वृत और उपवास | 01.2 | चैत्र मास के व्रत शुक्ल पक्ष

वृत और उपवास | 01.2 | चैत्र मास के व्रत शुक्ल पक्ष

चैत्र मास के व्रत

शुक्लपक्ष

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(१) संवत्सर (अनुसंधानमञ्जूषा) - यह चैत्र शुक्ल प्रतिपदाको पूजित होता है। इसमें मुख्यतया ब्रह्माजीका और उनकी निर्माण की हुई सृष्टिके प्रधान-प्रधान देवी, देवताओं, यक्ष-राक्षस, गन्धर्वो, ऋषि-मुनियों, मनुष्यों, नदियों, पर्वतों, पशु-पक्षियों और कीटाणुओंका ही नहीं-रोगों और उनके उपचारोंतकका पूजन किया जाता है। इससे यह स्वतः सूचित  होता है कि संवत्सर सर्वप्रधान, महामान्य¹ है। 
1. कालः सृजति भूतानि कालः संहरति प्रजाः । कालः सुप्तेषु जागर्ति कालो हि दुरतिक्रमः ॥ अनादिरेष भगवान् कालोऽनन्तोऽजरोऽमरः । सर्वगत्वात् स्वतन्त्रत्वात् सर्वात्मत्वान्महेश्वरः ॥ (विष्णुधर्मोत्तर)

संवत्सर उसे कहते है जिसमें मासादि भलीभाँति² निवास करते रहें। इसका दूसरा अर्थ है बारह महीनेका 'कालविशेष' । 
स च संवत्सरः सम्यग् वसन्त्यस्मिन् मासादयः ।(स्मृतिसार)

यही श्रुतिका³ वाक्य भी है। 
द्वादश मासाः संवत्सरः । (श्रुति)

जिस प्रकार महीनोंक चान्द्रादि तीन भेद हैं उसी प्रकार संवत्सरके भी सौर, सावन⁴ और चान्द्र ये तीन भेद हैं। 
चान्द्रसावनसौराणां त्रयः संवत्सरा अपि । (ब्रह्मसिद्धान्त)

परंतु अधिमाससे चान्द्रमास 13 हो जाते हैं। ऐसा होनेसे- संवत्सर 12 महीनेका नहीं रहता, 13 का हो जाता है। इसका स्मृतिकारोंने यह समाधान किया है कि 'बादरायणने अधिमासको 30-30 दिनके दो महीने नहीं माने⁵, 60 दिनका एक महीना माना है।' 
षष्ट्या तु दिवसैर्मासः कथितो बादरायणैः । (स्मृत्यन्तर)

इसलिये संवत्के बारह - महीने ही हो जाते हैं। फिर भी 13 महीने माने जायँ तो दूसरे श्रुति- वाक्यके⁶ अनुसार 13 मासका भी संवत्सर होता है। 
अस्ति त्रयोदशमासः ।(श्रुति)
ज्योतिःशास्त्रके अनुसार संवत्सरके सौर, सावन, चान्द्र, बार्हस्पत्य और नाक्षत्र - ये 5 भेद हैं। परंतु धर्म-कर्म और लोक-व्यवहारमें⁷ चान्द्र संवत्सरकी प्रवृत्ति ही विख्यात है। 
स्मरेत् सर्वत्र कर्मादौ चान्द्रं संवत्सरं सदा। नान्यं
यस्माद्वत्सरादौ प्रवृत्तिस्तस्य कीर्तिता । (आर्टिषण)

चान्द्र संवत्सरका⁸ प्रारम्भ चैत्र शुक्ल प्रतिपदासे होता है। इसपर कोई यह पूछ सकते हैं कि जब चान्द्रमास कृष्ण प्रतिपदासे प्रारम्भ होते हैं तो संवत्सर शुक्लसे क्यों होता है। इसका समाधान यह है कि कृष्णके आरम्भमें मलमास आनेकी सम्भावना रहती है और शुक्लमें नहीं रहती। इस कारण संवत्सरकी प्रवृत्ति शुक्ल प्रतिपदासे ही अनुकूल होती है। 
चान्द्रोऽब्दो मधुशुक्लगप्रतिपदारम्भः ।(दीपिका)

इसके सिवा ब्रह्माजीने सृष्टिका आरम्भ⁹ इसी शुक्ल प्रतिपदाको किया था 
चैत्रे मासि जगद् ब्रह्मा ससर्ज प्रथमेऽहनि । (ब्रह्मपुराण)

और इसी दिन मत्स्यावतारका¹⁰ आविर्भाव तथा सत्ययुगका आरम्भ हुआ था। इस महत्त्वको मानकर भारतके महामहिम सार्वभौम सम्राट् विक्रमादित्यने भी अपने संवत्सरका आरम्भ (आजसे प्रायः दो हजार वर्ष पहले) चैत्र शुक्ल प्रतिपदाको ही किया था। 
कृते प्रभवे चैत्रे प्रतिपच्छुक्लपक्षगा। रेवत्यां योगविष्कम्भे दिवा द्वादशनाडिकाः ॥ हरिः स्वयम्। संसूचितः । मत्स्यरूपकुमायी च अवतीर्णो ग्रन्थान्तरेषु चैत्रशुक्लतृतीयायां मत्स्यावतारः। (स्मृतिकौस्तुभ)

इसमें संदेह नहीं कि विश्वके यावन्मात्र संवत्सरोंमें शालिवाहन शक और विक्रम संवत्सर - ये दोनों सर्वोत्कृष्ट हैं। परंतु शकका विशेषकर गणितमें प्रयोजन होता है और विक्रम-संवत् का देशमें गणित, फलित, लोक-व्यवहार और धर्मानुष्ठानोंके समय-ज्ञान आदिमें अमिट रूपसे उपयोग और आदर किया जाता है। 

प्रारम्भमें प्रतिपदा लेनेका¹¹ यह प्रयोजन है कि ब्रह्माजीने जब सृष्टिका आरम्भ किया, उस समय इसको 'प्रवरा' (सर्वोत्तम) तिथि सूचित किया था और वास्तवमें यह प्रवरा है भी। 
तिथीनां प्रवरा यस्माद् ब्रह्मणा समुदाहृता । प्रतिपद्यापदे पूर्वे प्रतिपत् तेन सोच्यते । (भविष्योत्तर)

इसमें धार्मिक, सामाजिक, व्यावहारिक और राजनीतिक आदि अधिक महत्त्वके अनेक काम आरम्भ किये जाते हैं। इसमें संवत्सरका पूजन, नवरात्र-घट-स्थापन, ध्वजारोपण, तैलाभ्यङ्ग-स्नान, वर्षेशादिका फलपाठ, पारिभद्रका पत्र-प्राशन और प्रपास्थापन आदि लोकप्रसिद्ध और विश्वोपकारक अनेक काम होते हैं। इसके द्वारा सनातनी जनतामें सर्वत्र संवत्सरका महोत्सव¹² मनाया जाता है
प्राप्ते नूतनवत्सरे प्रतिगृहं कुर्याद् ध्वजारोपणं स्नानं मङ्गलमाचरेद् द्विजवरैः साकं सुपूजोत्सवैः । देवानां गुरुयोषितां च विभवालंकारवस्त्रादिभिः सम्पूज्यो गणकः फलं च शृणुयात् तस्माच्च लाभप्रदम् ॥ (उत्सवचन्द्रिका)

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(२) संवत्सरपूजन (ब्रह्माण्डपुराण) - यह चैत्र शुक्ल प्रतिपदाका किया जाता है। यदि चैत्र अधिक मास हो तो दूसरे चैत्रमें करना चाहिये। इसमें 'सम्मुखी'¹³ (सर्वा-व्यापिनी) प्रतिपदा ली जाती है। ज्यौतिष शास्त्रक अनुसार उस दिन उदयमें जो वार हो, वही उस वर्षका राजा¹⁴ होता है। यदि उदयव्यापिनी दो दिन हो या दोनों दिनोंमें ही न हो तो पहले दिन जो वार हो वह वर्षेश होता है। चैत्र मलमास हो तो पूजनादि सभी काम शुद्ध चैत्रमे करने चाहिये । मलमासमें कृष्ण पक्षके काम पहले महीनेमें और शुक्लपक्षके काम दूसरेमें करने चाहिये। यथा शीतलापूजन प्रथम चैत्रमें और नवरात्र तथा गौरीपूजन दूसरे चैत्रमें होते हैं. चैत्र शुक्ल प्रतिपदाको प्रातःस्नानादि नित्यकर्म करनेके पश्चात् हाथमें गन्ध, अक्षत, पुष्प और जल लेकर 'मम सकुटुम्बस्य सपरिवारस्य स्वजनपरिजनसहितस्य वा आयुरारोग्यैश्वर्यादि- सकलशुभफलोत्तरोत्तराभिवृद्ध्यर्थं ब्रह्मादिसंवत्सरदेवतानां पूजनमहं करिष्ये' यह संकल्प करके नवनिर्मित समचौरस चौकी या बालूकी वेदीपर श्वेत वस्त्र बिछाये और उसपर हरिद्रा अथवा केसरसे रँगे हुए अक्षतोंका अष्टदल कमल बनाकर उसपर सुवर्णनिर्मित मूर्ति स्थापन करके 'ॐ ब्रह्मणे नमः' से ब्रह्माजीका आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, गन्ध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, आचमन, ताम्बूल, नीराजन, नमस्कार, पुष्पाञ्जलि और प्रार्थना- इन उपचारोंसे पूजन करे। इसी प्रकार १ कालाय, २ निमेषाय, ३ त्रुट्यै, ४ लवाय, ५ क्षणाय, ६ काष्ठायै, ७ कलायै, ८ सुषुम्णायै, ९ नाडिकायै, १० मुहूर्ताय, ११ निशाभ्यः, १२ पुण्यदिवसेभ्यः, १३ पक्षाभ्याम्, १४ मासेभ्यः, १५ षऋतुभ्यः, १६ अयनाभ्याम्, १७ संवत्सरपरिवत्स- रेडावत्सरानुवत्सरवत्सरेभ्यः, १८ कृतयुगादिभ्यः, १९ नवग्रहेभ्यः, २० अष्टाविंशतियोगेभ्यः, २१ द्वादशराशिभ्यः, २२ करणेभ्यः, २३ व्यतीपातेभ्यः, सानुयात्रकुलनागेभ्यः, २४ प्रतिवर्षाधिपेभ्यः, २५ विज्ञातेभ्यः, २६ २७ चतुर्दशमनुभ्यः, २८ पञ्चपुरन्दरेभ्यः, २९ दक्षकन्याभ्यः, ३० देव्यै, ३१ सुभद्रायै, ३२ जयायै, ३३ भृगुशास्त्राय, ३४ सर्वास्त्रजनकाय, ३५ बहुपुत्रपत्नीसहिताय, ३६ बृद्धयै, ३७ ऋद्धयै, ३८ निद्रायै, ३९ धनदाय, ४० गुह्यकस्वामिने, ४१ नलकूबरयक्षेभ्यः, ४२ शङ्खपद्मनिधिभ्याम्, ४३ भद्रकाल्यै, ४४ सुरभ्यै, ४५ वेदवेदान्तवेदाङ्ग‌विद्यासंस्थायिभ्यः, ४६ नागयक्षसुपर्णेभ्यः, ४७ गरुडाय, ४८ अरुणाय, ४९ सप्तद्वीपेभ्यः, ५० सप्तसमुद्रेभ्यः, ५१ सागरेभ्यः, ५२ उत्तरकुरुभ्यः, ५३ ऐरावताय, ५४ भद्राश्व- केतुमालाय, ५५. इलावृताय, ५६ हरिवर्षाय, ५७ किम्पुरुषेभ्यः, ५८ भारताय, ५९ नवखण्डेभ्यः, ६० सप्तपातालेभ्यः, ६१ सप्तनरकेभ्यः, क्रोडरूपिणे, ६४ सप्तलोकेभ्यः, ६८ रजसे, ६२ कालाग्निरुद्रशेषेभ्यः, ६३ हरये ६५ पञ्चमहाभूतेभ्यः, ६६ तमसे, ६७ तमः प्रकृत्यै, ६९ रजःप्रकृत्यै, ७० प्रकृतये, ७१ पुरुषाय, ७२ अभिमानाय, ७४ हिमप्रमुखपर्वतेभ्यः, ७३ अव्यक्तमूर्तये, ७५ पुराणेभ्यः, ७६ गङ्गादिसप्तनदीभ्यः, ७७ सप्तमुनिभ्यः, ७८ पुष्करादितीर्थेभ्यः, ७९ वितस्तादिनिम्नगाभ्यः, ८० चतुर्दशदीर्घाभ्यः, ८१ धारिणीभ्यः, ८२ धात्रीभ्यः, ८३ विधात्रीभ्यः, ८४ छन्दोभ्यः, ८५ सुरभ्यैरावणाभ्याम्, ८६ उच्चैःश्रवसे, ८७ ध्रुवाय, ८८ धन्वन्तरये, ८९ शस्त्रास्त्राभ्याम्, ९० विनायककुमाराभ्याम्, ९१ विघ्न्नेभ्यः, ९२ शाखाय, ९३ विशाखाय, ९४ नैगमेयाय, ९५ स्कन्दगृहेभ्यः, ९६ स्कन्दमातृभ्यः, ९७ ज्वराय; रोगपतये, ९८ भस्मप्रहरणाय, ९९ ऋत्विग्भ्यः, १०० वालखिल्याय, १०१ काश्यपाय, १०२ अगस्तये, १०३ नारदाय, १०४ व्यासादिभ्यः, १०५ अप्सरोभ्यः, १०६ सोमपदेवेभ्यः, १०७ असोमपदेवेभ्यः, १०८ तुषितेभ्यः, १०९ द्वादशादित्येभ्यः, ११० सगणैकादशरुद्रेभ्यः, १११ दशपुण्येभ्यो विश्वेदेवेभ्यः, ११२ अष्टवसुभ्यः, ११३ नवयोगिभ्यः, ११४ द्वादशभृगुभ्यः, ११५ द्वादशाङ्गिरोभ्यः, ११६ तपस्विभ्यः, ११७ नासत्यदस्त्राभ्याम्, ११८ अश्विभ्याम्, ११९ द्वादशसाध्येभ्यः, १२० द्वादशपौराणेभ्यः, १२१ एकोनपञ्चाशद्‌द्मरुद्गणेभ्यः, १२२ शिल्पाचार्याय विश्वकर्मणे, १२३ सायुधसवाहनेभ्यो ऽष्टलोकपालेभ्यः, १२४ आयुधेभ्यः, १२५ वाहनेभ्यः, १२६ वर्मभ्यः, १२७ आसनेभ्यः, १२८ दुन्दुभिभ्यः, १२९ देवेभ्यः, १३० दैत्यराक्षसगन्धर्वपिशाचेभ्यः, १३१ सप्तभेदेभ्यः, १३२ पितृभ्यः, १३३ प्रेतेभ्यः, १३४ सुसूक्ष्मदेवेभ्यः, १३५ भावगम्येभ्यः और १३६ बहुरूपाय विष्णवे परमात्मने नमः परमात्मविष्णुमावाहयामि स्थापयामि - इस प्रकार उपर्युक्त सम्पूर्ण देवताओंका पृथक् पृथक् अथवा एकत्र यथाविधि पूजन करके 'भगवंस्त्वत्प्रसादेन वर्ष क्षेममिहास्तु मे । संवत्सरोपसर्गा मे विलयं यान्त्वशेषतः ।।' से प्रार्थना करे और विविध प्रकारके उत्तम और सात्त्विक पदार्थोंसे ब्राह्मणोंको भोजन करानेके बाद एक बार स्वयं भोजन करे। पूजनके समय नवीन पञ्चाङ्गसे उस वर्षके राजा, मन्त्री, सेनाध्यक्ष, धनाधिप, धान्याधिप, दुर्गाधिप, संवत्सर-निवास और फलाधिप आदिके फल श्रवण¹⁵ करे। निवास-स्थानोंको ध्वजा, पताका, तोरण और बंदनवार आदिसे सुशोभित करे । द्वारदेश और देवीपूजाके स्थानमें सुपूजित घट स्थापन करे। पारिभद्रके¹⁶ कोमल पत्तों और पुष्पोंका चूर्ण करके उनमें काली मिरच, नमक, हींग, जीरा और अजमोद मिलाकर भक्षण करे और सामर्थ्य हो तो 'प्रपा¹⁷' (पौसरे) का स्थापन करे। निम्बपत्र-भक्षण और प्रपाके प्रारम्भकी प्रार्थना टिप्पणीके मन्त्रोंसे करे। इस प्रकार करनेसे राजा, प्रजा और साम्राज्यमें वर्षपर्यन्त व्यापक शान्ति रहती है। 

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(३) तिलकव्रत (भविष्योत्तर) - यह व्रत चैत्र शुक्ल प्रतिपदाको किया जाता है। इसके निमित्त नदी या तालाबके तटपर जाकर अथवा घरपर ही पटवासकके चूर्णसे संवत्सरकी मूर्ति लिखकर उसका 'संवत्सराय नमः', 'चैत्राय नमः', 'वसन्ताय नमः' आदि नाम-मन्त्रोंसे पूजन करके विद्वान् ब्राह्मणका अर्चन करे । उस समय ब्राह्मण 'संवत्सरोऽसि परिवत्सरोऽसीडावत्सरोऽसि अनुवत्सरोऽसि वत्सरोऽसि।'¹⁸ मन्त्र पढ़े । तब 'भगवंस्त्वत्प्रसादेन वर्ष क्षेममिहास्तु मे । संवत्सरोपसर्गो मे विलयं यात्वशेषतः ।।' से प्रार्थना करे और दक्षिणा दे। इस प्रकार प्रत्येक शुक्ल प्रतिपदाको वर्षभर करे तो भूत-प्रेत-पिशाचादिकी बाधाएँ शान्त हो जाती हैं। 

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(४) आरोग्यव्रत (विष्णुधर्मोत्तर) - यह भी इसी प्रतिपदाको किया जाता है। इसके निमित्त पहले दिन व्रत करके प्रतिपदाको एक चौकीपर अनेक प्रकारके कमल बिछाकर उनमें सूर्यका ध्यान करे। श्वेत वर्णक सुगन्धित गन्ध-पुष्पादिसे पूजन करे। दही, चीनी, घी, पूए, दूध, भात और फल आदि अर्पण करे। वह्नि और ब्राह्मणको तृप्त करे। फिर सम्पूर्ण सामग्रीका एक-एक ग्रास भक्षण करे और शेषको त्याग दे। उसके बाद ब्राह्मणकी आज्ञा हो तब फिर भोजन करे। इस प्रकार प्रत्येक शुक्ल प्रतिपदाको वर्षपर्यन्त व्रत और शिव-दर्शन करे तो सदैव आरोग्य रह सकता है। 

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(५) विद्याव्रत (विष्णुधर्मोत्तर) - चैत्र शुक्ल प्रतिपदाको एक वेदीपर अक्षतोंका अष्टदल बनाकर उसके मध्यमें ब्रह्मा, पूर्वमें ऋक्, दक्षिणमें यजुः, पश्चिममें साम, उत्तरमें अथर्व, अग्निकोणमें षट्शास्त्र, नैऋत्यमें धर्मशास्त्र, वायव्यमें पुराण और ईशानमें न्यायशास्त्रको स्थापन करे तथा उन सबका नाम-मन्त्रसे आवाहनादि पूजन करके व्रत रखे। इस प्रकार प्रत्येक शुक्ल प्रतिपदाको १२ महीने करके गोदान करे और फिर उसी प्रकार १२ वर्षतक यथावत् करता रहे तो वह महाविद्वान् बन सकता है। 

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(६) नवरात्र (नानाशास्त्र-पुराणादि) - ये चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघकी शुक्ल प्रतिपदासे नवमीतक नौ दिनके होते हैं; परंतु प्रसिद्धिमें चैत्र और आश्विनके नवरात्र ही मुख्य माने जाते हैं। इनमें भी देवीभक्त आश्विनके नवरात्र अधिक करते हैं। इनको यथाक्रम वासन्ती और शारदीय कहते हैं। इनका आरम्भ चैत्र और आश्विन शुक्ल प्रतिपदाको होता है। अतः यह प्रतिपदा 'सम्मुखी'¹⁹ शुभ होती है। नवरात्रोंके आरम्भमें अमायुक्त²⁰ प्रतिपदा अच्छी नहीं। आरम्भमें घटस्थापनके समय यदि चित्रा और वैधृति²¹ हों तो उनका त्याग कर देना चाहिये; क्योंकि चित्रामें धनका²² और वैधृतिमें पुत्रका नाश होता है।
घटस्थापनका समय 'प्रातःकाल'²³ है। अतः उस दिन चित्रा या वैधृति रात्रितक रहें (और रात्रिमें नवरात्रोंका स्थापन²⁴ या आरम्भ होता नहीं,) तो या तो वैधृत्यादिके आद्य²⁵ तीन अंश त्यागकर चौथे अंशमें करे या मध्याह्नके समय²⁶ (अभिजित् मुहूर्तमें) स्थापन करे। स्मरण रहे कि देवीका आवाहन²⁷, प्रवेशन, नित्यार्चन और विसर्जन - ये सब प्रातःकालमें शुभ होते हैं। अतः उचित समयका अनुपयोग न होने दे। .... स्त्री हो या पुरुष, सबको नवरात्र करना चाहिये। यदि कारणवश स्वयं न²⁸ कर सकें तो प्रतिनिधि (पति-पत्नी, ज्येष्ठ पुत्र, सहोदर या ब्राह्मण) द्वारा करायें।... नवरात्र नौ रात्रि पूर्ण होनेसे पूर्ण होता है। इसलिये यदि इतना समय न मिले या सामर्थ्य न हो तो सात²⁹, पाँच, तीन या एक दिन व्रत करे और व्रतमें भी उपवास, अयाचित, नक्त या एकभुक्त - जो बन सके यथासामर्थ्य वही कर ले। यदि नवरात्रोंमें घटस्थापन करनेके बाद सूतक³⁰ हो जाय तो कोई दोष नहीं, परंतु पहले हो जाय तो पूजनादि स्वयं न करे। 
चैत्रके नवरात्रमें शक्तिकी उपासना³¹ तो प्रसिद्ध ही है; साथ ही शक्तिधरकी उपासना भी की जाती है। उदाहरणार्थ एक ओर देवीभागवत, कालिकापुराण, मार्कण्डेयपुराण, नवार्णमन्त्रके पुरश्चरण और दुर्गापाठकी शतसहस्रायुतचण्डी आदि होते हैं तो दूसरी ओर श्रीमद्भागवत, अध्यात्म-रामायण, वाल्मीकीय रामायण, तुलसीकृत रामायण, राममन्त्र-पुरश्चरण, एक-तीन-पाँच-सात दिनकी या नवाह्निक अखण्ड रामनामध्वनि और रामलीला आदि किये जाते हैं। यही कारण है कि ये 'देवी-नवरात्र' और 'राम-नवरात्र' नामोंसे प्रसिद्ध हैं।
... नवरात्रका प्रयोग प्रारम्भ करनेके पहले सुगन्धयुक्त तैलके उद्वर्तनादिसे मङ्गलस्नान करके नित्यकर्म करे और स्थिर शान्तिके पवित्र स्थानमें शुभ मृत्तिकाकी वेदी बनाये। उसमें जौ और गेहूँ-इन दोनोंको मिलाकर बोये। वहीं सोने, चाँदी, ताँबे या मिट्टीके कलशको यथाविधि स्थापन करके गणेशादिका पूजन और पुण्याहवाचन करे और पीछे देवी (या देव) के समीप शुभासनपर पूर्व (या उत्तर) मुख बैठकर 'मम महामायाभगवती (वा मायाधिपति भगवत्) प्रीतये (आयुर्बलवित्तारोग्यसमादरादिप्राप्तये वा) नवरात्रव्रतमहं करिष्ये ।' यह संकल्प करके मण्डलके मध्यमें रखे हुए कलशपर सोने, चाँदी, धातु, पाषाण, मृत्तिका या चित्रमय मूर्ति विराजमान करे और उसका आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, गन्ध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, आचमन, ताम्बूल, नीराजन, पुष्पाञ्जलि, नमस्कार और प्रार्थना आदि उपचारोंसे पूजन करे। इसके बाद यदि सामर्थ्य हो तो नौ दिनतक नौ (और यदि सामर्थ्य न हो तो सात, पाँच, तीन या एक) कन्याओंको देवी मानकर उनको गन्ध-पुष्पादिसे अर्चित करके भोजन कराये और फिर आप भोजन करे। व्रतीको चाहिये कि उन दिनोंमें भूशयन, मिताहार, ब्रह्मचर्यका पालन, क्षमा, दया, उदारता एवं उत्साहादिकी वृद्धि और क्रोध, लोभ, मोहादिका त्याग रखे। इस प्रकार नौ रात्रि व्यतीत होनेपर दसवें दिन प्रातःकालमें विसर्जन करे तो सब प्रकारके विपुल सुख-साधन सदैव प्रस्तुत रहते हैं और भगवान् (या भगवती) प्रसन्न होते हैं।

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(७) पञ्चरात्र (भविष्यपुराण) - ये व्रत नवरात्रोंके अन्तर्गत किये जाते हैं। विशेषता यह है कि इनमें पञ्चमीको एकभुक्त व्रत करे, षष्ठीको नक्तव्रत रखे, सप्तमीको अयाचित भोजन करे, अष्टमीको अन्नवर्जित उपवास रखे और नवमीको पारण करे तो इससे देवीकी प्रसन्नता बढ़ती है।

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(८) बालेन्दुव्रत (विष्णुधर्म) - यह चैत्र शुक्ल द्वितीयाको किया जाता है। इस दिन सूर्यास्तके समय शुद्ध जलसे स्नान करके चावलोंका बालेन्दु- मण्डल बनाये अथवा चन्द्रदर्शनके समय उसीमें बालेन्दु-मण्डलकी कल्पना करके आकाशस्थ चन्द्रमाका गन्ध-पुष्पादिसे पूजन करे। ईख, गुड़, अक्षत, सुपारी और सैन्धव अर्पण करे और 'बालचन्द्रमसे नमः' इस मन्त्रसे आहुति देकर भोजन करे। इस प्रकार प्रत्येक शुक्ल द्वितीयाको एक वर्षतक करनेसे सुख और भाग्यकी वृद्धि होती है। इसमें तैलपक्क पदार्थ खानेकी म ही है।

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(९) नेत्रव्रत (विष्णुधर्मोत्तर) - यह भी इसी द्वितीयाको किया जाता है। इसके लिये सूर्य-चन्द्रस्वरूप अश्विनीकुमारोंकी मूर्ति बनवाकर उनका गन्ध-पुष्पादिसे पूजन करे । ब्रह्मचर्यसे रहे। ब्राह्मणोंको सोने-चाँदीकी दक्षिणा दे और गौके दहीमें गौका घी मिलाकर भोजन करे। यह व्रत १२ वर्षतक किया जाता है और इसके करनेसे नेत्रोंकी ज्योति और मुख-मण्डलकी आभा बढ़ती है।

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(१०) दोलनोत्सव (व्रतरत्न) - चैत्र शुक्ल तृतीयाको प्रातःकालके समय जानकीनाथ रामचन्द्रभगवान्‌का राजोपचार पूजन करके उनको पालनेमें विराजमान कर झुलाये और इसी प्रकार सुरेश्वर और रमापतिको दोलारूढ़ करके उनके दर्शन करे तो सब पाप दूर होते हैं। [0610] व्र० प० ३]

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(११) गौरीतृतीया (व्रतोत्सवसंग्रह) - यह भी इसी दिन (चैत्र शुक्ल तृतीयाको) किया जाता है। सौभाग्यवती स्त्रियाँ उस दिन प्रातः-स्त्रान करके उत्तम रंगीन वस्त्र (लाल धोती आदि) धारण करके शुद्ध स्थानमें २४ अंगुलकी सम-चौरस वेदी बनायें और उसपर केसर, चन्दन और कपूरसे मण्डल बनाकर उसमें सोने या चाँदीकी मूर्ति स्थापन करके अनेक प्रकारके फल, पुष्प, दूर्वा और गन्धादिसे पूजन करे। उसी जगह गौरी, उमा, लतिका, सुभगा, भगमालिनी, मनोन्मना, भवानी, कामदा, भोगवर्द्धिनी और अम्बिका - इनको भी गन्ध-पुष्पादिसे चर्चित और सुशोभित करे और भोजनमें केवल एक बार दूध पियें तो पति-पुत्रादिका अखण्ड सुख प्राप्त होता है।

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(१२) ईश्वर-गौरी (व्रतोत्सव) - इसी दिन (चैत्र शुक्ल तृतीयाको) काष्ठादिकी पूर्वनिर्मित शिव-गौरीकी मूर्तियोंको स्नान कराके उत्तम प्रकारके वस्त्र और आभूषणादिसे भूषितकर पूजन करे और डोल, पालने या सिंहासनादिमें उनको सावधानीके साथ विराजमान करके सायङ्कालके समय विविध प्रकारके गाजे-बाजे, लवाजमे, सौभाग्यवती स्त्रियों और सत्पुरुषोंके समारोहके साथ उनको नगरसे बाहर किसी पुष्पोद्यान या सरोवरके तटपर स्थापित करे और वहाँ कुछ कालतक क्रीड़ा-कौतुकादिकी कला प्रदर्शन करानेके पीछे उनको उसी प्रकार वापस लाकर यथास्थान स्थापित कर दे। इस प्रकार प्रतिवर्ष करते रहनेसे नगर, ग्राम और उपबस्ती आदिमें सर्वत्र ही उद्योग, उत्साह, आरोग्यता और सर्वसौख्य बढ़ते हैं।

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(१३) गौरीविसर्जन (व्रतोत्सव) - यह भी चैत्र शुक्ल तृतीयाको होता है। होलीके दूसरे दिन (चैत्र कृष्ण प्रतिपदा) से जो कुमारी और विवाहिता बालिकाएँ प्रतिदिन गनगौर पूजती हैं, वे चैत्र शुक्ल द्वितीया (सिंजारे) के दिन किसी नद, नदी, तालाब या सरोवरपर जाकर अपनी पूजी हुई गनगौरोंको पानी पिलाती हैं और दूसरे दिन सायङ्कालके समय उनका विसर्जन कर देती हैं। यह व्रत विवाहिता लड़कियोंके लिये पतिका अनुराग उत्पन्न करानेवाला और कुमारिकाओंको उत्तम पति देनेवाला है।

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(१४) श्रीव्रत (विष्णुधर्मोत्तर) - यह चैत्र शुक्ल पञ्चमीको किया जाता है। इसलिये तृतीयाको अभ्यङ्ग स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण करे। माला आदि भी सफेद ले और व्रतमें संलग्न रहे। घी, दही और भातका भोजन करे। चतुर्थीको स्नान करके व्रत रखे और पञ्चमीको प्रातःस्नानादिके पश्चात् लक्ष्मीका पूजन करे। पूजनमें धान्य, हलदी, अदरख, गन्ने, गुड़ और लवण आदि अर्पण करके कमलके पुष्पोंका लक्ष्मीसूक्तसे हवन करे। यदि कमल न मिलें तो बेलके टुकड़ोंका और वे भी न हों तो केवल घीका हवन करे और पद्मिनी (कमलोंवाली तलाई) में स्नान करके सुवर्णका दान करे तो 'श्री' (लक्ष्मी) की प्राप्ति होती है।

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(१५) लक्ष्मीव्रत (भविष्योत्तर)- यह भी इसी दिन (चैत्र शुक्ल पञ्चमीको) किया जाता है। इसमें लक्ष्मीका पूजन और व्रत करके सुवर्णके बने हुए कमलका दान करे तो सब प्रकारके दुःख दूर होते हैं।

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(१६) सौभाग्यव्रत (भविष्योत्तर) - यह भी चैत्र शुक्ल पञ्चमीको होता है। इसमें पृथ्वीका, पञ्चमीका और चन्द्रमाका गन्धादिसे पूजन करके एक बार भोजन करे तो आयु और ऐश्वर्य दोनों बढ़ते हैं।

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(१७) कुमारव्रत (कालोत्तर) - यह चैत्र शुक्ल षष्ठीको किया जाता है। उस दिन मयूरपर बैठे हुए स्वामिकार्तिककी सुवर्णके समान मूर्ति बनवाकर उसका पूजन करे। आचार्यको वस्त्र और सुवर्ण दे। उपवास रखे और सद्वैद्यकी सम्मतिके अनुसार ब्राह्मीका रस और घी पिये। इस प्रकार प्रत्येक शुक्ल पञ्चमीको एक वर्षपर्यन्त करनेसे महाबुद्धिमान् होता है। शास्त्रोंका आशय सहज ही समझमें आ सकता है और शास्त्रार्थमें स्फुरणाशक्तिका भलीभाँति विकास होता है।

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(१८) मोदनव्रत (हेमाद्रि) - यह चैत्र शुक्ल सप्तमीको किया जाता है। उस दिन प्रातःस्नानादि करके सूर्यनारायणका पूजन करे। ब्राह्मणोंको खीरका भोजन कराये और आप भी एक बार उसीका भोजन करे।

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(१९) नामसप्तमी (भविष्यपुराण) - यह व्रत चैत्र शुक्ल सप्तमीसे वर्षपर्यन्त होता है और चैत्रादि १२ महीनोंमें सूर्यके १२ नामोंसे यथाक्रम पूजन किया जाता है। यथा-१ चैत्रमें धाता, २ वैशाखमें अर्यमा, ३ ज्येष्ठमें मित्र, ४ आषाढ़में वरुण, ५ श्रावणमें इन्द्र, ६ भाद्रपदमें विवस्वान्, ७ आश्विनमें पर्जन्य, ८ कार्तिकमें पूषा, ९ मार्गशीर्षमें अंशुमान्, १० पौषमें भग, ११ माघमें त्वष्टा और १२ फाल्गुनमें जिष्णु नामसे यथाविधि पूजन करके एकभुक्त व्रत करे तो आयु, आरोग्यता और ऐश्वर्यकी अपूर्व वृद्धि होती है।

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(२०) सूर्यव्रत (विष्णुधर्मोत्तर) - यह भी चैत्र शुक्ल सप्तमीको ही होता है। इसके लिये एकान्तके मकानको लीपकर या धोकर स्वच्छ करे और उसके मध्यमें वेदी बनाकर उसपर अष्टदल कमल लिखे और कमलके प्रत्येक दलमें निम्नलिखित मूर्ति स्थापित करे। यथा - पूर्वके दलपर दो ऋतुकारक 'गन्धर्व', आग्नेय पत्रपर दो ऋतुकारक 'गन्धर्व', दक्षिण दलपर दो 'अप्सराएँ', नैऋत्यके दलपर दो 'राक्षस', पश्चिमके दलपर ऋतुकारक दो 'महानाग', वायव्यके दलपर दो 'यातुधान', उत्तरके दलपर दो 'ऋषि' और ईशानके दलपर एक 'ग्रह' स्थापन करके उन सबका यथाक्रम पृथक् पृथक् गन्ध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्यसे पञ्चोपचार पूजन करके सूर्यके निमित्त घीकी १०८ आहुतियाँ दे और अन्य सबके निमित्त आठ-आठ आहुतियाँ दे तथा प्रत्येकके निमित्त एक-एक ब्राह्मणको भोजन कराये। इस प्रकार प्राप्ति होती है। शुक्ल पक्षकी प्रत्येक सप्तमीको एक वर्षतक करे तो उसको सूर्यलोककी

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(२१) अशोककलिकाप्राशनव्रत (कृत्यरत्नावली, कूर्मपुराण). यह चैत्र शुक्ल अष्टमीको किया जाता है। उस दिन प्रातः स्नानादि करनेके अनन्तर अशोक (आशापाला) के वृक्षका पूजन करके उसके पुष्प अथवा कोमल पत्तोंकी आठ कलिकाएँ लेकर उनसे शिवजीका पूजन करे और 'त्वामशोक नमाम्येनं मधुमाससमुद्भवम् । शोकार्तः कलिकां प्राश्य मामशोकं सदा कुरु ।' से आठ कलिकाएँ भक्षण करके व्रत करे तो वह शोकरहित रहता है। यदि उस दिन बुधवार हो या पुनर्वसु हो या दोनों हों तो व्रतीको किसी प्रकारका शोक नहीं होता।

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(२२) भवानीव्रत (भविष्यपुराण) - चैत्र शुक्ल अष्टमीको भवानीका प्रादुर्भाव हुआ था, अतः उस दिन देवीका पूजन करके अपूप आदिका भोग लगाये और व्रत करे।

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(२३) रामनवमी (विष्णुधर्मोत्तर) - इस व्रतकी चारों जयन्तियोंमें गणना है। यह चैत्र शुक्ल नवमीको किया जाता है। इसमें मध्याह्रव्यापिनी शुद्धा तिथि ली जाती है। यदि वह दो दिन मध्याह्रव्यापिनी हो या दोनों दिनोंमें ही न हो तो पहला व्रत करना चाहिये। इसमें अष्टमीका वेध हो तो निषेध³² नहीं, दशमीका वेध वर्जित है। यह व्रत नित्य³³, नैमित्तिक और काम्य - तीन प्रकारका है। नित्य होनेसे इसे निष्काम भावना रखकर आजीवन किया जाय तो उसका अनन्त और अमिट फल होता है। और किसी निमित्त या कामनासे किया जाय तो उसका यथेच्छ फल मिलता है। भगवान् रामचन्द्रका जन्म³⁴ हुआ, उस समय चैत्र शुक्ल नवमी, गुरुवार, पुष्य (या दूसरे मतसे पुनर्वसु), मध्याह्न और कर्क लग्न था। उत्सवके दिन ये सब तो सदैव आ नहीं सकते, परंतु जन्मक्ष कई बार आ जाता है; अतः वह हो तो उसे अवश्य लेना चाहिये। जो मनुष्य रामनवमीका भक्ति और विश्वासके साथ व्रत करते हैं, उनको महान् फल मिलता है। व्रतीको चाहिये कि व्रतके पहले दिन (चैत्र शुक्ल अष्टमीको) प्रातःस्नानादिसे निश्चिन्त होकर भगवान् रामचन्द्रका स्मरण करे। दूसरे दिन (चैत्र शुक्ल नवमीको) नित्यकृत्यसे अति शीघ्र निवृत्त होकर 'उपोष्य नवमी त्वद्य यामेष्वष्टसु राघव । तेन प्रीतो भव त्वं भो संसारात् त्राहि मां हरे ।।' इस मन्त्रसे भगवान्‌के प्रति व्रत करनेकी भावना प्रकट करे। और 'मम भगवत्प्रीतिकामनया (वामुकफलप्राप्तिकामनया) रामजयन्तीव्रतमहं करिष्ये' यह संकल्प करके काम-क्रोध-लोभ-मोहादिसे वर्जित होकर व्रत करे। ..... तत्पश्चात् मन्दिर अथवा अपने मकानको ध्वजा-पताका, तोरण और बंदनवार आदिसे सुशोभित करके उसके उत्तर भागमें रंगीन कपड़ेका मण्डप बनाये और उसके अंदर सर्वतोभद्रमण्डलकी रचना करके उसके मध्यभागमें यथाविधि कलश स्थापन करे। कलशके ऊपर रामपञ्चायतन (जिसके मध्यमें राम-सीता, दोनों पार्श्वोंमें भरत और शत्रुघ्न्न, पृष्ठ-प्रदेशमें लक्ष्मण और पादतलमें हनुमान्जी) की सुवर्णनिर्मित मूर्ति स्थापन करके उसका आवाहनादि षोडशोपचार पूजन करे। व्रतराज, व्रतार्क, जयसिंहकल्पद्रुम और विष्णुपूजन आदिमें वैदिक और पौराणिक दोनों प्रकारकी पूजनविधि है। उसके अनुसार पूजन करे। उस दिन³⁵ दिनभर भगवान्‌का भजन-स्मरण, स्तोत्रपाठ, दान-पुण्य, हवन, पितृश्राद्ध और उत्सव करे और रात्रिमें उत्तम प्रकारके गायन-वादन-नर्तन (रामलीला) और चरित्र-श्रवणादिके द्वारा जागरण करे तथा दूसरे दिन (दशमीको) पारण करके व्रतका विसर्जन करे। सामर्थ्य हो तो सुवर्णकी मूर्तिका दान और ब्राह्मण-भोजन कराये तथा इस प्रकार प्रतिवर्ष करता रहे।

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(२४) मातृकाव्रत (विष्णुधर्म) - यह भी इसी दिन (चैत्र शुक्ल नवमीको) होता है। इसमें भैरव और चौंसठ योगिनियोंका सफेद रंगके गन्ध-पुष्पादिसे पूजन किया जाता है।

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(२५) शुक्लैकादशी (नानापुराणस्मृति) - इसको चैत्र शुक्ल एकादशीके दिन पूर्वोक्त प्रकारसे करना चाहिये। व्रतके पहले दिन (दशमीके मध्याह्नमें) जौ, गेहूँ और मूँग आदिका एक बार भोजन करके भगवान्‌का स्मरण करे। दूसरे दिन (एकादशीको) प्रातः स्नानादि करके 'ममाखिलपापक्षयपूर्वकपरमेश्वरप्रीतिकामनया कामदैकादशीव्रतं करिष्ये' यह संकल्प करके रात्रिके समय भगवान्‌को दोलारूढ करे और उनके सम्मुख जागरण करे। फिर दूसरे दिन पारण करे तो सब प्रकारके पाप दूर होते हैं।..... इसका कथासार यह है कि प्राचीन कालमें सुवर्ण और रत्नोंसे सुशोभित भोगिपुर नगरके पुण्डरीक राजाके ललित और ललिता नामके गन्धर्व-गन्धर्विणी गायन-विद्यामें बड़े प्रवीण थे। एक दिन राजाके बुलानेपर ललित कार्यवश नहीं आया, तब राजाने उसको राक्षस बना दिया। इसपर ललिता बहुत दुःखी हुई और ऋष्यश्रृङ्गकी आज्ञासे उसने कामदाका व्रत करके पतिको पूर्वरूपमें प्राप्त किया।

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(२६) मदनद्वादशी (मत्स्यपुराण) - यह व्रत चैत्र शुक्ल द्वादशीको किया जाता है। उस दिन गुड़के जलसे स्नान करके एक वेदीपर चावलोंसे भरा हुआ कलश स्थापन करे और उसके ऊपर ताँबेके पात्रमें गुड़ और सुवर्णकी मूर्ति रखकर उसका गन्ध-पुष्पादिसे पूजन करे। साथ ही अनेक प्रकारके फल, पुष्प, ईख और नैवेद्य अर्पण करे तथा उनमेंसे एक फल लेकर उसको भक्षण करे। इस प्रकार १३ महीने करे तो उसको पुत्र-शोक नहीं होता।

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(२७) मदनपूजा (धर्मशास्त्रसमुच्चय) - यह त्रयोदशीको किया जाता है। उस दिन स्नान करके उत्तम कपड़ेपर मदनदेवकी मनोमोहक मूर्ति अङ्कित करे और उसका गन्ध-पुष्पादिसे पूजन करके घीसे बनाये हुए मोदकारी मोदकोंका 'नमो रामाय कामाय कामदेवस्य मूर्तये । ब्रह्मविष्णुशिवेन्द्राणां नमः क्षेमकराय वै ॥' से नैवेद्य अर्पण करे और रात्रिमें जागरण करके दूसरे दिन पारण करे तो पति-पुत्रादिका अखण्ड सुख होता है।

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(२८) प्रदोषव्रत (व्रतविज्ञान) - यह अतिप्रशस्त सर्वाचरणीय श्रेष्ठ व्रत प्रत्येक मासकी शुक्ल और कृष्ण त्रयोदशीको किया जाता है। कृष्णका विधान पहले लिखा ही जा चुका है, उसीके अनुसार शुक्लका व्रत करना चाहिये। विशेषता यह है कि संतानके लिये 'शनिप्रदोष', ऋणमोचनके लिये 'भौमप्रदोष' और शान्तिरक्षाके लिये 'सोमप्रदोष' अधिक फलदायी हैं। इनके सिवा आयु और आरोग्यकी वृद्धिके लिये 'अर्कप्रदोष' उत्तम होता है। व्रतीको चाहिये कि उस दिन सूर्यास्तके समय पुनः स्नान करके शिवजीका पूजन करे और 'भवाय भवनाशाय महादेवाय धीमते। रुद्राय नीलकण्ठाय शर्वाय शशिमौलिने । उग्रायोग्राघनाशाय भीमाय भयहारिणे । ईशानाय नमस्तुभ्यं पशूनां पतये नमः ॥' से प्रार्थना करके भोजन करे।

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(२९) चैत्री पूर्णिमा (पुराणसमुच्चय) - प्रत्येक मासकी पूर्णिमाको पूर्ण चन्द्रमाका और तत्प्रकाशक सूर्यका तथा विष्णुरूप सत्यनारायणका व्रत किया जाता है। यह पूर्णिमा चन्द्रोदयव्यापिनी ली जाती है। इसमें देवपूजन, दान-पुण्य, तीर्थ-स्नान और पुराण-श्रवणादि करनेसे पूर्ण फल मिलता है। यदि इस दिन चित्रा हो तो विचित्र वस्त्रोंका दान करनेसे सौभाग्यकी वृद्धि होती है।

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(३०) तिथीशपूजन (धर्मानुसंधान) - यह व्रत प्रतिपदादि प्रत्येक तिथिके स्वामीका पूजन करनेसे सम्पन्न होता है। विधान यह है कि प्रातः- स्नानादिके पीछे वेदी या चौकीपर रक्त वस्त्र बिछाकर उसपर अक्षतोंका अष्टदल बनाये। उसके मध्यमें जिस दिन जो तिथि हो, उसके स्वामीकी सुवर्णमयी मूर्तिका पूजन करे। तिथियोंके स्वामी क्रमशः प्रतिपदाके 'अग्निदेव', द्वितीयाके 'ब्रह्मा', तृतीयाकी 'गौरी', चतुथीकि 'गणेश', पञ्चमीके 'सर्प', षष्ठीके 'स्वामिकार्तिक', सप्तमीके 'सूर्य', अष्टमीके 'शिव' (भैरव), नवमीकी 'दुर्गा', दशमीके 'अन्तक' (यमराज), एकादशीके 'विश्वेदेवा', द्वादशीके 'हरि' (विष्णु), त्रयोदशीके 'कामदेव', चतुर्दशीके 'शिव', पूर्णिमाके 'चन्द्रमा' और अमाके 'पितर' हैं। इनका व्रत और पूजन प्रतिदिन करते रहनेसे हर्ष, उत्साह और आरोग्यकी वृद्धि होती है।

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(३१) हनुमद्भुत (उत्सवसिन्धु-व्रतरत्नाकर) - यह व्रत हनुमान्जीकी जन्मतिथिका है। जिन पञ्चाङ्गोंके आधारसे व्रतोंका निर्णय किया जाता है, उनमें हनुमान्जीकी जन्मतिथि किसीमें कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी और किसीमें चैत्र शुक्ल पूर्णिमा है। किसी भी देवताकी अधिकृति या जन्मतिथि एक होती है, परंतु हनुमान्जीकी दो मानते हैं। यह विशेषता है। इस विषयके ग्रन्थोंमें इन दोनोंके उल्लेख अवश्य हैं, परंतु आशयोंमें भिन्नता है। पहला 'जन्मदिन' है और दूसरा 'विजयाभिनन्दन'का महोत्सव । 'उत्सवसिन्धु'³⁶ में लिखा है कि कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी, भौमवारको स्वाती नक्षत्र और मेषलग्नमें अञ्जनीके गर्भसे हनुमान्‌जीके रूपमें स्वयं शिवजी उत्पन्न हुए थे।
'व्रतरत्नाकर'³⁷ 'में भी यही है कि कार्तिक कृष्णकी भूततिथि (चतुर्दशी) को मङ्गलवारके दिन महानिशामें अञ्जनादेवीने हनुमान्जीको जन्म दिया था। दूसरे वाक्यकी अपेक्षा पहलेमें स्वाती नक्षत्र और मेषलग्न विशेष है। परंतु कार्तिकीको कृत्तिका होनेसे कृष्ण चतुर्दशीको चित्रा या स्वातीका होना असम्भव नहीं। ... इनके विपरीत 'हनुमदुपासनाकल्पद्रुम'³⁸ नामक ग्रन्थमें, जो एक महाविद्वान्‌का संकलन किया हुआ है, चैत्र शुक्ल पूर्णिमा, मङ्गलवारके दिन मूँजकी मेखलासे युक्त, कौपीनसे संयुक्त और यज्ञोपवीतसे भूषित हनुमान्जीका उत्पन्न होना लिखा है। साथमें यह विशेष लिखा है कि 'कैकेयीके हाथसे³⁹ चील्हके द्वारा आयी हुई यज्ञकी खीर खानेसे अञ्जनाके हनुमान्जी उत्पन्न हुए। अस्तु। रामचरित्रके अन्वेषणमें वाल्मीकीय रामायण अधिक मान्य है। उसमें हनुमान्जीकी जन्मकथा (किष्किन्धाकाण्ड सर्ग ६६ और उत्तरकाण्ड सर्ग ३५ में) पूर्णरूपसे लिखी गयी है। उससे ज्ञात होता है कि अञ्जनीके उदरसे हनुमान्जी उत्पन्न हुए। भूखे होनेसे ये आकाशमें उछल गये और उदय होते हुए सूर्यको फल समझकर उनके समीप चले गये। उस दिन पर्वतिथि (अमावास्या) होनेसे सूर्यको ग्रसनेके लिये राहु⁴⁰ आया था। परंतु वह इनको दूसरा राहु मानकर भागने लगा, तब इन्द्रने अञ्जनीपुत्रपर वज्रका प्रहार किया, उससे उनकी ठोडी टेढ़ी हो गयी। इसीसे ये हनुमान् कहलाये। इस अंशमें चैत्र या कार्तिकका नाम नहीं है। सम्भव है कल्पभेद या भ्रान्तिवश अन्य ग्रन्थोंमें चैत्र लिखा गया हो।'... हनुमान्जीका एक जन्मपत्र भी है, उसमें तिथि चतुर्दशी, वार मङ्गल, नक्षत्र चित्रा और मास अनिर्दिष्ट है। कुण्डलीमें सूर्य, मङ्गल, गुरु, भृगु और शनि-ये उच्चके हैं और ये ४, १, ७, ३ और १० इन स्थानोंमें यथाक्रम बैठे हैं। इन सबके देखनेसे यह तथ्य निकलता है कि कार्तिक कृष्ण चतुर्दशीकी रात्रिमें हनुमान्जीका जन्म हुआ था और चैत्र शुक्ल पूर्णिमाको सीताकी खोज, राक्षसोंके उपमर्दन, लंकाके दहन और समुद्रके उल्लङ्घन आदिमें हनुमान्जीके विजयी होने और निरापद वापस लौटनेके उपलक्ष्यमें हर्षोन्मत्त वानरोंने मधुवनमें हर्ष मनाया था और उससे सभी नर-वानर सुखी हुए थे। इस कारण उक्त दोनों दिनोंमें व्रत और उत्सव किया जाय तो 'अधिकस्याधिकं फलम्' तो होगा ही। इस व्रतमें तात्कालिक (रात्रिव्यापिनी) तिथि ली जाती है। यदि वह दो दिन हो तो दूसरा व्रत करना चाहिये। व्रतीका कर्तव्य है कि वह हनुमज्जन्मदिनके व्रत-निमित्त धनत्रयोदशी (का० कृ० १३) की रात्रिमें राम-जानकी और हनुमान्‌जीका स्मरण करके पृथ्वीपर शयन करे तथा रूपचतुर्दशी (का० कृ० १४) को अरुणोदयसे पहले उठकर राम-जानकी और हनुमान्जीका पुनः स्मरण करके प्रातःस्नानादिसे जल्दी निवृत्त हो ले। तत्पश्चात् हाथमें जल लेकर - 'ममाखिलानिष्टनिरसनपूर्वकसकलाभीष्टसिद्धये तेजोबलबुद्धिविद्याधन-धान्यसमृद्धयायुरारोग्यादिवृद्धये च हनुमद्वतं तदङ्गीभूतपूजनं च करिष्ये । सकल्प करके हनुमान्जीकी पूर्वप्रतिष्ठित प्रतिमाके समीप पूर्व या उत्तरमुख बैठकर अति नम्रताके साथ 'अतुलितबलधामं स्वर्णशैलाभदेहं दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्। सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपतिवरदूतं वातजातं नमामि ।।' से प्रार्थना करे और फिर उनका यथाविधान षोडशोपचार पूजन करे। स्नानमें समीप हो तो नदीका और न हो तो श्रीजल मिला हुआ कूपोदक, वस्त्रोंमें लाल कौपीन और पीताम्बर, गन्धमें केसर मिला हुआ चन्दन, मूँजका यज्ञोपवीत, पुष्पोंमें शतपत्र (हजारा), केतकी, कनेर और अन्य पीले पुष्प, धूपमें अगर-तगरादि, दीपकमें गोघृतपूर्ण बत्ती और नैवेद्यमें घृतपक्व अपूप (पूआ) अथवा आटेको घीमें सेंककर गुड़ मिलाये हुए मोदक और केला आदि फल अर्पण करे तथा नीराजन, नमस्कार, पुष्पाञ्जलि और प्रदक्षिणाके बाद 'मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् । वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शिरसा नमामि ।' से प्रार्थना करके प्रसाद वितरण करे और सामर्थ्य हो तो ब्राह्मणभोजन कराकर स्वयं भोजन करे। रात्रिके समय दीपावली, स्तोत्रपाठ, गायन-वादन या संकीर्तनसे जागरण करे।

 ..... यदि किसी कार्य-सिद्धिके लिये व्रत करना हो तो मार्गशीर्ष शुक्ल त्रयोदशीको प्रातःस्नानादि करके एक वेदीपर अक्षत-पुञ्जसे १३ कमल बनाये। उनपर जलपूर्ण पूजित कलश स्थापन करके उसके ऊपर लगाये हुए पीले वस्त्रपर १३ कमलोंमें १३ गाँठ लगा हुआ नौ सूतका पीला डोरा रखे। फिर वेदीका पूजन करके उपर्युक्त विधिसे अथवा पद्धतिके क्रमसे हनुमान्‌जीका पूजन और जप, ध्यान, उपासना आदि करे तथा ब्राह्मणभोजनादिके पीछे स्वयं भोजन कर व्रतको पूर्ण करे तो सम्पूर्ण अभीष्ट सिद्ध होते हैं। कथा-सार यह है कि सूर्यके वरसे सुवर्णके बने हुए सुमेरुमें केसरीका राज्य था। उसके अति सुन्दरी अञ्जना नामकी स्त्री थी। एक बार उसने शुचिस्नान करके सुन्दर वस्त्राभूषण धारण किये। उस समय पवनदेवने उसके कर्णरन्ध्रमें प्रवेशकर आते समय आश्वासन दिया कि तेरे सूर्य, अग्नि एवं सुवर्णके समान तेजस्वी, वेद-वेदाङ्गोंका मर्मज्ञ, विश्ववन्द्य महाबली पुत्र होगा। 

.....ऐसा ही हुआ। कार्तिक कृष्ण चतुर्दशीकी महानिशामें अञ्जनाके उदरसे हनुमान्जी उत्पन्न हुए। दो प्रहर बाद सूर्योदय होते ही उन्हें भूख लगी। माता फल लाने गयी, इधर वनके वृक्षोंमें लाल वर्णके बालक सूर्यको फल मानकर हनुमान्जी उसको लेनेके लिये आकाशमें उछल गये। उस दिन अमा होनेसे सूर्यको ग्रसनेके लिये राहु आया था, किंतु इनको दूसरा राहु मानकर भाग गया। तब इन्द्रने हनुमान्जीपर वज्र प्रहार किया। उससे इनकी ठोडी टेढ़ी हो गयी, जिससे ये हनुमान् कहलाये। इन्द्रकी इस धृष्टताका दण्ड देनेके लिये इन्होंने प्राणिमात्रका वायुसंचार रोक दिया। तब ब्रह्मादि सभी देवोंने अलग-अलग इन्हें वर दिये। ब्रह्माजीने अमितायुका, इन्द्रने वज्रसे हत न होनेका, सूर्यने अपने शतांश तेजसे युक्त और सम्पूर्ण शास्त्रोंके विशेषज्ञ होनेका, वरुणने पाश और जलसे अभय रहनेका, यमने यमदण्डसे अवध्य और पाशसे नाश न होनेका, कुबेरने शत्रुमर्दिनी गदासे निःशङ्क रहनेका, शङ्करने प्रमत्त और अजेय योद्धाओंसे जय प्राप्त करनेका और विश्वकर्माने मयके बनाये हुए सभी प्रकारके दुर्बोध्य और असह्य, अस्त्र, शस्त्र तथा यन्त्रादिसे कुछ भी क्षति न होनेका वर दिया। 

इस प्रकारके वरोंके प्रभावसे आगे जाकर हनुमान्जीने अमित पराक्रमके जो काम किये, वे सब हनुमान्जीके भक्तोंमें प्रसिद्ध हैं और जो अश्रुत या अज्ञात हैं, वे अनेक प्रकारकी रामायणों, पद्म, स्कन्द और वायु आदि पुराणों एवं उपासना-विषयके अगणित ग्रन्थोंसे ज्ञात हो सकते हैं। ऐसे विश्ववन्द्य महाबली और श्रीरामचन्द्रके अनन्य भक्त हनुमान्जीके जप, ध्यान, उपासना, व्रत और उत्सव आदि करनेसे सब प्रकारके संकट दूर होते हैं। देवदुर्लभ पद, सम्मान और सुख प्राप्त होते हैं तथा राम-जानकी और हनुमान्जीके प्रसन्न होनेसे उपासकका कल्याण होता है। एवमस्तु ।

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टिप्पणियां 

1. कालः सृजति भूतानि कालः संहरति प्रजाः । कालः सुप्तेषु जागर्ति कालो हि दुरतिक्रमः ॥ अनादिरेष भगवान् कालोऽनन्तोऽजरोऽमरः । सर्वगत्वात् स्वतन्त्रत्वात् सर्वात्मत्वान्महेश्वरः ॥ (विष्णुधर्मोत्तर)
2. स च संवत्सरः सम्यग् वसन्त्यस्मिन् मासादयः ।(स्मृतिसार)
3. द्वादश मासाः संवत्सरः । (श्रुति)
4. चान्द्रसावनसौराणां त्रयः संवत्सरा अपि । (ब्रह्मसिद्धान्त)
5. षष्ट्या तु दिवसैर्मासः कथितो बादरायणैः । (स्मृत्यन्तर)
6. अस्ति त्रयोदशमासः ।(श्रुति)
7. स्मरेत् सर्वत्र कर्मादौ चान्द्रं संवत्सरं सदा। नान्यं यस्माद्वत्सरादौ प्रवृत्तिस्तस्य कीर्तिता । (आर्टिषण)
8. चान्द्रोऽब्दो मधुशुक्लगप्रतिपदारम्भः ।(दीपिका)
9. चैत्रे मासि जगद् ब्रह्मा ससर्ज प्रथमेऽहनि । (ब्रह्मपुराण)
10. कृते प्रभवे चैत्रे प्रतिपच्छुक्लपक्षगा। रेवत्यां योगविष्कम्भे दिवा द्वादशनाडिकाः ॥ हरिः स्वयम्। संसूचितः । मत्स्यरूपकुमायी च अवतीर्णो ग्रन्थान्तरेषु चैत्रशुक्लतृतीयायां मत्स्यावतारः। (स्मृतिकौस्तुभ)

11. तिथीनां प्रवरा यस्माद् ब्रह्मणा समुदाहृता । प्रतिपद्यापदे पूर्वे प्रतिपत् तेन सोच्यते । (भविष्योत्तर)
12. प्राप्ते नूतनवत्सरे प्रतिगृहं कुर्याद् ध्वजारोपणं स्नानं मङ्गलमाचरेद् द्विजवरैः साकं सुपूजोत्सवैः । देवानां गुरुयोषितां च विभवालंकारवस्त्रादिभिः सम्पूज्यो गणकः फलं च शृणुयात् तस्माच्च लाभप्रदम् ॥ (उत्सवचन्द्रिका)
13. प्रतिपत्सम्मुखी कार्या या भवेदापराह्निकी । (स्कन्दपुराण)
14. चैत्रे सितप्रतिपदि यो वारोऽर्कोदये स वर्षेशः । उदयद्वितये पूर्वो नोदययुगलेऽपि पूर्वः स्यात् ॥ (जयोतिर्निबन्ध)
15. शकवत्सरभूपमन्त्रिणां रसधान्येश्वरमेघपातिनाम् ।
श्रवणात् पठनाच्च वै नृणां शुभतां यात्यशुभं सहाश्रिया ।। कोमलानि विशेषतः । (ज्योतिर्निबन्ध)
16. पारिभद्रस्य पत्राणि सपुष्पाणि समादाय चूर्णं कृत्वा विधानतः ॥ 
मरिचं लवणं हिङ्गं जीरकेण च संयुतम्। भक्षयेद् अजमोदयुतं कृत्वा रोगशान्तये ॥ (पञ्चाङ्गपारिजात)
17. प्रपेयं सर्वसामान्या भूतेभ्यः रोगशान्तये ॥ प्रतिपादिता ।
अस्याः प्रदानात् पितरस्तृप्यन्तु च पितामहाः ॥ (दानचन्द्रिका)
18. संवत्सरोऽसि परिवत्सरोऽसीडावत्सरोऽसि अनुवत्सरोऽसि वत्सरोऽसि। (यजुर्वेद)
19. 'प्रतिपत्सम्मुखी कार्या या भवेदापराह्निकी ॥' (स्कन्द)
20. 'अमायुक्ता न कर्तव्य। प्रतिपत् पूजने मम।' (देवीभागवत)

21. 'प्रारभ्यं नवरात्रं स्याद्धित्वा चित्रां च वैधृतिम्।' (देवीभागवत)
22. 'वैधृत्तौ पुत्रनाशः स्याच्चित्रायां धननाशनम्।' (रुद्रयामल)
23. भास्करोदयमारभ्य यावत्तु दश नाडिकाः । प्रातःकाल इति प्रोक्तः स्थापनारोपणादिषु ॥ (विष्णुधर्म)
24. 'न कुम्भाभिषेचनम् च । (रुद्रयामल)
25. 'त्याज्या अंशास्त्रयस्त्वाद्यास्तुरीयांशे तु पूजनम् । (भविष्य)
26. सम्पूर्णा प्रतिपद्धयेव चित्रायुक्ता यदा भवेत्। वैधृत्या वापि युक्ता स्यात् तदा माध्यन्दिने रवौ ॥ अभिजित्तु मुहूर्त यत् तत्र स्थापनमिष्यते । (रुद्रयामल)
27. प्रातरावाहयेद् देवीं प्रातरेव प्रवेशयेत् । प्रातः प्रातश्च सम्पूज्य प्रातरेव विसर्जयेत् ॥ (देवीपुराण)
28. 'स्वयं वाप्यन्यतो वापि पूजयेत् पूजयीत वा।' (पूजापङ्कजभास्कर)
29. अथात्र नवरात्रं च सप्तपञ्चत्रिकादि वा। एकभक्तेन नक्तेनायाचितोपोषितैः क्रमात् ॥ (दीक्षित)
30. व्रतयज्ञविवाहेषु श्राद्धे होमेऽर्चने जपे । प्रारब्धे सूतकं न स्यादनारब्धे तु सूतकम् ॥ (विष्णु)

31. 'त्रिकालं पूजयेद् देवीं जपस्तोत्रपरायणः ।' (देवीभागवत)
32. अष्टम्या नवमी विद्धा कर्तव्या फलकाङ्गिभिः । न कुर्यान्नवमी तात दशम्या तु कदाचन ।।(दीक्षित)
33. नित्यं नैमित्तिकं काम्यं व्रतं वेति विचार्यते । निष्कामानां विधानात्तु तत् काम्यं तावदिष्यते ॥ (रामार्चन)
34. श्रीरामश्चैत्रमासे दिनदलसमये पुष्यभे कर्कलग्ने जीवेन्दोः कीटराशौ मृगभगतकुजे ज्ञे झषे मेषगेऽर्के। मन्दे जूकेऽङ्गनायां तमसि शफरिगे भार्गवेये नवम्यां पञ्चोच्चे चावतीर्णो दशरथतनयः प्रादुरासीत् स्वयम्भूः ॥ (रामचन्द्रजन्मपत्री)
35. चैत्रे मासि नवम्यां तु शुक्लपक्षे रघूत्तमः । प्रादुरासीत् पुरा ब्रह्मन् परब्रह्मैव केवलम् ॥ तस्मिन् दिने तु कर्तव्यमुपवासव्रतं सदा। तत्र जागरणं कुर्याद् रघुनाथपरो भुवि ॥ उपोषणं जागरणं पितॄनुद्दिश्य तर्पणम् । तस्मिन् दिने तु कर्तव्यं ब्रह्मप्राप्तिमभीप्सुभिः ॥ (रामार्चनचन्दिता)
36. ऊर्जस्य चासिते पक्षे स्वात्यां भौमे कपीश्वरः ।
मेषलग्नेऽञ्जनीगर्भाच्छिवः प्रादुरभूत् स्वयम् ॥ (उत्सवसिन्धु)
37. कार्तिकस्यासिते पक्षे भूतायां च महानिशि । भौमवारेऽञ्जना देवी हनुमन्तमजीजनत् ॥ (व्रतरत्नाकर)
38. चैत्रे मासि सिते पक्षे पौर्णमास्यां कुजेऽहनि । मौञ्जीमेखलया युक्तः कौपीनपरिधारकः ॥ (ह० क०)
39. कैकेयीहस्ततः पिण्डं जहार चिल्हिपक्षिणी। गच्छन्त्याकाशमार्गेण तदा वायुर्महानभूत् ॥ तुण्डात् प्रगलिते पिण्डे वायुर्नीत्वाञ्जनाञ्जलौ । क्षिप्तवान् स्थापितं पिण्डं भक्षयामास तत्क्षणात् ॥ नवमासगते पुत्रं सुषुवे साञ्जना शुभम्। (हनुमदुपासनाकल्पद्रुम; आनन्द रा० सारकां०)
40. यमेव दिवसं ह्येष ग्रहीतुं भास्करं प्लुतः । तमेव दिवसं राहुर्जिघृक्षति दिवाकरम् ॥ अद्याहं पर्वकाले तु जिघृक्षुः सूर्यमागतः । अथान्यो राहुरासाद्य जग्राह सहसा रविम् ॥ (वाल्मीकीय रामायण)

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