100.0. एकादशी

भारतवर्ष धर्मप्राण देश है, स्पष्ट है कि भारतीय संस्कृति का मूलाधार भी धर्म ही है।यहाँ का एक-एक कण धर्म की भावना से ओत-प्रोत है। तैत्तिरीयारण्यक में कहा गया है – 
‘धर्मो विश्वस्य जगतः प्रतिष्ठा। 
लोके धर्मिष्ठं प्रजा उपसर्पन्ति। 
धर्मेण पापमपनुदन्ति। 
धर्मे सर्वं प्रतिष्ठितम्। 
तस्माद्धर्मं परमं वदन्ति। (१०।६३)’। 

अर्थात् , धर्म सम्पूर्ण विश्व की प्रतिष्ठा है। धर्म में ही सब कुछ प्रतिष्ठित है। यही कारण है कि धर्म को श्रेष्ठ कहा गया है। और इस भारतीय संस्कृति तथा धर्म को सनातन कहा गया है क्योंकि यह अपौरुषेय है अर्थात् किसी पुरुष विशेषने इसे नहीं बनाया (जिस प्रकार से क्रिश्चियन और इस्लाम धर्म के प्रवर्त्तक ईसा मसीह और मुहम्मद साहब हुए)। भारतीयों के लिए गर्भाधान से लेकर परलोकपर्यन्त पुत्रपौत्रादि परम्पराक्रम में प्रति क्षण अनुष्ठित कार्यों के लिए धर्म अपना प्रकाश डालता है। वेद, स्मृति, और विभिन्न पुराणों से इस धर्म का प्रतिपादन किया गया है। चूँकि यह सनातन धर्म है अतः स्वयं भगवान् द्वारा प्रतिष्ठापित इस धर्म की रक्षा भी प्रभु स्वयमेव करते हैं। यही अवतार का रहस्य भी है। जब-जब इस सनातन धर्म में कोई विक्षेपादि होता है तब-तब हरि विभिन्न अवतार (अंशावतार, कलावतार आदि) लेकर इसको निर्माल्य प्रदान करते हैं। इसी कड़ी में हमारे जगद्गुरु आद्यरामानन्दाचार्य भी हैं—

सोऽवातरज्जगन्मध्ये जन्तूनां भवसङ्कटात्। 
पारं कर्तुं ह धर्मात्मा रामानन्द: स्वयं स्वभूः॥१॥ 
माघे कृष्णसप्तम्यां चित्रानक्षत्रसंयुते। 
कुम्भलग्ने सिद्धियोगे सप्तदण्डोदगे रवौ॥२॥ 
रामानन्दः स्वयं रामः प्रादुर्भूतो महीतले। 
कलौ लोके मुनिर्जातः सर्वजीवदयापरः॥३॥

भगवदवतार जगद्गुरु आद्य रामानन्दाचार्य ने प्रपन्न भक्तों और वैष्णवों के कल्याणार्थ व्रतोपवासादि का भी विधान किया है जिसमें एकादशी, रामनवमी, जानकीनवमी, हनुमज्जन्मोत्सव, नृसिंहजयन्ती, कृष्णाष्टमी, वामनद्वादशी तथा रथयात्रादि व्रतों एवं उत्सवों में सम्मिलित होने का आदेश भी दिया है। इन सारे व्रतोत्सवों को कैसे निर्णीत करें इस पर उनका आशीर्वचन भी उपलब्ध है। परन्तु इस लेख में केवल एकादशी-निर्णय की चर्चा की जायेगी। एकादशी को हरिवासर कहा गया है। भविष्यपुराण का वचन है—
शुक्ले वा यदि वा कृष्णे विष्णुपूजनतत्परः। 
एकादश्यां न भुञ्जीत पक्षयोरुभयोरपि ॥

अर्थात्, विष्णुपूजा परायण होकर दोनों पक्षों (शुक्ल और कृष्ण) की ही एकादशी में उपवास करना चाहिये। 

लिङ्गपुराण में तो और भी स्पष्ट कहा है—
गृहस्थो ब्रह्मचारी च आहिताग्निस्तथैव च। 
एकादश्यां न भुञ्जीत पक्षयोरुभयोरपि॥
अर्थात्, गृहस्थ, ब्रह्मचारी, सात्त्विकी किसी को भी एकादशी [दोनों पक्षों (शुक्ल और कृष्ण)] के दिन भोजन नहीं करना चाहिये। अब प्रश्न उठता है कि एकादशी व्रत का निर्धारण कैसे हो? 

वशिष्ठस्मृति के अनुसार दशमी विद्धा एकादशी संताननाशक होता है और विष्णुलोकगमन में बाधक हो जाता है। यथा—
दशम्येकादशी यत्र तत्र नोपवसद्बुध:। 
अपत्यानि विनश्यन्ति विष्णुलोकं न गच्छति॥

अतः यह परमावश्यक है कि एकादशी दशमीविद्धा (पूर्वविद्धा) न हो। हाँ द्वादशीविद्धा (परविद्धा) तो हो ही सकती है क्योंकि 
‘पूर्वविद्धातिथिस्त्यागो वैष्णवस्य हि लक्षणम्’ (नारदपाञ्चरात्र)। लेकिन वेध-निर्णय का सिद्धान्त भी सर्वसम्मत नहीं है। निम्बार्क सम्प्रदाय में स्पर्शवेध प्रमुख है।उनके अनुसार यदि सूर्योदय में एकादशी हो परन्तु पूर्वरात्रि में दशमी यदि आधी रात को अतिक्रमण करे अर्थात् दशमी यदि सूर्योदयोपरान्त ४५ घटी से १ पल भी अधिक हो तो एकादशी त्याग कर महाद्वादशी का व्रत अवश्य करे। यथा—
अर्धरात्रमतिक्रम्य दशमी दृश्यते यदि। 
तदा ह्येकादशीं त्यक्त्वा द्वादशीं समुपोषयेत्॥

(कूर्मपुराण)। परन्तु कण्व स्मृति के अनुसार अरुणोदय के समय दशमी तथा एकादशी का योग हो तो द्वादशी को व्रत कर त्रयोदशी को पारण करना चाहिये। यथा—
अरुणोदयवेलायां दशमीसंयुता यदि । 
तत्रोपोष्या द्वादशी स्यात्त्रयोदश्यां तु पारणम्॥

यहाँ पुराण और स्मृति के निर्देश में भिन्नता पायी जा रही है अतः शास्त्र-सिद्धान्त से स्मृति-वचन ही बलिष्ठ होता है। अतः यही सिद्धान्त बहुमान्य है। अपने रामानन्द-सम्प्रदाय का मत है कि वैष्णवों को वेध रहित एकादशी का व्रत रखना चाहिये।यदि अरुणोदय-काल में एकादशी दशमी से विद्धा हो तो उसे छोड़कर द्वादशी का व्रत करना चाहिये—
एकादशीत्यादिमहाव्रतानि कुर्याद्विवेधानि हरिप्रियाणि। 
विद्धा दशम्या यदि साऽरुणोदये स द्वादशीन्तूपवसेद्विहाय ताम्॥

(श्रीवैष्णवमताब्जभास्कर, ६७)। उदाहरणार्थ, भाद्रपद शु. ११ रविवार २०७० को उदया तिथि में एकादशी तो है पर पूर्ववर्ती दिन (शनिवार) दशमी की समाप्ति २८:४६ बजे हो रही है जो सूर्योदय (५:५२ बजे) से मात्र १घंटा ६ मि. अर्थात् पौने तीन घटी पहले है अतः अरुणोदय काल (२८:१६ बजे) में यह एकादशी दशमी-विद्धा है। फलतः इसे त्यागकर भाद्रपद शु. १२ सोमवार को पद्मा एकादशी का व्रत विहित है। यह वेध भी चार प्रकार का होता है- 
(१) सूर्योदय से पूर्व साढ़े तीन घटी का काल अरुणोदय वेध है 
(२) सूर्योदय से पूर्व २ घटी का काल अति-वेध है 
(३) सूर्य के आधे उदित हो जाने पर महावेध काल है तथा 
(४) सूर्योदय में तुरीय योग होता है। यथा—
घटीत्रयंसार्द्धमथारुणोदये वेधोऽतिवेधो द्विघटिस्तुदर्शनात्।
रविप्रभासस्य तथोदितेऽर्द्धे सूर्येमहावेध इतीर्यते बुधैः॥ 
योगस्तुरीयस्तु दिवाकरोदये तेऽर्वाक् सुदोषातिशयार्थबोधकाः।

(श्रीवैष्णवमताब्जभास्कर, ७१-७२)। सूर्योदयकाल से पूर्व दो मुहुर्त संयुक्त एकादशी शुद्ध है और शेष सभी विद्धा हैं—
पूर्णेति सूर्योदयकालतः या प्राङ्मुहूर्तद्वयसंयुता च। 
अन्या च विद्धा परिकीर्तिता बुधैरेकादशी सा त्रिविधाऽपि शुद्धा॥

(श्रीवैष्णवमताब्जभास्कर, ७३)। शुद्धा एकादशी के भी तीन भेद हैं। यथा—
एका तु द्वादशी मात्राधिका ज्ञेयोभयाधिका। 
द्वितीया च तृतीया तु तथैवानुभयाधिका॥ 
तत्राद्या तु परैवास्ति ग्राह्या विष्णुपरायणैः। 
शुद्धाप्येकादशी हेया परतो द्वादशी यदि ॥ 
उपोष्य द्वादशीं शुद्धान्तस्यामेव च पारणम्। 
उभयोरधिकत्वे तु परोपोष्या विचक्षणैः॥

(श्रीवैष्णवमताब्जभास्कर, ७४-७६) अर्थात्, एक वह जिसमें केवल द्वादशी अधिक हो, दूसरी जिसमें दोनों अधिक हों तथा तीसरी जिसमें दोनों में कोई भी अधिक न हो। (अब इनमें से किसे ग्रहण किया जाय। जगद्गुरु आद्य रामानन्दाचार्य-चरण का आदेश है –) इनमें से वैष्णवों को प्रथम एकादशी अर्थात् द्वादशी मात्र का ग्रहण करना चाहिये, यदि परे द्वादशी की वृद्धि हो तो शुद्ध एकादशी भी छोड़ देनी चाहिये। विज्ञ-जनों को एकादशीरहित शुद्ध षष्ठीदण्डात्मक द्वादशी में उपवास कर अगले दिन अवशिष्ट द्वादशी में ही पारण भी कर लेना चाहिये। दोनों की अधिकता में पर का उपवास करना चाहिये। आगे आचार्य-चरण ने अष्टविध एकादशी का वर्णन इस प्रकार किया है—
उन्मीलिनी वञ्जुलिनी सुपुण्याः सा त्रिस्पृशाऽथो खलु पक्षवर्द्धिनी । 
जया तथाऽष्टौ विजया जयन्ती द्वादश्य एता इति पापनाशिनी॥

(श्रीवैष्णवमताब्जभास्कर, ७७) अर्थात्, उन्मीलिनी, वञ्जुलिनी, त्रिस्पर्शा, पक्षवर्द्धिनी, जया, विजया, जयन्ती और पापनाशिनी ये आठ द्वादशियाँ अत्यन्त पवित्र हैं। पद्मपुराणानुसार भी—

एकादशी तु संपूर्णा वर्द्धते पुनरेव सा। 
द्वादशी न च वर्द्धेत कथितोन्मीलिनीति सा॥ 
संपूर्णैकादशी यत्र द्वादशी च यथा भवेत्। 
त्रयोदश्यां मुहुर्त्तार्द्धं वञ्जुली सा हरिप्रिया॥ 
शुक्ले पक्षेऽथवा कृष्णे यदा भवति वञ्जुली। 
एकादशीदिने भुक्त्वा द्वादश्यां कारयेद्व्रतम्॥

यहाँ स्पष्टतः कहा गया है कि शुक्ल अथवा कृष्ण पक्ष को यदि वञ्जुली हो तो एकादशी को भोजन कर द्वादशी का व्रत करें। ब्रह्मवैवर्तपुराण में भी यह वर्णन आया है। यथा—

एकादशी भवेत्पूर्णा परतो द्वादशी भवेत्। 
तदा ह्येकादशीं त्यक्त्वा द्वादशीं समुपोषयेत्॥ 
पर्वाच्युतजयावृद्धौ ईश दुर्गान्तकक्षये। 
शुद्धाष्येकादशी त्याज्या द्वादश्यां समुपोषणम् ॥ 

इनमें चार तिथिजन्य और चार नक्षत्रजन्य हैं जो इस प्रकार हैं-
१. उन्मीलनी : अरुणोदय काल में सम्पूर्ण एकादशी अगले दिन प्रातः द्वादशी में वृद्धि को प्राप्त हो परन्तु द्वादशी की वृद्धि किसी भी दशा में न हो। 
२. वञ्जुली:- एकादशी की वृद्धि न होकर द्वादशी की वृद्धि हो अर्थात् त्रयोदशी में मुहुर्तार्ध द्वादशी हो। (पारण द्वादशी मध्य होनी चाहिये)। उदाहरणार्थ आश्विन कृष्ण ११ सोमवार २०७० को एकादशी रहते हुए भी द्वादशी की वृद्धि परिलक्षित हो रही है अतः इन्दिरा एकादशी व्रत को सोमवार को त्यागकर मंगलवार को वञ्जुली महाद्वादशी के रुप में की जायेगी।ध्यान रहे कि पारण द्वादशी मध्य विहित होने के कारण इसे ०६:०४ तक कर लेनी चाहिए। 
३. त्रिस्पर्शा:- अरुणोदय काल में एकादशी, सम्पूर्ण दिन-रात्रि में द्वादशी तथा पर दिन त्रयोदशी हो, किन्तु किसी भी दशामें दशमीयुक्त नहीं हो। 
४. पक्षवर्द्धिनी:- अमावस्या अथवा पूर्णिमा की वृद्धि ।यथा वैशाख कृष्ण ११ रविवार २०७० को एकादशी वर्तमान होते हुये भी अमावस्या की वृद्धि होने के कारण वैशाख कृष्ण १२ सोमवार (पक्षवर्द्धिनी महाद्वादशी) को वरुथिनी एकादशी का उपवास विहित है। 

चार नक्षत्रयुक्त महाद्वादशी व्रत ये हैं यदि शुक्लपक्षीय द्वादशी 
१.पुनर्वसुयुता (जया) 
२. श्रवणयुता (विजया) 
३. रोहिणीयुता (जयन्ती) तथा 
४. पुष्ययुता (पापनाशिनी)। 

एकादशी (महाद्वादशी) व्रतोपवास का अन्त पारण के साथ होता है। कूर्मपुराणानुसार एकादशी को व्रत एवं द्वादशी को पारण होना चाहिए। किन्तु त्रयोदशी को पारण नहीं होना चाहिए, क्योंकि वैसा करने से १२ एकादशियों के पुण्य नष्ट हो जाते हैं । 

उदाहरणार्थ चैत्र शु. ११ सं. २०७० (२२ अप्रिल २०१३ सोमवार) के दिन कामदा एकादशी है अतः परवर्ती दिन मङ्गलवार अर्थात् २३ अप्रिल २०१३ को पारण करना होगा। परन्तु ध्यान रहे कि पारण सूर्योदयोपरान्त ७:४९ बजे के पहले ही कर लेना होगा। 

परन्तु एक दिन पूर्व दशमीयुक्ता एकादशी हो और दूसरे दिन एकादशीयुक्ता द्वादशी तो उपवास तो द्वादशी को होता है, किन्तु यदि उपवास के बाद द्वादशी न हो तो त्रयोदशी के दिन पारण होगा। 

उदाहरणार्थ फाल्गुन कृष्ण ११ मंगलवार सं. २०७० (२५ फरवरी २०१४) के अरुणोदयकाल में दशमी है और सूर्योदय में एकादशी है अतः आचार्य-चरण के अनुसार यह एकादशी दशमीविद्धा अतः अकरणीय है। अतः विजया एकादशी का व्रतोपवास फाल्गुन कृष्ण १२ बुधवार सं. २०७० (२६ फरवरी २०१४) को होगा । परन्तु अगले दिन गुरुवार २७ फरवरी २०१४ को त्रयोदशी तिथि है अतः द्वादशी तिथि की अप्राप्ति में त्रयोदशी को ही पारण होगा।जैसा कि वायुपुराण में कहा है-
कलाप्येकादशी यत्र परतो द्वादशी न चेत्। 
पुण्यं क्रतुशतस्योक्तं त्रयोदश्यां तु पारणम्॥

एक और भी बात। पारण में आचार्य-चरण ने यह भी आदेश किया है कि
आषाढ़भाद्रोर्जसितेषु संगता मैत्रश्रवोऽन्त्यादिगताद्व्युपान्त्यैः। 
चेद्द्वादशी तत्र न पारणं बुधः पादैः प्रकुर्याद्व्रतवृंदहारिणी॥

(श्रीवैष्णवमताब्जभास्कर, ७८)। अर्थात् यदि द्वादशी आषाढ़, भाद्र और कार्तिक मास शुक्ल पक्ष में अनुराधा, श्रवण, रेवती के आदि चरण, द्वितीय चरण और तृतीय चरण के साथ संयुक्त हो तो उसमें विद्वान् पारण न करे, क्योंकि वह समस्त व्रतों का नाशक है। अतः व्रतोपवास हेतु एकादशी-निर्णय एवं व्रत-समाप्ति के लिए उसके पारण-काल का निर्णय एकादशी का परमावश्यक अङ्ग है। यहाँ पर यह भी ध्यान देना गौरव की बात है कि एकादशी-सम्बन्धी आचार्यचरणनिर्दिष्ट उपरोक्त व्यवस्था हेमाद्रि (चतुर्वर्ग चिन्तामणि के रचयिता, कालखंड १२६०-७०) तथा चंडेश्वर (गृहस्थरत्नाकर आदि के रचयिता, कालखंड १३००-१३७०) के समकालीन है जिसका बहुत से विज्ञजन व्यवहार कर रहे हैं परन्तु उनके लिए तो रौरव की बात है जो लोग इसे अपनी परम्परा द्वारा उपदिष्ट मान रहे हैं । धर्म की आड़ में सत्य को छिपाना भी महान अधर्म है जिससे वैष्णवों को बचना चाहिए। ॥ नमो राघवाय ॥

एकादशी
एकादशी ( संस्कृत : एकादशी , रोमनकृत : एकादशी , शाब्दिक अर्थ  'ग्यारहवां दिन') वैदिक कैलेंडर माह में बढ़ते ( शुक्ल पक्ष ) और घटते ( कृष्ण पक्ष) चंद्र चक्र का ग्यारहवां चंद्र दिवस ( तिथि ) है। [1] एकादशी को वैष्णववाद और शैववाद , सनातन धर्म के दो प्रमुख मार्गों, में लोकप्रिय रूप से मनाया जाता है । अनुयायी उपवास करके या केवल प्रतीकात्मक रूप से भगवान विष्णु और शिव की पूजा करते हैं; विचार हमेशा आत्म-अनुशासन और उपवास के लाभों को प्राप्त करने का था और यह सनातम धर्म प्रथाओं के माध्यम से जीवन के तरीके से जुड़ा था। [2] [3]

हिंदू धर्म में, एकादशी पर उपवास का प्राथमिक उद्देश्य मन और शारीरिक इंद्रियों पर नियंत्रण हासिल करना और इसे आध्यात्मिक प्रगति की ओर ले जाना है। इसके अलावा, उपवास के कई स्वास्थ्य लाभ भी हैं। [4] एकादशी का व्रत तीन दिनों तक चलता है। भक्त यह सुनिश्चित करने के लिए कि अगले दिन पेट में कोई बचा हुआ भोजन न रहे, एकादशी के दिन (दसमी) से एक दिन पहले दोपहर में एक बार भोजन करते हैं। भक्त एकादशी के दिन बिना भोजन या पानी के सख्त उपवास रखते हैं और अगले दिन (द्वादशी) सूर्योदय के बाद ही उपवास तोड़ते हैं। [5] चूंकि उपवास का यह रूप बहुत कठोर है और स्वास्थ्य और जीवन पसंद कारणों से जीवन के सभी क्षेत्रों के लोगों के लिए संभव नहीं है, इसलिए अधिकांश भक्तों द्वारा उपवास का अधिक उदार तरीका अपनाया जाता है। [ प्रशस्ति - पत्र आवश्यक ]

इस विधि से एकादशी व्रत का पालन करने के विभिन्न तरीके हैं, [6] जिसमें भोजन और पानी से पूर्ण परहेज़ से लेकर आंशिक उपवास या केवल विशिष्ट प्रकार के भोजन का सेवन शामिल है। भक्त उपवास का तरीका चुन सकता है जो उसके स्वास्थ्य, जीवनशैली और आध्यात्मिक लक्ष्यों के अनुरूप हो। [ प्रशस्ति - पत्र आवश्यक ]

निर्जला: भक्त एकादशी के दिन बिना पानी के भी पूरा उपवास रखते हैं।
जलाहार: इस प्रकार की एकादशी व्रत में भक्त केवल पानी का सेवन करते हैं।
क्षीरभोजी: इस प्रकार की एकादशी व्रत में भक्त दूध और दूध से बने उत्पादों का सेवन करते हैं।
फलाहारी: इस प्रकार की एकादशी व्रत में भक्त केवल फलों का सेवन करते हैं।
नकटाभोजी: इस प्रकार की एकादशी व्रत में भक्त एक बार भोजन करते हैं। आम तौर पर, दिन के उत्तरार्ध में साबूदाना, सिंघाड़ा, शकरकंद (रतालू), आलू और मूंगफली से बने व्यंजन खाते हैं। हालाँकि, भोजन में चावल, गेहूं, बाजरा या दाल और बीन्स जैसे अनाज नहीं होने चाहिए। [ प्रशस्ति - पत्र आवश्यक ]

प्रत्येक एकादशी का समय चंद्रमा की स्थिति के अनुसार होता है। [7] भारतीय कैलेंडर पूर्णिमा से अमावस्या तक की प्रगति को पंद्रह बराबर चापों में विभाजित करता है। प्रत्येक चाप एक चंद्र दिवस को मापता है, जिसे तिथि कहा जाता है । चंद्रमा को एक विशेष दूरी तय करने में जितना समय लगता है, वह उस चंद्र दिवस की लंबाई होती है। एकादशी का तात्पर्य 11वीं तिथि या चंद्र दिवस से है। ग्यारहवीं तिथि बढ़ते और घटते चंद्रमा के एक सटीक चरण से मेल खाती है। चंद्र माह के शुक्ल पक्ष में, एकादशी को चंद्रमा लगभग 3/4 पूर्ण दिखाई देगा, और चंद्र माह के अंधेरे पक्ष में, एकादशी पर चंद्रमा लगभग 3/4 पूर्ण दिखाई देगा। [ प्रशस्ति - पत्र आवश्यक ]

एक कैलेंडर वर्ष में आमतौर पर 24 एकादशियाँ होती हैं। कभी-कभी, हिंदू लीप वर्ष में दो अतिरिक्त एकादशियां होती हैं। [8] प्रत्येक एकादशी के दिन को विशेष लाभ माना जाता है जो विशिष्ट गतिविधियों के प्रदर्शन से प्राप्त होते हैं। [9]

भागवत पुराण (स्कंध IX, अध्याय 4) में विष्णु के भक्त अंबरीश द्वारा एकादशी के पालन का उल्लेख है। [10]

दंतकथा
एकादशी के पीछे की कहानी विष्णु के शयन या ध्यान की अवस्था से शुरू हुई। मुर्दानव नाम का राक्षस उनके पास आया और विष्णु पर हमला करने का प्रयास किया। उस समय, विष्णु की 11वीं इंद्रिय (जिसे अक्सर "मन" कहा जाता है) से एक सुंदर महिला प्रकट हुई। मुग्ध मुर्दानव ने उससे शादी करने के लिए कहा, जिस पर उसने जवाब दिया कि वह तभी सहमत होगी जब वह उसे युद्ध में हरा देगा। जैसे ही वे लड़े, मुर्दानव अंततः मारा गया। विष्णु अपनी नींद से जाग गए, और महिला को "एकादशी" नाम देकर आशीर्वाद दिया, और कहा कि यदि कोई इस दिन उपवास करेगा, तो उसे मोक्ष (जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति) प्राप्त होगा। [ प्रशस्ति - पत्र आवश्यक ]

एकादशियों की सूची
नीचे दी गई तालिका में एकादशियों का वर्णन किया गया है और वे वर्ष में कब आती हैं।

वैदिक चंद्र मास पीठासीन देवता कृष्ण पक्ष एकादशी शुक्ल पक्ष की एकादशी 2024 तारीखें
चैत्र (चैत्र, मार्च-अप्रैल) राम/ विष्णु पापविमोचनि एकादशी कामदा एकादशी पापमोचनी/पापाविमोचनी एकादशी: 4-5 अप्रैल
कामदा एकादशी : 18-19 अप्रैल [नोट 1] (कुछ परंपराओं में 17-18 अप्रैल) [11] [12]

वैशाख (वैशाख, अप्रैल-मई) मधुसूदन ( विष्णु ) वरुथिनी एकादशी मोहिनी एकादशी वरूथिनी एकादशी : 3-4 मई
मोहिनी एकादशी: 18-19 मई [11] [12]

ज्येष्ठ (ज्येष्ठ, मई-जून) त्रिविक्रम ( विष्णु ) अपरा एकादशी निर्जला एकादशी वैष्णव अपरा और अपरा एकादशी: 2-3 जून
निर्जला एकादशी : 17-18 जून [11] [12]

आषाढ़ (आषाढ़, जून-जुलाई) वामन योगिनी एकादशी शयनी एकादशी योगिनी एकादशी: : 1-2 जुलाई
देवशयनी (शयनी) एकादशी : 16-17 जुलाई (कुछ परंपराओं में 15 -16 जुलाई) [11] [12]

श्रावण (श्रावण, जुलाई-अगस्त) श्रीधर कामिका एकादशी श्रावण पुत्रदा एकादशी कामिका एकादशी: 30-31 जुलाई [नोट 1]
श्रावण पुत्रदा एकादशी : 15-16 अगस्त [नोट 1] [11] [12]

भाद्रपद
(भाद्रपद, अगस्त-सितंबर) हृषिकेश [13] अन्नदा एकादशी पार्श्व एकादशी अजा (अन्नदा) एकादशी: 29-30 अगस्त [नोट 1]
पार्श्व एकादशी: 13-14 सितंबर [11] [12]

अश्विन (अश्विन, सितंबर-अक्टूबर) पद्मनाभ इंद्रा एकादशी [14] पसंकुसा एकादशी इंदिरा (इंद्र) एकादशी: 27-28 सितंबर [नोट 1]
पापांकुशा एकादशी: 13-14 अक्टूबर [11] [12]

कार्तिक (कार्तिक, अक्टूबर-नवंबर) दामोदरा रमा एकादशी [15] प्रबोधिनी एकादशी रमा एकादशी: 27-28 अक्टूबर [नोट 1]
देवउत्थान एकादशी : 11-12 नवंबर [11] [12]

मार्गशीर्ष (अग्रहायण)
(मार्गशीर्ष, नवंबर-दिसंबर) केशव उत्पन्ना एकादशी मोक्षदा एकादशी / वैकुण्ठ एकादशी उत्पन्ना एकादशी: 26-27 नवंबर [नोट 1]
मोक्षदा और गुरुवयूर (वैकुंठ) एकादशी : 11-12 दिसंबर [11] [12]

पौष (पौष, दिसंबर-जनवरी) नारायण (विष्णु/कृष्ण) सफला एकादशी पौष पुत्रदा एकादशी / वैकुंठ एकादशी सफला एकादशी: 7-8 जनवरी (पूर्वी परंपराओं में 11-12 जनवरी)
पौष पुत्रदा एकादशी : 20-21 जनवरी [11] [12]

माघ (माघ, जनवरी-फरवरी) माधव षटतिला एकादशी भैमी एकादशी / जया एकादशी षटतिला एकादशी: 5-6 फरवरी [नोट 1]

भैमी/जया एकादशी: 19-20 फरवरी [11] [16] [17] [12]
फाल्गुन (फाल्गुन, फरवरी-मार्च) गोविंदा ( कृष्णा ) विजया एकादशी आमलकी एकादशी वैष्णव विजया और विजया एकादशी: 6-7 मार्च (कुछ परंपराओं में 4-5 मार्च) [नोट 1]
आमलकी एकादशी : 20-21 मार्च [11] [12]

अधिक मास
(अधिक, 2-3 वर्ष में एक बार) पुरूषोत्तम पद्मिनी विशुद्धा एकादशी परम शुद्धा एकादशी 


एकादशी क्या है?

एकादशी शब्द संस्कृत भाषा से लिया गया है, जिसका अर्थ ग्यारह होता है। एकादशी को हिंदू संस्कृति में एक अत्यंत शुभ दिन माना जाता है। एकादशी मास में दो बार आती है, कृष्ण पक्ष में एवं शुक्ल पक्ष में। पूर्णिमा से अमावस्या तक की अवधि के 15 दिनों को कृष्णपक्ष एवं अमावस्या से पूर्णिमा तक की अवधि के 15 दिनों को शुक्लपक्ष कहा जाता है। कृष्ण पक्ष एवं शुक्ल पक्ष का ग्यारहवा दिन एकादशी होता है। आध्यात्मिक जीवन में प्रगति के लिए एकादशी के व्रत को महत्वपूर्ण माना जाता है।

एकादशी का महत्व (Importance of Ekadashi)

पुराणों के अनुसार, भगवान विष्णु ने एक देवी की रचना की थी जिनको एकादशी नाम दिया गया। एकादशी की रचना एक दानव मूरा को पराजित करने के लिए की गयी थी। एकादशी के द्वारा उस दानव की मृत्यु के उपरांत भगवान विष्णु ने इस कार्य से प्रसन्न होकर एकादशी को वरदान दिया कि जो भी भक्त एकादशी व्रत का पालन करेंगे तो वह सभी पापों और अशुद्धियों से मुक्त होने में सफल होंगे एवं निश्चित रूप से मोक्ष प्राप्त करेंगे।

एकादशी के व्रत का वास्तविक उद्देश्य सर्वोच्च भगवान श्रीकृष्ण के प्रति आस्था और प्रेम को बढ़ाना है। एकादशी का व्रत भगवान श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है जो एकादशी के दिन उपवास करने वाले व्यक्तियों के पापों का उद्धार करते हैं। एकादशी के व्रत से धार्मिक मनोवृत्ति और आध्यात्मिकता का विकास होता है। सभी व्रतों में से एकादशी भगवान श्रीकृष्ण को सबसे अधिक प्रसन्न करने वाली है। एकादशी का व्रत करके और हरे कृष्ण मंत्र का जप करके और इसके नियमित पालन से भक्तगण कृष्णभावनामृत में उन्नति करते हैं।

एकादशी व्रत पालन का अर्थ अन्न खाने से परहेज करने से कहीं अधिक है। एकादशी व्रत का पालन करने की पारंपरिक प्रणाली उपवास करना और रात्रि जागरण है और भगवान की महिमा का जप करना है। सभी भक्तों को कृष्णभावनामृत में आगे बढ़ने के लिए एकादशी का लाभ उठाने का प्रयास करना चाहिए। ब्रह्म-वैवर्त पुराण के अनुसार जो भक्त एकादशी के दिन उपवास करते हैं, वह सभी प्रकार के पापों से मुक्त हो जाते है और पवित्र जीवन में उन्नति करते है। मूल सिद्धांत केवल उपवास करना नहीं है, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अपनी आस्था और प्रेम को बढ़ाना है। श्रील प्रभुपाद के कथनानुसार भक्त पर्याप्त समय के साथ एकादशी पर पच्चीस माला या अधिक बार जप करें। सिर्फ पच्चीस माला ही नहीं, जितना हो सके जप करना चाहिए। असली एकादशी का अर्थ है उपवास और जप। जब कोई उपवास करता है, तो हरे कृष्ण मंत्र का जप सरल हो जाता है। अतः एकादशी के दिन जितना ​​संभव हो अन्य व्यवसाय को स्थगित करें, जब तक कि कोई आवश्यक कार्य न हो।

एकादशी के फायदे

एकादशी व्रत के मुख्य फायदे निम्नलिखित है।

  1. एकादशी के दिन उपवास करना किसी भी तीर्थ स्थान पर जाने के बराबर है। इस व्रत का पुण्य प्रसिद्ध अश्वमेध यज्ञ के समान माना जाता है।
  2. आध्यात्मिक जीवन में प्रगति होती है।
  3. यह मन, शरीर और आत्मा को शुद्ध करता है।
  4. इन्द्रियों पर अधिक नियंत्रण और धैर्य प्राप्त होता है।
  5. आत्म-अनुशासन और आत्म-नियंत्रण प्राप्त होता है।
  6. शरीर के विषाक्त पदार्थो से मुक्ति मिलती है। शरीर हल्का एवं ऊर्जावान महसूस करता है।
  7. मानसिक ऊर्जा सही दिशा में निर्देशित होती है।
  8. सुखद जीवन की प्राप्ति होती है।
  9. सुख समृद्धि एवं शांति प्राप्त होती है।
  10. मोह माया के बंधनो से मुक्ति मिलती है।
  11. समस्त पापों से मुक्ति मिलती है।
  12. एकादशी का व्रत केवल शरीर और आत्मा को शुद्ध करने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि चयापचय (Metabolism) और अन्य जैविक क्रियाओं के वैज्ञानिक अनुप्रयोग में इसकी प्रासंगिकता पायी जाती है।

एकादशी व्रत कौन रख सकते हैं 

एकादशी व्रत का पालन किसी भी आयु के व्यक्ति कर सकते हैं। जैसे ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यासी, विधवा, विधुर आदि। बाल्यावस्था से वृद्धावस्था तक कोई भी भक्त इस व्रत को रख सकता है। केवल दुर्लभ मामलों में, यदि आप शारीरिक रूप से उपवास करने में असमर्थ हैं तो यह व्रत मत रखिये।

एकादशी व्रत कैसे करते हैं

  1. एकादशी का दिन भक्ति को प्रगाढ़ करने के लिए सुअवसर होता है।
  2. एकादशी के दिन ब्रह्ममुहूर्त में उठ कर स्नान करना चाहिए एवं भगवान श्रीकृष्ण की पूजा अर्चना करनी चाहिए।
  3. भगवान श्रीकृष्ण तथा उनके विभिन्न अवतारों की लीलाओं का स्मरण करना चाहिए।
  4. जितनी बार संभव हो हरे कृष्ण महा–मंत्र का जाप करें।
  5. भगवद–गीता और श्रीमद्–भागवतम जैसे शास्त्रों को पढ़ना।
  6. भगवान विष्णु / श्रीकृष्ण के मंदिर में जाना चाहिए।
  7. इस व्रत को रखने वालों को हिंसा, छल–कपट और झूठ से दूर रहना चाहिए और परोपकारी कार्यों में शामिल होना चाहिए।
  8. भक्त को अधिक से अधिक समय आध्यात्मिक गतिविधियों के लिए उपयोग करना चाहिए। इस दिन कीर्तन एवं रात्रि जागरण का भी बहुत महत्व है।

एकादशी व्रत में क्या खाएं क्या न खाएं

एकादशी का व्रत खाद्य पदार्थों के नियमो के साथ किया जाता है जिनका पालन करना अति आवश्यक है।

क्या खाना चाहिए?

एकादशी के व्रत में निम्नलिखित खाद्य पदार्थ खाये जा सकते हैं।

  1. आलू
  2. कुट्टू का आटा से बने व्यंजन
  3. सिंघाड़े का आटा से बने व्यंजन
  4. राजगिरा का आटा से बने व्यंजन
  5. दूध एवं दूध से बने हुए व्यंजन
  6. ताजे फल एवं घर में निकाला हुआ फलो का रस
  7. सूखे मेवे
  8. सब्जियां जैसे कद्दू/सीताफल, लौकी/घीया, खीरा
  9. काली मिर्च और सेंधा नमक
  10. शकरकंद
  11. जैतून
  12. नारियल
  13. नारियल का तेल, जैतून का तेल, मूंगफली का तेल

क्या नहीं खाना चाहिए?

एकादशी के व्रत में निम्नलिखित खाद्य पदार्थो का सेवन वर्जित है

  1. चावल – एकादशी के व्रत में चावल का सेवन पूर्णतः वर्जित है। इस दिन चावल का सेवन करने से पुण्यों का विनाश हो जाता है।
  2. मांस, मदिरा, मछली एवं अण्डा
  3. प्याज एवं लहसुन
  4. सभी प्रकार के अनाज जैसे गेहूँ, ज्वार, बाजरा,जौ, जई, रागी आदि
  5. सभी प्रकार की दालें जैसे मूँग, मसूर, चना, अरहर, उड़द आदि
  6. फलियां/बीन्स एवं पत्तेदार सब्जियां
  7. सब्जियां जैसे फूलगोभी/बंदगोभी, बैंगन, मटर, गाजर, शलगम, मूली, ब्रोकली, शिमला मिर्च, भिंडी, करेला, गाजर, टमाटर
  8. मैदा से बने हुए व्यंजन
  9. शहद
  10. बेकिंग पाउडर
  11. बेकिंग सोडा
  12. कस्टर्ड
  13. कुछ मसाले जैसे हींग, जायफल, सरसो, सौंफ, मेथी, कलौंजी, अजवाइन,लौंग, इलायची
  14. बाजार के पैक फलो का रस
  15. दलिया
  16. पास्ता
  17. मैकरोनी
  18. डोसा/इडली

एकादशी व्रत का पारण

एकादशी व्रत का पारण किये बिना इस व्रत को पूरा नहीं माना जाता। एकादशी का व्रत रखने के बाद इस व्रत को खोलने की विधि को पारण कहा जाता है। एकादशी व्रत के अगले दिन सूर्योदय के बाद पारण किया जाता है। एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना अति आवश्यक है। उसी समय अवधि में ही पारण करना होता है। द्वादशी तिथि के भीतर पारण न करना पाप करने के समान होता है। पारण का समय जानने के लिए इस्कॉन द्वारा उपयोग किए जाने वाले वैष्णव कैलेंडर का उपयोग किया जाना चाहिए, क्योंकि एकादशी और महत्वपूर्ण त्योहारों के लिए निर्धारित तिथियां प्रत्येक संप्रदाय में पंडितों द्वारा उपयोग की जाने वाली गणना की प्रणाली के अनुसार भिन्न हो सकती हैं।

द्वादशी के दिन स्नान के बाद भगवान कृष्ण की पूजा करे एवं उसके बाद भोजन ग्रहण करे। पारण का भोजन सात्विक होना चाहिए। जिस वस्तु के त्याग से आपने एकादशी व्रत किया है, उसी वस्तु के सेवन के साथ ही व्रत खोला जाता है। जैसे यदि आपने निर्जला व्रत किया है तो पारण जल ग्रहण करके किया जा सकता है। यदि आपने अन्न का त्याग करके व्रत किया है तो अन्न के सेवन से पारण किया जा सकता है। 

नोट : द्वादशी के दिन तुलसी को नहीं तोड़ना चाहिए 



हिंदू कैलेंडर के अनुसार, हर महीने आने वाली एकादशी बहुत ही शुभ एवं विशेष समय होता है. इस दिन को तिथि एवं समय अनुसार व्रत एवं नियम हेतु विशिष्ट माना गया है. इस दिन एकादशी का व्रत करने का विधान रहा है. इसी के साथ एकादशी व्रत के साथ एकादशी के पूजन और नियमों को ध्यान में रखते हुए यदि कार्य किए जाते हैं तो एकादशी व्रत के लाभ प्राप्त करने में सक्षम होते हैं. एकादशी का व्रत जहां मानसिक एवं शारीरिक रुप से शुद्धता देता है वहीं हमारी आध्यात्मिक चेतना को भी विकसित करने वाला होता है. आइये जान लेते हैं एकादशी के दिन के वो नियम सिद्धांत जिनसे प्राप्त होता है एकादशी व्रत का संपूर्ण फल.

एकादशी के नियम एवं सिद्धांत

हर माह दो एकादशी तिथियां आती हैं जो पंचांग गंणना द्वारा निर्धारित होती हैं. शास्त्रों में एकादशी व्रत को बहुत महत्वपूर्ण और खास माना गया है. यह व्रत भगवान विष्णु के पूजन निमित्त होते होता है. एकादशी का व्रत करने से सभी प्रकार की नेगटिविटी समाप्त होती है, भय से मुक्ति मिलती है, मानसिकत जागृत्ति उत्पन्न होती है तथा जीवन में शुभ गुण फल की प्राप्ति होती है. माना जाता है कि एकादशी का व्रत रखना विधि-विधान से पूजा करना नियमों के साथ इस दिन को व्यतीत करना बहुत महत्वपूर्ण होता है. शास्त्रों में इसे वैकुंठ धाम की प्राप्ति के साथ मोक्ष की प्राप्ति के मार्ग हेतु उत्तम माना गया है.

आइये जान लेते हैं एकादशी व्रत से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण नियम हैं. एकादशी के दिन कुछ ऐसे काम हैं जो हमें इस दिन भूलकर भी नहीं करने चाहिए. जान लेते हैं एकादशी के दिन क्या करना चाहिए और क्या नहीं.

Ekadashi Vrat Rules

एकादशी पर क्या करें और क्या न करें?

एकादशी व्रत के नियमों का आरंभ दशमी तिथि से ही आरंभ हो जाता है. दशमी तिथि से ही व्यक्ति को अपने आचार व्यवहार में शुद्धता को शामिल करना चाहिए.
दशमी के दिन से ही ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए एकादशी के नियम आरंभ होते हैं.
एकादशी तिथि के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना चाहिए.
एकादशी तिथि के दिन साफ स्वच्छ वस्त्र धारण करते हुए सूर्य उपासना करनी चाहिए.
एकादशी तिथि का व्रत करने से पूर्व भगवान विष्णु के समक्ष व्रत का संकल्प लिया जाता है.
एकादशी तिथि के दिन यदि व्रत न कर पाएं तो फलाहार एवं सात्विक आहार करते हुए नियमों को धारण कर सकते हैं.
एकादशी तिथि के दिन दोपहर में सोना, अपश्ब्द कहना, झूठ बोलना, क्रोध या छल कपट जैसी धारणा से बचना चाहिए.
एकादशी तिथि के दिन मांस-मदिरा जैसी तामसिकता से दूर रहना चाहिए.
एकादशी तिथि पर तुलसी को तोड़ना गलत होता है. दशमी तिथि पर ही तुलसी दल को एकत्रित कर लेना चाहिए.
एकादशी तिथि पर चावल का उपयोग सेवन रुप में वर्जित होता है.

एकादशी तिथि पर अवश्य करें ये कार्य

एकादशी तिथि के दिन श्री हरि का पूजन करना चाहिए.
तुलसी माता का पूजन करना चाहिए.
सात्विक शुद्ध आचारण को करना चाहिए.
एकादशी के दिन तीर्थ स्थल में स्नान-दान करना शुभ होता है.
एकादशी तिथि के दिन भागवत कथा पाठ करना एवं एकादशी कथा करना शुभ होता है.



अवधूत दास द्वारा एकादशी व्रत के पीछे का विज्ञान

एकादशी चंद्र चक्र का 11वां दिन है, पूर्णिमा और अमावस्या दोनों से।

पद्म पुराण में, एकादशी की निम्नलिखित प्रासंगिकता का वर्णन किया गया है:

जैमिनी ऋषि, एक प्रसिद्ध ऋषि, एक बार एकादशी व्रत के बारे में जिज्ञासु हो गए, इसलिए उन्होंने महान ऋषि व्यास से इसके बारे में पूछताछ की। व्यास ने कहा कि प्रारंभ में, जब संसार प्रकट हुआ, तो भगवान विष्णु ने एक राक्षसी प्राणी (पाप-पुरुष) बनाया जो सभी प्रकार के पापों का अवतार था। यह उन सभी प्राणियों को दंडित करने के लिए किया गया था जो बुराई का रास्ता चुनेंगे। इसके बाद, उन्होंने यमलोक - ब्रह्मांडीय प्रायश्चित्त की भी रचना की, ताकि जो भी पाप करे (पाप-पुरुष के लक्षणों के साथ) उसे वहां भेजा जाए।

एक बार यमलोक की यात्रा पर, भगवान विष्णु ने वहां "सुधार" कर रहे जीवित प्राणियों की दयनीय स्थिति देखी, और उन पर दया की। इसलिए उन्होंने अपने अस्तित्व से एकदशी का निर्माण किया, और निर्णय लिया कि जो कोई भी एकदशी का व्रत करेगा, वह अपने पापों से मुक्त हो जाएगा और उसे लौकिक प्रायश्चित्त में नहीं जाना पड़ेगा।

यह जानकर पापा-पुरुष चिंतित हो गए। वह तुरंत भगवान विष्णु के पास गया और प्रार्थना की कि जल्द ही इन एकादशियों के कारण उसे कोई जीविका नहीं मिलेगी। इसलिए भगवान के परम व्यक्तित्व ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि वह एकादशी के दिनों में सेम, अनाज और अनाज में निवास कर सकते हैं। इस प्रकार जो कोई भी एकादशी के दिन इनका सेवन करता है, वह उसे प्रभावित कर सकता है। इस पर पापा-पुरुष संतुष्ट हो गए।

एकादशी का दिन किसी के अपराधों को धोने के लिए एक अद्भुत दिन है, इसलिए इसे सम्मानपूर्वक भगवान हरि (सर्वोच्च भगवान भगवान) के दिन के रूप में भी मनाया जाता है।

इस बीच आधुनिक विज्ञान के अनुसार, यह ज्ञात है कि हमारे ग्रह पर हवा का दबाव अमावस्या (अमावस्या) और पूर्णिमा (पूर्णिमा) दोनों दिन चरम सीमा तक भिन्न होता है। इसका कारण सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी का कक्षीय पथ संयोजन है।

इसे अमावस्या और पूर्णिमा के दिन ज्वारीय तरंगों की प्रकृति में परिवर्तन से देखा जा सकता है। लहरें बहुत ऊंची और उग्र होती हैं, लेकिन अगले दिन से लहरें शांत हो जाती हैं, जो इस बात का संकेत है कि दबाव भी कम हो गया है।

अब इस तथ्य के आधार पर एकादशी व्रत के महत्व को दो प्रकार से समझाया जा सकता है:

1) विज्ञान के अनुसार आज हम जो खाना खाते हैं उसे हमारे दिमाग तक पहुंचने में लगभग 3-4 दिन का समय लगता है। अब, यदि हम एकादशी के दिन हल्का/तेज भोजन करते हैं, तो वह भोजन अमावस्या/पूर्णिमा के दिन तदनुसार मस्तिष्क तक पहुंच जाएगा।

इन दोनों दिनों में, पृथ्वी का दबाव अपने अधिकतम स्तर पर होता है, जिससे विचार प्रक्रिया सहित हर चीज में असंतुलन हो जाता है।

इसलिए, यदि मस्तिष्क में इनपुट न्यूनतम है, तो उच्च दबाव असंतुलन के कारण मस्तिष्क द्वारा किसी भी तरह की गतिविधि में शामिल होने की संभावना भी न्यूनतम हो जाती है।

2) एकादशी व्रत के लिए एक और व्याख्या यह है कि चंद्र चक्र के किसी भी अन्य दिन की तुलना में, एकादशी के दिनों में वायुमंडलीय दबाव सबसे कम होता है। इस प्रकार, यह उपवास करने और आंत्र प्रणाली को साफ करने का सबसे अच्छा समय है। यदि हम किसी अन्य दिन उपवास करते हैं, तो उच्च दबाव/तनाव हमारे सिस्टम को नुकसान पहुंचा सकता है। इस प्रकार, यह सलाह दी जाती है कि एकादशी का उपवास करने के बाद, तुरंत अगले दिन (द्वादशी) हम जल्दी उठें और जितनी जल्दी हो सके भोजन करें।

उपरोक्त दोनों सिद्धांतों के अनुसार, एकादशियों के दिनों में उपवास अभ्यास का एक मजबूत वैज्ञानिक आधार है। व्रत रखने वाले लोगों को सभी प्रकार के अनाज से दूर रहने और मेवे, दूध, फल आदि का हल्का आहार लेने के लिए कहा जाता है।

उपवास करने से शरीर को आराम मिलता है। थोड़ा अधिक खाने या आहार में अंधाधुंध खाने के कारण शारीरिक तंत्र अति व्यस्त हो सकता है। इस प्रकार पाक्षिक एकादशी व्रत व्यवस्था को गति पकड़ने का मौका देता है। हम जानते हैं कि पाचन तंत्र रक्त परिसंचरण को पाचन अंगों की ओर खींचता है। इसलिए भोजन करने के बाद सिर में रक्त संचार कम हो जाता है: इसलिए हमें नींद आने लगती है। इस प्रकार एकादशियों का पालन हमें अधिक सतर्क, तेज, केंद्रित और अधिक जागरूक रखते हुए हमारे मस्तिष्क और दिमाग को रिचार्ज करने में मदद करता है।

स्वस्थ भोजन के साथ पाक्षिक एकादशी उपवास इंसुलिन प्रतिक्रिया में सुधार करता है, रक्त कोलेस्ट्रॉल को कम करता है और जीवन काल को बढ़ाता है। यह चिंता और अवसाद से पीड़ित लोगों की मानसिक स्थिरता में सुधार करने में मदद करता है। यह शरीर को डिटॉक्सीफाई करता है, खून को साफ करता है और किडनी और लीवर की कार्यप्रणाली में सुधार करता है। यह आश्चर्यजनक है कि प्राचीन वैदिक भारतीयों ने खुद को फिट रखने और किसी भी नकारात्मक प्रभाव से मुक्त रखने के लिए इस पद्धति को कैसे तैयार किया!

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निम्नलिखित लेख जो मुझे नेट पर मिला, उसमें आपकी रुचि भी हो सकती है:

एक पुरुष या महिला पृथ्वी की तरह 80 प्रतिशत तरल और 20 प्रतिशत ठोस है, यह बुनियादी जैविक स्थिति है जो एकादशी व्रत के बारे में समझने में मदद करती है।

हम अमावस्या और पूर्णिमा के दिन उच्च ज्वार और चंद्र चक्र के सातवें दिन निम्न ज्वार के बारे में जानते हैं। यह पृथ्वी के तरल पदार्थ पर चंद्र आकर्षण है। पृथ्वी और चंद्रमा एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं लेकिन कुछ खास दिनों में उनके नजदीक होने के कारण आकर्षण अधिक होता है। यह आकर्षण ही है जो समुद्र में ज्वार का कारण बनता है और यह निश्चित है कि चंद्रमा द्वारा नियंत्रित जैविक उच्च ज्वार और निम्न ज्वार भी होंगे। चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण बल मानव शरीर के पानी पर अपना प्रभाव डालता है जैसा कि ग्रह के महासागरों के मामले में होता है।

मियामी फ्लोरिडा के मनोचिकित्सक अर्नोल्ड लिबर ने प्रयोग किया और पाया कि जैविक ज्वार हमारे मूड और व्यवहार को भी प्रभावित करते हैं। कई मनोरोग अस्पतालों से यह जानकारी मिली है कि पूर्णिमा या अमावस्या के दिन मानसिक रोगियों का व्यवहार अधिक परेशान और अनियमित हो जाता है। एक लेख में, "क्या चंद्रमा आपके मूड को नियंत्रित करता है" एडगर ज़िगलर लिखते हैं कि फीनिक्स एरिज़ोना अग्निशमन विभाग ने पाया है कि उसे पूर्णिमा की रातों में 25 से 30 अधिक कॉल प्राप्त होती हैं। ऐसे उदाहरण हैं, कि इन ज्वारीय दिनों में जब चंद्रमा पृथ्वी के सबसे करीब आता है, कमजोर दिमाग वाले या कमजोर शरीर वाले लोगों को विशेष रूप से अधिक पीड़ा होती है। मैं कमजोर आंत वाले कई लोगों को जानता हूं जो हमेशा ऐसे दिनों में सबसे अधिक पीड़ा की शिकायत करते हैं।

ऊपर उल्लिखित एडगर ज़िगलर के लेख में उद्धृत शानदार रिपोर्टें हैं। वह लिखते हैं, कि यूएस नेशनल ओशन सर्वे के वैज्ञानिक फर्गस वुड ने कई साल पहले बताया था कि 1974 में 8 जनवरी और 7 फरवरी को एक के बाद एक दो अत्यधिक उच्च ज्वार आएंगे। वुड ने देखा कि दोनों अवसरों पर, पृथ्वी , सूर्य और चंद्रमा लगभग एक सीधी रेखा पर स्थित होंगे जिसे सिगी कहा जाता है और 8 जनवरी 1974 को चंद्रमा भी पृथ्वी के बहुत करीब होगा। खगोलीय घटनाओं के इस लगातार संयोजन के कारण समुद्र का पानी सामान्य स्तर से काफी ऊपर बढ़ जाता है। यह सुनकर अर्नोल्ड लिबर ने मियामी पुलिस विभाग, समाचार पत्रों और मियामी के जैक्सन मेमोरियल अस्पताल के मनोचिकित्सक आपातकालीन कक्षों को इन दिनों के दौरान मानव व्यवहार में सामान्य गड़बड़ी की भविष्यवाणी करते हुए सतर्क कर दिया, और वास्तव में, नए साल के इन पहले हफ्तों में मियामी में हत्याओं की संख्या बहुत अधिक थी। पूरे जनवरी 1973 की तुलना में दो गुना अधिक। इसके अलावा, उद्देश्यहीन अपराधों की बार-बार घटनाएँ हुईं। यह एक ऐसा उदाहरण था जिसे उद्धृत करके बताया जा सकता है कि मानव व्यवहार मानव व्यक्तित्व पर चंद्र आकर्षण से कैसे प्रभावित होता है।

हमारे ऊपर आकाशीय पिंडों के प्रभाव पर किए गए अध्ययनों से पता चला है कि हार्मोन और तरल पदार्थों का असंतुलन हो सकता है, और ये प्रभाव हमारे रोग संबंधी रोगों और मनोवैज्ञानिक व्यवहार पर एक बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। संबंधित शारीरिक ग्रंथियाँ और हार्मोन विभिन्न मानसिक अभिव्यक्तियों के भौतिक-मानसिक कारणों से संबंधित हैं, जिन्हें वृत्ति (प्रवृत्ति) के रूप में जाना जाता है, जैसे भय, लालच, घृणा, जुनून और क्रोध आदि। ऐसी 50 अभिव्यक्तियाँ हैं और यदि ये हार्मोन असंतुलित हो जाते हैं, स्राव असामान्य हो जाता है, यानी हाइपो या हाइपर, जिसके परिणामस्वरूप इन अभिव्यक्तियों (वृत्ति) में असामान्यताएं हो जाती हैं। अर्नोल्ड लिबर का उपरोक्त प्रयोग इनमें से कुछ वृत्तियों के लिए ही था; लेकिन ऐसी सभी या इनमें से कई वृत्तियां चंद्र जैविक ज्वार से प्रभावित हो सकती हैं।

इतना ही नहीं, हमारे शरीर की त्वचा एक अर्ध-पारगम्य झिल्ली है जो एक गतिशील संतुलन बनाए रखते हुए, दोनों दिशाओं में विद्युत चुम्बकीय बलों की आवाजाही की अनुमति देती है। अर्नोल्ड लिबर का कहना है कि प्रत्येक तंत्रिका आवेग एक लघु सौर मंडल की तरह संबंधित कोशिकाओं के लिए ऊर्जा की अपनी छोटी आभा उत्पन्न करता है, और इसका अपना हल्का विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र होता है। यह संभव है कि आकाशीय पिंडों से उत्पन्न होने वाली स्थूल विद्युत चुम्बकीय शक्तियाँ इन सूक्ष्म कोशिकीय संसारों के संतुलन को प्रभावित कर सकती हैं। जब अत्यधिक ज्वार आएगा, तो कब्र और आसपास के विद्युत चुम्बकीय क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी से भारी बमबारी की संभावना है। इससे तंत्रिका तंत्र पर प्रभाव पड़ सकता है और तंत्रिका तंतु कमजोर हो सकते हैं।

उन्मत्त अवसाद के कई रोगियों पर लिबर के शोध में, उन्होंने चरम ज्वार के दिनों में अवसाद, बेचैनी, अनिद्रा और तेज़ दिल की धड़कन के लक्षणों की पुनरावृत्ति पाई। यह आमतौर पर पाया जाता है कि ज्वार के दिनों में हमले अधिक होते हैं और इसका प्रभाव एकादशी से अमावस्या या पूर्णिमा के दिनों तक होता है। इस प्रकार नकारात्मक प्रभावों का मुकाबला करने के लिए एकादशी व्रत का शरीर और मन पर विभिन्न प्रभाव पड़ते हैं। सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण है ग्रंथियों और कोशिकाओं के संबंध में हार्मोन और अन्य स्रावों का संतुलन बनाए रखना। चूंकि इन उपवास के दिनों में पेट में भोजन और पानी नहीं होगा, इसलिए रैखिक आकर्षण का आंत, गुर्दे और यकृत आदि पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसके अलावा, शरीर की अधिकांश शक्तियों के कामकाज की प्रवृत्ति केन्द्राभिमुखी होगी, यानी शरीर के अंदरूनी हिस्से की ओर. इसलिए, चंद्र गुरुत्वाकर्षण बल के बाहरी खिंचाव को संतुलित करने के लिए आंतरिक गुरुत्वाकर्षण खिंचाव अधिक शक्तिशाली होगा। इससे सभी अंगों के नियंत्रित कामकाज, रासायनिक परिवर्तन, कोशिकाओं की वृद्धि और अन्य जैविक परिवर्तनों में मदद मिलेगी।

यदि कामकाज सामान्य और संतुलित रहेगा तो स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं नहीं होंगी और आयु कई गुना बढ़ जाएगी। एकादशी और पूर्णिमा तथा अमावस्या दोनों दिन उपवास करना अच्छा होता है। लेकिन कम से कम 12 वर्ष से अधिक आयु के सभी स्त्री-पुरुषों को एकादाशी का व्रत अवश्य करना चाहिए। चूँकि एकादशी का दिन चंद्र चक्र के सातवें और पंद्रहवें दिन के बीच आता है, अर्थात लघु ज्वार और उच्च ज्वार के दिन, एक दिन का उपवास चंद्र आकर्षण के प्रभाव को संतुलित करने में मदद करता है। लेकिन, जैसा कि ऊपर बताया गया है, बेहतर परिणामों के लिए उपवास सभी चार दिनों में किया जा सकता है, अर्थात्: अमावस्या से पहले की एकादशी, अमावस्या ही, पूर्णिमा से पहले की एकादशी, पूर्णिमा ही। हमारे शरीर की छोटी-छोटी कोशिकाओं पर भी आकाशीय विद्युत-चुंबकीय शक्तियों की बमबारी की संभावना कम होगी या बिल्कुल नहीं होगी, जिससे संतुलन बेहतर ढंग से बनाए रखा जा सकेगा।

प्रयोगात्मक रूप से देखा गया है कि ऐसे व्यवस्थित उपवासों से उन्मत्त-अवसादग्रस्त रोगी ठीक हो जाते हैं और मन की अनेक असामान्यताएँ, जिनसे आजकल के अधिकांश लोग पीड़ित हैं, कम हो जाती हैं। अत्यधिक यौन उत्तेजना, क्रोध, चिड़चिड़ापन, भय, लालच और जुनून आदि भी इन व्रतों से शांत हो जाते हैं। यहां तक ​​कि एकादशी व्रत की मदद से हाइपर-टेंशन को भी कुशलतापूर्वक नियंत्रित किया जा सकता है।

अधिकतर लोगों को यह डर रहता है कि उपवास करने से व्यक्ति कमजोर हो जायेगा। ऐसा डर वास्तविक नहीं है. एक दिन का उपवास पेट की मशीनरी को आराम देता है और इससे उसे भविष्य में बेहतर काम करने में मदद मिलती है। न केवल अपाच्य भोजन सामग्री को उसके आगे पचने का उचित अवसर मिलता है, बल्कि उपवास करने से पाचन शक्ति भी बढ़ती है, भोजन का बेहतर पाचन होता है जिससे रक्त और अन्य आवश्यक रसायनों के अधिक उत्पादन में मदद मिलती है, और इस तरह बेहतर स्वास्थ्य और बेहतर पोषण प्रभाव में मदद मिलती है। . यह पेट की समस्याओं के लिए एक अच्छा उपाय है और कई बीमारियों का इलाज भी है। यह लिवर, अग्न्याशय, आंतों और किडनी आदि के बेहतर कामकाज में मदद करता है, जिससे इन अंगों से संबंधित किसी भी बीमारी की संभावना कम हो जाती है।

एकादशी का व्रत शरीर में रसायनों को मन के एक्टोप्लाज्मिक सामग्री (यानी चित्त या माइंडस्टफ) जैसे सूक्ष्म कारकों में परिवर्तित करने में भी मदद करता है ताकि एक्टोप्लाज्मिक सामग्री और भी उच्च क्षेत्रों के साथ जुड़ जाए। यदि साधक ध्यान के विज्ञान का अभ्यास करता है, तो उपवास का अर्थ केवल कुछ भी न खाना नहीं है, बल्कि कड़े अर्थों में इसका अर्थ कुछ भी न पीना भी है। उपवास यानी 'उपवास' का आध्यात्मिक अर्थ दिव्य विचारों के साथ रहना, यानी सर्वोच्च चेतन सत्ता के करीब रहना है। यह केवल संवेदी और मोटर अंगों (इंद्रियों) की गतिविधियों को बाह्य रूप से त्यागकर और सर्वोच्च चेतना या सर्वोच्च भगवान के विभिन्न पहलुओं (भाव) पर ध्यान केंद्रित करके ही किया जा सकता है। एकादशी के दिनों में खाने-पीने के साथ-साथ दैवीय (भगवत-भाव) पर ध्यान न देने से निश्चित रूप से साधक को खुद को शारीरिक और मनोवैज्ञानिक रूप से परिपूर्ण रखने में मदद मिलेगी और इस तरह जीवन के अंतिम आध्यात्मिक उद्देश्य को प्राप्त करने में मदद मिलेगी।




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