पंच पर्व 2
भाई दूज - भाई बहन के पावन प्रेम का अदभुत प्रतीक
भाई दूज या यम द्वितीया दिवाली के दो दिन बाद कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व भाई बहन के अदभुत स्नेह का प्रतीक है | यह पांच दिवसीय दीपोत्सव का समापन दिवस भी है दीपावली महापर्व के अंतिम दिन का पर्व है ‘भाईदूज’, दीवाली का त्योहार भाईदूज के बिना अधूरा है।
इस दिन प्रातःकाल चंद्र-दर्शन की परंपरा है और जिसके लिए भी संभव होता है वो यमुना नदी के जल में स्नान करते हैं।
स्नानादि से निवृत्त होकर दोपहर में बहन के घर जाकर वस्त्र और द्रव्य आदि द्वारा बहन का सम्मान किया जाता है और वहीं भोजन किया जाता है। मान्यता है कि ऐसा करने से कल्याण या समृद्धि प्राप्त होती है। बदलते हुए समय को देखें तो यह व्यस्त जीवन में दो परिवारों को मिलने और साथ समय बिताने का सर्वोत्तम उपाय है। ऐसा कहा गया है कि यदि अपनी सगी बहन न हो तो पिता के भाई की कन्या, मामा की पुत्री, मौसी अथवा बुआ की बेटी – ये भी बहन के समान हैं, इनके हाथ का बना भोजन करें। जो पुरुष यम द्वितीया को बहन के हाथ का भोजन करता है, उसे धन, आयुष्य, धर्म, अर्थ और अपरिमित सुख की प्राप्ति होती है। यम द्वितीय के दिन सायंकाल घर में बत्ती जलाने से पूर्व, घर के बाहर चार बत्तियों से युक्त दीपक जलाकर दीप-दान करने का नियम भी है। परंपरा के अनुसार इसी दिन शीतकाल के लिए यमुनोत्री धाम के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। यह ऐसा दिन है जब यमुना स्नान करने से शनि दोष और अकाल मृत्यु का भय दूर होता है। भाईदूज में हर बहन रोली एवं अक्षत से अपने भाई का तिलक कर उसके उज्ज्वल भविष्य के लिए आशीष देती हैं और अपने भाई के कल्याण व दीर्घायु, यशस्वी और सर्वगुण संपन्न होने की प्रार्थना करती हैं। भाई अपनी बहन को कुछ उपहार या दक्षिणा देता है |
सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज तथा यमुना का जन्म हुआ। यमुना अपने भाई यमराज से स्नेहवश निवेदन करती थी कि वे उसके घर आकर भोजन करें। लेकिन यमराज व्यस्त रहने के कारण यमुना की बात को टाल जाते थे।
कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमुना अपने द्वार पर अचानक यमराज को खड़ा देखकर हर्ष-विभोर हो गई। प्रसन्नचित्त हो भाई का स्वागत-सत्कार किया तथा भोजन करवाया। इससे प्रसन्न होकर यमराज ने बहन से वर माँगने को कहा।
तब बहन ने भाई से कहा कि आप प्रतिवर्ष इस दिन मेरे यहां भोजन करने आया करेंगे तथा इस दिन जो बहन अपने भाई को टीका करके भोजन खिलाए उसे आपका भय न रहे। यमराज 'तथास्तु' कहकर यमपुरी चले गए।
ऐसी मान्यता है कि जो भाई आज के दिन यमुना में स्नान करके पूरी श्रद्धा से बहनों के आतिथ्य को स्वीकार करते हैं उन्हें तथा उनकी बहन को यम का भय नहीं रहता। जिनकी बहनें दूर रहती हैं, वे भाई अपनी बहनों से मिलने भाईदूज पर अवश्य जाते हैं और उनसे टीका कराकर उपहार आदि देते हैं।
बहनें पीढियों पर चावल के घोल से चौक बनाती हैं। इस चौक पर भाई को बैठा कर बहनें उनके हाथों की पूजा करती हैं। इस पूजा में भाई की हथेली पर बहनें चावल का घोल लगाती हैं उसके ऊपर सिन्दूर लगाकर कद्दू के फूल, पान, सुपारी मुद्रा आदि हाथों पर रखकर धीरे धीरे पानी हाथों पर छोड़ते हुए कुछ मंत्र बोलती हैं जैसे
"गंगा पूजे यमुना को यमी पूजे यमराज को, सुभद्रा पूजा कृष्ण को,
गंगा यमुना नीर बहे मेरे भाई की आयु बढ़े"
बहनों को इस दिन नित्य कृत्य से निवृत्त हो अपने भाई के दीर्घ जीवन, कल्याण एवं उत्कर्ष हेतु तथा स्वयं के सौभाग्य के लिए अक्षत (चावल) कुंकुमादि से अष्टदल कमल बनाकर इस व्रत का संकल्प कर मृत्यु के देवता यमराज की विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिए। इसके पश्चात यमभगिनी यमुना, चित्रगुप्त और यमदूतों की पूजा करनी चाहिए। तदंतर भाई के तिलक लगाकर भोजन कराना चाहिए। इस विधि के संपन्न होने तक दोनों को व्रती रहना चाहिए।
इस समय ऊपर आसमान में चील उड़ता दिखाई दे तो बहुत ही शुभ माना जाता है। इस संदर्भ में मान्यता यह है कि बहनें भाई की आयु के लिए जो दुआ मांग रही हैं उसे यमराज ने कुबूल कर लिया है या चील जाकर यमराज को बहनों का संदेश सुनाएगा। यमराज इस दिन वह यमलोक छोड़कर बहन यमुना से मिलने यमनोत्री पहुंचते हैं। इसलिए कहा जाता है कि इस पावन मौके पर यमलोक के द्वार बंद रहते हैं।
एक अन्य मान्यता के अनुसार इसी दिन चित्रगुप्त की पूजा से पितृ दोष, केतु ग्रह दोष की बाधा दूर होती है। ज्योतिष की दृष्टि से केतु के प्रसन्न होने से राहु स्वत: ठीक हो जाते हैं इस कारण चित्रगुप्त को प्रधान देवता मानते हुए पूजा करने से दैहिक भौतिक तापों से भी मुक्ति मिलती है।
भाईदूज की एक पौराणिक कथा यह भी है कि इस दिन भगवान कृष्ण नरकासुर को मारने के बाद अपनी बहन सुभद्रा के पास गए थे। तब सुभद्रा ने अपने भाई कृष्ण का पारंपरिक रूप से स्वागत किया और उनकी पूजा आरती की।
भाई दूज के लिए ऎसा भी प्रचलित है कि महावीर भगवान ने इसी दिन निर्वाण प्राप्त किया था जिससे उनके भाई राजा नंदीवर्घन महावीर को खोने से बहुत व्यथित हुए। तब उस दिन उनकी बहन सुदर्शना ने अपने भाई को काफी दिलासा दी और फिर उनकी सुख शांति के लिए हमेशा उनका साथ निभाया और उनकी रक्षा के लिए पूजा अर्चना की। तभी से सभी महिलाएं भइया दूज मनाकर भाई बहन के प्रेम का सम्मान करते आए हैं।
पूजा विधान इस दिन बहने अपने भाई की दीर्घायु की कामना के लिए व्रत रखती हैं। सुबह सुबह स्त्रानध्यान करने के बाद पूजा की थाली सजाकर भाई का तिलक करती हैं और उन्हें बुरी नजरों से बचाने के लिए उनकी आरती उतारती हैं। बदले में भाई भी बहनों के इस अटूट प्यार को देखकर उन्हें उपहार देते हैं।
वस्तुतः इस त्योहार का मुख्य उद्देश्य है भाई-बहन के मध्य सौमनस्य और सद्भावना का पावन प्रवाह अनवरत प्रवाहित रखना तथा एक-दूसरे के प्रति निष्कपट प्रेम को प्रोत्साहित करना है। इस प्रकार 'दीपोत्सव-पर्व' का धार्मिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय महत्व अनुपम है।
नरक चतुर्दशी - छोटी दीपावली
कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी 'नरक चतुर्दशी' कहलाती है। सनत्कुमार संहिता के अनुसार इसे पूर्वविद्धा लेना चाहिये। इस दिन अरुणोदय से पूर्व प्रत्यूषकाल में स्नान करने से मनुष्य को यमलोक का दर्शन नहीं करना पड़ता।
वैसे तो कार्तिक मास में शरीर पर तेल लगाने का निषेद्ध है परन्तु इस दिन जो व्यक्ति सूर्योदय से पूर्व उठकर अपने शरीर के तेल लगाकर व अपामार्ग से दाँत माँज कर स्नान करता है उसके सभी पापों का नाश होता है और उसकी सद्गति का मार्ग खुलता है।
चतुर्दशी के दिन अभ्यंग स्नान बहुत ही महत्वपूर्ण होता है यह माना जाता है कि जो भी इस दिन स्नान करता है वह नरक जाने से बच सकता है। अभ्यंग स्नान के दौरान उबटन के लिए तिल के तेल का उपयोग किया जाता है। चतुर्दशी को लगाए जाने वाले तेल में लक्ष्मी जी तथा जल में माँ गंगा का वास रहता है।
तेल और अपामार्ग की पत्तियों से युक्त जल से स्नान करने से शरीर से अच्छी सुगन्ध आने लगती है और व्यक्ति का स्वरूप तेजोमय होकर उसका रूप भी निखर आता है इस लिये उसे रूप चतुर्दशी भी कहा जाता है।
इस दिन के महत्व के बारे में कहा जाता है कि इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर तेल लगाकर और पानी में चिरचिरी के पत्ते डालकर उससे स्नान करने करके विष्णु मंदिर और कृष्ण मंदिर में भगवान का दर्शन करना करना चाहिए।
अपमार्ग प्रोक्षण का मंत्र -
सीतालोष्ठ समायुक्तं सकण्ट कदलान्वितम् ।
हर पापमपामार्ग भ्राम्यमाणःपुनः पुनः ॥
अभ्यंग स्नान के लिए मुहूर्त का समय चतुर्दशी तिथि के प्रचलित रहते हुए चन्द्रोदय और सूर्योदय के मध्य का होता है।
निम्न मन्त्र पढ़कर अपामार्ग को अथवा लौकी को मस्तक पर घुमाकर नहाने से नरक का भय नहीं रहता | स्नान के बाद शुद्ध वस्त्र पहनकर, तिलक लगाकर दक्षिणाभिमुख होकर निम्न नाममन्त्रों से यमलोक से मुक्ति व यमराज की प्रसन्नता के लिए प्रत्येक नाम से तिलयुक्त तीन-तीन जलाञ्जलि दी जानी चाहिये। यह यम-तर्पण कहलाता है। इससे वर्ष भर के पाप नष्ट हो जाते हैं।
'ॐ यमाय नमः','ॐ धर्मराजाय नमः','ॐ मृत्यवे नमः',
'ॐ अन्तकाय नमः','ॐ वैवस्वताय नमः','ॐ कालाय नमः',
'ॐ सर्वभूतक्षयाय नमः','ॐ औदुम्बराय नमः','ॐ दध्नाय नमः',
'ॐ नीलाय नमः','ॐ परमेष्ठिने नमः','ॐ वृकोदराय नमः',
'ॐ चित्राय नमः', 'ॐ चित्रगुप्ताय नमः'।
यम, धर्मराज, मृत्यु, अन्तक, वैवस्वत, काल, सर्वभूतक्षय, औदुभ्बर, दघ्न, नील, परमेष्ठी, वृकोदर, चित्र और चित्रगुप्त- इन चतुर्दश नामों से इन महिषवाहन दण्डधर की आराधना होती है। इन्हीं नामों से इनका तर्पण किया जाता है।
इस दिन देवताओं का पूजन करके सायंकाल को दीपदान करना चाहिये। मन्दिरों, गुप्तगृहों, रसोई, स्नानघर, देववृक्षों के नीचे, सभाभवन, नदियों के किनारे, चहारदीवारी, बगीचे, बावली, गली-कूचे, गोशाला आदि प्रत्येक स्थान पर दीपक जलाना चाहिये। यमराज के उद्देश्य से त्रयोदशी से अमावास्या तक दीप जलाने चाहिये। जो व्यक्ति इस पर्व पर दीपदान करता है उसे प्रेत बाधा कभी नहीं सताती है इस लिए इसे प्रेत चतुर्दशी भी कहते हैं।
हिन्दू धर्मग्रन्थों के अनुसार नरक चतुर्दशी के पीछे वामन पुराण में एक आख्यान है राजा बलि के यज्ञ को भंग करके वामन भगवान ने पृथ्वी से सम्पूर्ण ब्रहाण्ड को नाप लिया था और राजा बली को पाताल में शरण दी। बली के द्वारा मांगे वर के अनुसार जो मनुष्य इस पर्व पर दीप दान करेगा उसके यहाँ स्थिर लक्ष्मी का वास होगा और वह यम यातना से दूर रहेगा।
इसी संदर्भ में एक अन्य आख्यान मिलता है कि कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को भगवान श्री कृष्ण ने नरकासुर नामक राक्षस का वध करके तीनों लोकों को भयमुक्त किया और उस उपलक्ष्य में लोगों ने घी के दीप जलाये थे। इस लिये इसे छोटी दीपावली भी कहते हैं। अत: यम यातना से मुक्ति और स्थिर लक्ष्मी की प्राप्ति के लिए इस दिन प्रदोष काल में घर के मुख्य द्वार के बाहर चार बत्तियों वाला दीपक जलाना चाहिए और लोक कल्याणार्थ घर पर दीपदान करना चाहिए। दीप सायंकाल में जब सूर्य अस्त हो रहे हों, उस समय प्रज्ज्वलित करने चाहिए।
यमराज या यम भारतीय पौराणिक कथाओं में मृत्यु के देवता को कहा गया है। विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा से भगवान सूर्य के पुत्र यमराज, श्राद्धदेव मनु और पुत्री यमुना हुईं। यमराज परम भागवत, द्वादश भागवताचार्यों में हैं। यमराज जीवों के शुभाशुभ कर्मों के निर्णायक हैं। दक्षिण दिशा के इन लोकपाल की संयमनीपुरी समस्त प्राणियों के लिये, जो अशुभकर्मा है, बड़ी भयप्रद है। दीपावली से पूर्व दिन यमदीप देकर तथा दूसरे पर्वो पर यमराज की आराधना करके मनुष्य उनकी कृपा का सम्पादन करता है। ये निर्णेता हम से सदा शुभकर्म की आशा करते हैं। दण्ड के द्वारा जीव को शुद्ध करना ही इनके लोक का मुख्य कार्य है।
धनतेरस पूजा विधि
शुभ मुहूर्त में 13 दीपक जलाकर तिजोरी में कुबेर की पूजा करनी चाहिए। देव कुबेर का ध्यान करते हुए, भगवान कुबेर को पुष्प चढ़ाएं। ध्यान करें। कहें, कि हे श्रेष्ठ विमान पर विराजमान रहने वाले, गरूडमणि के समान आभावाले, दोनों हाथों में गदा व वर धारण करने वाले, सिर पर श्रेष्ठ मुकुट से अलंकृत शरीर वाले,
भगवान शिव के प्रिय मित्र देव कुबेर का मैं ध्यान करता हूं। धूप, दीप, नैवैद्य से पूजा करें।इस मंत्र का जाप करें
च्यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धन-धान्य अधिपतये
धन-धान्य समृद्धि मे देहि दापय स्वाहा।
धनतेरस के शुभ दिन से मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के उपाय किए जाने चाहिए। इसके लिए धनतेरस विशेष तंत्र पूजन का विधान शास्त्रों में मिलता है।
सामग्री :
दक्षिणावर्ती शंख, केसर, गंगाजल का पात्र, धूप अगरबत्ती, दीपक, लाल वस्त्र।
मंत्र :
ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं महालक्ष्मी धनदा लक्ष्मी कुबेराय मम गृह स्थिरो ह्रीं ॐ नमः।
विधि : सबसे पहले सामने लक्ष्मी जी का चित्र रखें तथा उनके सामने लाल रंग का वस्त्र बिछाकर उस पर दक्षिणावर्ती शंख रख दें। उस पर केसर से स्वास्तिक बना लें तथा कुमकुम से तिलक कर दें।
बाद में स्फटिक की माला से मंत्र की 7 माला करें। तीन दिन तक ऐसा निरंतर करें। इतने से ही मंत्र-साधना सिद्ध हो जाती है।
मंत्र जप पूरा होने के पश्चात् लाल वस्त्र में शंख को बांधकर घर में रख दें। जब तक वह शंख घर में रहेगा, तब तक घर में निरंतर उन्नति होती रहेगी।
प्रदोषकाल : सायं 5.41 से 8.15 तक
वृषभकाल : सायं 6.25 से 8.20 तक
सूर्यास्त के बाद के दो घंटे की अवधि को प्रदोषकाल के नाम से जाना जाता है। प्रदोषकाल में दीपदान व लक्ष्मी पूजन करना शुभ माना जाता है। देव वैद्य धन्वंतरी के साथ-साथ देवी लक्ष्मी जी और धन के देवता कुबेर के पूजन की परंपरा है तथा कुबेर के अलावा यमदेव को भी दीपदान किया जाता है। धनतेरस को पूजा करने के उपरांत घर के मुख्यद्वार पर दक्षिण दिशा की ओर दीपक जलाकर रखा जाता है जो पूरी रात जले, इस दीपक में कुछ पैसे-कौड़ी डाले जाते हैं। स्कंदपुराण के अनुसार कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को प्रदोषकाल में घर के दरवाजे पर यमराज के लिए दीप देने से अकाल मृत्यु का भय खत्म होता है। दीपदान के समय इस मंत्र का जाप करते रहना चाहिए:
मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालेन च मया सह।
त्रयोदश्यां दीपदानात सूर्यज: प्रीयतामिति॥
धनतेरस पर सफाई के लिए नई झाडू और सूपड़ा खरीदकर उसकी पूजा की जाती है।
इस दिन वैदिक देवता यमराज की पूजा की जाती है। वर्ष में केवल इसी दिन मृत्यु के देवता की पूजा की जाती है।













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