शनि जयंती पर विशेष
शनि जयंती पर विशेष
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शनि देव न्यायाधीश हैं। शनि देव हिन्दू धर्म में पूजे जाने वाले प्रमुख देवताओं में से एक हैं।इस समय शनि उच्च के (साथ ही वक्री भी) राहु के साथ तुला राशि में स्थित है।शनि के अधिदेवता प्रजापति ब्रह्मा और प्रत्यधिदेवता यम हैं। इनका वर्ण कृष्ण, वाहन गिद्ध तथा रथ लोहे का बना हुआ है। यह एक-एक राशि में तीस-तीस महीने तक रहते हैं। यह मकर और कुम्भ राशि के स्वामी हैं तथा इनकी महादशा 19 वर्ष की होती है।शनि जयंती एक हिन्दू पर्व है जो ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष अमावस्या को मनाया जाता है।
माना जाता है कि इस दिन शनि देव का जन्म हुआ था।जन्म के समय से ही शनि देव श्याम वर्ण, लंबे शरीर, बड़ी आंखों वाले और बड़े केशों वाले थे।यह माना जाता है कि शनि देव मनुष्य को उसके पाप और बुरे कार्यों आदि का दण्ड प्रदान करते हैं। इनकी शरीर-कान्ति इन्द्रलीलमणि के समान है। सिर पर स्वर्ण मुकुट, गले में माला तथा शरीर पर नीले रंग के वस्त्र सुशोभित हैं। शनि देव गिद्ध पर सवार रहते हैं। हाथों में क्रमश: धनुष, बाण, त्रिशूल और वरमुद्रा धारण करते हैं।
माना जाता है कि इस दिन शनि देव का जन्म हुआ था।जन्म के समय से ही शनि देव श्याम वर्ण, लंबे शरीर, बड़ी आंखों वाले और बड़े केशों वाले थे।यह माना जाता है कि शनि देव मनुष्य को उसके पाप और बुरे कार्यों आदि का दण्ड प्रदान करते हैं। इनकी शरीर-कान्ति इन्द्रलीलमणि के समान है। सिर पर स्वर्ण मुकुट, गले में माला तथा शरीर पर नीले रंग के वस्त्र सुशोभित हैं। शनि देव गिद्ध पर सवार रहते हैं। हाथों में क्रमश: धनुष, बाण, त्रिशूल और वरमुद्रा धारण करते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शनिदेव का स्वभाव क्रूर बताया गया है। शनि की तिरछी नजर या टेढ़ी चाल का प्रभाव घातक माना जाता है। ये क्रूर ग्रह माने जाते हैं। इनकी दृष्टि में जो क्रूरता है, वह इनकी पत्नी के शाप के कारण है।
ब्रह्म पुराण में एक कथा के अनुसार बचपन से ही शनि भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त थे। वे श्रीकृष्ण के अनुराग में निमग्न रहा करते थे। वयस्क होने पर इनके पिता ने चित्ररथ की कन्या से इनका विवाह कर दिया था। इनकी पत्नी सती, साध्वी और परम तेजस्विनी थी। एक रात वह ऋतु स्नान करके पुत्र प्राप्ति की इच्छा से शनि के पास पहुँची, पर यह श्रीकृष्ण के ध्यान में निमग्न थे। इन्हें बाह्य संसार की सुध ही नहीं थी। पत्नी प्रतीक्षा करके थक गयी। उसका ऋतुकाल निष्फल हो गया। इसलिये उसने क्रुद्ध होकर शनि देव को शाप दे दिया कि आज से जिसे तुम देख लोगे, वह नष्ट हो जायगा। ध्यान टूटने पर शनि देव ने अपनी पत्नी को मनाया। पत्नी को भी अपनी भूल पर पश्चात्ताप हुआ, किन्तु शाप के प्रतिकार की शक्ति उसमें न थी, तभी से शनि देवता अपना सिर नीचा करके रहने लगे। क्योंकि वह नहीं चाहते थे कि इनके द्वारा किसी का अनिष्ट हो।
जब शनि देव का जन्म हुआ तो उनकी दृष्टि पिता पर पड़ते ही सूर्य को कुष्ठ रोग हो गया।
शनि जन्म के संदर्भ में एक पौराणिक कथा बहुत मान्य है जिसके अनुसार शनि, सूर्य देव और उनकी पत्नी छाया के पुत्र हैं। सूर्य देव का विवाह प्रजापति दक्ष की पुत्री संज्ञा से हुआ। कुछ समय पश्चात उन्हें तीन संतानों के रूप में मनु, यम और यमुना की प्राप्ति हुई। इस प्रकार कुछ समय तो संज्ञा ने सूर्य के साथ निर्वाह किया परंतु संज्ञा सूर्य के तेज को अधिक समय तक सहन नहीं कर पाईं उनके लिए सूर्य का तेज सहन कर पाना मुश्किल होता जा रहा था। इसी वजह से संज्ञा ने अपनी छाया को पति सूर्य की सेवा में छोड़कर वहां से चली चली गईं। कुछ समय बाद छाया के गर्भ से शनि देव का जन्म हुआ।
सूर्य के अन्य पुत्रों की अपेक्षा शनि शुरू से ही विपरीत स्वभाव के थे। धीरे-धीरे शनि देव का पिता से मतभेद होने लगा। सूर्य चाहते थे कि शनि अच्छा कार्य करें, मगर उन्हें हमेशा निराश होना पड़ा। संतानों के योग्य होने पर सूर्य ने प्रत्येक संतान के लिए अलग-अलग लोक की व्यवस्था की, मगर शनि देव अपने लोक से संतुष्ट नहीं हुए। उसी समय शनि ने समस्त लोकों पर आक्रमण की योजना बना डाली। सूर्य देव के कहने पर भगवान शिव ने शनि को बहुत समझाया, मगर वह नहीं माने। उनकी मनमानी पर भगवान शिव ने शनि को दंडित करने का निश्चय किया और दोनों में घनघोर युद्ध हुआ। भगवान शिव के प्रहार से शनिदेव अचेत हो गए, तब सूर्य का पुत्र मोह जगा और उन्होंने शिव से पुत्र के जीवन की प्रार्थना की। तत्पश्चात शिव ने शनि को दंडाधिकारी बना दिया। शनि न्यायाधीश की भाँति जीवों को दंड देकर भगवान शिव का सहयोग करने लगे।
शनि देव के विषय में यह कहा जाता है कि-
शनिदेव के कारण गणेश जी का सिर छेदन हुआ।
शनिदेव के कारण राम जी को वनवास हुआ था।
रावण का संहार शनिदेव के कारण हुआ था।
शनिदेव के कारण पांडवों को राज्य से भटकना पड़ा।
शनि के क्रोध के कारण विक्रमादित्य जैसे राजा को कष्ट झेलना पड़ा।
शनिदेव के कारण राजा हरिशचंद्र को दर-दर की ठोकरें खानी पड़ी।
राजा नल और उनकी रानी दमयंती को जीवन में कई कष्टों का सामना करना पड़ा था।
किंतु शास्त्रों में ही इससे बचने व शनि कृपा पाने के लिए शनि उपासना के उपाय भी बताए गए हैं। इसी कड़ी में शनि की जन्मतिथि शनिश्चरी जयंती, शनि की विशेष उपासना से शनि दशा से हो रही पीड़ा और कष्टों से छुटकारे के लिए बहुत ही शुभ मानी गई है।इनमें शनि वैदिक मंत्र, तांत्रिक मंत्र, शनि का पौराणिक मंत्र और महामृत्युंजय मंत्र प्रमुख है।
ॐ सूर्यपुत्रो दीर्घदेही विशालाक्षा शिवप्रिया|
मंदाचारा प्रसन्न्तात्मा पीड़ां हरतु में शनि||
इस मंत्र से शनि का ध्यान कर आगे की पूजा में तिल, तेल, काला कपड़ा, लोहे की वस्तु, काली उड़द आदि चढ़ाकर शनि पूजा, मंत्र जप और आरती करें तो वह शनि की प्रसन्नता के लिए बहुत ही शुभ माना गया है।
शनि का पौराणिक मंत्र -
ॐ नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्।
छायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम् ।।
इस मंत्र का 21 दिन में 23000 जप करना अनिवार्य है।
शनि का वैदिक मंत्र -
ॐ शत्रोदेवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये।
शंयोरभिस्र वन्तु न:।
इस मंत्र का सुबह-शाम दो माला करने से शनि की प्रसन्नता और कृपा प्राप्त होती है।
शनि का तांत्रिक मंत्र -
ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनये नमः
शनि ग्रह पीड़ा नाशक मंत्र -
ॐ शं शनैश्चराय नम:।
महामृत्युंजय मंत्र –
ॐ त्र्यंम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टि वर्धनम् ।
उर्वारुकमिव बन्धनान्म्त्योर्मुक्षीय याऽमृतात ।।
इस मंत्र का पाठ सवा लाख जप शनि अमावस्या, शनिवार, शनि जयंती या शनि की दशा में शुरू करने चाहिए। यह मंत्र पूर्ण विधि-विधान से करना चाहिए, जो किसी कर्मकांडी ब्राह्मण से भी कराया जा सकता है। यह मंत्र प्रतिदिन 10 माला के हिसाब से 125 दिन तक करने से भी शनि ग्रह दोष शांति होती है।
शनि जयंती पर स्नान कर शनि की लोहे की मूर्ति को तिल को तेल चढ़ाएं। साथ ही गंध, अक्षत के साथ खासतौर पर नीले लाजवंती के फूल चढ़ाकर शनि गायत्री मंत्र के अचूक संकटनाशक मंत्र का यथाशक्ति अधिक से अधिक बार जप करें –
ॐ भगभवाय विद्महे, मृत्युरूपाय धीमहि,
तन्नो सौरी: प्रचोदयात।।
शनिवार व शनि जयंती के संयोग में विशेष कृष्ण मंत्र बोलना श्रीकृष्ण भक्त शनि के साथ कालसर्प योग बनाने वाले राहु-केतु की पीड़ा शांति के लिए भी मंगलकारी माना गया है।
सुबह स्नान के बाद घर में भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा को जल व पंचामृत से स्नान के बाद केसरयुक्त चंदन, अक्षत, फूल, पीताम्बरी वस्त्र अर्पित कर माखन-मिश्री का भोग लगाएं और नीचे लिखे दो मंत्रों का विषम संख्या यानी 1, 3, 5, 7, 11, 21 बार जप करें। एक माला यानी 108 बार जप करें -
कृं कृष्णाय नम||
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय||
इन मंत्रों के जप के बाद भगवान श्रीकृष्ण व भगवान विष्णु की आरती करें और सफलता व यश की कामना करें।
तेल, काले गंध, काले अक्षत, काले फूल व तेल से बने पकवान जैसे पूरी, इमरती का भोग लगाएं और नीचे लिखे इन शनि मंत्रों को स्मरण करें -
ॐ कोणस्थाय नम:
ॐ रौद्रात्त्मकाय नम:
ॐ शनैश्चराय नम:
ॐ यमाय नम:
ॐ ब्रभवे नम:
ॐ कृष्णाय नम:
ॐ मंदाय नम:
ॐ पिप्पलाय नम:
ॐ पिंगलाय नम:
ॐ सौरये नम:
अंत में शनि पीड़ा से मुक्ति के लिए श्रद्धा से प्रार्थना करें।
शनि जयंती के अवसर पर शनिदेव के निमित्त विधि-विधान से पूजा पाठ तथा व्रत किया जाता है। शनि जयंती के दिन किया गया दान पुण्य एवं पूजा पाठ शनि संबंधि सभी कष्टों दूर कर देने में सहायक होता है।
शनि जयंती के दिन सुबह जल्दी स्नान आदि से निवृत्त होकर नवग्रहों को नमस्कार करते हुए शनिदेव की लोहे की मूर्ति स्थापित करें और उसे सरसों या तिल के तेल से स्नान कराएं तथा षोड्शोपचार पूजन करें साथ ही शनि मंत्र का उच्चारण करें :-ॐ शनिश्चराय नम: इसके बाद पूजा सामग्री सहित शनिदेव से संबंधित वस्तुओं का दान करें। इस प्रकार पूजन केबाद दिन भर निराहार रहें व मंत्र का जप करें। शनि की कृपा एवं शांति प्राप्ति हेतु तिल, उड़द, काली मिर्च, मूंगफली का तेल, आचार, लौंग, तेजपत्ता तथा काले नमक का उपयोग करना चाहिए, शनि देव को प्रसन्न करने के लिए हनुमान जी की पूजा करनी चाहिए। शनि के लिए दान में दी जाने वाली वस्तुओं में काले कपड़े, जामुन, काली उडद, काले जूते, तिल, लोहा, तेल, आदि वस्तुओं को शनि के निमित्त दान में दे सकते हैं|शनि महाराज की पूजा के पश्चात राहु और केतु की पूजा भी करनी चाहिए।
इस दिन शनि भक्तों को पीपल में जल देना चाहिए और पीपल में सूत्र बांधकर सात बार परिक्रमा करनी चाहिए
शनि का वृश्चिक राशि मे गोचर
अब तक अपनी ऊंच राशि “तुला” मे भ्रमण कर रहे शनि अब “वृश्चिक” राशि मे प्रवेश कर रहे हैं | अब चूंकि शनि वृश्चिक अपनी शत्रु राशि, जो की काल पुरुष की आठ्वी राशि हैं, से संचार करेंगे | तो इस स्तिथि में शनि का धरती और प्राणियों पर क्या प्रभाव होगा यह देखना रोचक होगा | शनि के राशि परिवर्तन के साथ ही कन्या जातकों की साढ़े साती पूर्ण होगी
एवं तुला जातकों के लिए साढ़े साती का अंतिम जबकि वृश्चिक जातकों के लिए दूसरा चरण शुरू होगा। इसके अलावा धनु जातकों के लिए साढ़े साती का प्रारंभ समय है। सिंह व मेष जातकों के लिए शनि की छोटी पनौती रहेगी।शनि के राशि परिवर्तन के समय सूर्य, शुक्र (स्वाति नक्षत्र ) और चन्द्र ( शतभिषा में ) तीनों ही राहू के नक्षत्र में हैं, मंगल केतु के नक्षत्र में है, राहू मंगल के नक्षत्र में है और स्वयं शनि मंगल की राशि और बृहस्पति के नक्षत्र में है। शनि और मंगल में द्विद्वादश योग बन रहा है और शनि पर बृहस्पति की पंचम दृष्टि है। मंगल की केतु पर सीधी दृष्टि तथा गुरु पर नीच दृष्टि है, परिणाम स्वरूप भयानक प्राकृतिक आपदाएँ जैसे भूकम्प, समुद्री तूफान, सुनामी इत्यादि घटनाएँ बड़े स्तर पर होने की सम्भावना तथा कुछ जगहों पर युद्ध या धार्मिक उन्माद के कारण भयानक रक्तपात और जन - धन हानि की सम्भावना बनेगी। पश्चिम - दक्षिण के देश - प्रदेश अधिक प्रभावित होंगे। शनि का वृश्चिक राशि में जब तक निवास रहेगा और इस दौरान जब - जब सूर्य - चन्द्रमा, मंगल - केतु इन सबका प्रभाव एक साथ आएगा, तब - तब पूरे विश्व में प्राकृतिक प्रकोप की भरमार रहेगी।
वृश्चिक राशि मे संचार करते हुये शनि मकर, वृष तथा सिंह राशियो पर दृष्टि तथा तुला, वृश्चिक व धनु पर साढ़े साती का प्रभाव रखेंगे | 3, 6, व 11वे भावो से पाप ग्रहो का गोचर लाभकारी माना जाता हैं चूंकि शनि की गिनती भी पापी ग्रह मे होती हैं अत: जिन राशि के शनि 3, 6 व 11वे भाव गोचर करेंगे उन्हे शुभफलों की प्राप्ति होगी तथा अन्य राशि वालो को मिलेजुले फल प्राप्त होंगे |
आइए जानते हैं की विभिन्न राशियों पर शनि के इस वृश्चिक राशि गोचर का क्या प्रभाव पड़ेगा |
1)मेष राशि
मेष राशि के जातकों के लिए शनिदेव अष्टम भाव में गोचर करेंगें जो ढैय्या ( छोटी पनौती ) का सूचक है। मंगल की राशि और मंगल के ही स्थान पर होने के कारण शनि अत्यंत उद्विग्न रहेगा। इससे कार्यों की विकास गति प्रभावित होगी। आर्थिक तौर पर आपको थोड़ा सा संघर्ष करना पड़ सकता है। आजीविका मे परिवर्तन अथवा ऊठा पटक जैसे हालात बनेंगें, धन की पूर्ति बाधक होगी व अनावश्यक खर्चे बढ़ेंगे, संतान संबंधी कोई समस्या होने की संभावनाएं बनेंगी, कमर पैर से संबन्धित कोई चोट इत्यादि लग सकती हैं | जीवन साथी के लिए अच्छे समाचार प्राप्त होंगे | किसी बड़े निवेश से बचना लाभदायक रहेगा |स्वयं का अवलोकन करें। सत्य का साथ दें। शोध पर विशेष ध्यान दें। सूर्य भगवान की और सूर्य यन्त्र की पूजा करे
उपाय
दशरथ शनि श्रोत का पाठ करे तथा प्रत्येक शनिवार किसी गरीब को सरसों का तेल दान करे |
2)वृष राशि
शुक्र की राशियों के लिए शनि योगकारक होता है इसलिए शुक्र की दोनों राशियों में शनि प्रसन्न रहता है
गोचरस्थ शनि की सप्तम भाव से जन्मकालीन चन्द्र पर पूर्ण दृष्टि, भाग्योदय का समय बनेगा | सप्तम भाव गृहस्थ जीवन व सहभागिता का स्थान है। जीवनसाथी व पिता हेतु शुभ समाचार प्राप्त होंगे, कोई भागीधारी का प्रस्ताव भी आ सकता हैं, दाम्पत्य सुख मे कुछ कमी हो सकती हैं | कामकाज बढ़ने लगेंगे, नए वस्त्राभूषणों, नई संपत्ति, वाहन इत्यादि खरीदने के योग बनेंगे, साज-सज्जा पर व्यय होगा तथा पुरानी संपत्ति बिकेगी, यात्राए व भागदौड़ बढेगी | प्रतियोगिताओं में बेहतर परिणाम प्राप्त करेंगे एवं रहस्यमयी विद्याओं की ओर आकर्षित होंगे।
अगर आपकी जन्म कुंडली में शनि अशुभ है तो इस पारगमन के कारण आपके अपने जीवन साथी के संबंध बिगड़ सकते हैं। अपने जीवन साथी के प्रति संवेदनशील रहें। यदि आप हिस्सेदारी में कारोबार कर रहे हैं, तो दिक्कत का सामना करना पड़ सकता है। इस समय आपके लिए सलाह है कि आपको धैर्य रखना चाहिए। व्यक्तिगत संबंधों के मामलों में थोड़ी सावधानी बरतें | इस समय राजनीति, पी आर, समाज सेवा एवं मास मीडिया से जुड़े जातकों को थोड़ा सा संभलकर चलने की जरूरत रहेगी।
उपाय
शनि श्लोक “‘नीलांजन समाभासं रवि पुत्रं यमाग्रजं। छाया मार्तण्ड सम्भूतं तम् नमामि शनैश्चरम् || का जाप रोजाना शाम के समय करे तथा किसी को भी शराब व सेन्ट (परफ्यूम ) उपहार मे ना दे |
3)मिथुन राशि
शनि का गोचर शनि के मित्र बुध की राशि और षष्ट भाव में होगा जो कुछ हद तक शुभ होगा| यहाँ से इसकी तृतीय दृष्टि अपनी ही राशि मकर पर (अष्टम भाव में ), सप्तम दृष्टि शुक्र की राशि वृषभ पर ( द्वादश भाव में ) और दशम दृष्टि सूर्य की राशि सिंह पर (तृतीय भाव में ) होगी। राशिफल के अनुसार शारीरिक सुख तथा स्वास्थ्य में वृद्धि करेगा। ख्याति और पराक्रम बढ़ेगा । कर्ज़ और शत्रुओं का नाश होगा। परन्तु आपके कार्यों से पीठ पीछे आपकी निंदा भी होती रहेगी। कुछ स्वतन्त्र कार्य करने में समर्थ होंगे। जमीन-जायदाद एवं विवाद संबंधी मामलों में परेशानी बढ़ सकती है। व्यय की वृद्धि होगी एवं शत्रुओं के प्रबल होने की संभावना है। संयम एवं धैर्य की प्रवृत्ति की आवश्यकता है। नित्य होने वाले कार्यों में भी परेशानी का अनुभव करेंगे। उधार लेने व देने की संभावनाएं बनेगी, सहोदरो को कष्ट मिलेंगे, अचानक चोट लगने की, धन प्राप्ति की तथा किसी गुप्त विद्या जानने की इच्छा बढेगी, धार्मिक कार्य, लंबी यात्राए व योजनाए बन सकती हैं जिनसे लाभ होगा|
उपाय-कनकधारा श्रोत का पाठ रोजाना करे तथा हर शनिवार एक मुट्ठी साबुत बादाम जलप्रवाह करे |
4)कर्क राशि
जन्म कालीन चन्द्र से पंचम भाव में गोचर जीवन साथी के लिए अच्छा होगा। विवाहितों को ससुराल पक्ष से सहयोग प्राप्त होगा। परन्तु जो लोग अपने विवाह की तैयारी कर रहे हैं अब उन्हें इंतज़ार करना पड़ेगा। स्वयं यदि किसी प्रतियोगिता में बैठ रहे हैं तो सफलता के लिए कठिन प्रयास करना पड़ेगा। किसी बड़े पद की प्राप्ति, कोई बड़ी ज़िम्मेदारी अथवा सम्मान मिल सकता हैं, भाग्य से अब काम बनने लगेंगे, परिवार मे किसी की विवाह होने की संभावना बनेगी, धन प्रवाह मे थोड़ा विलंब रहेगा आर्थिक विषमताओं का भी सामना करना पड सकता है | कार्यस्थल पर सौहार्द्र बनाने में सफल होंगे। व्यापारिक यात्रा सफल होगी। प्रतियोगिताओं की तैयारियों में रुकावट हो सकती है। अधिक मेहनत की आवश्यकता है |
आपकी राशि से पांचवें स्थान में शनि पारगमन करेगा, लेकिन राहत की बात है कि गुरू पारगमन अभी आपके अनुकूल है, जो आपको किसी बड़ी दिक्कत से बचाएगा। इसके अलावा छात्र वर्ग को शनि पारगमन प्रभावित करेगा, जिसके कारण अधिक मेहनत के बावजूद कम नंबर मिलने की संभावना है। जो दंपति बच्चे की आशा रखते हैं, उनको मेडिकल ट्रीटमेंट के साथ आगे बढ़ना चाहिए। जो शेयर बाजार में निवेश करते हैं, उनको इस समय ज्योतिषीय सलाह के अनुरूप निवेश करना चाहिए। व्यापार में लाभ तो होगा परन्तु यदि उधार दिए तो उसे डूबा हुआ ही मानें।
उपाय-शाकाहारी रहे तथा एक मुट्ठी साबुत बादाम मंदिर मे हर शनिवार रखकर आए |
5)सिंह राशि
सिंह राशि वाले जातको के लिए शनि मारकेश होकर चतुर्थ भाव में गोचर से ढैय्या का आरम्भ हो रहा है । यह स्थान सुख, हृदय, माता, मातृभूमि, चल अचल संपत्ति से संबंधित है। इसलिए यह पारगमन आपको मानसिक रूप से बेचैन, करेगा। पारिवारिक सुख में कमी महसूस करेंगे, शत्रु सर उठा सकते हैं, इसके अलावा आपको उन चीजों का अहसास करवाएगा, जो आपके पास उपलब्ध नहीं हैं। कार्यक्षेत्र मे ऊठा पटक मचा कर बदलाव अथवा पदोन्नति करवा सकता हैं, राजनैतिक तथा सामाजिक क्षेत्रों से जुड़ें लोगों के मान प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। मकान व भूमि का सुख बढ़ेगा | शारीरिक कष्ट, दुर्घटना, माता के स्वास्थ्य सम्बंधित समस्या उत्पन्न हो सकती है। परंतु आपकी लोकप्रियता बढ़ती रहेगी, किसी को उधार देना पड सकता हैं निवेश में सावधानी रखें अथवा नहीं करें। व्यापार में अपने अत्यंत करीबी लोगों को भी अपनी निजी बातें ना बताएँ, धोखा हो सकता है। मामूली चिंताओं में वृद्धि होगी। शत्रु कार्यों में बाधाएं उत्पन्न कर सकते हैं परंतु कुछ बिगाड़ नहीं पाएंगे |सहायकों की वजह से स्थितियों पर नियंत्रण रखने में सफल होंगे। कार्यस्थल पर तनाव पैदा हो सकता है। मेहनत करने से अपने कार्य में अग्रणी रहेंगे एवं प्रोजेक्ट भी श्रेष्ठ होने के साथ सफलताएं मिलेंगी। आंखों एवं सिर में दर्द हो सकता है। नींद पूरी लें।
उपाय-हनुमान चालीसा का पाठ नित्य करे तथा स्फटिक शिवलिंग पर प्रत्येक सोमवार दूध का अभिषेक करे |
अपने स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखें विशेष कर यदि आप दिल के मरीज़ हैं तो
6)कन्या राशि
जन्म कालीन चन्द्र से तृतीयभाव, जो भाई, मित्र तथा साहस का स्थान है से शनि का यह गोचर आपको बहुत शुभता प्रदान करेगा लेकिन कुछ समय के लिए भाई बहन के साथ आपके संबंध बिगड़ सकते हैं। यदि आप नया साहस करना चाहते हैं तो पूरी योजना बनाने के बाद आगे बढ़ें। कानूनी मामलों में बहुत सतर्कता बरतने की जरूरत है। प्यार या धन के मामले में कोई करीबी मित्र धोखा दे सकता है, अतः इस समय किसी पर भी आंख मूंदकर विश्वास न करें। आपकी पद प्रतिष्ठा बढ़ेगी, संतान प्राप्ति हो सकती हैं, धार्मिक व विदेश यात्राए होंगी, खर्चे बढ़ेगे, विवादो मे आपकी विजय होगी व शनि की साढ़ेसाती से मुक्ति होने से तनावमय जीवन से छुटकारा मिल जाएगा | आशाजनक समाचारों की प्राप्ति तथा धन की वृद्धि होगी, कार्यों में आ रही अड़चनों का नाश होगा एवं अधूरे पड़े कार्यों को पूर्ण करने में सफल होंगे। अटके धन की प्राप्ति संभव है। प्रबुद्धजनों के मध्य रहने का मौका मिलेगा। आपकी अपनी इच्छा शक्ति अत्यंत दृढ़ रहेगी, समय आने पर आप कठोर निर्णय लेने में समर्थ होंगे। वैसे शनि के इस गोचर का एक प्रभाव अवश्य रहेगा, आप अपने लोगों की चाहे कितनी भी भलाई कर लें, आपको बुराई ही मिलनी है, लोग पीठ पीछे आपकी बुराई करेंगे तथा आपको नुकसान पहुँचाने की कोशिश करेंगे। संतान तथा शिक्षा के मामले में सफलता तथा व्यय की अधिकता रहेगी।
उपाय- रोजाना “ॐ नमः शिवाय” का 108 बार जाप करे तथा 3 कुत्तो को रोजाना कुछ खिलाये |
7)तुला राशि
द्वितीयभाव में शनि का गोचर सुखद, धन लाभ, आर्थिक मजबूती प्रदान करने वाला होगा। भूमि वाहन व मकान खरीदने की समभावनाए बनाएगा, आपकी माता या आपको कोई सम्मान प्राप्त होगा, उतरती हुयी साढ़ेसाती खूब यात्राए कराएगी, नियम के विरुद्ध कार्य करने व बिना जाने पहचाने उधार देने दिलवाने से परेशानियाँ होंगी | संबंधित लोग हावी होने का प्रयास कर सकते हैं। पारिवारिक और वैवाहिक जीवन में सुख की वृद्धि। पद और प्रतिष्ठा बढ़ेगी, नौकरी में प्रमोशन का योग बनेगा। संतान की इच्छा रखने वालों की इच्छा शनि अब पूरी करेंगे।रोग समाप्त होगा, शत्रु परास्त होंगे। उपाय-प्रतिदिन धर्मस्थान मे ज़रूर जाये |
उपाय- शनि की कृपा दृष्टि के लिए लोहे तथा तेल का दान करें
श्री यंत्र की पूजा करें।
चाटुकारों से सावधान रहें।
अपने परिवारिक सदस्यों से बातचीत करते हुए विनम्रता रखें।
8)वृश्चिक राशि
जन्म कालीन चन्द्र शनि का गोचर विलम्बकारी समय, कार्यक्षेत्र मे बदलाव व पिता के लिए कष्ट लाएगा, जीवन साथी से संबन्धित कोई नया कार्य कर सकते हैं सहोदरो से संबन्धित कोई खबर मिल सकती हैं | पारिवारिक सुख में कमी के कारण मानसिक संताप रह सकता है क्योंकि शनि जन्म के चंद्रमा को कमजोर करेगा। इस समय आप अनिद्रा की समस्या के कारण शारीरिक थकावट महसूस करेंगे। वृश्चिक जातकों के लिए शनि की साढ़े साती का दूसरा चरण है। नौकरी या व्यापार में स्थान परिवर्तन का योग भी बनेगा । व्यापारिक यात्रा लाभप्रद होगी। शनि साढ़ेसाती की दूसरी ढैय्या किसी बुजुर्ग की मृत्यु कारण अन्त्येष्टि कर्म मे सम्मिलित करवा सकती हैं स्वयं हेतु विष इत्यादि से भय हो सकता हैं पेट सम्बन्धी परेशानियाँ पैदा होंगी जिसके कारण स्वास्थ्य ठीक नहीं रहेगा। अत; बाहर के खाने से परहेज करे | कभी - कभी आलस्य भी परेशान करेगा, फिर भी दृढ़ता बनी रहेगी और निरन्तर कर्मशील रहेंगे।
उपाय- नित्य शनि चालीसा,हनुमान चालीसा का पाठ करे तथा हर शनिवार बंदरो को केला खिलाये |
शनि से जुड़ी चीजों का दान करना चाहिए। शनि साढ़े साती यंत्र की पूजा करना काफी आवश्यक है।
9)धनु राशि
व्ययभाव मे शनि का गोचर परेशानियाँ पैदा करने वाला होगा। साथ ही साढ़े साती का पहला चरण शुरू हो रहा है। जिसके प्रभाव से स्थान परिवर्तन, व्यर्थ यात्रायें, व आय में कमी, धन आने मे दिक्कते होंगी | व्यापार में परेशानी एवं संकट आ सकता है। व्यापार या नौकरी में परिस्थिति वश परिवर्तन करना पड़ सकता है। शत्रु परेशान कर सकते हैं, विश्वसनीय लोगों से थोड़ी सावधानी बरतने का समय है। साझेदारी में विवाद हो सकता है। विवाह योग्य लोगों को अभी और प्रतीक्षा करनी होगी। धार्मिक कार्यों में व्यय होने की संभावना है। कार्यस्थल पर विवाद हो सकता है। आपके खिलाफ कोई इलज़ाम अथवा कारवाई की जा सकती हैं जिनसे स्वयं स्वास्थ्य संबंधी परेशानिया शुरू होंने के कारण अस्पताल जाना पड़ सकता हैं, इसके अलावा वर्तमान में आपकी राशि का स्वामी गुरू आपकी राशि से आठवें स्थान पर पारगमन कर रहा है, जो आपको पूर्ण रूप से मदद नहीं करेगा। इस समय धन खर्च में इजाफा होगा, यहां तक कि आपको धन उधार लेना पड़ सकता है। धन सोच समझकर खर्च करें, विशेष कर भूमि खरीदते समय अत्यंत सावधानी बरतें। यह समय धैर्य से चलने और क्रोध तथा आवेग पर नियंत्रण रखने का होगा। मामा पक्ष मे परेशानियाँ आएंगी परंतु विदेश अथवा दूर की यात्रा से लाभ भी मिलेगा |
उपाय-विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ नित्य करे तथा चींटियों को चावल के आटे का चुरा डाले |
मेहनत से लाभ होगा।
10)मकर राशि
एकादश भाव लाभ स्थान मे लाभेश शनि का गोचर अत्यंत शुभ है। गुरु की दृष्टि भी इस राशि पर रहेगी जिससे सफलता व धन लाभ की संभावनाएं बनेगी | परिश्रम व्यर्थ नहीं जायेगा। आत्मविश्वास मे बढोतरी होगी, जीवन मे बहुत से बदलाव आएंगे, व्यापार विस्तार हेतु नई योजनाए बनेगी जिनसे लाभ होगा, आप धन को कहीं ना कहीं किसी भी रूप मे निवेश करेंगे, मित्रों से सहयोग बना रहेगा। नौकरी में बदलाव का विचार कर रहे हैं तो अभी कुछ समय प्रतीक्षा करें। संतान के लिए थोड़ा कष्टकारक समय रहेगा | संतान की इच्छा रखते दंपति को सचेत रहने की जरूरत है।घर के मरम्मत कार्यों में व्यय हो सकता है। विरोधियों को परास्त करने में सफल होंगे एवं अग्नि उपकरणों से बचना होगा। संबंधियों में उत्पन्न कलह से दूर रहें तो बेहतर होगा। इस समय छात्र वर्ग आलसी हो सकता है, जिसके कारण पढ़ने में मन नहीं लगेगा।
उपाय- सोमवार को शिवजी की तथा शनिवार को शनिदेव की पुजा करे,किसी सेवार्थ अस्पताल मे गरीबो के लिए मदर टिंचर नामक दवा दान करे |
11)कुम्भ राशि
दशमभाव से गोचर कार्य की अधिकता, नौकरी का छूटना व सम्मान की हानी कराएगा आपको अपने खर्चे निकालने मे दिक्कते प्राप्त होंगी, उधार व किश्ते चुकाना मुश्किल होगा, इन सब कारणो से सेहत प्रभावी हो सकती हैं, पिता या किसी पार्टनर से लाभ होगा, लंबी यात्राओ मे धन खर्च होगा, आपका विदेश अथवा अस्पताल से संबंध जुड़ सकता हैं, पत्नी से संबन्धित सुखो मे कमी तथा भूमि व मकान संबंधी योजनाओ मे परेशानियाँ बनेगी | इस स्थान का संबंध कर्म के अलावा पिता, व्यवसाय, यश एवं मान सम्मान से भी है। इस गृह में शनि पारगमन के कारण पेशेवर व व्यवसायी जातकों को परेशानी होगी, क्योंकि उनके कार्य धीमी गति से आगे बढ़ेंगे। इस समय नया कारोबार शुरू करने के संबंध में फैसला न लें। जो जातक विदेशी कार्यों से जुड़ें हैं उन्हें अद्भुत सफलता मिलेगी। पिता के साथ वैचारिक मतभेद रहने की संभावना है। जो जातक सरकारी काम काज से जुड़े हैं या अच्छे पदों पर विराजमान हैं, उनको इस समय यश प्राप्ति नहीं होगी। इस समय हनुमान चालीसा या हनुमान यंत्र की पूजा करनी चाहिए। मद्यादि सेवन की इच्छा प्रबल हो सकती है। इससे दूर रहने में भलाई होगी। आर्थिक क्षेत्र अस्थिर हो सकता है एवं बचत में भी कमी होगी। कार्य में अत्यधिक परिश्रम करना होगा। पूर्व अनुभव से अपना कार्य बनाने में सफल होंगे। विपरीत लिंग के प्रति प्रबल आकर्षण महसूस करेंगे।
उपाय-प्रतिदिन किसी धर्मस्थान मे अवश्य जाए तथा शनिवार शाम को शनि सहस्त्रनाम का पाठ करे|
12)मीन राशि
नवमभाव में गोचर धर्म, धन व भाग्य वृद्दि करेंगे, भाई बहनो को लाभ देंगे, शत्रुओ को नुकसान मिलेगा अर्थात आपकी विजय होगी, दुस्साहसी प्रवृति बढ़ेगी, कानूनी मामलो मे मदद व लाभ मिलेंगी, व्यापार में सफलता मिलेगी, आय के स्रोत बढ़ेंगे। धन और व्यापार के मामले में अच्छा समय है, पिता के स्वास्थ्य मे सुधार होगा, परन्तु पिता से बहुत विवाद हो सकता है। अपने क्रोध और ज़िद को नियंत्रण में रखें। धर्म गुरुओ से मिलना अथवा विदेश मे तबादला हो सकता हैं| यह समय व्यावसायिक रूप से महत्वपूर्ण होगा। नए कारोबार की शुरुआत एवं उद्यम की वृद्धि होगी। नौकरी में नई जिम्मेदारियों के साथ पद-वृद्धि के भी संकेत हैं। उच्च अध्ययन के लिए किए गए प्रयास सफलता दिलाने वाले होंगे तथा प्रतियोगिताओं में सफलता प्राप्त होगी। विपरीत लिंग के व्यक्तियों से रिश्ते बनाने में सावधानी बरते अन्यथा बदनामी मिल सकती या धोखा खा सकते हैं। अपने गुरु और मित्रों से द्वेष तथा बैर उत्पन्न हो सकता है, अतः सावधानी बरतें।
उपाय- रोज शनि चालीसा का नियमित पाठ करे तथा नित्य माथे पर हल्दी का तिलक लगाए |
गाय को चारा जरूर खिलाएं।
विशेष : सिर्फ गोचर परिवर्तन के आधार पर पड़ने वाले प्रभाव को जो मैं यहाँ दे रहा हूँ वह सामान्य है, आपके जीवन में शनि सम्बंधित वास्तविक परिणाम आपकी कुंडली में शनि की वास्तविक स्थिति, ढैय्या, साढ़ेसाती, महादशा - अंतर दशा, मार्गी - वक्री, ग्रहों से युति या दृष्टि सम्बन्ध इत्यादि बहुत सी बातों पर निर्भर करता है, अतः आपसे अनुरोध है कि इसे अंतिम परिणाम ना मानें और विशेष परिस्थितियों में ज्योतिषीय परामर्श लें।
शनि की साढ़ेसाती / ढैय्या / दशा के उपाय:
पुराणों की मानें तो शनि देव को परमात्मा ने सभी लोकों का न्यायाधीश, मनुष्यों के ‘कर्मों का निर्णायक बनाया है, और यथोचित पुरस्कार अथवा दंड देने का अधिकार दिया है।
शनिदेव त्रिदेव और ब्रह्मांड निवासियों में बिना किसी भेद के उनके किए कर्मों की सजा उन्हें देते हैं।
इसके साथ ही वह शराब का सेवन करने वाले, मांस भक्षण करने वाले, ब्याज लेने वाले, पर स्त्री के साथ संबंध रखने वाले लोगों एवं व्यभिचार करने वाले और अपनी ताकत के बल पर किसी के साथ अन्याय करने वाले का शनि देव कई जन्मों तक पीछा करते हैं और उसे उसके कर्मों के अनुरूप फल देते हैं।
जन्मकालीन शनि निर्बल होने के कारण अशुभ फल देने वाला हो या शनि कि साढ़े-साती व ढैया अशुभ कारक हो तो निम्नलिखित उपाय करने से बलवान हो कर शुभ फल दायक हो जाता है |
शनि का रत्न नीलम लोहे या सोने की अंगूठी में पुष्य ,अनुराधा ,उत्तरा भाद्रपद नक्षत्रों में जड़वा कर शनिवार को सूर्यास्त के बाद पुरुष दायें हाथ की तथा स्त्री बाएं हाथ की मध्यमा अंगुली में धारण करें | धारण करने से पहले ॐ प्रां प्रीं प्रों सः शनये नमः मन्त्र के १०८ उच्चारण से इस में ग्रह प्रतिष्ठा करके धूप, दीप, नीले पुष्प, काले तिल व अक्षत आदि से पूजन कर लें |
नीलम की सामर्थ्य न हो तो उपरत्न संग्लीली , लाजवर्त भी धारण कर सकते हैं | काले घोड़े कि नाल या नाव के नीचे के कील का छल्ला धारण करना भी शुभ रहता है
काले घोड़े की नाल या नाव (किश्ती) की कील का छल्ला बनवाकर, शुक्रवार शाम को एक लोहे की कटोरी में काले तिल व सरसों का तेल डालकर उसमें डुबो दें । शनिवार की शाम को सूर्यास्त के समय अंगुठी निकालकर हाथ की मध्यमा अंगुली में पहनें | तत्पश्चात तिल वाला तेल पीपल के पेड़ पर डाल दें।
शनिवार के नमक रहित व्रत रखें | ॐ प्रां प्रीं प्रों सः शनये नमः मन्त्र का २३ ००० की संख्या में जाप करें | शनिवार को काले उडद, तिल, तेल, लोहा, काले जूते, काला कम्बल, काले रंग का वस्त्र इत्यादि का दान करें |
हनुमान मंदिर में जाकर हनुमान चालीसा का पाठ करने से चमत्कारिक फल मिलता है। हनुमान चालीसा शनि दोष शान्ति हेतु रामबाण औषधि है।
किसी लोहे के पात्र में सरसों का तेल डालें और उसमें अपने शरीर की छाया देखें | इस तेल को पात्र व दक्षिणा सहित शनिवार को संध्या काल में दान कर दें |
शनिवार को शनि ग्रह की वस्तुएं न दान में लें और न ही बाजार से खरीदें।
शनिवार व मंगलवार को बंदरों को गुड़ चना खिलाएं, लाभ होगा।
मिट्टी के बर्तन में सरसों का तेल भरकर पानी में तालाब, नदी के किनारे शाम को दबा दें।
भैरों मंदिर में सायंकाल शराब चढ़ाएं व क्षमा याचना मांगे।
शनिवार को 8 लोहे के कटोरे सरसों के तेल से भर दें। शनिवार को सायंकाल आक के पेड़ की जड़ में इन कटोरों का तेल डालकर कटोरों को उलटा कर प्रार्थना करें कि मेरे सब कष्टों को दूर करो। फिर पीछे मुड़कर न देखें।
शनिवार को कीड़े-मकोड़ों को काले तिल डालें।
शनिवार को श्मशान घाट में लकड़ी दान करें।
सात शनिवार सरसों का तेल सारे शरीर में लगाकर नहाएं।
सात शनिवार को सात बादाम तथा काले उड़द की दाल धर्म स्थान में दान करें।
शनिवार को काले उड़द की दाल पीस कर उसके आटे की गोलियां बनाकर मछलियों को खिलाएं।
शनिवार के दिन उड़द दाल की खिचड़ी खाने से भी शनि दोष के कारण प्राप्त होने वाले कष्ट में कमी आती है।
लगातार सात शनिवार इस प्रकार करने से समस्याओं का प्रभाव कम हो जाएगा और हनुमानजी के साथ ही शनिदेव की कृपा भी प्राप्त होगी।
अश्वमेघ यज्ञ का फल: शनिवार को एक मुख का गोला ऊपर से इस प्रकार से काट लें कि गोले का ढक्कन बन जाये। फिर इस गोले में उड़द साबुत, काले तिल, सफेद तिल, शक्कर गुड़ वाली व एक चम्मच गाय का घी मिलाकर भर दें। फिर ढक्कन से बंद कर दें और ढक्कन पर चार मोची कीलें लगा दें। फिर किस पार्क या जंगल में मकोड़ों की जगह गड्डा करके दबा दें। मकोड़ों को एक महीने का राशन मिल जायेगा और वे आपको आशीर्वाद देंगे।
शनि का श्रेष्ठ उपाय : शनिवार को सायंकाल कोकिलावन (कोसी) में परिक्रमा करके शनिदेव के दर्शन करके भगवान श्री कृष्ण के दर्शन करें |
महाराष्ट्र के अहमद नगर से 30 कि.मी. दूर शनि शिंगणापुर में दर्शन करने से भी शनिदेव शांत होकर आशीर्वाद देते हैं
इस क्षेत्र की प्रसद्धि कहावत है :
देव है, देवालय नहीं।
घर है, द्वारा नहीं
वृक्ष है, पर छाया नहीं।
अनुष्ठान में जप हेतु शनि के निम्न कोई भी मंत्र का जप करवाएं। -
।।ऊँ शं शनैश्चराय नमः।। -
।।ऊँ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः।।
।।ऊँ शन्नौदेवी रभिष्ठयऽआपो भवंतु पीतते। शंरुयोरभिश्रवंतु नः।।
पद्म पुराण में वर्णित शनि के दशरथ को दिए गए वचन के अनुसार जो व्यक्ति श्रद्धा पूर्वक शनि की लोह प्रतिमा बनवा कर शमी पत्रों से दशरथ कृत शनि स्तोत्र द्वारा पूजन करके तिल ,काले उडद व लोहे का दान प्रतिमा सहित करता है तथा नित्य विशेषतः शनिवार को भक्ति पूर्वक इस स्तोत्र का जाप करता है उसे दशा या गोचर में कभी शनि कृत पीड़ा नहीं होगी और शनि द्वारा सदैव उसकी रक्षा की जायेगी |
शनि साढेसाती तथा शनि सवारी फल
शास्त्रो मे कहा गया है कि शनिदेव एकमात्र ऐसे देव हैं जिनके नौ वाहन है | इन 9 वाहनों में विराजित शनिदेव की पूजा करने से अलग-अलग फल मिलता है। इसलिए आराधना के लिए जरूरी है उनके सही रूप को जानना। शनिदेव चाहे मूर्ति रूप में हों या शिला रूप में, हर रूप में भक्तों को वरदान देते हैं। शनि की साढेसाती के दौरान शनि जिस वाहन पर सवार होकर जातक की कुण्डली मे प्रवेश करते है | उसी के अनुरुप शनि जातक को इस अवधि मे फल देते है | श्री शनि चालीसा मे भी उल्लेख है :वाहन प्रभु के सात सजाना। जग दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना॥
जम्बुक सिंह आदि नख धारी।सो फल ज्योतिष कहत पुकारी॥
गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं। हय ते सुख सम्पति उपजावैं॥
गर्दभ हानि करै बहु काजा। सिंह सिद्धकर राज समाजा॥
जम्बुक बुद्धि नष्ट कर डारै। मृग दे कष्ट प्राण संहारै॥
जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी। चोरी आदि होय डर भारी॥
वैसे तो शनिदेव का सबसे प्रमुख वाहन गिद्ध है। जो कि भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ का छोटा भाई है। लेकिन इसके अलावा घोड़ा, गधा, कुत्ता, शेर, सियार, हाथी, हिरण और मोर को भी उनका वाहन बताया गया है। यमराज के भाई होने की वजह से उनका एक और वाहन भैंसा है।
मान्यता है कि शनिदेव जिस वाहन पर सवार होकर जिस भक्त के पास जाते हैं। उसे उस वाहन के अनुसार फल भी मिलता है। शास्त्रों में कहा गया है कि हर वाहन विशेष इच्छा और फल के लिए उत्तरदायी होता है, और अगर शनिदेव की उस वाहन पर पूजा कर ली जाए तो शनि तुरंत प्रसन्न हो जाते हैं।
शनि साढ़ेसाती के समय निम्न विधि से वाहन का निर्धारण किया जाता है:
शनि सवारी निर्धारण का तरीका – 1
जातक के जन्म नक्षत्र की संख्या और शनि के राशि बदलने की तिथि की नक्षत्र संख्या दोनो को जोड कर योगफल को नौ से भाग करें, शेष संख्या के आधार पर शनि का वाहन निर्धारित होता है |
जातक के जन्म नक्षत्र की संख्या और शनि के राशि बदलने की तिथि की नक्षत्र संख्या दोनो को जोड कर योगफल को नौ से भाग करें, शेष संख्या के आधार पर शनि का वाहन निर्धारित होता है |
एक अन्य विधि के अनुसार
शनि सवारी निर्धारण का तरीका 2
शनि के राशि प्रवेश करने कि तिथि संख्या+ ऩक्षत्र संख्या + वार संख्या + जातक के नाम का प्रथम अक्षर संख्या सभी को जोडकर योगफल को 9 से भाग किया जाता है | शेष संख्या शनि का वाहन बताती है | दोनो विधियो मे शेष 0 बचने पर संख्या नौ समझनी चाहिए |
उदाहरण स्वरूप, मान लें,
गोचर में शनि वृश्चिक राशि में विशाखा नक्षत्र में चल रहे हैं और जातक का जन्म नक्षत्र है पूर्व फाल्गुनी तो पूर्व फाल्गुनी से विशाखा तक गिनने पर संख्या आई =6
तिथि शुकल एकादशी = 11
वार रविवार तो वार संख्या हुई 0
मान लीजिये जातक का नाम है अर्जुन तो नाम का पहला अक्षर हुआ A संख्या आई 1
योग हुआ = 18
नौ से भाग देंने पर शेष बचा 0
जिसके अनुसार शनि सवारी बनी : हंस: जो दर्शाता है --- लाभ, जय, सफलता
इस प्रकार शनि की प्रकृति और गोचर में स्थिति देखकर समझकर समय रहते शनि प्रकोप के निवारण का यथोचित उपाय कर सकते
विशेष: शेष संख्या 0 आने पर सँख्या 9 समझनी चाहिए और शनि का वाहन हँस समझना चाहिए|
शनि के राशि प्रवेश करने कि तिथि संख्या+ ऩक्षत्र संख्या + वार संख्या + जातक के नाम का प्रथम अक्षर संख्या सभी को जोडकर योगफल को 9 से भाग किया जाता है | शेष संख्या शनि का वाहन बताती है | दोनो विधियो मे शेष 0 बचने पर संख्या नौ समझनी चाहिए |
उदाहरण स्वरूप, मान लें,
गोचर में शनि वृश्चिक राशि में विशाखा नक्षत्र में चल रहे हैं और जातक का जन्म नक्षत्र है पूर्व फाल्गुनी तो पूर्व फाल्गुनी से विशाखा तक गिनने पर संख्या आई =6
तिथि शुकल एकादशी = 11
वार रविवार तो वार संख्या हुई 0
मान लीजिये जातक का नाम है अर्जुन तो नाम का पहला अक्षर हुआ A संख्या आई 1
योग हुआ = 18
नौ से भाग देंने पर शेष बचा 0
जिसके अनुसार शनि सवारी बनी : हंस: जो दर्शाता है --- लाभ, जय, सफलता
इस प्रकार शनि की प्रकृति और गोचर में स्थिति देखकर समझकर समय रहते शनि प्रकोप के निवारण का यथोचित उपाय कर सकते
विशेष: शेष संख्या 0 आने पर सँख्या 9 समझनी चाहिए और शनि का वाहन हँस समझना चाहिए|
1. शनि सवारी गधा: दुःख, वाद-विवाद
अगर शेष संख्या 1 होने पर शनि गधे पर सवार होते है | जातक के लिए शनि का वाहन गधा होने पर शनि की साढेसाती मे मिलने वाले शुभ फलो मे कमी होती है | शनि के इस वाहन को शुभ नही कहा गया है | शनि की साढेसाती की अवधि मे जातक को कार्यो मे सफलता प्राप्त करने के लिए काफी प्रयास करना होता है | जातक को इस स्थिति मे मेहनत के अनुरुप ही फल मिलते है | इसलिए जातक का अपने कर्तव्य का पालन करना हितकर होता है
2. शनि सवारी घोडा : सुख, संपत्ति, यात्रा
शेष सँख्या 2 होने पर शनि घोडे पर सवार होते है | शनि का वाहन घोडा होने पर जातक को शनि की साढेसाती मे शुभ फल मिलते है | इस दौरान जातक समझदारी व अक्लमंदी से काम लेते हुए अपने शत्रुओ पर विजय हासिल करता है | व जातक अपने बुद्धिबल से अपने विरोधियों को परास्त करने मे सफल रहता है | घोडे को शक्ति का प्रतिक माना गया है इसलिए इस अवधि मे जातक के उर्जा व जोश मे बढोतरी होती है |
शेष सँख्या 2 होने पर शनि घोडे पर सवार होते है | शनि का वाहन घोडा होने पर जातक को शनि की साढेसाती मे शुभ फल मिलते है | इस दौरान जातक समझदारी व अक्लमंदी से काम लेते हुए अपने शत्रुओ पर विजय हासिल करता है | व जातक अपने बुद्धिबल से अपने विरोधियों को परास्त करने मे सफल रहता है | घोडे को शक्ति का प्रतिक माना गया है इसलिए इस अवधि मे जातक के उर्जा व जोश मे बढोतरी होती है |
3. शनि सवारी हाथी : उत्तम भोजन, सुख, लाभ
शेष सँख्या 3 होने पर शनि को हाथी पर सवार कहा गया है , जिस जातक के लिए शनि का वाहन हाथी होता है | उस जातक के लिए शनि के वाहन को शुभ नही कहा गया है | इस अवधि मे आशा के विपरित फल मिलते है | इस स्थिति मे जातक को साहस व हिम्मत से काम लेना चाहिए | तथा विपरित परिस्थितियों मे भी घबराना नहीं चाहिए |
शेष सँख्या 3 होने पर शनि को हाथी पर सवार कहा गया है , जिस जातक के लिए शनि का वाहन हाथी होता है | उस जातक के लिए शनि के वाहन को शुभ नही कहा गया है | इस अवधि मे आशा के विपरित फल मिलते है | इस स्थिति मे जातक को साहस व हिम्मत से काम लेना चाहिए | तथा विपरित परिस्थितियों मे भी घबराना नहीं चाहिए |
4. शनि सवारी भैसा : विपरीत, असफलता, रोग
शेष सँख्या 4 होने पर शनि को भैसे पर सवार बताया गया है | शनि का वाहन भैंसा आने पर जातक को मिलेजुले फल मिलते है | शनि की साढेसाती की अवधि मे जातक को संयम व होशियारी से काम करना चाहिए | इस समय मे अधीर व व्याकुल होना जातक के हित मे नही होता है | जातक को इस समय मे सावधानी से काम करना चाहिए | अन्यथा कटु फलो मे वृ्द्धि होने की संभावना होती है |
शेष सँख्या 4 होने पर शनि को भैसे पर सवार बताया गया है | शनि का वाहन भैंसा आने पर जातक को मिलेजुले फल मिलते है | शनि की साढेसाती की अवधि मे जातक को संयम व होशियारी से काम करना चाहिए | इस समय मे अधीर व व्याकुल होना जातक के हित मे नही होता है | जातक को इस समय मे सावधानी से काम करना चाहिए | अन्यथा कटु फलो मे वृ्द्धि होने की संभावना होती है |
5. शनि सवारी सिंह : विजय, लाभ, सफलता
शेष सँख्या 5 होने पर शनि सिंह पर सवार होते है | शनि का वाहन सिँह जातक को शुभ फल देता है सिँह वाहन होने पर जातक को समझदारी व चतुराई से काम लेना चाहिए ऎसा करने से जातक अपने शत्रुओ पर विजय प्राप्त करने मे सफल होता है अत इस अवधि मे जातक को अपने विरोधियोँ से घबराने की जरुरत नही होती है |
शेष सँख्या 5 होने पर शनि सिंह पर सवार होते है | शनि का वाहन सिँह जातक को शुभ फल देता है सिँह वाहन होने पर जातक को समझदारी व चतुराई से काम लेना चाहिए ऎसा करने से जातक अपने शत्रुओ पर विजय प्राप्त करने मे सफल होता है अत इस अवधि मे जातक को अपने विरोधियोँ से घबराने की जरुरत नही होती है |
6. शनि सवारी सियार: भय, कष्ट
शेष सँख्या 6 होने पर शनि सियार पर सवार माने गये है | शनि की साढेसाती के आरम्भ होने पर शनि का वाहन सियार होने पर जातक को मिलने वाले फल शुभ नही होते है इस स्थिति मे जातक को साहस व हिम्मत से काम लेना चाहिए क्योकि इस दौरान जातक को अशुभ सूचनाएं अधिक मिलने की संभावनाएं बनती है |
7. शनि सवारी कौआ : चिंता, मानसिक कष्ट
शेष सँख्या 7 होने पर शनि का वाहन कौआ कहा गया है | साढेसाती की इस अवधि मे कलह बढती है | जातक के लिए शनि का वाहन कौआ होने पर उसे शान्ति व सँयम से काम लेना चाहिए परिवार मे किसी मुद्दे को लेकर विवाद व कलह की स्थिति को टालने का प्रयास करना चाहिए ज्यादा से ज्यादा बातचीत कर बात को बढने से रोकने की कोशिश करनी चाहिए इससे कष्टो मे कमी होती है
शेष सँख्या 7 होने पर शनि का वाहन कौआ कहा गया है | साढेसाती की इस अवधि मे कलह बढती है | जातक के लिए शनि का वाहन कौआ होने पर उसे शान्ति व सँयम से काम लेना चाहिए परिवार मे किसी मुद्दे को लेकर विवाद व कलह की स्थिति को टालने का प्रयास करना चाहिए ज्यादा से ज्यादा बातचीत कर बात को बढने से रोकने की कोशिश करनी चाहिए इससे कष्टो मे कमी होती है
8. शनि सवारी मोर : सुख एवं लाभ
शेष सँख्या 8 होने पर शनि को मोर पर सवार बताया गया है | शनि का वाहन मोर जातक को शुभ फल देता है इस समय मे जातक को अपनी मेहनत के साथ - साथ भाग्य का साथ भी मिलता है शनि की साढेसाती की इस अवधि मे जातक अपनी होशियारी व समझदारी से परेशानियों को कम करने मे सफल होता है इस दौरान जातक मेहनत से अपनी आर्थिक स्थिति को भी सुधार पाता है
9. शनि सवारी हंस : लाभ, जय, सफलता
शेष सँख्या 9 होने पर शनि का वाहन हँस कहा गया है | जिन जातकों के लिए शनि का वाहन हँस होता है उनके लिए शनि की साढेसाती की अवधि बहुत शुभ होती है इस मे जातक बुद्धिमानी व मेहनत से काम करके भाग्य का सहयोग पाने मे सफल होता है यह वाहन जातक के आर्थिक लाभ व सुखो को बढाता है शनि के सभी वाहनो मे इस वाहन को सबसे अधिक अच्छा कहा गया है|
शनि साढेसाती तथा शनि सवारी फल
जिस जातक को शनि की साढेसाती के चरण के फल अशुभ मिल रहे है तथा शनि का वाहन भी शुभ नही है तो इस स्थिति मे साढेसाती के दौरान जातक को विशेष रुप से सावधान रहना चाहिए इस स्थिति मे जातक के सामने अनेक चुनोतियाँ आती है जिनका जातक को हिम्मत के साथ सामना करना चाहिए
जिस जातक को शनि की साढेसाती के चरण के फल अशुभ मिल रहे है तथा शनि का वाहन भी शुभ नही है तो इस स्थिति मे साढेसाती के दौरान जातक को विशेष रुप से सावधान रहना चाहिए इस स्थिति मे जातक के सामने अनेक चुनोतियाँ आती है जिनका जातक को हिम्मत के साथ सामना करना चाहिए
अगर किसी जातक को साढेसाती के अशुभ फल मिल रहे हो तथा शनि का वाहन शुभ हो तो इस स्थिति मे साढेसाती के कष्टो मे कमी आती है और जातक को मिला जुला फल मिलता है
जिस जातक के लिए शनि का वाहन शुभ हो तथा साढेसाती के चरण के फल भी शुभ हो तो इस स्थिति मे शुभता बढ जाती है पर साढेसाती का चरण शुभ तो और वाहन का फल अशुभ आ रहा हो तो जातक को मिलजुले फल मिलते है
शनि का वाहन कुछ जातकों के लिए शुभ फलकारी है तथा कुछ के लिए अशुभ फल देने वाला होता है प्रत्येक जातक के लिए शनि के फल अलग अलग हो सकते है |
ढैया व साढ़े-साती के फलित का निष्कर्ष शनि की सही स्थिति का अवलोकन करने के बाद ही निकालना चाहिए । शनि की ढैया या साढ़े-साती का फल कई बातों पर निर्भर करता है जैसे- जन्म-पत्रिका में शनि की चंद्र से सापेक्ष दूरी पर।
जन्म-पत्रिका में शनि की स्थिति पर।
जन्म-पत्रिका व गोचर में ग्रहों की तुलनात्मक स्थिति।
पाद, वेध और प्रतिवेध पर।
शनि अष्टकवर्ग में विभिन्न भावों को मिली रेखाओं एवं अशुभ बिंदुओं पर।
जातक की दशा-अंतर्दशा पर।
जन्म-कुंडली में शनि की नवांश में स्थिति पर।
जन्म-कुंडली में शनि के षड्बल में बल पर।
पूर्व जन्म व वर्तमान जन्म के कर्मों के फल पर।
निम्न-वर्ग के साथ व्यवहार पर।
दैनिक जीवन में सत्य व न्याय
रत्न की धारण स्थिति पर।
शनि का राशि परिवर्तन- 2014
‘‘तुष्टो ददासि वै राज्यं, रुष्टो हरसि तत्क्षणात्।’’
महर्षि कश्यप द्वारा रचित शनि स्तोत्र के अनुसार- ‘‘शनिदेव’’ संतुष्ट या प्रसन्न होने पर भिखारी को भी राजा के समान सुख दे देते हैं और रुष्ट होने पर राजाओं के राज्य छीनकर उन्हें क्षण भर में भिखारी बना देते हैं।
इसलिए शनि चालीसा में कहा गया है-
‘‘जा पर प्रभु प्रसन्न हुई जाहीं। रंकहुं राव करे क्षण माही।।’’
शनिदेव अपनी उच्च या मूल त्रिकोण राशि में,
जातक की जन्मकालीन लग्न या चन्द्र राशि से 3, 6, 11वें भाव में भ्रमण करते समय शुभ फल प्रदान करते हैं ।अष्टकवर्ग के फलानुसार जब शनि जातक की अधिक रेखायुक्त राशि में प्रवेश करते हैं । तब उस जातक को शनि संबंधी शुभ फलों की प्राप्ति होती है। तथा लग्न से जिस भाव में वह राशि हो उस भाव से संबंधित शुभ फलों की वृद्धि का लाभ मिलेगा। उदाहरणार्थ, जिस व्यक्ति के शन्याष्टक वर्ग कुंडली के वृश्चिक राशि में शनि की 4 या 4 से अधिक शुभाष्टक रेखाएं हों। उस व्यक्ति को वृश्चिक के गोचरीय शनि का शुभफल अवश्य प्राप्त होगा। फिर चाहे भले ही शनि जन्म राशि से अशुभ (12, 1, 2, 4, 8) स्थानों में गोचर कर रहा हो। क्योंकि उपरोक्त स्थिति में उसे शनि का शुभ रेखाष्टक बल प्राप्त हो जाएगा।
यदि जन्मराशि से शुभ (3, 6, 11) स्थान में शनि का गोचर हो और वृश्चिक राशि में शन्याष्टक की 4 या 4 से अधिक रेखाएं हों, तो सर्वाधिक शुभ फल प्राप्त होगा। इसके विपरीत जितनी कम रेखाएं होंगी उतना ही ज्यादा अशुभ फल प्राप्त होगा।
जन्मराशि से 1, 2, 4, 5, 7, 8, 9, 12वें स्थान में शनि का भ्रमण पीड़ा दायक होता है। जन्मराशि से जब शनि 12, 1, 2 स्थानों में होता है, तब उन राशि के जातकों को शनि की साढ़ेसाती का प्रभाव रहता है। गोचर का शनि जन्मराशि से जब चतुर्थ या अष्टम स्थान में रहता है, तब शनि की ढैय्या होती है।
महादेव के शिष्य सूर्यपुत्र ''शनिदेव'' अपनी उच्च राशि तुला में से निकल कर शत्रु राशि वृश्चिक में प्रवेश करेंगे । शनि के राशि परिवर्तन के साथ ही कन्या राशि के जातकों की साढ़े साती पूर्ण होगी एवं तुला राशि के जातकों के लिए साढ़े साती का अंतिम जबकि वृश्चिक राशि के जातकों के लिए दूसरा चरण शुरू होगा। इसके अलावा धनु राशि के जातकों के लिए साढ़े साती का प्रारंभ समय है। सिंह व मेष राशि के जातकों के लिए शनि की छोटी पनौती/ढैय्या (कंटक व् अर्धकंटक शनि) रहेगी।
आम तौर पर शनि को पापी ग्रह कहा जाता है, लेकिन शनि एक न्यायाधीश ग्रह है, जो आपको अपने पुराने कर्मों का फल प्रदान करता है, यदि आप अपने पुण्य किए हैं तो अच्छे फल, यदि आप ने पाप किए हैं तो बुरे परिणाम मिलेंगे।
मकर एवं कुंभ राशि का स्वामी शनि सूर्य पुत्र हो कर भी सूर्य का प्रबल शत्रु है | उत्तर कालामृत के अनुसार ज्योतिष शास्त्र में शनि ग्रह मुख्यतः आयु, बीमारी, मृत्यु का कारण, भय, दुख, विपत्ति, दासता, आलस्य, नौकरी, मेहनत, दरिद्रता, दांतों व पैरों के रोग, कृषि साधन, लौह-उपकरण आदि से संबंध रखता है। कंगनी, कौवों, उड़द, काले तिल, नमक, तथा सभी काली वस्तुओं पर उसका आधिपत्य है। साथ ही गुप्त-विद्या, अध्यात्म और मोक्ष दिलाने वाला ग्रह भी शनि ही है। भारतीय ज्योतिष में शनि ग्रह को नैसर्गिक अशुभ और कष्टकारी माना गया है।
वह वृष, तुला, मकर और कुंभ लग्न में जन्मे जातकों के लिए परम शुभ फलदायक (योग कारक) होता है। शनि एक निष्पक्ष न्यायकर्ता ग्रह है। जो लोग अनाचार और अधार्मिक कार्यों में लिप्त रहते हैं, केवल उन्हीं को शनि प्रताड़ित करता है। मनुष्यों के प्रारब्ध (पिछले जन्मों के कर्मफल) अनुसार ही शनि की जन्म-कुंडली में स्थिति होती है।
वृषभ और तुला लग्न वालों के लिए शनि ‘योगकारक’ (परम शुभ) होता है। मकर और कुंभ लग्न वाले जातकों का लग्नेश होकर हितकारी होता है।
कुंडली में शनि अशुभ, नीच, अथवा अस्त होने पर कष्टकारी होता है। बलवान शनि परम सहायक व शुभ फलदायक होता है।
शनि ग्रह का गोचर सबसे धीमा है। अतः उसे ‘शनैः शनैः शनैश्चराय’ से संबोधित किया जाता है। उसका एक और नाम ‘मंदः’ है। वह एक राशि (30°) का गोचर पूर्ण करने में सर्वाधिक ढाई वर्ष लेता है और मानव जीवन पर दीर्घकालीन प्रभाव डालता है। जब शनि जन्म कालीन चन्द्र से द्वादश, प्रथम तथा द्वितीय भाव भाव में गोचर करता है, इस समय को साढ़े-साती से संबोधित किया जाता है। यह क्रम हर व्यक्ति के जीवन में 30 वर्ष के अंतराल से आता रहता है।
शनि का चंद्र राशि से चतुर्थ सप्तम और अष्टम भाव से गोचर ‘‘अशुभ ढैय्या’ कहलाता है।
शनि का चंद्रमा से तृतीय षष्ट और एकादश भाव से गोचर शुभ फल दायक होता है।
अन्य भावों में शनि का गोचर फल मिश्रित होता है।
2 नवंबर, 2014 को शाम 4 बजकर 8 मिनट पर शनि “वृश्चिक” राशि मे प्रवेश कर रहे हैं, जहां वह 26 जनवरी, 2017 तक रहेंगे |
इस दौरान 14 मार्च, 2015 से 2 अगस्त, 2015 तक तथा 25 मार्च, 2016 से 13 अगस्त, 2016 तक 2 बार शनि वक्री होंगे तथा 31 अक्तूबर, 2014 से 6 दिसंबर, 2014 तक, 12 नवंबर, 2015 से 17 दिसंबर, 2015 तक तथा 22 नवंबर, 2016 से 28 दिसंबर, 2016 तक 3 बार शनि इसी वृश्चिक राशि मे अस्त भी होंगे |
जन्मकुंडली में शनि की अशुभ स्थिति होने पर उसकी दशा-भुक्ति, ढैय्या और साढ़ेसाती के समय जातक को सांसारिक दृष्टि से कई प्रकार के कष्टों-असफलता, दुख, धन तथा मानहानि, शारीरिक व्याधि, चिंता, परिवार के महत्वपूर्ण व्यक्ति का निधन आदि का सामना करना पड़ सकता है। जब किसी परिवार के कई सदस्यों की एक साथ शनि दशा, ढैय्या या साढ़ेसाती चलती है तब उस समय वह परिवार अधिक विपत्तियां झेलता है। शुभ ग्रहों की दशा-भुक्ति होने तथा बृहस्पति का शुभ गोचर होने पर समय कम कष्टकारी होता है।
पौराणिक कथा के अनुसार शनि देवाधिदेव महादेव के परम शिष्य हैं। उनकी धर्म अनुरक्ति और निष्पक्षता से प्रसन्न होकर शिवजी ने उन्हें मनुष्यों के शुभ-अशुभ कर्मफल प्रदान करने का अधिकार दिया था। साथ ही शिवजी ने शनि को सावधान किया था कि जो भी प्राणी उनकी (शिवजी की) शरण में आयेगा उस व्यक्ति को शनि और प्रताड़ित नहीं करेगा। अतः सुबह नहाकर शिवलिंग का जलाभिषेक -जल, गंगाजल, काले तिल के कुछ दाने व तिल के तेल की कुछ बूंद मिलाकर करना चाहिए। वहीं बैठकर ‘ऊँ नमः शिवाय’ व ‘ऊँ शं शनैश्चराय नमः’ की एक-एक माला जप शनि प्रदत्त कष्टों को कम करता है।
एक अन्य कथा अनुसार हनुमान जी से हारने के बाद शनि ने अपना दिन (शनिवार) भी उनकी पूजा के लिए अर्पित कर दिया था, और हनुमान जी के भक्तों को कष्ट न देने का वचन भी दिया था। अतः शनि-प्रदत्त कष्टों से निवारण के लिए हनुमानजी की पूजा आराधना का शास्त्रोक्त विधान है। ‘शनि उपासना’ के लिए ‘पद्मपुराण’ में वर्णित राजा दशरथ द्वारा की गई स्तुति (दशरथ स्तोत्र) का प्रातः काल पाठ करना उत्तम फलदायक माना गया है। स्तोत्र के अंत में की गई प्रार्थना इस प्रकार है:-
ज्ञानचक्षर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज सूनवे।
तुष्टो ददासि वै राज्यं रूष्टो हरसि तत्क्षणात।।
देवासुर मनुष्याश्च सिद्धविद्या धरोनगाः।
त्वयां विलोकिताः सर्वे नाशं यान्ति समूलतः।।
प्रसादं कुरू में देव वरार्हो ज्हमुपागतः। (34, 34-35)
अर्थात् ‘हे ज्ञान नेत्र ! आपको नमस्कार है। कश्यपनन्दन सूर्य के पुत्र! आपको नमस्कार है। आप संतुष्ट होने पर राज्य देते हैं और रूष्ट होने पर तत्क्षण हर लेते हैं। देवता, असुर, मनुष्य, सिद्ध, विद्याधर और नाग, ये सब आपकी दृष्टि पड़ने पर समूल नष्ट हो जाते हैं। हे देव ! मुझ पर प्रसन्न होईये। मैं वर पाने के लिए आपकी शरण में आया हूं।’’
शनि पीड़ा होने पर निम्न किसी भी मंत्र का 23 हजार संख्या का जप अनुष्ठान किसी शनिवार और विशेषकर ‘शनि अमावस्या’ को शनि की प्रतिमा का तेलाभिषेक करने के बाद सुबह से रुद्राक्ष की माला पर करना चाहिए। उसके बाद काले तिल से दशांश हवन व आरती के बाद उरद की दल को बड़े का प्रसाद बांटना चाहिए।
1. ऊँ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः।
2. ऊँ शं शनैश्चराय नमः ।
ध्यान रहे कि शनि एक निर्णायक ग्रह है। अतः शनि-प्रदत्त् कष्टों को सहनशील ही बनाया जा सकता है, पूर्णतया मिटाया नहीं जा सकता। शनि पीड़ित व्यक्ति को शनि उपासना के साथ ही धर्मानुकूल आचरण भी करना चाहिए। मांस-मदिरा का सर्वथा त्याग कर देना चाहिए तभी शनि साधना फलीभूत होगी। जिनका शनि शुभ है, एवं शनि दशा, अंतर्दशा, साढ़ेसाती, ढैय्या, आदि नहीं चल रही है, उन्हें भी सुनहरे भविष्य हेतु शनि उपासना तथा मंत्र जप अवश्य करते रहना चाहिए। शनि आराधना मनुष्यों के लिए परम कल्याणकारी है। इससे जीवन में सात्विकता आती है, और मानव जीवन के लक्ष्य का ज्ञान देकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती है।
‘नीलांजन समाभासं रवि पुत्रं यमाग्रजं।
छाया मार्तण्ड सम्भूतं तम् नमामि शनैश्चरम्।।
ऊँ शं शनैश्चराय नमः।
शनि जयंती
शनि जयंती
ज्योतिष शास्त्र में शनि देव को दंड अधिकारी माना गया है। शनि की तिरछी नजर या टेढ़ी चाल का प्रभाव घातक माना जाता है। ये क्रूर ग्रह माने जाते हैं | इस समय शनि देव अपनी उच्च राशि तुला में होने के साथ साथ ज्ञान, बुद्धि एवं प्रगति के स्वामी देवगुरु बृहस्पति के नक्षत्र मे विराजमान हैं | इसलिए शनि जयंती का यह दिवस आलस्य, कष्ट, विलंब, पीड़ानाशक होकर भाग्योदय का दुर्लभ अवसर है।
शनि जयंती पर किया गया दान-पुण्य शुभ फलों को प्रदान करने वाला होगा। गलत कार्य करने वाले लोगों को इस सावधान रहना होगा, अन्यथा कोई बड़ी परेशानी उत्पन्न हो सकती है।
शनि देव के विषय में यह कहा जाता है कि-
राशि अनुसार शनि ग्रह का फल तथा किये जाने वाले उपाय
शनि जयंती के दिन सरसों के तेल का दान गरीबों में दें।
शनि जयंती के दिन श्रद्घानुसार ज्वार गरीब व्यक्ति या किसी गौशाला में दान दें।
शनि जयंती के दिन उड़द के आटे की गोलियां बनाकर मछलियों को डालें।
शनि जयंती के दिन शिवलिंग पर बिल्व पत्र अर्पित करें। गरीब और अपाहिजों को भोजन कराना शुभ रहेगा।
शनि जयंती के दिन मां भगवती के श्रीचरणों में गुलाब के 108 फूल अर्पित करें। श्री शनिदेव के श्रीचरणों में तेल चढ़ाएं।
कोणस्थ:पिंगलो वभ्रु: कृष्णौ रौद्रान्त को यम:, सौरि: शनैश्चरौ मंद: पिप्पलादेन संस्तुत:॥ - अर्थात् कोणस्थ, पिंगल, बभ्रु, कृष्ण, रौद्रान्तक, यम, सौरि (सूर्यपुत्र), शनैश्चर, मन्द, पिप्पलाश्रय.
शनि जयंती के दिन वट वृक्ष के पेड़ में जल अर्पित करें। तवा, अंगीठी व काले कपड़े का दान करना शुभ रहेगा।
आपकी राशि पर शनि का भ्रमण और दूसरा ढैय्या हृदय पर चांदी के पाये का होने से शुभाशुभ फल की प्राप्ति होगी. मानसिक तनाव, पारिवारिक क्लेश, भूमि, व्यापार-व्यवसाय में विशेष प्रयास से लाभ के योग हैं. तरक्की भी संभव है|
दशरथकृत शनि स्त्रोत का पाठ शनिजनित पीड़ा में लाभ देगा|
दशरथकृत शनि स्त्रोत-
नमस्ते कोण संस्थाय पिंगलाय नमोऽस्तुते
नमस्ते बभ्रुरुपाय कृष्णाय नमोऽस्तुते
नमस्ते रौद्रदेहाय नमस्ते चांतकाय च
नमस्ते यमसंज्ञाय नमस्ते सौरये विभौ
नमस्ते मंदसंज्ञाय शनैश्चर नमोऽस्तुते
प्रसादं कुरू में देवेश दीनस्य प्रणतस्य च
शनि के मंत्र का जाप करें-
ॐ शं शनैश्चराय नम:,
साथ ही शनि की पत्नी के नामों के स्मरण से शनि प्रसन्न होते हैं|
ध्वजनि धामिनी चैव कंकाली कलहप्रिया, कंटकी कलही चाडथ तुरंगी महिषी अजा.. शनेनभिमानी पत्नी नामेताति संजपन् पुमान्. दुःखानि नाशयेनित्य सौभाग्यमेधते सुखम्.
गरीबों की सेवा करें, कुष्ठ रोगों से ग्रसित लोगों की सेवा शनि के शुभ फलों में वृद्धि देगी|
शनि जयंती के दिन अंधे व्यक्ति को भोजन कराना अति लाभकारी रहेगा। चने की दाल कुष्ठ रोगियों को दान में दें।
शिव की आराधना करें, ॐ नम: शिवाय का जाप करें, बिल्वपत्र शिव को अर्पित करें, शनि की अनुकूलता प्राप्त होगी|
आपकी राशि से शनि का गोचर पंचम स्थान से गोचर होने से धन, संतान में लाभ, पारिवारिक क्लेश, लंबी तीर्थयात्राएं हो सकती है. विशेष प्रयास करने पर व्यापार व नौकरी में उन्नति संभव है|
सदैव शनि चालीसा का पाठ करें, वृद्धों-गरीबों की सेवा करें आप पर शनि की अनुकंपा बनी रहेगी.
हनुमान साधना करें, बजरंग बाण का पाठ विशेष लाभकारी होगा|




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