नवरात्रि के नौ दिन देवी पूजा उपासना
नवरात्रि के नौ दिन देवी पूजा उपासना

नवरात्रि का ज्योतिषीय, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक रहस्य
काल (समय) चक्र के विभाग अनुसार पूरे एक दिन-रात में चार संधिकाल होते हैं | जिनको हम प्रात:काल, मध्यान्ह काल, सांयकाल और मध्यरात्रि काल कहते हैं | मानव का एक वर्ष का समय देवों के लिए एक दिन और रात के समान होता है जिसे ज्योतिष शास्त्र में दिव्यकालीन अहोरात्र
कहा गया है| ये दिन-रात छ:-छ: माह के होते हैं, इन्ही को हम उतरायण और दक्षिणायन के नाम से जानते हैंयहाँ ‘अयन’ का अर्थ है—मार्ग
उतरायण=सूर्य देव का मकर क्रांतिवृत्त से उत्तर की और चलना जिसे देवों का दिन
दक्षिणायन=सूर्य देव का कर्क क्रांतिवृत्त से दक्षिण की और चलना, जिसे देवों की रात्रि कहा जाता है|
जिस प्रकार मकर और कर्क वृ्त से अयन(मार्ग) परिवर्तन होता है, उसी प्रकार मेष और तुला राशियों से उत्तर गोल तथा दक्षिण गोल का परिवर्तन होता है |
एक वर्ष में दो अयन परिवर्तन की संधि और दो गोल परिवर्तन की संधियाँ होती है, कुल मिलाकर एक वर्ष में चार संधियाँ होती हैं, इनको ही नवरात्री के पर्व के रूप में मनाया जाता है|
1. प्रात:काल (गोल संधि) चैत्री नवरात्र
2. मध्यान्ह काल (अयन संधि) आषाढी नवरात्र
3. सांयकाल (गोल संधि) आश्विन नवरात्र
4. मध्यरात्रि (अयन संधि) पौषी नवरात्र
उपरोक्त इन चार नवरात्रियों में गोल संधि की नवरात्रियाँ चैत्र और आश्विन मास की हैं, जो कि दिव्य अहोरात्र के प्रात:काल और सांयकाल की संधि में आती हैं—-इन्हे ही विशेष रूप से मनाया जाता है |
हालाँकि बहुत से लोग हैं, जिनके द्वारा अयन संधिगत (आषाढ और पौष) मास की नवारत्रियाँ भी मनाई जाती हैं, लेकिन यह समय विशेषतय: तान्त्रिक कार्यों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है—गृ्हस्थों के लिए गोल संधिगत नवरात्रियों का कोई विशेष महत्व नहीं है|
क्रमश: चित्रा, पूर्वाषाढा, अश्विनी और पुष्य नक्षत्रों पर आधारित चान्द्रमासों में नवरात्रि पर्व का विधान है | वैदिक ज्योतिष में नाक्षत्रीय गुणधर्म के प्रतीक प्रत्येक नक्षत्र का एक देवता कल्पित किया हुआ है | इस कल्पना के गर्भ में भी विशेष महत्व समाया हुआ है, जो कि विचार करने योग्य है|
भारतीय ज्योतिष शास्त्र कालचक्र की संधियों की अभिव्यक्ति करने में समर्थ है | प्राचीन युगदृ्ष्टा ऋषि-मुनियों नें विभिन्न तौर-तरीकों से अभिनव रूपकों में प्रकृ्ति के सूक्ष्म तत्वों को समझाने के तथा उनसे समाज को लाभान्वित करने के अपनी ओर से विशेष प्रयास किए हैं|
संधिकाल में सौरमंडल के समस्त ग्रह पिण्डों की रश्मियों का प्रत्यावर्तन तथा संक्रमण पृ्थ्वी के समस्त प्राणियों को प्रभावित करता है | अत: संधिकाल में दिव्यशक्ति की आराधना, संध्या उपासना आदि करने का ये विधान बनाया गया है|
अयन, गोल तथा ऋतुओं के परिवर्तन मानव मस्तिष्क को आंदोलित करते हैं |मानव मस्तिष्क, जो कि अनन्त शक्ति स्त्रोतों का अक्षय भंडार है | उसमें जहाँ संसार के निर्माण करने की स्थिति है, वहीं संहार करने की शक्ति भी केन्द्रित है|
यही कारण है कि त्रिगुणात्मक महाकाली, महासरस्वती और महादुर्गा हमारी आराध्य रही हैं |
यह पर्व रात्रि प्रधान इसलिए है कि शास्त्रों में “रात्रि रूपा यतोदेवी दिवा रूपो महेश्वर:” अर्थात दिन को शिव(पुरूष) रूप में तथा रात्रि को शक्ति(प्रकृ्ति) रूपा माना गया है | एक ही तत्व के दो स्वरूप हैं, फिर भी शिव(पुरूष) का अस्तित्व उसकी शक्ति(प्रकृ्ति) पर ही आधारित है|
इस बात को समझने की जरूरत है कि अखिल पिण्ड ब्राह्मंड के समस्त संकेत के पारखी ऋषि-मुनियों नें नैसर्गिक सुअवसरों को परख कर हमें विशेष रूप से संस्कारित बनाने का प्रयास किया है|
त्रिविध ताप नाश की इस पुनीत पर्व की गरिमा को समझते हुए हमें दिव्यशक्ति की आराधना, उपासना करते हुए पूर्ण मर्यादासहित(मन को विषय भोगों से दूर रख) नवरात्रि पूजन करना आवश्यक है | यह समय किसी धर्म, जाति या सम्प्रदाय विशेष से सम्बन्धित न होकर मानव मात्र के लिए कल्याणप्रद है|
नवरात्रि के नौ दिन देवी पूजा उपासना
नवरात्रि के पहले दिन को मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार देवी का यह नाम हिमालय के यहां जन्म होने से पड़ा। हिमालय हमारी शक्ति, दृढ़ता, आधार व स्थिरता का प्रतीक है। मां शैलपुत्री को अखंड सौभाग्य का प्रतीक भी माना जाता है। नवरात्रि के प्रथम दिन योगीजन अपनी शक्ति मूलाधार में स्थित करते हैं व योग साधना करते हैं। हमारे जीवन प्रबंधन में दृढ़ता, स्थिरता व आधार का महत्व सर्वप्रथम है। अत: इस दिन हमें अपने स्थायित्व व शक्तिमान होने के लिए माता शैलपुत्री से प्रार्थना करनी चाहिए। शैलपुत्री का आराधना करने से जीवन में स्थिरता आती है। हिमालय की पुत्री होने से यह देवी प्रकृति स्वरूपा भी है। स्त्रियों के लिए उनकी पूजा करना ही श्रेष्ठ और मंगलकारी है।
वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥
अर्थात्
मैं मनोवाञ्छित लाभ के लिए मस्तक पर अर्धचन्द्र धारण करने वाली, वृष पर आरूढ़ होने वाली, शूलधारिणी, यशस्विनी शैलपुत्री दुर्गा की वन्दना करता हूँ।
नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा होती है। देवी ब्रह्मचारिणी ब्रह्म शक्ति यानि तप की शक्ति का प्रतीक हैं। इनकी आराधना से भक्त की तप करने की शक्ति बढ़ती है। साथ ही सभी मनोवांछित कार्य पूर्ण होते हैं। ब्रह्मचारिणी हमें यह संदेश देती हैं कि जीवन में बिना तपस्या अर्थात कठोर परिश्रम के सफलता प्राप्त करना असंभव है। बिना श्रम के सफलता प्राप्त करना ईश्वर के प्रबंधन के विपरीत है। अत: ब्रह्मशक्ति अर्थात समझने व तप करने की शक्ति हेतु इस दिन शक्ति का स्मरण करें। योगशास्त्र में यह शक्ति स्वाधिष्ठान में स्थित होती है। अत: समस्त ध्यान स्वाधिष्ठान में करने से यह शक्ति बलवान होती है एवं सर्वत्र सिद्धि व विजय प्राप्त होती है।
नवरात्रि के द्वितीय दिन ब्रह्मचारिणी जी की आराधना शुभप्रद है, इनका ध्यान इस तरह करें-
दधाना कर पद्माभ्यामक्षमाला कमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥
अर्थात् जो दोनों करकमलों में अक्षमाला व कमण्डलु धारण करती हैं, वे सर्वश्रेष्ठा ब्रह्मचारिणी दुर्गा देवी मुझ पर प्रसन्न हों।
नवरात्रि का तीसरा दिन माता चंद्रघंटा को समर्पित है। यह शक्ति माता का शिवदूती स्वरूप है। इनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है, इसी कारण इन्हें चंद्रघंटा देवी कहा जाता है। असुरों के साथ युद्ध में देवी चंद्रघंटा ने घंटे की टंकार से असुरों का नाश कर दिया था। नवरात्रि के तृतीय दिन इनका पूजन किया जाता है। इनके पूजन से साधक को मणिपुर चक्र के जाग्रत होने वाली सिद्धियां स्वत: प्राप्त हो जाती हैं तथा सांसारिक कष्टों से मुक्ति मिलती है।
नवरात्रि के तृतीय दिन चंद्रघण्टा जी की पूजा करना उत्तम है इनका ध्यान इस प्रकार है-
पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुतां मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥
अर्थात्
जो पक्षिप्रवर गरुड़ पर आरूढ़ होती हैं, उग्र कोप और रौद्रता से युक्त रहती हैं तथा चंद्रघण्टा नाम से विख्यात हैं,वे दुर्गा देवी मेरे लिए कृपा का विस्तार करें।
नवरात्रि के चौथे दिन की प्रमुख देवी मां कुष्मांडा हैं। देवी कुष्मांडा रोगों को तुरंत की नष्ट करने वाली हैं। इनकी भक्ति करने वाले श्रद्धालु को धन-धान्य और संपदा के साथ-साथ अच्छा स्वास्थ्य भी प्राप्त होता है। मां दुर्गा के इस चतुर्थ रूप कुष्मांडा ने अपने उदर से अंड अर्थात ब्रह्मांड को उत्पन्न किया। इसी वजह से दुर्गा के इस स्वरूप का नाम कुष्मांडा पड़ा। नवरात्रि के चतुर्थ दिन इनकी पूजा और आराधना की जाती है। मां कुष्मांडा के पूजन से हमारे शरीर का अनाहत चक्रजागृत होता है। इनकी उपासना से हमारे समस्त रोग व शोक दूर हो जाते हैं। साथ ही भक्तों को आयु, यश, बल और आरोग्य के साथ-साथ सभी भौतिक और आध्यात्मिक सुख भी प्राप्त होते हैं।
नवरात्रि के चौथे दिन कूष्माण्डा देवी की आराधना शुभप्रद है इनका ध्यान इस तरह करें-
सुरासम्पूर्णकलशं रूधिराप्लुतमेव च।
दधानाहस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥
अर्थात्
रुधिर से परिप्लुत व सुरा से परिपूर्ण कलश को दोनों करकमलों में धारण करने वाली कूष्मांडा दुर्गा मेरे लिए शुभदायिनी हों।
नवरात्रि के पांचवें दिन स्कंदमाता की पूजा की जाती है। स्कंदमाता भक्तों को सुख-शांति प्रदान वाली हैं। देवासुर संग्राम के सेनापति भगवान स्कन्द की माता होने के कारण मां दुर्गा के पांचवे स्वरूप को स्कन्दमाता के नाम से जानते हैं। पांचवे दिन इस शक्ति की उपासना होती है। स्कंद माता हमें सीखाती है कि जीवन स्वयं ही अच्छे-बुरे के बीच एक देवासुर संग्राम है व हम स्वयं अपने सेनापति हैं। हमें सैन्य संचालन की शक्ति मिलती रहे, इसलिए मां स्कन्दमाता की पूजा-आराधना करनी चाहिए। इस दिन साधक का मन विशुद्ध चक्र में अवस्थित होना चाहिए जिससे कि ध्यान वृत्ति एकाग्र हो सके। यह शक्ति परम शांति व सुख का अनुभव कराती है।
नवरात्रि के पंचम दिन स्कंदमाता जी की आराधना करें, जिनका ध्यान ऐसे करें-
सिंहासनगता नित्यं पद्माञ्चितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्द माता यशस्विनी॥
अर्थात्
जो नित्य सिंहासन पर विराजमान रहती हैं तथा जिनके दोनों हाथ कमलों से सुशोभित होते हैं, वे यशस्विनी दुर्गा देवी स्कन्दमाता सदा कल्याण दायिनी हों।
नवरात्रि के छठे दिन आदिशक्ति श्री दुर्गा का छठे रूप कात्यायनी की पूजा-अर्चना का विधान है। महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रसन्न होकर आदिशक्ति ने उनके यहां पुत्री के रूप में जन्म लिया था। इसलिए वे कात्यायनी कहलाती हैं। नवरात्रि के षष्ठम दिन इनकी पूजा और आराधना होती है। माता कात्यायनी की उपासना से आज्ञा चक्र जाग्रति की सिद्धियां साधक को स्वयंमेव प्राप्त हो जाती है। वह इस लोक में स्थित रहकर भी अलौलिक तेज और प्रभाव से युक्त हो जाता है तथा उसके रोग, शोक, संताप, भय आदि सर्वथा विनष्ट हो जाते हैं।
नवरात्रि के अंतर्गत षष्ठी तिथि को कात्यायनी जी की पूजा उत्तम है इनका ध्यान इस प्रकार है-
चन्द्रहासोज्जवलकरा शार्दूलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्याद्देवीदानव घातिनी॥
अर्थात्
जिनका हाथ उज्जवल चन्द्रहास नामक तलवार से सुशोभित होता है तथा सिंहप्रवर जिनका वाहन है, वे दानव संहारिणी कात्यायनी दुर्गादेवी मङ्गल प्रदान करें।
महाशक्ति मां दुर्गा का सातवां स्वरूप है कालरात्रि। मां कालरात्रि काल का नाश करने वाली हैं, इसी वजह से इन्हें कालरात्रि कहा जाता है। नवरात्रि के सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा की जाती है। मां कालरात्रि की आराधना के समय भक्त को अपने मन को भानु चक्र जो ललाट अर्थात सिर के मध्य स्थित करना चाहिए। इस आराधना के फलस्वरूप भानुचक्र की शक्तियां जागृत होती हैं। मां कालरात्रि की भक्ति से हमारे मन का हर प्रकार का भय नष्ट होता है। जीवन की हर समस्या को पलभर में हल करने की शक्ति प्राप्त होती है। शत्रुओं का नाश करने वाली मां कालरात्रि अपने भक्तों को हर परिस्थिति में विजय दिलाती है।
नवरात्रि के सप्तम दिन कालरात्रि जी की आराधना उत्तम है जिनका ध्यान ऐसे करें-
करालरूपा कालाब्जसमानाकृतिविग्रहा।
कालरात्रिः शुभं दद्याद् देवी चण्डाट्टहासिनी॥
अर्थात्
जिनका रूप विकराल है, जिनकी आकृति और विग्रह कृष्ण कमल-सदृश है तथा जो भयानक अट्टहास करने वाली हैं, वे कालरात्रि देवी दुर्गा मङ्गल प्रदान करें।
नवरात्रि के आठवें दिन मां महागौरी कीपूजा की जाती है। आदिशक्ति श्री दुर्गा का अष्टम रूप श्री महागौरी हैं। मां महागौरी का रंग अत्यंत गौरा है इसलिए इन्हें महागौरी के नाम से जाना जाता है। नवरात्रि का आठवां दिन हमारे शरीर का सोमचक्रजागृत करने का दिन है। सोमचक्र उध्र्व ललाट में स्थित होता है। आठवें दिन साधना करते हुए अपना ध्यान इसी चक्रपर लगाना चाहिए। श्री महागौरी की आराधना से सोमचक्र जागृत हो जाता है और इस चक्र से संबंधित सभी शक्तियां श्रद्धालु को प्राप्त हो जाती है। मां महागौरी के प्रसन्न होने पर भक्तों को सभी सुख स्वत: ही प्राप्त हो जाते हैं। साथ ही इनकी भक्ति से हमें मन की शांति भी मिलती है।
नवरात्रि के आठवें दिन महागौरी जी की आराधना शुभप्रद है इनका ध्यान इस तरह करें-
श्वेतवृषेसमारूढ़ा श्वेताम्बरधरा शुचि:।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा॥
अर्थात्
जो श्वेत वृष पर आरूढ़ होती हैं, श्वेत वस्त्र धारण करती हैं, सदा पवित्र रहती हैं तथा महादेव जी को आनन्द प्रदान करती हैं, वे महागौरी दुर्गा मङ्गल प्रदान करें।
नवरात्रि का समापन : नवरात्रि के अंतिम दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। मां सिद्धिदात्री भक्तों को हर प्रकार की सिद्धि प्रदान करती हैं। अंतिम दिन भक्तों को पूजा के समय अपना सारा ध्यान निर्वाण चक्र जो कि हमारे कपाल के मध्य स्थित होता है, वहां लगाना चाहिए। ऐसा करने पर देवी की कृपा से इस चक्र से संबंधित शक्तियां स्वत: ही भक्त को प्राप्त हो जाती हैं। सिद्धिदात्री के आशीर्वाद के बाद श्रद्धालु के लिए कोई कार्य असंभव नहीं रह जाता और उसे सभी सुख-समृद्धि प्राप्त हो जाते हैं।
नवरात्रि के अंतिम दिन नवमी तिथि को सिद्धिदात्री जी की पूजा उत्तम है इनका ध्यान इस प्रकार है-
सिद्धगंधर्व यक्षाद्यैर सुरैरमरै रपि।
सेव्यमाना सदाभूयात्सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥
अर्थात्
सिद्धों, गन्धर्वों, यक्षों, असुरों और देवों द्वारा भी सदा सेवित होने वाली सिद्धिदायिनी सिद्धिदात्री दुर्गा सिद्धि प्रदान करने वाली हों।
माघ मास की गुप्त नवरात्रि
माघ मास की गुप्त नवरात्रि (इस बार 21 जनवरी,2015 बुधवार से 28 जनवरी, 2015 बुधवार तक )
माघ मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमीपर्यंत नवरात्रि के 9 दिनों तक साधक गुप्त साधना करते हैं | गुप्त नवरात्रि विशेष तौर पर गुप्त सिद्धियां पाने का समय है। साधक इन गुप्त नवरात्रि में विशेष साधना करते हैं तथा चमत्कारिक शक्तियां प्राप्त करते हैं जानकार साधकजन तांत्रिक क्रियाएँ, शाक्त साधनाएँ, शैव साधनाएँ, योगिनी, भैरवी, महाकाल और पंचमकार आदि से जुड़ी तंत्र साधनाएं सम्पन्न करते हैं व सफल होने पर गुप्त एवं दुर्लभ सिद्धियाँ पाते हैं।

नवरात्र में भगवती का आगमन व गमन चार सवारियों पर होता है. इसमें हाथी, घोड़ा, पालकी व नाव की सवारी शामिल हैं |
नवरात्र के नौ दिन ब्रह्माण्ड की आदि – त्रिगुणात्मकता के उत्सव का अवसर है। हमारा जीवन तीन गुणों से संचालित होता है, नवरात्र के पहले तीन दिन तमो गुण के हैं, अगले तीन दिन रजो गुण के हैं तथा अंतिम तीन दिन सतोगुण के हैं। हमारी चेतना तमो गुण और रजो गुण से पार आकर अंतिम तीन दिनों में सतोगुण मे पुष्पित होती है। जब भी सतोगुण जीवन को शासित करता है, विजय अनुगमन करती है।
राहू काल का समय दोपहर 1:44 से 3:13 बजे तक रहेगा
अभिजीत मुहूर्त 11:50 से 12:38 बजे तक
इस बार मां दुर्गा का आगमन गुरुवार को पालकी पर सवार होगा,
एवं शुक्रवार को विसर्जन होने से हाथी पर बैठकर जायेगी |
मां दुर्गा यदि डोले पर आती है तो उस वर्ष में अनेक कारणों से बहुत लोगों की मृत्यु होती है।
और वर्तमान समय में सूर्य ( आत्मा करक ) ,चन्द्र ( मन ) एवं शुक्र (भौतिक सुखों का कारक ) तीनो ग्रह राहु, केतु से पीड़ित हैं | शुक्र इस समय अपनी नीच राशि कन्या में हैं यह अच्छे संकेत नहीं हैं !!!!!!
देवीपुराण में नवरात्रि में भगवती के आगमन व प्रस्थान के लिए वार अनुसार वाहन बताये गए हैं | ऐसी मान्यता है कि मां के आने-जाने के इन साधनों से मौसम का निर्धारण और ज्योतिष गणना की जाती है। मां दुर्गा यदि डोले पर आती है तो उस वर्ष में अनेक कारणों से बहुत लोगों की मृत्यु होती है।
नवरात्र में अलग-अलग दिनों में मां का अलग-अलग रंगों के वस्त्रों से श्रृंगार करने से मां भगवती प्रसन्न होती हैं।
माघ मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमीपर्यंत नवरात्रि के 9 दिनों तक साधक गुप्त साधना करते हैं | गुप्त नवरात्रि विशेष तौर पर गुप्त सिद्धियां पाने का समय है। साधक इन गुप्त नवरात्रि में विशेष साधना करते हैं तथा चमत्कारिक शक्तियां प्राप्त करते हैं जानकार साधकजन तांत्रिक क्रियाएँ, शाक्त साधनाएँ, शैव साधनाएँ, योगिनी, भैरवी, महाकाल और पंचमकार आदि से जुड़ी तंत्र साधनाएं सम्पन्न करते हैं व सफल होने पर गुप्त एवं दुर्लभ सिद्धियाँ पाते हैं।
आषाढ़ मास की गुप्त नवरात्रि में जहां वामाचार उपासना की जाती है, वहीं माघ मास की गुप्त नवरात्रि में वामाचार पद्धति को अधिक मान्यता नहीं दी गई है। ग्रंथों के अनुसार माघ मास के शुक्ल पक्ष का विशेष महत्व है।
शुक्ल पक्ष की पंचमी को ही देवी सरस्वती प्रकट हुई थीं। इन्हीं कारणों से माघ मास की नवरात्रि में सनातन, वैदिक रीति के अनुसार देवी साधना करने का विधान निश्चित किया गया है।माघी नवरात्र में पंचमी तिथि सर्वप्रमुख मानी जाती है। इसे 'श्रीपंचमी', 'वसंत पंचमी' और 'सरस्वती महोत्सव' के नाम से कहा जाता है। प्राचीन काल से आज तक इस दिन माता सरस्वती का पूजन-अर्चन किया जाता है। यह त्रिशक्ति में एक माता शारदा के आराधना के लिए विशिष्ट दिवस के रूप में शास्त्रों में वर्णित है। कई प्रामाणिक विद्वानों का यह भी मानना है कि जो छात्र पढ़ने में कमज़ोर हों या जिनकी पढ़ने में रूचि नहीं हो, ऐसे विद्यार्थियों को अनिवार्य रूप से माँ सरस्वती का पूजन करना चाहिए। देववाणी संस्कृत भाषा में निबद्ध शास्त्रीय ग्रंथों का दान संकल्प पूर्वक विद्वान ब्राह्मणों को देना चाहिए।नवरात्र में देवी साधक और भक्त 'ऊं ऐं हीं क्लीं चामुण्डाये विच्चे नम:' मंत्र जाप करें।
मां काली के उपासक 'ऊं ऐं महाकालाये नम:' मंत्र का जाप करें।
व्यापारी लोग 'ऊं हीं महालक्ष्मये नम:' मंत्र का जाप करें।
विद्यार्थी 'ऊं क्लीं महासरस्वतये नम:' मंत्र जपें।
प्रतिपदा यानी गुप्त नवरात्रि के पहले दिन (21 जनवरी, बुधवार) माता को घी का भोग लगाएं तथा उसका दान करें। इससे रोगी को कष्टों से मुक्ति मिलती है तथा वह निरोगी होता है।
द्वितीया तिथि (22 जनवरी, गुरुवार) को माता को शक्कर का भोग लगाएं तथा उसका दान करें। इससे साधक को दीर्घायु प्राप्त होती है।
तृतीया तिथि (23 जनवरी, शुक्रवार) को माता को दूध चढ़ाएं तथा इसका दान करें। ऐसा करने से सभी प्रकार के दु:खों से मुक्ति मिलती है।
चतुर्थी तिथि (24 जनवरी, शनिवार) को मालपूआ चढ़ाकर दान करें। इससे सभी प्रकार की समस्याएं स्वत: ही समाप्त हो जाती है।
- इस बार पंचमी तथा षष्ठी तिथि एक ही दिन (25 जनवरी, रविवार) है। इसलिए इस दिन माता दुर्गा को सयुंक्त रूप से केले तथा शहद का भोग लगाएं। केले का भोग लगाने से परिवार में सुख-शांति रहती हैं, वहीं शहद चढ़ाने से धन संबंधी समस्याओं का निराकरण होता है। भोग लगाने के बाद इन दोनों वस्तुओं को गरीबों में बांट दें।
सप्तमी तिथि (26 जनवरी, सोमवार) को माता को गुड़ की वस्तुओं का भोग लगाएं तथा दान भी करें। इससे दरिद्रता का नाश होता है।
अष्टमी तिथि (27 जनवरी, मंगलवार) को नारियल का भोग लगाएं तथा नारियल का दान भी करें। इससे सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
नवमी तिथि (28 जनवरी, बुधवार) को माता को विभिन्न प्रकार के अनाजों का भोग लगाएं व यथाशक्ति गरीबों में दान करें। इससे लोक-परलोक में आनंद व वैभव मिलता है।
देवी भागवत (स्कंध 11, अध्याय 12) में लिखा है कि विभिन्न प्रकार के रसों से देवी दुर्गा का अभिषेक किया जाए तो माता अति प्रसन्न होती हैं और भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करती हैं।
1- देवी भागवत के अनुसार वेद पाठ के साथ यदि कर्पूर, अगरु (सुगंधित वनस्पति), केसर, कस्तूरी व कमल के जल से देवी दुर्गा को स्नान करवाया जाए तो सभी प्रकार के पापों का नाश हो जाता है तथा साधक को थोड़े प्रयासों से ही सफलता मिलती है। ये उपाय बहुत ही चमत्कारी है।
2- देवी भागवत के अनुसार यदि माता दुर्गा को दूध से स्नान करवाया जाए तो व्यक्ति सभी प्रकार की सुख-समृद्धि का स्वामी बनता है।
3- द्राक्षा (दाख) के रस से यदि माता जगदंबिका को स्नान करवाया जाए तो भक्तों पर देवी की कृपा बनी रहती है।
4- माता जगदंबिका को आम अथवा गन्ने ढके रस से स्नान करवाया जाए तो लक्ष्मी और सरस्वती ऐसे भक्त का घर छोड़कर कभी नहीं जातीं। वहां नित्य ही संपत्ति और विद्या का वास रहता है।
नवरात्र में भगवती का आगमन व गमन

नवरात्र में भगवती का आगमन व गमन चार सवारियों पर होता है. इसमें हाथी, घोड़ा, पालकी व नाव की सवारी शामिल हैं |
भगवती के आगमन व गमन का फल
नवरात्र के प्रथम दिन भगवती का आगमन और दशमी को गमन दिनों के अनुसार वर्ष का शुभ और अशुभ का ज्ञान करते हैं यथा-
भगवती का आगमन दिन :
गुरौशुक्रेच दोलायां बुधे नौकाप्रकीर्तिता॥ ( देवीपुराण)
रविवार और सोमवार को भगवती हाथी पर आती हैं,
शनि और मंगल वार को घोड़े पर,
बृहस्पति और शुक्रवार को डोला पर,
बुधवार को नाव पर आती हैं।
गजेश जलदा देवी क्षत्रभंग तुरंगमे।
नौकायां कार्यसिद्धिस्यात् दोलायों मरणधु्रवम्॥
अर्थात् दुर्गा हाथी पर आने से अच्छी वर्षा होती है,
घोड़े पर आने से राजाओं में युद्ध होता है।
नाव पर आने से सब कार्यों में सिद्ध मिलती है और
यदि डोले पर आती है तो उस वर्ष में अनेक कारणों से बहुत लोगों की मृत्यु होती है।
घोड़े पर आने से राजाओं में युद्ध होता है।
नाव पर आने से सब कार्यों में सिद्ध मिलती है और
यदि डोले पर आती है तो उस वर्ष में अनेक कारणों से बहुत लोगों की मृत्यु होती है।
गमन (जाने)विचार:-
शशि सूर्य दिने यदि सा विजया महिषागमने रुज शोककरा,
शनि भौमदिने यदि सा विजया चरणायुध यानि करी विकला।
बुधशुक्र दिने यदि सा विजया गजवाहन गा शुभ वृष्टिकरा,
सुरराजगुरौ यदि सा विजया नरवाहन गा शुभ सौख्य करा॥
भगवती रविवार और सोमवार को महिषा (भैंसा)की सवारी से जाती है जिससे देश में रोग और शोक की वृद्धि होती है।
शनि और मंगल को पैदल जाती हैं जिससे विकलता की वृद्धि होती है।
बुध और शुक्र दिन में भगवती हाथी पर जाती हैं। इससे वृष्टि वृद्धि होती है।
बृहस्पति वार को भगवती मनुष्य की सवारी से जाती हैं। जो सुख और सौख्य की वृद्धि करती है।
इस प्रकार भगवती का आना जाना शुभ और अशुभ फल सूचक हैं।
इस फल का प्रभाव यजमान पर ही नहीं, पूरे राष्ट्र पर पड़ता हैं।
शनि और मंगल को पैदल जाती हैं जिससे विकलता की वृद्धि होती है।
बुध और शुक्र दिन में भगवती हाथी पर जाती हैं। इससे वृष्टि वृद्धि होती है।
बृहस्पति वार को भगवती मनुष्य की सवारी से जाती हैं। जो सुख और सौख्य की वृद्धि करती है।
इस प्रकार भगवती का आना जाना शुभ और अशुभ फल सूचक हैं।
इस फल का प्रभाव यजमान पर ही नहीं, पूरे राष्ट्र पर पड़ता हैं।
नवरात्र
नवरात्र के नौ दिन ब्रह्माण्ड की आदि – त्रिगुणात्मकता के उत्सव का अवसर है। हमारा जीवन तीन गुणों से संचालित होता है, नवरात्र के पहले तीन दिन तमो गुण के हैं, अगले तीन दिन रजो गुण के हैं तथा अंतिम तीन दिन सतोगुण के हैं। हमारी चेतना तमो गुण और रजो गुण से पार आकर अंतिम तीन दिनों में सतोगुण मे पुष्पित होती है। जब भी सतोगुण जीवन को शासित करता है, विजय अनुगमन करती है।नवरात्र शब्द में संख्या और काल का भी अद्भुत सम्मिश्रण है।
श्री मार्कंडेय पुराण के अनुसार मां दुर्गा के नौ ((नव)) स्वरुप हैं। जिनमें प्रथम शैलपुत्री, द्वितीय ब्रह्मचारिणी, तृतीय चंद्रघंटा, चतुर्थ कूष्मांडा, पंचम सकंदमाता, छठा कात्यायनी, सातवां कालरात्रि, आठवां महागौरी, नौंवा सिद्धिदात्री है।
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्माचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्।।
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्।।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्म्रणव महात्मना।।
सृष्टि की संचालिका कही जाने वाली आदिशक्ति की नौ कलाएं (विभूतियां) 'नवदुर्गा' कहलाती हैं। और नवरात्र को आद्याशक्ति की आराधना का सर्वश्रेष्ठ पर्वकाल माना गया है।
देवीभागवत में 'नवकुमारियों' को 'नवदुर्गा' का साक्षात् प्रतिनिधि बताया गया है। उसके अनुसार, नवदुर्गा-स्वरूपा नवकुमारियां भगवती के नवरूपों की प्रत्यक्ष जीवंत मूर्तियां हैं।
भगवान शंकर माता पार्वती के पूछने पर कहते हैं
'नवशक्तिभि: संयुक्तम् नवरात्रं तदुच्यते।
एकैव देव-देवेशि नवधा परितिष्ठता॥' ( शक्तिसंगम )
अर्थात नवरात्र नौ शक्तियों से संयुक्त है।
स्त्री हो या पुरुष, सबको नवरात्र करना चाहिये । यदि कारणवश स्वयं न कर सकें तो प्रतिनिधि ( पति – पत्नी, ज्येष्ठ पुत्र, सहोदर या ब्राह्मण ) द्वारा करायें । कन्या-पूजा के बिना भगवती महाशक्ति कभी प्रसन्न नहीं होती इसीलिए भक्त प्राय: नवरात्र के नौ दिन तक कन्याओं का पूजन करते हैं, जो नित्य कन्या-पूजन नहीं कर पाते, वे अष्टमी अथवा नवमी में कुमारिका (कंजक )-पूजन करते हैं।
चैत्र में आने वाले नवरात्र में अपने कुल देवी-देवताओं की पूजा का विशेष प्रावधान माना गया है। वैसे दोनों ही नवरात्र मनाए जाते हैं। फिर भी इस नवरात्र को कुल देवी-देवताओं के पूजन की दृष्टि से विशेष मानते हैं।
चैत्र के नवरात्र में शक्ति की उपासना तो प्रसिद्ध ही हैं, साथ ही शक्तिधर की उपासना भी की जाती है । उदाहरणार्थ एक ओर देवीभागवत कालिकापुराण, मार्कण्डेयपुराण, नवार्णमन्त्न के पुरश्चरण और दुर्गापाठकी शतसहस्त्रायुतचण्डी आदि होते हैं तो दूसरी ओर श्रीमद्भागवत, अध्यात्मरामायण, वाल्मीकीय रामायण, तुलसीकृत रामायण, राममन्त्न – पुरश्चरण एक – तीन – पाँच – सात दिनकी या नवाह्लिक अखण्ड रामनामधव्नि आदि किये जाते हैं । यही कारण है कि ये ’ देवी – नवरात्र ’ और ’ राम – नवरात्र ’ नामोंसे प्रसिद्ध हैं ।
नवदुर्गा-स्वरूपा नवकुमारियां भगवती के नवरूपों की प्रत्यक्ष जीवंत मूर्तियां हैं।
मंत्रमहोदधि के 18वें तरंग में वर्णन है कि पूजन के लिए दो से दस वर्ष की अवस्था वाली कन्याओं का चयन करना चाहिए | इस ग्रंथ में कहा गया है कि एक वर्ष की कन्या की पूजा से प्रसन्नता नहीं होगी। इसी प्रकार ग्यारह वर्ष से ऊपर वाली कन्याओं के लिए भी पूजा ग्रहण वर्जित कहा गया है। शास्त्र कहते हैं कि जो कन्याओं की पूजा करता है, उसी के परिवार में देवी-देवता प्रसन्न होकर संतान के रूप में जन्म लेते हैं।
· दो वर्ष की कन्या 'कुमारिका' कही जाती है, जिसके पूजन से धन-आयु-बल की वृद्धि होती है।
· तीन वर्ष की कन्या 'त्रिमूर्ति' की पूजा से घर में सुख-समृद्धि का आगमन होता है।
· चार वर्ष की कन्या 'कल्याणी' के पूजन से सुख मिलता है।
· पांच वर्ष की कन्या 'रोहिणी' की पूजा से स्वास्थ्य-लाभ होता है।
· छ: वर्ष की कन्या 'कालिका' के पूजन से शत्रुओं का शमन होता है।
· सात वर्ष की कन्या 'चण्डिका' की पूजा से संपन्नता एवं ऐश्वर्य मिलता है।
· आठ वर्ष की कन्या 'शांभवी' के पूजन से दुख-दरिद्रता का नाश होता है।
· नौ वर्ष की कन्या 'दुर्गा' की पूजा से कठिन कार्य भी सिद्ध हो जाते हैं।
· दस वर्ष की कन्या 'सुभद्रा' के पूजन से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
ज्नानार्णाव रुद्रयामालातंत्र के अनुसार
· एक वर्ष की आयु वाली बालिका संध्या,
· दो वर्ष वाली सरस्वती
· तीन वर्ष वाली त्रिधामूर्ति,
· चार वर्ष वाली कालिका
· पांच वर्ष वाली सुभगा
· छह वर्ष वाली उमा
· सात वर्ष वाली मालिनी
· आठ वर्ष वाली कुब्जा
· नौ वर्ष वाली कन्या कालसंदर्भा,
· दस वर्ष वाली अपराजिता और
· ग्यारह वर्ष वाली रुदाणी है।
· बारह वर्ष वाली बालिका भैरवी
· तेरह वर्ष वाली महालक्ष्मी
· चौदह वर्ष वाली पीठनायिका,
· पंद्रह वर्ष वाली क्षेत्रज्ञा
· सोलह वर्ष वाली अंबिका
नवरात्र मैं ये प्रयोग देगा अच्छे स्वास्थ्य की गारंटी ।
पारिभद्रस्य पत्राणि कोमलानि विशेषत:।
सुपुष्पाणि समानीय चूर्णंकृत्वा विधानत: ।
मरीचिं लवणं हिंगु जीरणेण संयुतम्।
अजमोदयुतं कुत्वा भक्षयेद्रोगशान्तये ।
"चैत्र नवरात्रि पर नीम के कोमल पत्ते, पुष्प, काली मिर्च, नमक, हींग, जीरा मिश्री और अजवाइन मिलाकर मिक्सी में पीसकर इसकी लुगदी तैयार की जाती है। इस लुगदी को कपड़े में रखकर पानी में छाना जाता है। छाना हुआ पानी गाढ़ा या पतला कर प्रातः खाली पेट एक कप से एक गिलास तक सेवन करना चाहिए।
शारदीय नवरात्र 2014
25 सितंबर 2014 गुरुवार को अश्विन शुक्ल पक्ष प्रतिपदा हस्त नक्षत्र और ब्रह्म योग में, सूर्य और चन्द्रमा कन्या राशि में शारदीय नवरात्र की शुरुआत होगी | इस समय गुरुवार का कारक ग्रह गुरु इस समय उच्च राशि
कर्क में स्थित है। साथ ही, शनि भी तुला राशि में उच्च का बना हुआ है।
देवी पुराण में नवरात्र के दिन देवी का आह्वान, स्थापना व पूजन का समय प्रात: काल माना गया है। मगर इस दिन चित्रा नक्षत्र व वैधृति योग वर्जित बताया गया है।कर्क में स्थित है। साथ ही, शनि भी तुला राशि में उच्च का बना हुआ है।
घट स्थापना का मुहूर्त : प्रातः 6.14 बजे 7:30 बजे तक शुभ के चौघडियॉ रहेगा। 10.30 बजे से12 तक चर व 12 बजे से 1:30 तक लाभ और अमृत चौघडिया दोपहर 1:30 से दोपहर 3 बजे तक व 4:30 से 6 बजे तक शुभ के चौघडिए में भी घट स्थापना की जा सकती है।
राहू काल का समय दोपहर 1:44 से 3:13 बजे तक रहेगा
अभिजीत मुहूर्त 11:50 से 12:38 बजे तक
इस बार मां दुर्गा का आगमन गुरुवार को पालकी पर सवार होगा,
एवं शुक्रवार को विसर्जन होने से हाथी पर बैठकर जायेगी |
मां दुर्गा यदि डोले पर आती है तो उस वर्ष में अनेक कारणों से बहुत लोगों की मृत्यु होती है।
और वर्तमान समय में सूर्य ( आत्मा करक ) ,चन्द्र ( मन ) एवं शुक्र (भौतिक सुखों का कारक ) तीनो ग्रह राहु, केतु से पीड़ित हैं | शुक्र इस समय अपनी नीच राशि कन्या में हैं यह अच्छे संकेत नहीं हैं !!!!!!
बांगला मान्यता के अनुसार मां दुर्गा अपने परिवार लक्ष्मी, गणेश, सरस्वती कार्तिकेय के साथ धरती पर नवरात्री की पंचमी तिथि से नवमीं तक वास करती हैं। मां के घर आने पर धूम-धाम से उनका स्वागत और आराधना की जाती है।
देवीपुराण में नवरात्रि में भगवती के आगमन व प्रस्थान के लिए वार अनुसार वाहन बताये गए हैं | ऐसी मान्यता है कि मां के आने-जाने के इन साधनों से मौसम का निर्धारण और ज्योतिष गणना की जाती है। मां दुर्गा यदि डोले पर आती है तो उस वर्ष में अनेक कारणों से बहुत लोगों की मृत्यु होती है।
आगमन वाहन-
रविवार व सोमवार को हाथी,
शनिवार व मंगलवार को घोड़ा
गुरुवार व शुक्रवार को पालकी
बुधवार को नौका आगमन होता है
शनिवार व मंगलवार को घोड़ा
गुरुवार व शुक्रवार को पालकी
बुधवार को नौका आगमन होता है
प्रस्थान वाहन-
रविवार व सोमवार भैसा
शनिवार और मंगलवार को सिंह
बुधवार व शुक्रवार को गज हाथी
गुरुवार को नर वाहन पर प्रस्थान करतीशनिवार और मंगलवार को सिंह
बुधवार व शुक्रवार को गज हाथी
नवरात्र में अलग-अलग दिनों में मां का अलग-अलग रंगों के वस्त्रों से श्रृंगार करने से मां भगवती प्रसन्न होती हैं।
गुरुवार को क्रीम
शुक्रवार को मटमैला या भूरे
रविवार को लाल,
सोमवार को गुलाबी,
मंगलवार को लाल,
बुधवार को हरे रंग के वस्त्रों से मां का श्रृंगार करने से मां आदि शक्ति प्रसन्न होती हैं।
नवरात्र में मां भगवती के लिए भोग
नवरात्र में मां भवानी को मनाने के लिए अलग-अलग तरह के भोग प्रसाद चढ़ाने चाहिए।
25-सितंबर प्रतिपदा प्रथम नवरात्र माँ शैलपुत्री - गाय का शुद्ध घी चढ़ाए। इससे आरोग्यता का अशीर्वाद प्राप्त होता है।
26-सितंबर द्वितीया नवरात्र मां ब्रमचारिणी- शक्कर का भोग लगाए। इससे परिवार को दीर्घायु प्राप्त होती है।
27-सितंबर तृतीया नवरात्र मां चन्द्रघंटा - दूध की खीर अर्पित करें। इससे दु:खों से मुक्ति मिलती है।
28-सितंबर चतुर्थ नवरात्र मां कूष्मांडा - मालपुए का भोग लगाएं। इससे बुद्धि में विकास होता है।
29-सितंबर पंचम नवरात्र मां स्कन्दमाता - केले का भोग लगाएं। इससे निरोगी काया मिलती है।
30-सितंबर षष्ट नवरात्र मां कात्यायनी- शहद का भोग लगाएं। इससे आकर्षण और सौन्दर्य की प्राप्ति होती है।
1- अक्टूबर सप्तम नवरात्र मां महाकाली - गुड़ का भोग लगाएं। इससे आकस्मिक दुर्घटनाओं से बचा जा सकता है।
2-अक्टूबर अष्टम नवरात्र मां महागौरी - नारियल का भोग लगाएं। इससे आत्मशक्ति में विकास होता है और निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है।
3-अक्टूबर नवमी/दशमी नवरात्र मां सिद्धिदात्री - काले तिल का भोग लगाएं। इससे मृत्यु का भय नहीं होता।
नवरात्र व्रत में दिन के नैवेद्य की अपनी विशेषता है।
रविवार को खीर,
सोमवार को दूध,
मंगलवार को केला,
बुधवार को मक्खन,
बृहस्पति को खांड,
शुक्रवार को चीनी तथा
शनिवार को गाय का घी जगदंबा भवानी को नैवेद्य के रूप में अर्पित करना चाहिए।
घी, तिल, चीनी, दही, दूध, मलाई, लस्सी, लड्डू, तारफेनी, घृतमंड, कसार, पापड़, घेवर, पकौड़ी, कोकरस, घृतमिश्रित चने का चूर्ण, मधु, चूरमा, गुड़, चिउड़ा, दाख, खजूर, चारक, पूआ, मक्खन, मूंग के बेसन का लड्डू और अनार का नक्षत्रानुसार भोग अर्पण करने से भगवती की कृपा प्राप्त होती है।



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