पंच पर्व 2




भाई दूज - भाई बहन के पावन प्रेम का अदभुत प्रतीक

भाई दूज या यम द्वितीया दिवाली के दो दिन बाद कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व भाई बहन के अदभुत स्नेह का प्रतीक है यह  पांच दिवसीय दीपोत्सव का समापन दिवस भी है  दीपावली महापर्व के अंतिम दिन का पर्व है भाईदूज’दीवाली का त्योहार भाईदूज के बिना अधूरा है।   
इस दिन प्रातःकाल चंद्र-दर्शन की परंपरा है और जिसके लिए भी संभव होता है वो यमुना नदी के जल में स्नान करते हैं।
स्नानादि से निवृत्त होकर दोपहर में बहन के घर जाकर वस्त्र और द्रव्य आदि द्वारा बहन का सम्मान किया जाता है और वहीं भोजन किया जाता है। मान्यता है कि ऐसा करने से कल्याण या समृद्धि प्राप्त होती है। बदलते हुए समय को देखें तो यह व्यस्त जीवन में दो परिवारों को मिलने और साथ समय बिताने का सर्वोत्तम उपाय है। ऐसा कहा गया है कि यदि अपनी सगी बहन न हो तो पिता के भाई की कन्यामामा की पुत्रीमौसी अथवा बुआ की बेटी – ये भी बहन के समान हैंइनके हाथ का बना भोजन करें। जो पुरुष यम द्वितीया को बहन के हाथ का भोजन करता हैउसे धनआयुष्यधर्मअर्थ और अपरिमित सुख की प्राप्ति होती है। यम द्वितीय के दिन सायंकाल घर में बत्ती जलाने से पूर्वघर के बाहर चार बत्तियों से युक्त दीपक जलाकर दीप-दान करने का नियम भी है। परंपरा के अनुसार इसी दिन शीतकाल के लिए यमुनोत्री धाम के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। यह ऐसा दिन है जब यमुना स्नान करने से शनि दोष और अकाल मृत्यु का भय दूर होता है। 


भाईदूज में हर बहन रोली एवं अक्षत से अपने भाई का तिलक कर उसके उज्ज्वल भविष्य के लिए आशीष देती हैं और अपने भाई के कल्याण व दीर्घायु, यशस्वी और सर्वगुण संपन्न होने की प्रार्थना करती हैं। भाई अपनी बहन को कुछ उपहार या दक्षिणा देता है |

सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज तथा यमुना का जन्म हुआ। यमुना अपने भाई यमराज से स्नेहवश निवेदन करती थी कि वे उसके घर आकर भोजन करें। लेकिन यमराज व्यस्त रहने के कारण यमुना की बात को टाल जाते थे।

कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमुना अपने द्वार पर अचानक यमराज को खड़ा देखकर हर्ष-विभोर हो गई। प्रसन्नचित्त हो भाई का स्वागत-सत्कार किया तथा भोजन करवाया। इससे प्रसन्न होकर यमराज ने बहन से वर माँगने को कहा।

तब बहन ने भाई से कहा कि आप प्रतिवर्ष इस दिन मेरे यहां भोजन करने आया करेंगे तथा इस दिन जो बहन अपने भाई को टीका करके भोजन खिलाए उसे आपका भय न रहे। यमराज 'तथास्तुकहकर यमपुरी चले गए।

ऐसी मान्यता है कि जो भाई आज के दिन यमुना में स्नान करके पूरी श्रद्धा से बहनों के आतिथ्य को स्वीकार करते हैं उन्हें तथा उनकी बहन को यम का भय नहीं रहता। जिनकी बहनें दूर रहती हैंवे भाई अपनी बहनों से मिलने भाईदूज पर अवश्य जाते हैं और उनसे टीका कराकर उपहार आदि देते हैं।

बहनें पीढियों पर चावल के घोल से चौक बनाती हैं। इस चौक पर भाई को बैठा कर बहनें उनके हाथों की पूजा करती हैं। इस पूजा में भाई की हथेली पर बहनें चावल का घोल लगाती हैं उसके ऊपर सिन्दूर लगाकर कद्दू के फूलपानसुपारी मुद्रा आदि हाथों पर रखकर धीरे धीरे पानी हाथों पर छोड़ते हुए कुछ मंत्र बोलती हैं जैसे
 "गंगा पूजे यमुना को यमी पूजे यमराज कोसुभद्रा पूजा कृष्ण को,
गंगा यमुना नीर बहे मेरे भाई की आयु बढ़े"
बहनों को इस दिन नित्य कृत्य से निवृत्त हो अपने भाई के दीर्घ जीवनकल्याण एवं उत्कर्ष हेतु तथा स्वयं के सौभाग्य के लिए अक्षत (चावलकुंकुमादि से अष्टदल कमल बनाकर इस व्रत का संकल्प कर मृत्यु के देवता यमराज की विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिए। इसके पश्चात यमभगिनी यमुनाचित्रगुप्त और यमदूतों की पूजा करनी चाहिए। तदंतर भाई के तिलक लगाकर भोजन कराना चाहिए। इस विधि के संपन्न होने तक दोनों को व्रती रहना चाहिए।
इस समय ऊपर आसमान में चील उड़ता दिखाई दे तो बहुत ही शुभ माना जाता है। इस संदर्भ में मान्यता यह है कि बहनें भाई की आयु के लिए जो दुआ मांग रही हैं उसे यमराज ने कुबूल कर लिया है या चील जाकर यमराज को बहनों का संदेश सुनाएगा। यमराज इस दिन वह यमलोक छोड़कर बहन यमुना से मिलने यमनोत्री पहुंचते हैं। इसलिए कहा जाता है कि इस पावन मौके पर यमलोक के द्वार बंद रहते हैं।
एक अन्य मान्यता के अनुसार इसी दिन चित्रगुप्त की पूजा से पितृ दोषकेतु ग्रह दोष की बाधा दूर होती है। ज्योतिष की दृष्टि से केतु के प्रसन्न होने से राहु स्वतठीक हो जाते हैं इस कारण चित्रगुप्त को प्रधान देवता मानते हुए पूजा करने से दैहिक भौतिक तापों से भी मुक्ति मिलती है।
भाईदूज की एक पौराणिक कथा यह भी है कि इस दिन भगवान कृष्ण नरकासुर को मारने के बाद अपनी बहन सुभद्रा के पास गए थे। तब सुभद्रा ने अपने भाई कृष्ण का पारंपरिक रूप से स्वागत किया और उनकी पूजा आरती की।

भाई दूज के लिए ऎसा भी प्रचलित है कि महावीर भगवान ने इसी दिन निर्वाण प्राप्त किया था जिससे उनके भाई राजा नंदीवर्घन महावीर को खोने से बहुत व्यथित हुए। तब उस दिन उनकी बहन सुदर्शना ने अपने भाई को काफी दिलासा दी और फिर उनकी सुख शांति के लिए हमेशा उनका साथ निभाया और उनकी रक्षा के लिए पूजा अर्चना की। तभी से सभी महिलाएं भइया दूज मनाकर भाई बहन के प्रेम का सम्मान करते आए हैं।

पूजा विधान इस दिन बहने अपने भाई की दीर्घायु की कामना के लिए व्रत रखती हैं। सुबह सुबह स्त्रानध्यान करने के बाद पूजा की थाली सजाकर भाई का तिलक करती हैं और उन्हें बुरी नजरों से बचाने के लिए उनकी आरती उतारती हैं। बदले में भाई भी बहनों के इस अटूट प्यार को देखकर उन्हें उपहार देते हैं। 
वस्तुतः इस त्योहार का मुख्य उद्देश्य है भाई-बहन के मध्य सौमनस्य और सद्भावना का पावन प्रवाह अनवरत प्रवाहित रखना तथा एक-दूसरे के प्रति निष्कपट प्रेम को प्रोत्साहित करना है। इस प्रकार 'दीपोत्सव-पर्वका धार्मिकसामाजिक एवं राष्ट्रीय महत्व अनुपम है।

नरक चतुर्दशी - छोटी दीपावली


कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी 'नरक चतुर्दशीकहलाती है। सनत्कुमार संहिता के अनुसार इसे पूर्वविद्धा लेना चाहिये। इस दिन अरुणोदय से पूर्व प्रत्यूषकाल में स्नान करने से मनुष्य को यमलोक का दर्शन नहीं करना पड़ता।
वैसे तो कार्तिक मास में शरीर पर तेल लगाने का निषेद्ध है परन्तु इस दिन जो व्यक्ति सूर्योदय से पूर्व उठकर अपने शरीर के तेल लगाकर व अपामार्ग से दाँत माँज कर स्नान करता है उसके सभी पापों का नाश होता है और उसकी सद्गति का मार्ग खुलता है।
चतुर्दशी के दिन अभ्यंग स्नान बहुत ही महत्वपूर्ण होता है यह माना जाता है कि जो भी इस दिन स्नान करता है वह नरक जाने से बच सकता है। अभ्यंग स्नान के दौरान उबटन के लिए तिल के तेल का उपयोग किया जाता है। चतुर्दशी को लगाए जाने वाले तेल में लक्ष्मी जी तथा जल में माँ गंगा का वास रहता है।
तेल और अपामार्ग की पत्तियों से युक्त जल से स्नान करने से शरीर से अच्छी सुगन्ध आने लगती है और व्यक्ति का स्वरूप तेजोमय होकर उसका रूप भी निखर आता है इस लिये उसे रूप चतुर्दशी भी कहा जाता है।
 
इस दिन के महत्व के बारे में कहा जाता है कि इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर तेल लगाकर और पानी में चिरचिरी के पत्ते डालकर उससे स्नान करने करके विष्णु मंदिर और कृष्ण मंदिर में भगवान का दर्शन करना करना चाहिए।
अपमार्ग प्रोक्षण का मंत्र -
सीतालोष्ठ समायुक्तं सकण्ट कदलान्वितम् ।
हर पापमपामार्ग भ्राम्यमाणःपुनः पुनः ॥

अभ्यंग स्नान के लिए मुहूर्त का समय चतुर्दशी तिथि के प्रचलित रहते हुए चन्द्रोदय और सूर्योदय के मध्य का होता है।
निम्न मन्त्र पढ़कर अपामार्ग को अथवा लौकी को मस्तक पर घुमाकर नहाने से नरक का भय नहीं रहता स्नान के बाद शुद्ध वस्त्र पहनकरतिलक लगाकर दक्षिणाभिमुख होकर निम्न नाममन्त्रों से यमलोक से मुक्ति  यमराज की प्रसन्नता के लिए प्रत्येक नाम से तिलयुक्त तीन-तीन जलाञ्जलि दी जानी चाहिये। यह यम-तर्पण कहलाता है। इससे वर्ष भर के पाप नष्ट हो जाते हैं।
 'ॐ यमाय नमः','ॐ धर्मराजाय नमः','ॐ मृत्यवे नमः',
 'ॐ अन्तकाय नमः','ॐ वैवस्वताय नमः','ॐ कालाय नमः', 
'ॐ सर्वभूतक्षयाय नमः','ॐ औदुम्बराय नमः','ॐ दध्नाय नमः', 
'ॐ नीलाय नमः','ॐ परमेष्ठिने नमः','ॐ वृकोदराय नमः', 
'ॐ चित्राय नमः', 'ॐ चित्रगुप्ताय नमः'
यमधर्मराजमृत्युअन्तकवैवस्वतकालसर्वभूतक्षयऔदुभ्बरदघ्ननीलपरमेष्ठीवृकोदरचित्र और चित्रगुप्तइन चतुर्दश नामों से इन महिषवाहन दण्डधर की आराधना होती है। इन्हीं नामों से इनका तर्पण किया जाता है।

इस दिन देवताओं का पूजन करके सायंकाल को दीपदान करना चाहिये। मन्दिरोंगुप्तगृहोंरसोईस्नानघरदेववृक्षों के नीचेसभाभवननदियों के किनारेचहारदीवारीबगीचेबावलीगली-कूचेगोशाला आदि प्रत्येक स्थान पर दीपक जलाना चाहिये। यमराज के उद्देश्य से त्रयोदशी से अमावास्या तक दीप जलाने चाहिये। जो व्यक्ति इस पर्व पर दीपदान करता है उसे प्रेत बाधा कभी नहीं सताती है इस लिए इसे प्रेत चतुर्दशी भी कहते हैं।
हिन्दू धर्मग्रन्थों के अनुसार नरक चतुर्दशी के पीछे वामन पुराण में एक आख्यान है राजा बलि के यज्ञ को भंग करके वामन भगवान ने पृथ्वी से सम्पूर्ण ब्रहाण्ड को नाप लिया था और राजा बली को पाताल में शरण दी। बली के द्वारा मांगे वर के अनुसार जो मनुष्य इस पर्व पर दीप दान करेगा उसके यहाँ स्थिर लक्ष्मी का वास होगा और वह यम यातना से दूर रहेगा।
इसी संदर्भ में एक अन्य आख्यान मिलता है कि कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को भगवान श्री कृष्ण ने नरकासुर नामक राक्षस का वध करके तीनों लोकों को भयमुक्त किया और उस उपलक्ष्य में लोगों ने घी के दीप जलाये थे। इस लिये इसे छोटी दीपावली भी कहते हैं। अतयम यातना से मुक्ति और स्थिर लक्ष्मी की प्राप्ति  के लिए इस दिन प्रदोष काल में घर के मुख्य द्वार के बाहर चार बत्तियों वाला दीपक जलाना चाहिए और लोक कल्याणार्थ घर पर दीपदान करना चाहिए। दीप सायंकाल में जब सूर्य अस्त हो रहे होंउस समय प्रज्ज्वलित करने चाहिए।
यमराज या यम भारतीय पौराणिक कथाओं में मृत्यु के देवता को कहा गया है। विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा से भगवान सूर्य के पुत्र यमराजश्राद्धदेव मनु और पुत्री यमुना हुईं। यमराज परम भागवतद्वादश भागवताचार्यों में हैं। यमराज जीवों के शुभाशुभ कर्मों के निर्णायक हैं। दक्षिण दिशा के इन लोकपाल की संयमनीपुरी समस्त प्राणियों के लियेजो अशुभकर्मा हैबड़ी भयप्रद है। दीपावली से पूर्व दिन यमदीप देकर तथा दूसरे पर्वो पर यमराज की आराधना करके मनुष्य उनकी कृपा का सम्पादन करता है। ये निर्णेता हम से सदा शुभकर्म की आशा करते हैं। दण्ड के द्वारा जीव को शुद्ध करना ही इनके लोक का मुख्य कार्य है।

धनतेरस पूजा विधि




qqq
शुभ मुहूर्त में 13 दीपक जलाकर तिजोरी में कुबेर की पूजा करनी चाहिए। देव कुबेर का ध्यान करते हुएभगवान कुबेर को पुष्प चढ़ाएं। ध्यान करें। कहेंकि हे श्रेष्ठ विमान पर विराजमान रहने वालेगरूडमणि के समान आभावालेदोनों हाथों में गदा व वर धारण करने वालेसिर पर श्रेष्ठ मुकुट से अलंकृत शरीर वाले,
भगवान शिव के प्रिय मित्र देव कुबेर का मैं ध्यान करता हूं। धूपदीपनैवैद्य से पूजा करें।
इस मंत्र का जाप करें
च्यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धन-धान्य अधिपतये
धन-धान्य समृद्धि मे देहि दापय स्वाहा।
धनतेरस के शुभ दिन से मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के उपाय किए जाने चाहिए। इसके लिए धनतेरस विशेष तंत्र पूजन का विधान शास्त्रों में मिलता है।

सामग्री :

दक्षिणावर्ती शंखकेसरगंगाजल का पात्रधूप अगरबत्तीदीपकलाल वस्त्र।
मंत्र :

ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं महालक्ष्मी धनदा लक्ष्मी कुबेराय मम गृह स्थिरो ह्रीं ॐ नमः।

विधि : सबसे पहले सामने लक्ष्मी जी का चित्र रखें तथा उनके सामने लाल रंग का वस्त्र बिछाकर उस पर दक्षिणावर्ती शंख रख दें। उस पर केसर से स्वास्तिक बना लें तथा कुमकुम से तिलक कर दें।
बाद में स्फटिक की माला से मंत्र की 7 माला करें। तीन दिन तक ऐसा निरंतर करें। इतने से ही मंत्र-साधना सिद्ध हो जाती है।
मंत्र जप पूरा होने के पश्चात् लाल वस्त्र में शंख को बांधकर घर में रख दें। जब तक वह शंख घर में रहेगातब तक घर में निरंतर उन्नति होती रहेगी।

प्रदोषकाल : सायं 5.41 से 8.15 तक
वृषभकाल : सायं 6.25 से 8.20 तक
सूर्यास्त के बाद के दो घंटे की अवधि को प्रदोषकाल के नाम से जाना जाता है। प्रदोषकाल में दीपदान व लक्ष्मी पूजन करना शुभ माना जाता है। देव वैद्य धन्वंतरी के साथ-साथ देवी लक्ष्मी जी और धन के देवता कुबेर के पूजन की परंपरा है तथा कुबेर के अलावा यमदेव को भी दीपदान किया जाता है। धनतेरस को पूजा करने के उपरांत घर के मुख्यद्वार पर दक्षिण दिशा की ओर दीपक जलाकर रखा जाता है जो पूरी रात जलेइस दीपक में कुछ पैसे-कौड़ी डाले जाते हैं। स्कंदपुराण के अनुसार कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को प्रदोषकाल में घर के दरवाजे पर यमराज के लिए दीप देने से अकाल मृत्यु का भय खत्म होता है। दीपदान के समय इस मंत्र का जाप करते रहना चाहिए:
मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालेन  मया सह।
त्रयोदश्यां दीपदानात सूर्यजप्रीयतामिति॥

धनतेरस पर सफाई के लिए नई झाडू और सूपड़ा खरीदकर उसकी पूजा की जाती है।
इस दिन वैदिक देवता यमराज की पूजा की जाती है। वर्ष में केवल इसी दिन मृत्यु के देवता की पूजा की जाती है।

धनतेरस और कुबेर पूजन




#dhanteras, #Kuber-Pujan
दीपावली के पावन पांच पर्वों में धनवन्तरीयमलक्ष्मीऔर कुबेर का पूजन किया जाता है।
वयं यक्षाम: का मंत्र देने वाले यक्षराज कुबेर देवताओं के कोषाध्यक्ष हैं। उनकी राजधानी हिमालय क्षेत्र के अलकापुरी में स्थित है। यक्ष समुदाय जलस्रोतों और धन संपत्ति का संरक्षक है। विश्रवस्‌ ऋषि और उनकी पत्नी इलविला के पुत्र कुबेर की पत्नी हारिति है। भारत में हर पूजा से पहले दिक्पालों की पूजा का विधान है जिसमें उत्तर के दिक्पाल होने के कारण कुबेर की पूजा भी होती है। गहन तपस्या के बाद मरुद्गणों ने उन्हें यक्षों का अध्यक्ष बनाया और पुष्पक विमान भेंट किया।
निधिपति कुबेर के गण यक्ष हैं
जो कि संस्कृत साहित्य में मनुष्यों से अधिक शक्तिशाली, ज्ञान की परीक्षा लेते हुएनिर्मम प्राणी हैं। जैन साहित्य में इन्हें शासनदेव व शासनदेवी भी कहा गया है। महाभारत के यक्षप्रश्न की याद तो हम सब को है। कुबेर की सम्मिलित प्रजा का नाम पुण्यजन है जिसमें यक्ष तथा रक्ष दोनों ही शामिल हैं।
महर्षि पुलस्त्य के पुत्र महामुनि विश्रवा ने भारद्वाज जी की कन्या इळविळा का पाणि ग्रहण किया। उसी से कुबेर की उत्पत्ति हुई। इसलिये उनका पूरा नाम कुबेर वैश्रवण है। विश्रवा की दूसरी पत्नीदैत्यराज माली की पुत्री कैकसी केरावणकुंभकर्ण और विभीषण हुए जो कुवेर के सौतेले भाई थे। विश्रवा की पुत्रों में कुबेर सबसे बड़े थे। रावण ने अपनी मां और नाना से प्रेरणा पाकर कुबेर का पुष्पक विमान और उनकी स्वर्णनगरी लंकापुरी तथा समस्त संपत्ति पर कब्जा करने के हिंसक प्रयास किए। 

रावण के अत्याचारों से चिंतित कुबेर ने जब अपने एक दूत को रावण के पास क्रूरता त्यागने के संदेश के साथ भेजा तो रावण ने क्रुद्ध होकर उस दूत को मार-काटकर अपने सेवक राक्षसों को खिला दिया। यह घटनाक्रम जानकर कुबेर को दुख हुआ। अंततः यक्षों और राक्षसों में युद्ध हुआ। बलवान परंतु सरल यक्षमायावीनृशंस राक्षसों के आगे टिक न सकेराक्षस विजयी हुए। रावण ने माया से कुबेर को घायल करके उनका पुष्पक विमान ले लिया। कुबेर अपने पितामह पुलत्स्य के पास गये। पितामह की सलाह पर कुबेर ने गौतमी के तट पर शिवाराधना की। फलस्वरूप उन्हें 'धनपालकी पदवीपत्नी और पुत्र का लाभ हुआ। कुछ जनश्रुतियों के अनुसार कुबेर का एक नेत्र पार्वती के तेज से नष्ट हो गयाअत: वे एकाक्षीपिंगल भी कहलाए। तपस्थली का वह स्थल कुबेरतीर्थ और धनदतीर्थ नाम से विख्यात है।
धनार्थियों के लिए कुबेर पूजा का विशेष महत्व है। परंपरा के अनुसार लक्ष्मी जी चंचला हैंकभी भी कृपा बरसा देती हैं। लेकिन कुबेर संसार की समस्त संपदा के रक्षक हैं। उनकी अनिच्छा होते ही धन-संपदा अपना स्थान बदल लेती है। समस्त धन के संरक्षक कुबेर की मर्जी न हो तो लक्ष्मी चली जाती हैं। दीपावली पर बहीखाता पूजन के साथ कुबेर पूजनतुला पूजन तथा दीपमाला पूजन का भी रिवाज है।
महाराज कुबेर के कुछ मंत्र:
आह्वान मंत्र:
आवाहयामि देव त्वामिहायाहि कृपां कुरु।
कोशं वर्धय नित्यं त्वं परिरक्ष सुरेश्वर।। 
कुबेर मंत्र:
ॐ कुबेराय नम: 
कुबेर मंत्र:
धनदाय नमस्तुभ्यं निधिपद्माधिपाय च।
भगवान् त्वत्प्रसादेन धनधान्यादिसम्पद:।।
अष्टाक्षर कुबेर मंत्र:
ॐ वैश्रवणाय स्वाहा। 
षोडशाक्षर कुबेर मंत्र:
ॐ श्रीं ॐ ह्रीं श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं क्लीं वित्तेश्वराय नम: 

पंच्चात्रिशदक्षर कुबेर मंत्र –
ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये
धनधान्यसमृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा।
कुबेरकनकधारा और श्री यंत्र तीनों त्रिगुणात्मक शक्ति के पुंज हैं। यदि तीनों की एक साथ पूजा की जाए तो १०० गुणा फल प्राप्त होता है। अष्ट सिद्धी और नवनिधी के दाता कुबैर एक अन्य मान्यता के अनुसार वैवस्वत मंन्वंतर में महर्षि पुलस्त्य के याहं विश्रण नामक पुत्र हुआ। विश्रण के केशनी और इलविला दो पटरानियां थीं।
केशनी के गर्भ से रावणकुम्भकर्णविभीषण और शूर्पणखा चार सन्तानें हुई।
इहविला जो कि भारद्वाज ऋषि की पुत्री थी। उसके केवल एक पुत्र पैदा हुआ। जिसका नाम कुबेर रखा गया। कुबेर रावण का सौतेला भाई था।
 
कुबेर ने शिव और ब्रह्मा को उपासना की जिससे उसको अनेक वरदान प्राप्त हुए। कुबेर स्वभाव से शान्त और गम्भीर था। उसने विश्वकर्मा के सहयोग से सुवर्णमयी लंका का निर्माण किया जिसको रावण ने ले ली थी और कुबेर के पास पुष्पक विमान था जो कि सात मंजिल का था तथा वह चालक की इच्छानुसार चलता था उसे भी रावण ने कुबेर से छीन लिया था। राम उसी पुष्पक विमान में बैठकर लंका विजय के बाद अयोध्या आए और वह विमान कुबेर को वापस दिया।
शिव पुराण के अनुसार यक्षराज कुबेर अलकावती नगरी के राजा थे।
ब्रह्माण पुराणके अनुसार मेरु पर्वत की चेरी मंदर पर चैत्ररथ एक दिव्य बगीचा है वहां पर कुबेर आराम करते हैं। जिस जगह पर कुबेर ने तपस्या की वह स्थल नर्मदा नदी एवं कावेरी का संगम स्थल था। यह तीर्थ आज भी कुबेर तीर्थ के नाम से पूजा जाता है। कुबेर ने शिव की तपस्या की उस पर शिव ने प्रसन्न होकर वर मागने को कहा। कुबेर ने कहा है भगवान मुझे ऐसा स्थान दिखाओजिस पर शासन एवं आधिपत्य अक्षुण्ण बना रहे तथा कोई कितना भी शक्तिशाली हो मेरा प्रभुत्व छीन नहीं सकता। भगवान शिव ने कुबेर को उत्तर दिशा का स्वामी बना दिया और कहा कि अब से जो भी उत्तर दिशा में तुमको नमस्कार करके जायेगा उसका कार्य तत्काल सम्पन्न होगा। तब से कुबरे उत्तर दिशा का स्वामी होकर शक्तिशाली लोकपाल के रूप में प्रतिष्ठित हो गया तब से उत्तर दिशा का नाम कौबेरी हो गया। कुबेर उत्तर दिशा का स्वामी बनने के बाद भी तपस्या करते रहे। तब शिव ने पुनः प्रसन्न होकर वर मांगने को कहा तब कुबेर ने कहा कि भगवान मुझे आप ऐसी अक्षय एवं विस्तृत सम्पत्ति दीजिएजिसको मुझसे कोई छीन नहीं सके। इतना ही नहीं मैं जिस पर कृपा करूं वह अथाह सम्पत्ति का स्वामी बन जाय। भगवान शंकर ने प्रसन्न होकर कहा जा आज से तू समस्त देवताओंदानवों  मानवों की अक्षय सम्पत्ति एवं नव निधियों  अष्ट सिद्धियों का स्वामी बन जा। जो भी विधि विधान से तेरी पूजा करेगातेरी कृपा से वह अक्षय सम्पत्ति का स्वामी बनेगा। तब से कुबेर धनाधिपतियक्षाधिपतिधनेशनिधिनाथशिवसखादेवताओं के कोषाध्यक्षधनाध्यक्ष होकर संसार के समस्त चर-अचर सम्पत्तियों के स्वामी बन गया। पदम् पुराण के अनुसार गंधमादन पर्वत पर गिरिहार में इनका विशेष प्रकोष्ठ है जहां से यह अक्षय सम्पत्ति का संचालन करते हैं। तीन अक्षय सम्पत्ति का मात्र सोलहवां हिस्सा ही इन्होंने भूतल वासियों को वितरित किया। हमें कुबेर की अनेक प्रचीन प्रतिमायें मिली हैं। जिसे देखने पर पता चला कि कुबेर के एक हाथ में गदादूसरे हाथ में रूपयों की थैली है। किसी मूर्ति के एक हाथ में मदिरा का पात्र है। कुषाणकालीन मूर्तियों में अपनी पत्नि के साथ धन की थैली पर बैठे दिखाए गए इनका उदर विशाल है। रंग काला एवं कद नाटा तथा दिखने में कुरूप है। कुबेर को मिष्ठान और मदिरा प्रिय है। कुबेर के सोलह स्वरूप हैः-  
१ कुबेर त्र्यम्बक सुख यक्षराज गुह्मकेश्वर धनद .राज राज धनाधिप किन्नदेश वैश्रवण १०पौलस्त्य ११नरवाहन १२सक्ष १३एकपिंग १४ऐलविल १५श्रीद १६पुण्यजनेश्वर।
कुबेर के पूजन से जीवन में किसी प्रकार का कोई अभाव नहीं रहता है। ऐसा माना जाता है कि जहां धन प्राप्ति हेतु अन्य प्रयत्न  उपासनाएं विफल हो जाती ळैं। वहां कुबेर की उपासना शीघ्र फलदायी है। धन तेरस को कुबेर की पूजा का दिन माना जाता है। इस दिन कुबेर यंत्र का कुबेर की पूजा का दिन माना जाता है उस दिन कुबेर यंत्र का निर्माण कर पूजन करें। इसके पश्चात् सवा लाख कुबेर मंत्र के जाप करें।
मन्त्र :
ऊं यक्षराज कुबेराय वैश्रवणाय धन-धान्यपत्यै।
धन धान्य समृद्धि में  देहि दापय स्वाहा
षोढशाक्षर कुबेरमन्त्र श्री ह्नीं श्रीं ह्नीं क्लीं वित्तश्रवराय नमः किसी एक मंत्र के जाप कर जाप का दसवां भाग हवन करें। शिव रात्रि धन त्रयोदशी एवं विशिष्ट अवसर पर दस हजार लाख कुबेर जाप करने से मन्त्र सिद्ध प्राप्त हो जाता है।


यमदीपदान



astrosurkhiyan.blogspot.com
स्कन्दपुराण में कहा गया है कि कार्तिक के कृष्णपक्ष में त्रयोदशी के प्रदोषकाल में यमराज के निमित्त दीप और नैवेद्य समर्पित करने पर अपमृत्यु अर्थात् अकाल मृत्यु का नाश होता है । ऐसा स्वयं यमराज ने कहा था ।
यमदीपदान जैसा कि पूर्व में कहा गया है प्रदोषकाल में करना चाहिए  इसके लिए मिट्टी का एक बड़ा दीपक लें और उसे स्वच्छ जल से धो लें । तदुपरान्त स्वच्छ रुई लेकर दो लम्बी बत्तियॉं बना लें । उन्हें दीपक में एक -दूसरे पर आड़ी इस प्रकार रखें कि दीपक के बाहर बत्तियों के चार मुँह दिखाई दें । अब उसे तिल के तेल से भर दें और साथ ही उसमें कुछ काले तिल भी डाल दें । प्रदोषकाल में इस प्रकार तैयार किए गए दीपक का रोली अक्षत एवं पुष्प से पूजन करें । उसके पश्चात् घर के मुख्य दरवाजे के बाहर थोड़ी -सी खील अथवा गेहूँ से ढेरी बनाकर उसके ऊपर दीपक को रखना है । दीपक को रखने से पहले प्रज्वलित कर लें और दक्षिण दिशा की ओर देखते हुए निम्मलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए चारमुँह के दीपक को खील आदि की ढेरी के ऊपर रख दें ।
मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालेन च मया सह ।

त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतामिति ।

अर्थात् त्रयोदशी को दीपदान करने से मृत्यु पाश दण्ड काल और लक्ष्मी के साथ सूर्यनन्दन यम प्रसन्न हों । उक्त मन्त्र के उच्चारण के पश्चात् हाथ में पुष्प लेकर निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए यमदेव को दक्षिण दिशा में नमस्कार करें ।
ॐ यमदेवाय नमः । नमस्कारं समर्पयामि ॥
अब पुष्प दीपक के समीप छोड़ दें और पुनः हाथ में एक बताशा लें तथा निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए उसे दीपक के समीप ही छोड़ दें ।
ॐ यमदेवाय नमः । नैवेद्यं निवेदयामि ॥
अब हाथ में थोड़ा -सा जल लेकर आचमन के निमित्त निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए दीपक के समीप छोड़े 
ॐ यमदेवाय नमः । आचमनार्थे जलं समर्पयामि ।
अब पुनः यमदेव को ‘ॐ यमदेवाय नमः ’ कहते हुए दक्षिण दिशा में नमस्कार करें ।
धनत्रयोदशी पर यमदीपदान क्यों ?
‘ स्कन्द ’ आदि पुराणों में , ‘ निर्णयसिन्धु ’ आदि धर्मशास्त्रीय निबन्धों में एवं ‘ ज्योतिष सागर ’ जैसी पत्रिकाओं में धनत्रयोदशी के करणीय कृत्यों में यमदीपदान को प्रमुखता दी जाती है । कभी आपने सोचा है कि धनत्रयोदशी पर यह दीपदान क्यों किया जाता है हिन्दू धर्म में प्रत्येक करणीय कृत्य के पीछे कोई न कोई पौराणिक कथा अवश्य जुड़ी होती हैं । धनत्रयोदशी पर यमदीपदान भी इसी प्रकार पौराणिक कथा से जुड़ा हुआ है ।
स्कन्दपुराण के वैष्णवखण्ड के अन्तर्गत कार्तिक मास महात्म्य में इससे सम्बन्धित पौराणिक कथा का संक्षिप्त उल्लेख हुआ है ।
एक बार यमदूत बालकों एवं युवाओं के प्राण हरते समय परेशान हो उठे  उन्हें बड़ा दुःख हुआ कि वे बालकों एवं युवाओं के प्राण हरने का कार्य करते हैं परन्तु करते भी क्या उनका कार्य ही प्राण हरना ही है । अपने कर्तव्य से वे कैसे च्युत होते एक और कर्तव्यनिष्ठा का प्रश्न था दुसरी ओर जिन बालक एवं युवाओं का प्राण हरकर लाते थे उनके परिजनों के दुःख एवं विलाप को देखकर स्वयं को होने वाले मानसिक क्लेश का प्रश्न था । ऐसी स्थिति में जब वे बहुत दिन तक रहने लगे तो विवश होकर वे अपने स्वामी यमराज के पास पहुँचे और कहा कि ‘‘महाराज आपके आदेश के अनुसार हम प्रतिदिन वृद्ध बालक एवं युवा व्यक्तियों के प्राण हरकर लाते हैं परन्तु जो अपमृत्यु के शिकार होते हैं उन बालक एवं युवाओं के प्राण हरते समय हमें मानसिक क्लेश होता है । उसका कारण यह है कि उनके परिजन अत्याधिक विलाप करते हैं और जिससे हमें बहुत अधिक दुःख होता है । क्या बालक एवं युवाओं को असामयिक मृत्यु से छुटकारा नहीं मिल सकता है ?’’ ऐसा सुनकर धर्मराज बोले ‘‘दूतगण तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है । इससे पृथ्वीवासियों का कल्याण होगा । कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को प्रतिवर्ष प्रदोषकाल में जो अपने घर के दरवाजे पर निम्नलिखित मन्त्र से उत्तम दीप देता है वह अपमृत्यु होने पर भी यहॉं ले आने के योग्य नहीं है ।
मृत्युना पाश्दण्डाभ्यां कालेन च मया सह ।

त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतामिति  ’’
(Mrityunaa Paashah Hastena Kalena bhaaryaapaa Saha

Trayodasham Deepdaanam Suryajah Pritaamivee)
उसके बाद से ही अपमृत्यु अर्थात् असामयिक मृत्यु से बचने के उपाय के रूप में धनत्रयोदशी पर यम के निमित्त दीपदान एवं नैवेद्य समर्पित करने का कृत्य प्रतिवर्ष किया जाता है । .
यमराज की सभा
देवलोक की चार प्रमुख सभाओं में से एक है ‘यमसभा ’। यमसभा का वर्णन महाभारत के सभापर्व में हुआ है । इस सभा का निर्माण विश्वकर्मा जी ने किया था । यह अत्यन्त विशाल सभा है । इसकी १०० योजन लम्बाई एवं १०० योजन लम्बाई एवं १०० योजन चौड़ाई है । इस प्रकार यह वर्गाकार है । यह सभा न तो अधिक शीतल है और न ही अधिक गर्म है अर्थात् यहॉं का तापक्रम अत्यन्त सुहावना है । यह सभी के मन को अत्यन्त आनन्द देने वाली है । न वहॉं शोक न बुढ़ापा है न भूख है न प्यास है और न ही वहॉं कोई अप्रिय वस्तु है । इस प्रकार वहॉं दुःख कष्ट एवं पीड़ा के करणों का अभाव है । वहॉं दीनता थकावट अथवा प्रतिकूलता नाममात्र को भी नही है ।
वहा सदैव पत्रित सुगन्ध वाली पुष्प मालाएँ एवं अन्य कई रम्य वस्तुएँ विद्यमान रहती हैं ।
यमसभा में अनेक राजर्षि और ब्रह्मर्षि यमदेव की उपासना करते रहते हैं  ययाति नहुश पुरु मान्धाता कार्तवीर्य अरिष्टनेमी कृति निमि प्रतर्दन शिवि आदि राजा मरणोणरान्त यहां बैठकर धर्मराज की उपासना करते हैं । कठोर तपस्या करने वाले उत्तम व्रत का पालन करने वाले सत्यवादी शान्त संन्यासी तथा अपने पुण्यकर्म से शुध्द एवं पवित्र महापुरुषों का ही इस सभा में प्रवेश होता है ।



लक्ष्मी पूजन की विधि


मां लक्ष्मी के पूजन की सामग्री अपने सामर्थ्य के अनुसार होना चाहिए। मां लक्ष्मी को पुष्प में कमल व गुलाबफल में श्रीफलसीताफलबेरअनार व सिंघाड़ेसुगंध में केवड़ागुलाबचंदन के इत्र,  वस्त्र में लाल-गुलाबी या पीले रंग का रेशमी वस्त्रअनाज में चावल तथा मिठाई में घर में बनी शुद्धता पूर्ण केसर की मिठाई विशेष प्रिय हैं।इनका उपयोग करने से वे शीघ्र प्रसन्न होती हैं। प्रकाश के लिए गाय का घीमूंगफली या तिल्ली का तेल तथा अन्य सामग्री में गन्नाकमल गट्टाखड़ी हल्दीबिल्वपत्रपंचामृतगंगाजलऊन का आसनरत्न आभूषणगाय का गोबरसिंदूरभोजपत्र का पूजन में उपयोग करना चाहिए।

पूजा की सामग्री व तैयारी

चौकी पर लक्ष्मी व गणेश की मूर्तियां इस प्रकार रखें कि उनका मुख पूर्व या पश्चिम में रहे। लक्ष्मीजीगणेशजी की दाहिनी ओर रहें। पूजनकर्ता मूर्तियों के सामने की तरफ बैठें। कलश को लक्ष्मीजी के पास चावलों पर रखें। नारियल को लाल वस्त्र में इस प्रकार लपेटें कि नारियल का अग्रभाग दिखाई देता रहे व इसे कलश पर रखें। यह कलश वरुण का प्रतीक है।

दो बड़े दीपक रखें। एक में घी भरें व दूसरे में तेल। एक दीपक चौकी के दाईं ओर रखें व दूसरा मूर्तियों के चरणों में। इसके अतिरिक्त एक दीपक गणेशजी के पास रखें।

मूर्तियों वाली चौकी के सामने छोटी चौकी रखकर उस पर लाल वस्त्र बिछाएं। कलश की ओर एक मुट्ठी चावल से लाल वस्त्र पर नवग्रह की प्रतीक नौ ढेरियां बनाएं। गणेशजी की ओर चावल की सोलह ढेरियां बनाएं। ये सोलह मातृका की प्रतीक हैं। नवग्रह व षोडश मातृका के बीच स्वस्तिक का चिह्न बनाएं।

इसके बीच में सुपारी रखें व चारों कोनों पर चावल की ढेरी। सबसे ऊपर बीचोंबीच ॐ लिखें। छोटी चौकी के सामने तीन थाली व जल भरकर कलश रखें। थालियों की निम्नानुसार व्यवस्था करें-
एक थाली में ग्यारह दीपक
दूसरी में खीलबताशेमिठाईवस्त्रआभूषणचन्दन का लेपसिन्दूरकुंकुमसुपारीपान,
तीसरी में फूलदुर्वाचावललौंगइलायचीकेसर-कपूरहल्दी-चूने का लेपसुगंधित पदार्थधूपअगरबत्तीएक दीपक।

इन थालियों के सामने यजमान बैठे। आपके परिवार के सदस्य आपकी बाईं ओर बैठें। कोई आगंतुक हो तो वह आपके या आपके परिवार के सदस्यों के पीछे बैठे। 
पूजा की संक्षिप्त विधि
सबसे पहले पवित्रीकरण करें। 
आप हाथ में पूजा के जलपात्र से थोड़ा सा जल ले लें और अब उसे मूर्तियों के ऊपर छिड़कें। साथ में मंत्र पढ़ें। इस मंत्र और पानी को छिड़ककर आप अपने आपको पूजा की सामग्री को और अपने आसन को भी पवित्र कर लें।

 
ॐ पवित्रः अपवित्रो वा सर्वावस्थांगतोऽपिवा।
यः स्मरेत्‌ पुण्डरीकाक्षं स वाह्यभ्यन्तर शुचिः॥
पृथ्विति मंत्रस्य मेरुपृष्ठः ग षिः सुतलं छन्दः
कूर्मोदेवता आसने विनियोगः॥



अब पृथ्वी पर जिस जगह आपने आसन बिछाया हैउस जगह को पवित्र कर लें और मां पृथ्वी को प्रणाम करके मंत्र बोलें-

ॐ पृथ्वी त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता।
त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम्‌॥
पृथिव्यै नमः आधारशक्तये नमः
अब आचमन करें
पुष्पचम्मच या अंजुलि से एक बूंद पानी अपने मुंह में छोड़िए और बोलिए-
ॐ केशवाय नमः
और फिर एक बूंद पानी अपने मुंह में छोड़िए और बोलिए-
ॐ नारायणाय नमः
फिर एक तीसरी बूंद पानी की मुंह में छोड़िए और बोलिए-
ॐ वासुदेवाय नमः
फिर ॐ हृषिकेशाय नमः कहते हुए हाथों को खोलें और अंगूठे के मूल से होंठों को पोंछकर हाथों को धो लें। पुनः तिलक लगाने के बाद प्राणायाम व अंग न्यास आदि करें। आचमन करने से विद्या तत्वआत्म तत्व और बुद्धि तत्व का शोधन हो जाता है तथा तिलक व अंग न्यास से मनुष्य पूजा के लिए पवित्र हो जाता है।

आचमन आदि के बाद आंखें बंद करके मन को स्थिर कीजिए और तीन बार गहरी सांस लीजिए। यानी प्राणायाम कीजिए क्योंकि भगवान के साकार रूप का ध्यान करने के लिए यह आवश्यक है फिर पूजा के प्रारंभ में स्वस्तिवाचन किया जाता है। उसके लिए हाथ में पुष्पअक्षत और थोड़ा जल लेकर 

ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धाश्रवा: स्वस्ति न: पूषा विश्ववेदा:। 
स्वस्ति नस्ताक्ष्र्यो अरिष्टनेमि:स्वस्तिनो बृहस्पतिर्दधातु॥
पय: पृथिव्यांपय ओषधीयु पयो दिव्यन्तरिक्षे पयो धा:। 
पयस्वती: प्रदिश: सन्तु मह्यम। 
विष्णो रामटमसि विष्णो: श्नप्त्रेस्थो विष्णो: स्यूरिस विष्णोधुरर्वासि:। 
वैष्णवमसि विष्णवे त्वा॥ 
अग्निर्देवताव्वातोदेवतासूय्र्योदेवता चन्द्रमा देवताव्वसवो 
देवता रुद्रोदेवता बृहस्पति: देवतेन्द्रोदेवताव्वरुणादेवता:॥ 
ॐ  शांति: शांति: सुशांतिभर्वतु। सर्वोरिष्ठ-शांतिर्भवतु॥
ऊपर लिखित वेद मंत्रों का उच्चारण करते हुए परम पिता परमात्मा को प्रणाम किया जाता है। फिर पूजा का संकल्प किया जाता है। संकल्प हर एक पूजा में प्रधान होता है।
संकल्प आप हाथ में अक्षत लेंपुष्प और जल ले लीजिए। कुछ द्रव्य भी ले लीजिए। द्रव्य का अर्थ है कुछ धन। ये सब हाथ में लेकर संकल्प मंत्र को बोलते हुए संकल्प कीजिए कि मैं अमुक व्यक्ति अमुक स्थान व समय पर अमुक देवी-देवता की पूजा करने जा रहा हूं जिससे मुझे शास्त्रोक्त फल प्राप्त हों। सबसे पहले गणेशजी व गौरी का पूजन कीजिए। उसके बाद वरुण पूजा यानी कलश पूजन करनी चाहिए।
 
चौकी के दायीं ओर घी का दीपक प्रज्जवलित करें। इसके पश्चात दाहिने हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर निम्न मंत्रों से स्वस्तिवाचन करें -
विभिन्न देवता‌ओं के स्मरण के पश्चात निम्नलिखित मंत्र का उच्चारण करें-
विनायकम गुरुं भानुं ब्रहाविष्णुमहेश्वरान।

सरस्वतीय प्रणाम्यादौ सर्वकार्यार्थ सिद्धर्य॥
हाथ में लि‌ए हु‌ए अक्षत और पुष्प को चौकी पर समर्पित कर दें।
एक सुपारी लेकर उस पर मौली लपेटकर चौकी पर थोड़े से चावल रखकर सुपारी को उस पर रख दें। तदुपरांत भगवान गणेश का आह्वान करें-
आहृवान के पश्चात निम्नलिखित मंत्र की सहायता से गणेशजी की प्रतिष्ठा करें और उन्हें आसन दें-
अस्यै प्राणाप्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणाक्षरन्तु च।

अस्यै देवत्वमर्चायै मामहेति च कश्चन॥

गजाननं सुप्रतिष्ठिते वरदे भवेताम ॥

प्रतिष्ठापूर्वककम आसनार्थे अक्षतान समपर्यामि गजाननाभ्यां नम:
पुनअक्षत लेकर गणेशजी के दाहिनी ओर माता अम्बिका का आवाहन करें
  ॐ  अम्बे अम्बिकेम्बालिके न मां नयति कश्चन।

ससस्त्यश्वकसुभद्रिकां काम्पीलवासिनीम 

हेमाद्रितनयां देवीं वरदां शंकरप्रियाम।

लम्बोदरस्य जननीं गौरीमावाहयाम्यहम॥

ओम भूभुर्वस्वगौर्य नम:, गौरीमावाहयमिस्थापयामिपूजयामि  


अक्षत चौकी पर छोड़ दें। अब पुनअक्षत लेकर माता अम्बिका की प्रतिष्ठा करें-
अस्यै देवत्वमचौर्य मामहेति च कश्चन॥

आम्बिके सुप्रतिष्ठिते भवेताम।

प्रतिष्ठापूर्वकम आसनाथे अक्षतान समर्पयामि गणेशम्बिका नम
ऐसा कहते हु‌ए आसन के समक्ष समर्पित करें।

हाथ में थोड़ा सा जल ले लीजिए और आह्वान व पूजन मंत्र बोलिए और पूजा सामग्री चढ़ाइए। फिर नवग्रहों का पूजन कीजिए। हाथ में अक्षत और पुष्प ले लीजिए और नवग्रह स्तोत्र बोलिए। इसके बाद भगवती षोडश मातृकाओं का पूजन किया जाता है। हाथ में गंधअक्षतपुष्प ले लीजिए। सोलह माताओं को नमस्कार कर लीजिए और पूजा सामग्री चढ़ा दीजिए।

सोलह माताओं की पूजा के बाद रक्षाबंधन होता है। रक्षाबंधन विधि में मौली लेकर भगवान गणपति पर चढ़ाइए और फिर अपने हाथ में बंधवा लीजिए और तिलक लगा लीजिए। अब आनंदचित्त से निर्भय होकर महालक्ष्मी की पूजा प्रारंभ कीजिए।
महा लक्ष्मी पूजन
उक्त समस्त प्रक्रिया के पश्चात प्रधान पूजा में भगवती महालक्ष्मी का पूजन करना चाहि‌ए। पूजन से पूर्व नवीन चित्र और श्रीयंत्र तथा द्रव्यलक्ष्मी स्वर्ण अथवा चांदी के सिक्के आदि की निम्नलिखित मंत्र से अक्षत छोड़कर प्रतिष्ठा कर लेनी चाहि‌ए।
अस्यै प्राणप्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणाक्षरन्तु  

अस्यै देवत्मर्चायै मामहेति च कश्चन॥
ध्यानतदुपरान्त हाथ में लाल कमल पुष्प लेकर निम्न मंत्र देवी लक्ष्मी का ध्यान करें।
आवाहनहाथ में पुष्प लेकर देवी का आवाहन करे-
सर्वलोकस्य जननीं सर्वसौख्यप्रदासिनौम।

सर्वदेवमदयीमीशां देवीवाहयाम्हम॥
अब पुष्प समर्पित करें।
तप्मका‌ऋनर्वाभं मुक्तामणिविराजितम।

अमलं कमलं दिव्योमासन प्रतिगृहृताम॥
आसन के लि‌ए कमल पुष्प अर्पित करें-
गड्डनदितीर्थसम्भूतं गन्धपुष्पादिभिर्युतम।

पाद्यं ददाम्यी देवि गृहाणाशु नमोस्तुति ते॥
अघ्र्यनिम्न मंत्र से देवी को अघ्र्य दें अष्टगंध से मिश्रित जल से-
अष्टगन्धसमायुक्तं स्वर्णपात्रप्रपूरितम।

अघ्र्यं गृहाण महतं महालक्ष्मी नमोस्तुते॥

   महालक्ष्म्यै नम: अघ्य समर्पयामि॥
स्नाननिम्न मंत्र से देवी को स्नान करा‌एं-
मन्दाकिन्यासमानीतैर्हेमाम्भोरुहासितै:

स्नानं कुरूष्व देवेशि सलिलैश्च सुगन्धिभि:

  महालक्ष्म्यै नम: स्नानं समर्पयामि॥
पचांमृतस्नाननिम्न मंत्र से देवी को पंचामृत घीशहददुग्धशर्करादही स्नान करा‌ए:
पयो दधि घृतं चैव मधुशर्करयान्वितम।

पत्रामृतं मयानीतं स्नानार्थ प्रतिगुहृताम॥

  महालक्ष्म्यै नम: पंचामृत स्नानं समर्पयामि॥
शुद्धोदक स्नाननिम्न मंत्र से देवी को शुद्धोदक स्नान करा‌एं:
मन्दाकिन्यास्तु यद्वारि सर्वपापहरं शुभम।

तदिदं कल्पित तुभ्यं स्नानार्थ प्रतिगृहृताम॥

 महालक्ष्त्यै नम: शुद्धोदक स्नानं समर्पयातिम॥
वस्त्रनिम्न मंत्र से देवी को वस्त्र अर्पित करें:
दिव्याम्बरं नूतनं हि क्षौमं त्वतिमनोहरम।

दीयमानं मया देवि गृहाण जगदम्बिके॥

  महालक्ष्मै नम: वस्त्रं समर्पयामि॥
आभूषणनिम्न मंत्र से देवी को आभूषण अर्पित करें:
रत्नकड्कणवैदूर्यमुक्ताहारादिकदत्तानि च।

सुप्रसन्नेन मनसा दत्ताति स्वीकुरुष्व भो:

  महालक्ष्म्यै नम: आभूषणें समर्पयामि॥
गंधनिम्न मंत्र से देवी को गंध रोली-चंदन अर्पित करें:
श्रीखण्डं चंदन दिव्यं गन्धाढयं सुमनोहरम।

विलेपनं सुरक्षेष्ठ चदंन प्रमितगृहृताम॥

  महालक्ष्म्यै नम: गन्धं समर्पयामि॥
सिंदूरनिम्न मंत्र से देवी को सिंदूर अर्पित करें:
सिन्दूरं रक्तवर्ण व सिन्दूरतिलप्रिये।

भक्त्या दत्तं मया देवि सिन्दूरं प्रतिगृहृताम॥

  महालक्ष्म्यै नम: सिन्दूरं समर्पयामि॥
कुमकुमनिम्न मंत्र से देवी को कुमकुम अर्पित करें:
तैलानि च सुगन्धीनि द्रव्ययाणि विविधानि च।

मया दत्तानि लेपाथ गृहाण परमेश्वरि॥

  महालक्ष्म्यै नम: कुंकुमं समर्पयामि॥
अक्षतनिम्न मंत्र से देवी को अक्षत चावल अर्पित करे:
अक्षताश्च सुरक्षेष्ठे कुड्कमाक्तासुशोभिता:

मया निवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्वरि॥

  महालक्ष्म्यै नम: अक्षतम समर्पयामि॥
अक्षत के स्थान पर अपनी परम्परा के अनुरूप हल्दी की गांठ या गुड़ भी अर्पित किया जाता है।
पुष्प एवं पुष्पमालानिम्न मंत्र का उच्चारण करते हु‌ए देवी को पुष्प एवं पुष्पमाला अर्पित करे-
माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्यादीनि वै प्रभो।

मयानीतानि पुष्पाणि पूजाथ प्रतिगृहृताम।

  महालक्ष्म्यै नम: पुष्पं पुष्पमालाम  समर्पयामि॥

  महालक्ष्म्यै नम: धूपमाप्रापघामि॥
दीपनिम्न मंत्र का उच्चारण करते हु‌ए देवी को दीप दिखा‌एं:
साज्यं च वर्तिसंयुक्तं वहृना योजित मया।

दीपं गृहाण देवेशि त्रैलोक्यतिमिरापहम॥

   महालक्ष्म्यै नम: दीपम दर्शयामि॥
नैवेद्यकिसी कटोरी में पान के पत्ते के ऊपर नैवेद्य प्रसाद रखें तथा उस पर लौंग का जोड़ा अथवा इलायची रखें। तदुपरांत निम्नलिखित मंत्र का उच्चारण करते हु‌ए देवी को उक्त समस्त सामग्री अर्पित करें-
शर्कराखण्डखाद्यानि दधिक्षीरघृतानि च।

आहारं भक्ष्यभोज्यं च नैवेद्यं प्रतिगृहृाताम॥
ऐसा कहते हु‌ए जल अर्पित करें।
उत्तरापानार्थ हस्तप्रक्षालनाथ मुख्यप्रक्षलानार्थ च जलं समर्पयामि।
ऋतुफल और दक्षिणाअग्रलिखित मंत्र का उच्चारण करते हु‌ए देवी को ऋतुफल और दक्षिणा अर्पित करें:
इदं फलं मया देवि स्थापित पुरतस्तव:

तेन से सफलावप्तिर्भवेज्जनमनि जन्मनि॥

हिरणगर्भगर्भस्थं हेमबीजं विभावसों:

अनन्तपुण्यफलमतशांतिं प्रयच्छ मे॥

   महालक्ष्म्यै नम: ऋतु फलं दक्षिणाम  समर्पयामि:
 पुष्पाज्जलि और प्रदक्षिणा
निम्न मंत्र का उच्चारण करते हु‌ए आरतीपुष्पाज्जलि और प्रदक्षिणा करें:
कदलीगर्भसम्भूतं कर्पूरं त प्रदीपितम।

आरार्तिकमहं कुर्वे पश्य मे वरदो भव॥

नानासुगन्धिपुष्पाणि यथाकालोभ्दवानि च।

पुष्पाज्जलिर्मया दत्ता गृहाण परमेश्वरि॥

यानि काानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च।

तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिण पदे पदे।

 महालक्ष्म्यै नम: प्रार्थनापूर्वक नमस्कारान समर्पयामि॥

समर्पण
निम्नलिखित का उच्चारण करते हु‌ए महालक्ष्मी के समक्ष पूजन कर्म को समर्पित करें और इस निमित्त जल अर्पित करें-
कृतेनानने पूजनेन भगवती महालक्ष्मीदेवी प्रीयताम न मम॥
उक्त प्रक्रिया के पश्चात देवी के समक्ष दण्डवत प्रणाम करें तथा अनजाने में हु‌ई त्रुटियों के लि‌ए क्षमा मांगते हु‌एदेवी से सुख-सम़ृद्धि आरोग्य तथा वैभव की कामना करें।


दीपावली पूजन का शास्त्रोक्त विधान

नारद जी के अनुसार दीपावली के उत्सव को द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी, अमावस्या और प्रतिपदा – इन पांच दिनों तक मानना चाहिये ।इनमें भी प्रत्येक दिनअलग अलग प्रकार की पूजा का विधान है ।

गोवत्स द्वादशी - 
                        दीपावली के इस पञ्च दिवसीय उत्सव का शुभारम्भ कार्तिक के कृष्ण पक्ष की द्वादशी के साथ ही हो जाता है| कार्तिक मास की द्वादशी को गोवत्सद्वादशी कहते हैं । इस दिन दूध देने वाली गाय को उसके बछड़े सहित स्नान कराकरवस्त्र ओढाना चाहिये, गले में पुष्पमाला पहनाना , सींग मढ़ना, चन्दन का तिलक करना तथा ताम्बे के पात्र में सुगन्ध, अक्षत, पुष्प,तिल, और जल का मिश्रण बनाकर निम्न मंत्र से गौ के चरणों का प्रक्षालन करना चाहिये।
क्षीरोदार्णवसम्भूते सुरासुरनमस्कृते ।
सर्वदेवमये मातर्गृहाणार्घ्य नमो नमः ॥
(समुद्र मंथनके समय क्षीरसागर से उत्पन्न देवताओं तथा दानवों द्वारा नमस्कृत, सर्वदेवस्वरूपिणी माता तुम्हे बार बार नमस्कार है।)
पूजा के बाद गौ को उड़द के बड़े खिलाकर यह प्रार्थना करनी चाहिए-
“सुरभि त्वं जगन्मातर्देवी विष्णुपदे स्थिता ।
सर्वदेवमये ग्रासं मया दत्तमिमं ग्रस ॥
ततः सर्वमये देवि सर्वदेवलङ्कृते।
मातर्ममाभिलाषितं सफलं कुरू नन्दिनी ॥“

(हेजगदम्बे ! हे स्वर्गवसिनी देवी ! हे सर्वदेवमयि ! मेरे द्वारा अर्पित इस ग्रास का भक्षण करो ।हे समस्त देवताओं द्वारा अलंकृत माता ! नन्दिनी ! मेरा मनोरथ पुर्ण करो।) इसके बादरात्रि में इष्ट , ब्राम्हण , गौ तथा अपने घरके वृद्धजनों की आरती उतारनी चाहिए।
गाय के शरीर पर 33 कोटि देवताओं का वास है तथा गाय की पूजा करने पर सभी देवताओं की पूजा हो जाती है। कार्तिक मास में तो गाय की सबसे अधिक पूजा की जाती है। गाय की सेवा करने मात्र से ही अश्वमेध यज्ञ के समान फल की प्राप्ति हो जाती है। अग्नि पुराण के अनुसार गाय के पूजन से दरिद्रता मिटती है। जो मनुष्य किसी दूसरे की गाय को गो ग्रास देता है उसे परम पद मिलता है। जो नित्य गाय की सेवा करता है उसे ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। गाय का दूध, मूत्र और गोबर हमारे लिए एक बहुमूल्य उपहार हैं। जिसका गुणगान वेद और पुराणों में भी है तथा आधुनिक विज्ञान भी इसकी गुणवत्ता का लोहा मान रहा है। 
क्या न करें- गोवत्स द्वादशी को भोजन में गाय के दूध अथवा उससे तैयार किए गए किसी भी प्रकार के खाद्य पदार्थ जैसे दही, मक्खन, लस्सी अथवा घी आदि का प्रयोग नहीं करना चाहिए तथा न ही तेल में पके हुए भुजिया, नमकीन एवं पकौड़ी आदि पदार्थों का सेवन करना चाहिए। 


धनतेरस -  
 दूसरे दिन कार्तिककृष्ण त्रयोदशी के दिन को धनतेरस कहते हैं । भगवान धनवंतरी ने दुखी जनों के रोगनिवारणार्थ इसी दिन आयुर्वेद का प्राकट्य किया था ।
इस दिन घर के टूटे-फूटे पुराने बर्तनों के बदले नये बर्तन खरीदे जाते हैं। इस दिन चांदी के बर्तन खरीदना अत्यधिक शुभ माना जाता है। इन्हीं बर्तनों में भगवान गणेश और देवी लक्ष्मीजी की मूर्तियों को रखकर पूजा की जाती है। इस दिन लक्ष्मीजी की पूजा करते समय
 ''यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धन-धान्य अधिपतये |
धन-धान्य समृद्ध में देहि दापय स्वाहा || ''
का स्मरण करके फूल चढ़ाये। इसके पश्चात कपूर से आरती करें। इस समय देवी लक्ष्मीजी, भगवान गणेशजी और जगदीश भगवान की आरती करे। 
जिस प्रकार देवी लक्ष्मी सागर मंथन से उत्पन्न हुई थी उसी प्रकार भगवान धनवन्तरि भी अमृत कलश के साथ सागर मंथन से उत्पन्नहुए हैं। भगवान धनवंतरी नेदुखी जनों के रोग निवारणार्थ इसी दिन आयुर्वेद का प्राकट्य किया था । देवी लक्ष्मी हालांकि की धन देवी हैं परन्तु उनकीकृपा प्राप्त करने के लिए आपको स्वस्थ्य और लम्बी आयु भी चाहिए यही कारण हैदीपावली दो दिन पहले से ही यानी धनतेरस से ही दीपामालाएं सजने लगती हें।
कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन ही धन्वन्तरि का जन्म हुआ था इसलिए इस तिथि को धनतेरस के नाम से जाना जाता है। धन्वन्तरी जब प्रकट हुए थे तो उनके हाथो में अमृत से भरा कलश था। भगवानधन्वन्तरी चुकि कलश लेकर प्रकट हुए थे इसलिए ही इस अवसर पर बर्तन खरीदने कीपरम्परा है। इस दिन चांदी के बर्तन खरीदना अत्यधिक शुभ माना जाता है। इन्हीं बर्तनों में भगवान गणेश और देवी लक्ष्मीजी की मूर्तियों को रखकर पूजा की जाती है। इस दिन लक्ष्मीजी की पूजा करते समय
 ''यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धन-धान्य अधिपतये |
धन-धान्य समृद्ध में देहि दापय स्वाहा || ''
का स्मरण करके फूल चढ़ाये। इसके पश्चात कपूर से आरती करें। इस समय देवी लक्ष्मीजी, भगवान गणेशजी और जगदीश भगवान की आरती करे
कहींकहीं लोकमान्यता के अनुसार यह भी कहा जाता है कि इस दिन धन (वस्तु) खरीदने से उसमें 13 गुणावृद्धि होती है। इस अवसर पर धनिया के बीज खरीद कर भी लोग घर में रखते हैं। दीपावलीके बाद इन बीजों को लोग अपने बाग-बगीचोंमें या खेतों में बोते हैं।


यम दीपम --
इस दिन सन्ध्या के समय घर के बाहर हाथ में जलता हुआदीप लेकर भगवान यमराज की प्रसन्नता हेतु उन्हे इस मंत्र के साथ दीप दान करनाचाहिये-
मृत्युना पाशदण्डाभ्याम्  कालेन श्यामया सह ।
त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतां मम ॥
(Mrityunaa Paashah Hastena Kalena bhaaryaapaa Saha
Trayodasham Deepdaanam Suryajah Pritaamivee)

(त्रयोदशीके इस दीपदान के पाश और दण्डधारी मृत्यु तथा काल के अधिष्ठाता देव भगवान देव यम, देवी श्यामला सहित मुझ पर प्रसन्न हो।)


नरक चतुर्दशी /रूप चौदस -  
नरक चतुर्दशी को रूप चौदस भी कहा जाता है
दीपावली पर्व के ठीक एक दिन पहले मनाई जाने वाली नरक चतुर्दशी को छोटी दीवाली, रूप चौदस और काली चतुर्दशी भी कहा जाता है। मान्यता है कि कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी के विधि-विधान से पूजा करने वाले व्यक्ति को सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है। इसी दिन बजरंग बली हुनमान का जन्म दिवस भी माना गया है। 
नरक चतुर्दशी के दिन चतुर्मुखी दीप का दान करने से नरक भय से मुक्ति मिलती है । एक चार मुख ( चारलौ ) वाला दीप जलाकर इस मंत्र का उच्चारण करना चाहिये –
” दत्तो दीपश्वचतुर्देश्यां नरकप्रीतये मया ।
चतुर्वर्तिसमायुक्तः सर्वपापापनुत्तये  ॥“

(आज नरकचतुर्दशी के दिन नरक के अभिमानी देवता की प्रसन्नता के लिये तथा समस्त पापों केविनाश के लिये मै चार बत्तियों वाला चौमुखा दीप अर्पित करता हूँ।)
यद्यपि कार्तिक मास में तेल नहीं लगाना चाहिए, फिर भी नरक चतुर्दशी के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर तेल-मालिश (तैलाभ्यंग)करके स्नान करने का विधान है। 'सन्नतकुमार संहिता' एवं धर्मसिन्धु ग्रन्थ के अनुसार इससे नारकीय यातनाओं से रक्षाहोती है। जो इस दिन सूर्योदय के बाद स्नान करता है उसके शुभकर्मों का नाश हो जाताहै। 
#'नरक चौदस', #'रूप चौदस', #'रूप चतुर्दशी', #'नर्क चतुर्दशी' या #'नरका पूजा'
इस दिन सौंदर्य रूप श्रीकृष्ण की पूजा करनी चाहिए।  नरकासुर के मारे जाने की खुशी में लोगों ने दीवाली से एक दिन पहले ही घी के दीपक जलाकर छोटी दीवाली मनाई थी तब से आज तक रात को नरक चौदस छोटी दीवाली के रूप में मनाए जाने की परम्परा है। 
इसी दिन भगवान ने वामन अवतार लेकर राजा बलि से तीन पग भूमि मांगी थी तथा भगवान के वामन अवतार की भी पूजा की जाती है। 
नरक चौदस के दिन सायं 4 बत्ती वाला मिट्टी का दीपक पूर्व दिशा में अपना मुख करके घर के मुख्य द्वार पर रखें तथा 
‘दत्तो दीप: चतुर्दश्यो नरक प्रीतये मया। चतुर्वर्ति समायुक्त: सर्व पापा न्विमुक्तये।’ 

मंत्र का जाप करें और नए पीले रंग के वस्त्र पहन कर भगवान् का पूजन करें।


दीपावली - 
अगले दिन कार्तिक अमावस्या को दीपावली का त्यौहार मनाया जाता है । इस दिन प्रातः उठकर स्नानादि करके जप तप करने से अन्य दिनों की अपेक्षा विशेष लाभ होता है । इस दिन पहले से ही स्वच्छ किये गृह को सजाना चाहिये । भगवान नारायण सहित भगवान लक्ष्मी जी की मुर्ती अथवा चित्र की स्थापना करनी चाहिये तत्पश्चात धूप दीप व स्वस्तिवाचन आदि वैदिक मंत्रो के साथ या आरती के साथ पुजाअर्चना करनी चाहिये । इस रात्रि को लक्ष्मी भक्तों के घर पधारती है ।

दीपावली पूजन  मूहूर्त
दीपावली के दिन मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा स्थिर लग्न में करना बेहद शुभ माना गया है. दीपावली के दिन 30 अक्टूबर 2016, रविवार लक्ष्‍मी पूजन के लिए चार अलग-अलग मुहूर्त हैं |
वृश्चिक लग्न – 8:00 से 10:10
मकर लग्न – 14:05 से 15:30
वृष लग्न ---18:25 से 20:25
सिंह लग्न ---12:56 ( मध्य रात्रि ) से  3:26

वृष लग्न- इस स्थिर लग्न में सभी प्रकार के गृहस्थ, मध्यम वर्ग, निम्न वर्ग, ग्रामीण जन, कृषक, नौकरीपेशा और सभी प्रकार के व्यापारियों को वृष लग्न में पूजन करने से अद्भुत लाभ की प्राप्ति होती है |
सिंह लग्न- सिंह लग्न का मूलतः तांत्रिक साधना में विशेष महत्व है | इस लग्न में साधु सन्त, संन्यासी और तांत्रिक जन अपनी साधना को सफल करने के लिए मां लक्ष्मी का पूजन करते हैं | इस काल में श्री यन्त्र और गणेश-लक्ष्मी यन्त्र को बनाने का विधान है |

वृश्चिक लग्न- इस लग्न में पूजन करने से सद्बुद्धि, विकास, समृद्धि और धन की स्थिरता बनी रहती है | मंदिरों, अस्पताल, होटल व्यवसाय, स्कूल आदि में इसी लग्न में पूजन करना शुभ व लाभकारी रहता है | पब्लिक सेक्टर से जुड़े लोगों को इसी लग्न में पूजन करनी चाहिए. जैसे-राजनीति से जुड़े लोग, कलाकार, टीवी कलाकार, ऐंकर, बीमा ऐजेन्ट आदि |

मकर लग्न- इस लग्न में श्री लक्ष्मी पूजन उन लोगों को करना चाहिए जैसे - रोगी, असहाय कर्जदार, या शनि ग्रह से पीड़ित लोगों को इस लग्न में पूजन करने से सर्वबाधा से मुक्ति मिलकर धन और समृद्धि की प्राप्ति होती है. जो लोग व्यवसाय में लगातार घाटा उठा रहे हैं और कर्ज से परेशान हैं, ऐसे लोगों को कुम्भ लग्न में पूजन करने से घाटे और कर्ज से मुक्ति मिलती है|

महालक्ष्मी पूजन करने के लिए ऋग्वेद के श्रीसूक्त में विधान किया गया है | निम्न मन्त्रों से माता लक्ष्मी का जप करें 

 1. लक्ष्मी बीज मन्त्र
ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीभयो नमः॥

2. महालक्ष्मी मन्त्र
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्मयै नम:॥

3. लक्ष्मी गायत्री मन्त्र
ॐ श्री महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णु पत्न्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ॐ॥ 

दीपावली को 11 प्रकार से अष्टसिद्धियों की पूजा होती है. महालक्ष्मी को कमलगट्टा, धूप, दीप, नैवेद्य, ऋतुफल, खील-बताशे, पकवान, सुपारी, पान के पत्ते अर्पित किये जाते हैं| साथ ही पानी वाला नारियल चढ़ाया जाता है | दीपावाली पर श्रीसूक्त एवं कनकधारा स्तोत्र का पाठ करना चाहिए।





अन्नकूट दिवस / गोवर्धन-पूजा - 
पांचवे दिन कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को अन्नकूट दिवस कह्ते है । धर्मसिन्धु आदि शास्त्रों के अनुसार गोवर्धन-पूजा के दिनगायों कोसजाकर, उनकी पूजा करके उन्हें भोज्य पदार्थ आदिअर्पित करने का विधान है। इस दिन गौओ को सजाकर उनकी पूजा करके यह मंत्रकरना चाहिये,
गौ-पूजन का मंत्र –
लक्ष्मीर्या लोकपालानां धेनुरूपेण संस्थिता ।
घृतं वहति यज्ञार्थ मम पापं त्यपोहतु ॥
(धेनुरूप में स्थित जो लोकपालों की साक्षात लक्ष्मी है तथा जो यज्ञ के लिए घी देती है , वह गौ माता मेरे पापों का नाश करे । रात्री को गरीबों को यथा सम्भव अन्नदान करना चाहिये । इस प्रकार पांच दिनों का यह दीपोत्सव सम्पन्न होता है ।

भाई दूज -- यम द्वितीया --
कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाए जानेवाला हिन्दू धर्म का पर्व है जिसे यम द्वितीया भी कहते हैं। भाईदूज में हर बहनरोली एवं अक्षत से अपने भाई का तिलक कर उसके उज्ज्वल भविष्य के लिए आशीष देती हैं।भाई अपनी बहन को कुछ उपहार या दक्षिणा देता है।
"गंगा पूजे यमुना को यमी पूजे यमराज को,
सुभद्रा पूजा कृष्ण को, गंगा यमुना नीर बहे
मेरे भाई की आयु बढ़े"
इस त्योहार के पीछे एक किंवदंती यह है कि यम देवता ने अपनी बहन यमी (यमुना) को इसी दिन दर्शन दिया था, जो बहुत समय से उससे मिलने के लिए व्याकुल थी। अपने घर में भाई यम के आगमन पर यमुना ने प्रफुल्लित मन से उसकी आवभगत की।यम ने प्रसन्न होकर उसे वरदान दिया कि इस दिन यदि भाई-बहन दोनों एक साथ यमुना नदी में स्नान करेंगे तो उनकी मुक्ति हो जाएगी।


Comments

Popular posts from this blog

श्री गंगा स्तोत्र

100.2. एकादशी व्रत कथा - एकादशी महात्म्य

शनि जयंती पर विशेष