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Showing posts from May, 2024

01. चैत्र मास के व्रत (कृष्णपक्ष)

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01. चैत्र मास के व्रत (कृष्णपक्ष) चैत्र मास के व्रत कृष्णपक्ष आरम्भका निवेदन - प्रत्येक प्रयोजनके सभी व्रत मास', पक्ष और तिथि-वारादिके सहयोगसे सम्पन्न होते हैं। मास चार प्रकारके माने गये हैं। वे सौर, सावन, चान्द्र और नाक्षत्र नामोंसे प्रसिद्ध हैं। उनमें सूर्यसंक्रान्तिके आरम्भसे उसकी समाप्तिपर्यन्तका 'सौर', सूर्योदयसे सूर्योदय-पर्यन्तके एक दिन-जैसे ३० दिनका 'सावन'३, शुक्ल और कृष्णपक्षका 'चान्द्र और अश्विनीके आरम्भसे रेवतीके अन्ततकके चन्द्रभोगका 'नाक्षत्र'५ मास होता है। ये सब प्रयोजनके अनुसार पृथक् पृथक् लिये जाते हैं- यथा विवाहादिमें 'सौर', यज्ञादिमें 'सावन', श्राद्ध आदिमें 'चान्द्र' और नक्षत्रसत्र (नक्षत्र-सम्बन्धी यज्ञ, यथा श्लेषा-मूलादिजन्मशान्ति) में 'नाक्षत्र' लिया जाता है।  मास-गणनामें वैशाख आदिकी अपेक्षा सर्वप्रथम चैत्र क्यों लिया गया ? इसका कारण यह है कि सृष्टिके आरम्भ (अथवा ज्योतिर्गणनाके प्रारम्भ) में चन्द्रमा चित्रापर था (और चित्रा २४ चैत्रीको प्रायः १ होती ही है;) इस कारण अन्य महीनोंकी अपेक्षा चैत्र...

100.2. एकादशी व्रत कथा - एकादशी महात्म्य

एकादशी व्रत कथा - एकादशी महात्म्य हिन्दु पञ्चाङ्ग में प्रत्येक 11वीं तिथि को एकादशी व्रत का पालन किया जाता है। एक माह में दो एकादशी, अर्थात एक शुक्ल पक्ष में तथा दूसरी कृष्ण पक्ष में होती है।  भगवान विष्णु  के भक्तगण उनकी कृपा प्राप्ति हेतु एकादशी व्रत का पालन करते हैं। एकादशी उपवास एक तीन दिवसीय व्रत है। भक्तगण उपवास के दिन से एक दिन पूर्व मध्याह्नकाल में एक समय ही भोजन ग्रहण करते हैं, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि, अगले दिन पेट में भोजन के अंश शेष न रह जाये। भक्तगण एकादशी के दिन कठोर उपवास का पालन करते हैं तथा अगले दिन सूर्योदय पश्चात् ही उपवास खोलते हैं। एकादशी व्रत के समय सभी प्रकार के अन्न एवं अनाज का सेवन वर्जित होता है। भक्तगण अपनी इच्छा एवं शारीरिक शक्ति के अनुरूप निर्जला, केवल जल, केवल फल तथा एक समय फलाहार ग्रहण करके उपवास का पालन कर सकते हैं। हालाँकि, इस तथ्य का निर्धारण व्रत आरम्भ करने से पूर्व ही कर लेना चाहिये। परिचय एकादशी व्रत परिचय विधि विधान पूजन सामग्री एकादशी व्रत पारण उद्यापन एकादशी माहात्म्य एकादशी व्रत कथा - चातुर्मास्य से पूर्व उत्पन्ना एकादशी कथा  - ...

100.0. एकादशी

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भारतवर्ष धर्मप्राण देश है, स्पष्ट है कि भारतीय संस्कृति का मूलाधार भी धर्म ही है।यहाँ का एक-एक कण धर्म की भावना से ओत-प्रोत है। तैत्तिरीयारण्यक में कहा गया है –  ‘धर्मो विश्वस्य जगतः प्रतिष्ठा।  लोके धर्मिष्ठं प्रजा उपसर्पन्ति।  धर्मेण पापमपनुदन्ति।  धर्मे सर्वं प्रतिष्ठितम्।  तस्माद्धर्मं परमं वदन्ति। (१०।६३)’।  अर्थात् , धर्म सम्पूर्ण विश्व की प्रतिष्ठा है। धर्म में ही सब कुछ प्रतिष्ठित है। यही कारण है कि धर्म को श्रेष्ठ कहा गया है। और इस भारतीय संस्कृति तथा धर्म को सनातन कहा गया है क्योंकि यह अपौरुषेय है अर्थात् किसी पुरुष विशेषने इसे नहीं बनाया (जिस प्रकार से क्रिश्चियन और इस्लाम धर्म के प्रवर्त्तक ईसा मसीह और मुहम्मद साहब हुए)। भारतीयों के लिए गर्भाधान से लेकर परलोकपर्यन्त पुत्रपौत्रादि परम्पराक्रम में प्रति क्षण अनुष्ठित कार्यों के लिए धर्म अपना प्रकाश डालता है। वेद, स्मृति, और विभिन्न पुराणों से इस धर्म का प्रतिपादन किया गया है। चूँकि यह सनातन धर्म है अतः स्वयं भगवान् द्वारा प्रतिष्ठापित इस धर्म की रक्षा भी प्रभु स्वयमेव करते हैं। यही अवतार का रहस्य ...