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Showing posts from October, 2025

तुलसी–विष्णु विवाह विधिः अर्थ सहित

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🌷2⃣🌷 तुलसी पूजा (१)  🌷2⃣🌷 श्री तुलसी पूजन विधि (२)  🌷3⃣🌷 श्री तुलसी लघुपूजा (३)  🌷4⃣🌷 श्री तुलसीपूजा (४)  🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷 🌷1⃣🌷 तुलसी पूजा (१) 🌷🌷🌷 🟩🟩🟩 हिन्दी अर्थ सहित 🟩🟩🟩 यह विधि प्रातःकाल या सायंकाल तुलसी-वृन्दावन में की जाती है। शुद्ध मन, स्नान के पश्चात, दीप जलाकर, तुलसी के समीप पूर्वमुख या उत्तरमुख होकर पूजन किया जाता है। ॥ अथ तुलसी पूजा प्रारंभः ॥ ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ (पूजन से पूर्व गणेशजी का स्मरण करें) ॥ अथ तुलसीपूजनं लिख्यते ॥ श्रीमहादेव उवाच — (भगवान शिव पार्वतीजी से कहते हैं) शुभे पक्षे शुभे वारे शुभे ऋक्षे शुभोदये । केशवार्थे शुभांशे च रोपयेत्तुलसीं मुनिः ॥ १॥ हिन्दी अर्थ: किसी भी शुभ पक्ष, शुभ वार, शुभ नक्षत्र और शुभ प्रभात में, भगवान केशव (विष्णु) के निमित्त भक्त को तुलसी रोपनी चाहिए। गृहस्थो गृहमध्ये वा गृहस्थोपवनेपि वा । शुचौ देशे तु तुलसीमर्च्चयेद्बुद्धिमान्नरः ॥ २॥ हिन्दी अर्थ: गृहस्थ व्यक्ति चाहे घर के मध्य भाग में या घर के उपवन में, शुद्ध स्थान पर तुलसी का पूजन करे — यही बुद्धिमान का आचरण है। मूले च वेदिकां कृत्व...

पंचायतन पूजा

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🕉️ पंचायतन पूजा — पाँच देवताओं की उपासना का रहस्य, महत्व और विधि 🌺 🔶 पंचायतन पूजा क्या है? “पंचायतन” शब्द का अर्थ है — पाँच देवों का समूह। आदि शंकराचार्य ने इस पूजा की स्थापना की ताकि संपूर्ण सनातन धर्म में एकता बनी रहे और सभी प्रमुख देवताओं की उपासना एक साथ हो सके। इस पूजा में पाँच मुख्य देवता माने गए हैं — भगवान विष्णु भगवान शिव भगवान गणेश भगवती दुर्गा (या पार्वती) सूर्य देव (कई स्थानों पर षष्ठ रूप में भगवान स्कंद या कुबेर को भी पूजा जाता है।) 🌼 पंचायतन पूजा का महत्व संपूर्ण सृष्टि का संतुलन: ये पाँच देवता ब्रह्मांड के पाँच प्रमुख तत्वों — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश — का प्रतिनिधित्व करते हैं। समग्र भक्ति की अभिव्यक्ति: यह पूजा दर्शाती है कि ईश्वर एक ही है, केवल उसके रूप भिन्न हैं। “एकोऽहम् बहुस्याम्” — एक ही सत्य अनेक रूपों में प्रकट होता है। सभी मतों की एकता: शैव, वैष्णव, शाक्त, सौर और गाणपत्य — सभी मतों को एक मंच पर लाने वाली यह पूजा समरसता का प्रतीक है। गृहस्थों के लिए श्रेष्ठ पूजा: यह पूजा सरल, संतुलित और कल्याणकारी है — जो घर में सुख, शांति और समृद्धि लाती ...

आरती की महिमा

आरती की महिमा 〰〰🌼〰〰 आरती को आरात्रिक , आरार्तिक अथवा नीराजन भी कहते हैं। पूजा के अंत में आरती की जाती है। जो त्रुटि पूजन में रह जाती है वह आरती में पूरी हो जाती है।  स्कन्द पुराण में कहा गया है- मन्त्रहीनं क्रियाहीनं यत् कृतं पूजनं हरे:। सर्वं सम्पूर्णतामेति कृते निराजने शिवे ।। अर्थात - पूजन मंत्रहीन तथा क्रियाहीन होने पर भी नीराजन (आरती) कर लेने से उसमे सारी पूर्णता आ जाती है।  आरती करने का ही नहीं, देखने का भी बड़ा पूण्य फल प्राप्त होता है। हरि भक्ति विलास में एक श्लोक है-  नीराजनं च यः पश्येद् देवदेवस्य चक्रिण:।सप्तजन्मनि विप्र: स्यादन्ते च परमं पदम।। अर्थात - जो भी देवदेव चक्रधारी श्रीविष्णु भगवान की आरती देखता है, वह सातों जन्म में ब्राह्मण होकर अंत में परम् पद को प्राप्त होता है।  श्री विष्णु धर्मोत्तर में कहा गया है-  धूपं चरात्रिकं पश्येत काराभ्यां च प्रवन्देत। कुलकोटीं समुद्धृत्य याति विष्णो: परं पदम्।। अर्थात - जो धुप और आरती को देखता है और दोनों हाथों से आरती लेता है, वह करोड़ पीढ़ियों का उद्धार करता है और भगवान विष्णु के परम पद को प्राप्त होता है।...

षष्ठी माता कथा आरम्भ

षष्ठी माता कथा आरम्भ (संस्कृत) नारद उवाच षष्ठी मङ्गलचण्डी च मनसा प्रकृतेः कला।  उत्पतिमासां चरितं श्रोतमिच्छामि तत्त्वतः ।१। नारायण उवाच षष्ठांशा प्रकृतेर्या च सा च षष्ठी प्रकीर्तिता।  बालकानामधिष्टात्री विष्णुमाया च बालदा । २।  मातृकासु च विख्याता देवसेनाभिधा च या।  प्राणाधिकप्रिया साध्वी स्कन्दभार्या च सुव्रता।३।  आयुःप्रदा बालानां धात्री रक्षणकारिणी।  सततं शिशुपार्श्वस्था योगेन सिद्धियोगिनी ।४।  तस्याः पूजनविधिं ब्रह्मन्नितिहासमिदं श्रृणु।  यच्छुतं धर्मवक्त्रेण सुखदं पुत्रदं परम्।५।  राजा प्रियव्रतश्चासीत् स्वायम्भुवमनोः सुतः। योगीन्द्रो नीद्वहद्वार्या तपस्यासु रतः सदा।६। बह्याज्ञया च यत्नेन कृतदारो बभूव ह। सुचिरं कृतदारश्यन लेभे तनयं मुने।७। बभूव ह। पुत्रेष्टियज्ञं तं चापि कारयामास कश्यपः।  मालिन्यै तस्य कान्तायै मुनिर्यज्ञचरूं ददौ ।८।  भुक्त्वा च तं चरूं तस्याः सद्यो गर्भो वभुव है। दधार तं च सा देवी दैवं द्वादशवत्सरम्।९।  ततः सुषाव सा ब्रह्मन् कुमारं कनकप्र भम्।  सर्वावयवसम्पन्ने मृतमुत्तारलोचनम् ।१०।  तं दृष्टवा...

त्वरित शत्रुनाशक विष्णुमंत्र

🌷🌷🌷 श्री महाविष्णु त्वरितास्त्र स्तोत्र 🌷🌷🌷 ॐ अस्य त्वरित शत्रुनाशक विष्णुमंत्रस्य शिव ऋषि: अनुष्टुप छन्दः सुरासुरनमस्कृत  विष्णु देवता सर्वेष्टसिद्धये जपे विनियोगः श्री गणेश ध्यानम् ॐ सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजगणकः । लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः ॥ धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः । व द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छुणुयादपि । विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा । संग्रामे संकटचैव विघ्न तस्य न जायते ॥ शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्न वदनं ध्यायेत्सर्वविघ्नोपशान्तये ॥ अर्थ---- भगवान गणेश के बारह नाम हैं – सुमुख, एकदन्त, कपिल, गजकर्णक, लम्बोदर, विकट, विघ्ननाशक, विनायक, धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष, भालचन्द्र और गजानन। इन नामों का पाठ या श्रवण विद्यारम्भ, विवाह, घर में प्रवेश, बाहर निकलने, संग्राम या किसी संकट के समय करने पर सभी विघ्न नष्ट हो जाते हैं। 🌹🌹 गुरु ध्यान श्लोक  🌹🌹 द्विदल कमलमध्ये बद्धसंवितसमुद्रं धृतशिवमयगात्रं साधकानुग्रहार्थम् । श्रुतिशिरसिविभान्तं बोधमार्तण्डमूर्ति । शमिततिमिरशोकं श्री गुरुं भावयामि ॥ हृद्यंबुजे कर्णिकमध्यसंस्थं । सि...