100.3. श्री एकादशी व्रत उद्यापन

॥ उद्यापन विधि ॥

उद्यापन के दिन यजमान नित्यक्रिया से निवृत होकर शुभ्र या रेशमी वस्त्र धारण करे। अपनी पत्नी को उसी प्रकार पवित्र करके सपत्नीक शुद्ध मन होकर आसन पर बैठे।' 

दिन में अगर करना हो तो पूर्व की ओर मुख कर के बैठें | और यदि आप रात में पूजन करने जारहे हों तो उत्तर दिशा की ओर मुख कर के बैठें |

निम्न मंत्र बोलते हुए तीन बार जल से आचमन करें –

ॐ केशवाय नमः | ॐ नारायणाय नमः | ॐ माधवाय नमः ।

आचमन के पश्चात दाहिने हाथ के अंगूठे के मूलभाग से `ॐ गोविन्दाय नमः’ कहकर ओठों को पोछकर हाथ धोलें |

पवित्री धारण – दिए गए मन्त्र का उच्चारण कर पवित्री धारण करें| ( पवित्री कुश का होना चाहिय अगर उपलब्ध नाहो तो स्वर्न्मुद्रिका (अंगूठी) धारण करें –

ॐ पवित्रेस्थो वैष्णव्यौ सवितुर्वः प्रसव उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभि:| तस्यते पवित्रपते पवित्र पूतस्य यात्काम: पुने तच्छकेयम ||:' 

इस मन्त्र से यजमान पवित्री धारण करे, और भगवान का ध्यान करे। पवित्रीधारण करने के पश्चात् प्राणायाम करें – ( प्राणायाम के बारे में मई आपको आगे बताऊंगा ) इसके बाद बाएं हाथमें जल लेकर दाहिने अपने ऊपर तह पूजन सामग्रियों पर छिड़क दें मंत्र –

ॐ अपवित्र: पवित्रोवा सर्वा वस्थान्ग्तोपीवा| य: स्मरेत पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यंतर: शुची: ||

ॐ पुण्डरीकाक्ष: पुनातु | ॐ पुण्डरीकाक्ष: पुनातु | ॐ पुण्डरीकाक्ष: पुनातु |

यजमान के हाथ में अक्षत, पुष्प, सुपारी देकर ॐ आनोभद्रा इत्यादि मन्त्र पढ़ना चाहिये। 

स्वस्तयन

ॐ आ नो भाद्रा: क्रतवो यन्तु विस्वतो दब्धासो अपरीतास उद्भिदः | देवा नो यथा सदमिदवृधे असन्न्प्रायुवो रक्षितारो दिवे दिवे || देवानां भद्रा सुमतिऋजुयातां देवाना गुंग रातिरभि नो निवर्त्ताम्म | देवाना गुंग सख्यमुपसेदिमा वयं देवा न आयु: प्रतिरंती जीवसे || तानपूर्व्या निविदा हुमहे वयं भगं मित्रमदितिं दक्षमस्त्रीधम्म | अर्यमणं वरुण गुंग सोममश्विना सरस्वती न: सुभगा मयस्करत || तन्नो वातो मयोभु वातु भेषजं तन्माता पृथिवी तत्पिता द्यौ: | तदग्रावान: सोम सुतो मयो भुवस्त दस्विना सृनुतम धिष्ण्या युवम || तमीशानं जगातास्तस्थू षस्पतिम धियंजिन्वमवसे  हुमहे  वयम् | पूषानो यथा वेद साम सद्वृधे रक्षिता पायुर दब्ध: स्वस्तये || स्वस्ति नो इन्द्रो वृद्धश्रवा: स्वस्ति न: पूषा विश्ववेदा: | स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमि : स्वस्तिनो वृहस्पति र्दधातु || पृषदस्वा मरुत: प्रिश्निमातर: शुभम यावानो विदथेषु जग्मयः | अग्निजिह्वा मानव: सूरचक्षसो विश्वे नो देवा अवसा गमन्निह || भद्रं कर्नेभी: शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्ष भिर्यजत्रा: | स्थिरै रंगैश्तुष्तुवा गुंग सस्तनू भिर्व्य शेमही देवहितं जदायू:  || शतमिन्नू शरदो अंति देवा यत्रा नश्चक्रा जरसं तनूनाम् || पुत्रासो जत्र पितरो भवन्ति  मानो मध्या रिरिषतायुर्गंतो: || अदितिर्द्यौरदिति रन्तरिक्ष मदितिर्माता स पिता स पुत्र: | विश्वे देवा अदिति: पञ्चजना अदितिर्जातमदितिर्ज्नित्वम् || द्यौ: शान्ति रन्तरिक्ष गुंग शांति: पृथिवी शांति राप: शान्ति रोषधय: शांति: | वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शांति ब्रह्म शांति: सर्व गुंग शांति:  शान्तिरेव शांतिः सामा शान्तिरेधि || यतोयतः समिहसे ततो नो अभयं कुरु | शं न: कुरु प्रजाभ्यो भयं न: पशुभ्य: ||  शुशान्तिर्भवतु ||


फिर यजमान को दक्षिण हाथ में द्रव्य, अक्षत, सुपारी, जल लेकर संकल्प करना चाहिए। 

संकल्प करके पृथ्वी, गौरी और गणेश का पूजन कलश स्थापन, आचार्य वरणादि करके संकल्पित सब क्रियाओं का सम्पादन करना चाहिए। ततः पूर्वनिर्मित सर्वतोभद्र पर ब्रह्मादि देवताओं का आवाह्नन करना चाहिये। उसके ऊपर ताम्र का कलश स्थापित करना चाहिये। कलश में चावल भरा हो, उसके ऊपर चांदी का पात्र हो। अष्टदल कमल बनाकर प्रधान देवता का आवाह्नन करना चाहिए।

'सहस्त्र शीर्षा पुरुषः इत्यादि मंत्रों से लक्ष्मी सहित विष्णु का आवाह्नन करना चाहिए। अष्टदल के आठों पत्रों पर पूर्वादि क्रम से अग्नि, इन्द्र, प्रजा पति, विश्वदेवा, ब्रह्मा, वासुदेव, श्रीराम का नाम लेकर आवाह्नन करना चाहिए, फिर चारों दिशाओं में क्रमशः रुक्मिणी, सत्यभाभा, जाम्बवती और कालिन्दी का आवाह्नन करना चाहिये। चोरों कोणों में आग्नेयादि क्रम से शंख, चक्र, गदा का आवाह्नन करना चाहिए। कलश के आगे गरुड़ का आवाह्नन होना चाहिए। ततः पूर्वादि क्रम से इन्द्रादि लोकपालों का आवाहन करके षोडशोपचार से पूजन करना चाहिए।

फिर भगवान के सर्वांग शरीर का पूजन और नमस्कार करना चाहिए। स्नान, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल से पञ्चोपकार पूजन करना चाहिए। पात्र में जलदार-नारियल, अक्षत, फूल, चन्दन और सोना रखकर घुटने के बल बैठकर इस श्लोक (नारायणं हृषीकेश लक्ष्मीकान्त दयानिधे। गृहाणार्थ्यं मया दत्तं व्रत्तं सम्पूर्ण हेतवे ) से अर्घ्य देना चाहिए। इस के पश्चात इस दिन का कृत्य समाप्त करके गाने-बजाने से रात्रि व्यतीत करे।

दूसरे दिन यजमान तथा आचार्य नित्य कृत्य करके पुनः आचार्य' अपवित्रः पवित्रो वा', पवित्रेस्थो व आनो भद्रा, आदि मन्त्रों का पाठ करके हवन का संकल्प करे और आवाहित देवताओं का पूजन करे।

ततः 'सहस्त्रशीर्षा पुरुषः' इत्यादि १६ मन्त्रों से प्रधान के लिए हवन करना चाहिए। आवश्यकतावश केवल घी या पायस घी या पायसान्नयुक्त घी का हवन करना चाहिए।

हवन के पश्चात तीन बार अग्नि की प्रदक्षिणा करे। फिर जानु के बल बैठकर पुरुषसूक्त का पाठ करना चाहिए। ततः शेष हव्य तथा आज्य का हवन करना चाहिए। ततः आचार्य शुल्व प्रहरण करके प्रायश्चित संकल्प करावे और हवन समाप्त करे। ब्राह्मण को तूर्ण पात्र का दान दे। आचार्य को दक्षिणा के साथ सवत्सा सालंकारा श्वेत गाय दे।

यजमान १२ ब्राह्मणों को केशवादि १२ देवताओं का स्वरूप मानकर उनका पूजन करे, २ कलश, दक्षिणा धन, मिठाई और वस्त्र से युक्त करके दे। ततः प्रधान पीठ पर कंल्पित केशवादि  देवताओं का उत्थापन करके आचार्य को दान दे। ततः आचार्य वैदिक तथा तन्त्रोक्त जल छिड़के। अग्नि की पूजा करे। फिर प्रार्थना करे विसर्जन करे। ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा सहित ताम्बूल दे, स्वयं भी सपरिवार इष्ट मित्रों सहित' भोजन करे । इस प्रकार विधिपूर्वक योग्य आचार्य के निर्देशन में उद्यापन करने से एकादशी व्रत की सिद्धि होती है।

श्री एकादशी व्रत उद्यापन सामग्री

रोली, मौली, धूपबत्ती, केसर, कपूर, सिन्दूर, चन्दन, होरसा, पेड़ा, बतासा, ऋतुफल, केला, पान ! सुपारी, रुई, पुष्पमाला, पुष्प, दूर्वा, कुशा, गंगाजल, तुलसी, अग्निहोत्र, भस्म, गोमूत्र, घृत, शहद, चीनी, दूध, यज्ञोपवीत, अबीर (गुलाल), अभ्रक, गुलाब

C-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGango

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जल, धान का लावा, इत्र, शीशा, इलायची, जावित्री, जायफल, पञ्चमेवा, हलदी, पीली सरसों, मेंहदी की बुकनी, नारियल, गिरि का गोला, पंचपल्लव, वंदनवार, कच्चा सूत, मूंग की दाल, उछ्द काला, सूप, विल्व पत्र, भोज पत्र, पंचरत्न, सर्वोषधि सप्तमृत्तिका, सप्तधान्य, पंचरंग, नवग्रह, समिधा, चौकी, पीढ़ा, घण्टा, शंख, कंटिया, कलश, गंगा सागर, कटोरी कटोरा, चरुस्थाली, आज्यस्थाली, बाल्टी, कलछी, सँड़ासी, चिमटा, प्रधान प्रतिमा सुवर्ण की, प्रधान प्रतिमा चांदी की, चांदी की कटोरी, पंचपात्र, आचमनी, अर्घा, तष्टा, सुवर्णजिव्हा, सुवर्ण शलाका, सिंहासन, छत्र, चमर, तिल, चावल, यव, घृत, चीनी, पंचमेवा, भोजनपत्र, बालू, ईंट, हवनार्थ लकड़ी आम की गोयँठा, दियासलाई और यज्ञपात।

वरण सामग्री-धोती, दुपट्टा, अँगोछा, यज्ञोपवीत, पंचपात्र, आचमनी, अर्घा, तष्टा, लोटा, गिलास, छाता, छड़ी, कुशासन, कंबलासन, कटोरी (मधुपर्कार्थ), गोमुखी, रुद्राक्षमाला, पुष्पमाला, खड़ाऊँ, अँगूठी, देवताओं को वस्त्रांदि ।

शय्या सामग्री - प्रतिमा विष्णु भगवान की, पलंग, तकिया, चादर, दरी, रजाई, पहनने के वस्त्र छाता, जूता, खड़ाऊँ, पुस्तक, आसन, शीश घंटी पानदान, छत्रदान, भोजन के बर्तन, चूल्हा, लालटेन, पंखा, अन्न, घृत, आभूषण। 
॥ समाप्त ॥

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