पंच पर्व
करवा चौथ व्रत करने की विधि
कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को मनाया जाने वाला करकचतुर्थी या करवाचौथ का व्रत
सौभाग्यवती स्त्रियां अपने पति की लम्बी आयु की कामना हेतु कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी (श्री करक चतुर्थी व्रत करवा चौथ के नाम से प्रसिध्द है) को करवाचौथ का व्रत रखती हैं।
सौभाग्यवती स्त्रियां अपने पति की लम्बी आयु की कामना हेतु कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी (श्री करक चतुर्थी व्रत करवा चौथ के नाम से प्रसिध्द है) को करवाचौथ का व्रत रखती हैं।
कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को मनाया जाने वाला करक चतुर्थी या करवाचौथ का व्रत चंद्रोदय व्यापिनी चतुर्थी को किया जाता है।
छान्दोग्य उपनिषद के अनुसार करवा चौथ के दिन व्रत रखने से सारे पाप नष्ट होते हैं और जीवन में किसी प्रकार का कष्ट नहीं होता है। इससे आयु में वृद्धि होती है और इस दिन गणेश तथा शिव-पार्वती और चंद्रमा की पूजा की जाती है।
छान्दोग्य उपनिषद के अनुसार करवा चौथ के दिन व्रत रखने से सारे पाप नष्ट होते हैं और जीवन में किसी प्रकार का कष्ट नहीं होता है। इससे आयु में वृद्धि होती है और इस दिन गणेश तथा शिव-पार्वती और चंद्रमा की पूजा की जाती है।
वामन पुराण में करवा चौथ व्रत का वर्णन आता है। करवा चौथ व्रत को रखने वाली स्त्रियों को प्रात:काल स्नान आदि के बाद आचमन करके पति, पुत्र-पौत्र तथा सुख-सौभाग्य की इच्छा का संकल्प लेकर इस व्रत को करना चाहिए।
इस व्रत में भगवान शिव, माता पार्वती, श्री गणेश, श्री कार्तिकेय और चंद्रमा की पूजा का विधान है। गोधूलि की बेला यानी चन्द्रोदय के एक घण्टे पूर्व श्री गणपति एवं अम्बिका गौर, श्री नन्दीश्वर, श्री कार्तिकेयजी, श्री शिवजी , पार्वतीजी और चन्द्रमा का पूजन किया जाता है
पति के सुख-सौभाग्य के लिए रखा जाने वाला यह व्रत उत्तर प्रदेश, पंजाब, राजस्थान और गुजरात में मुख्य रूप से मनाए जाने के साथ ही भारत के अन्य कई राज्यों में भी मनाया जाता है।
व्रत करने की विधि :
सूर्योदय से पूर्व :
सुबह सूर्योदय से पूर्व अर्थात तारों की छांव में सुहागिनें स्नान आदि के बाद आचमन करके पति, पुत्र-पौत्र तथा सुख-सौभाग्य की इच्छा का संकल्प लेकर इस व्रत को करती हैं।
संकल्प मंत्र - "मम सुखसौभाग्य पुत्रपौत्रादि सुस्थिर श्री प्राप्तये करक चतुर्थी व्रतमहं करिष्ये।"
व्रत का संकल्प लेकर सरगी खाती हैं जो उन्हें उनकी सास द्वारा भेंट की जाती हैं। सरगी में मिठाई, फल व सेवइयों के साथ श्रृंगार का सामान भी होता है।
सुबह सूर्योदय से पूर्व अर्थात तारों की छांव में सुहागिनें स्नान आदि के बाद आचमन करके पति, पुत्र-पौत्र तथा सुख-सौभाग्य की इच्छा का संकल्प लेकर इस व्रत को करती हैं।
संकल्प मंत्र - "मम सुखसौभाग्य पुत्रपौत्रादि सुस्थिर श्री प्राप्तये करक चतुर्थी व्रतमहं करिष्ये।"
व्रत का संकल्प लेकर सरगी खाती हैं जो उन्हें उनकी सास द्वारा भेंट की जाती हैं। सरगी में मिठाई, फल व सेवइयों के साथ श्रृंगार का सामान भी होता है।
सरगी खाने के बाद करवाचौथ का निर्जल व्रत आरंभ होता है।
करवा चौथ की पूजा सामग्री:
कुंकुम, शहद, अगरबत्ती, पुष्प, कच्चा दूध, शक्कर, शुद्ध घी, दही, मिठाई, गंगाजल, चंदन, अक्षत, (चावल) सिन्दूर, मेंहदी, महावर, कंघा,बिंदी, चुनरी, चूड़ी, बिछुआ, मिट्टी का करवा व ढक्कन, दीपक, रुई, कपूर, गेहूँ, शक्कर का बूरा, हल्दी, पानी का लोटा, गौरी बनाने के लिए पीली मिट्टी, लकड़ी का आसन, छलनी, आठ पूरियों की अठावरी, हलवा, दक्षिणा के लिए पैसे करवा चौथ में प्रयुक्त होने वाली संपूर्ण सामग्री को एकत्रित करें।
गणेश जी को पीले फूलों की माला, लड्डू और केले चढ़ाएं।
भगवान शिव और पार्वती को बेलपत्र और श्रृंगार की वस्तुएं अर्पित करें।
मां पार्वती को श्रृंगार सामग्री चढ़ाएं या उनका श्रृंगार करें.
श्रीकृष्ण को माखन-मिश्री और पेड़े का भोग लगाएं। उनके सामने मोगरा या चन्दन की अगरबत्ती और घी का दीपक जलाएं।
मिटटी के कर्वे पर रोली से स्वस्तिक बनाएं। कर्वे में दूध, जल और गुलाब जल मिलाकर रखें और रात को छलनी के प्रयोग से चंद्र दर्शन करें और चन्द्रमा को अर्घ्य दें।
इस दिन महिलाएं सोलह श्रृंगार जरूर करें, इससे सौंदर्य बढ़ता है।
इस दिन करवा चौथ की कथा कहनी या फिर सुननी चाहिए। कथा सुनने के बाद अपने घर के सभी बड़ों का चरण स्पर्श करना चाहिए।
गणेश जी को पीले फूलों की माला, लड्डू और केले चढ़ाएं।
भगवान शिव और पार्वती को बेलपत्र और श्रृंगार की वस्तुएं अर्पित करें।
मां पार्वती को श्रृंगार सामग्री चढ़ाएं या उनका श्रृंगार करें.
मिटटी के कर्वे पर रोली से स्वस्तिक बनाएं। कर्वे में दूध, जल और गुलाब जल मिलाकर रखें और रात को छलनी के प्रयोग से चंद्र दर्शन करें और चन्द्रमा को अर्घ्य दें।
इस दिन महिलाएं सोलह श्रृंगार जरूर करें, इससे सौंदर्य बढ़ता है।
इस दिन करवा चौथ की कथा कहनी या फिर सुननी चाहिए। कथा सुनने के बाद अपने घर के सभी बड़ों का चरण स्पर्श करना चाहिए।
सायंकाल को कथावाचन और थाली बंटाना :
देवताओं की प्रतिमा अथवा चित्र का मुख पश्चिम दिशा की ओर होना चाहिये . पूजन के लिये स्वयं पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिये क्योंकि ज्ञान, कर्म, तेज और शक्ति का स्वामी सूर्य पूर्व से उदित होता है
'ॐ शिवायै नमः' से पार्वती का,
'ॐ नमः शिवाय' से शिव का,
'ॐ षण्मुखाय नमः' से स्वामी कार्तिकेय का,
'ॐ गणेशाय नमः' से गणेश का तथा
'ॐ सोमाय नमः' से चंद्रमा का पूजन करें।
रोली से करवा पर स्वस्तिक बनाएँ।
गौरी-गणेश और चित्रित करवा की परंपरानुसार पूजा करें। पति की दीर्घायु की कामना करें।
नमः शिवायै शर्वाण्यै सौभाग्यं संतति शुभाम्।
प्रयच्छ भक्तियुक्तानां नारीणां हरवल्लभे॥
शाम को एक नियत समय पर सभी स्त्रियां सोलह शृंगार कर एक खुले स्थान पर एकत्रित होती हैं। उनके हाथों में सजी थाली में मीठी व फीकी मट्ठियां, नारियल, फल, कपड़े व शगुन रखा होता है और साथ में पानी से भरी एक गड़वी होती है जिसमें थोड़े से कच्चे चावल व चीनी के दाने होते हैं। पीली मिट्टी से गौरी बनाकर और उनकी गोद में गणेशजी बनाकर बिठाती हैं।सभी सुहागिनों को कोई बड़ी-बूढ़ी महिला या मंदिर का पुजारी करवा चौथ व्रत की कथा सुनाता है। इसके बाद थालियां बंटाने की रस्म शुरू हो जाती है। इसे करवा खेलना भी कहते हैं।
सभी स्त्रियां गोल दायरे में बैठ जाती हैं और अपनी थाली में शुद्ध घी की जोत जलाकर अपनी-अपनी थाली पंक्ति में एक-दूसरे को पकड़ाती जाती हैं और जब उनकी थाली उनके हाथों में आ जाती है तो एक चक्कर पूरा होता है। इस तरह से सभी सात बार थाली बंटाते हुए यह गीत गाती हैं-
ले वीरो कुडि़ए करवड़ा, ले सर्व सुहागन करवड़ा,
ले कटी न अटेरीं न, खुंब चरखड़ा फेरीं ना,
ग्वांड पैर पाईं ना, सुई च धागा फेरीं ना,
रुठड़ा मनाईं ना, सुतड़ा जगाईं ना,
बहन प्यारी वीरां, चंद चढ़े ते पानी पीना,
लै वीरां कुडि़ए करवड़ा, लै सर्व सुहागिन करवड़ा।
इसके बाद वे थाली में रखा सामान जिसे ‘बया’ कहते हैं अपनी सास को दे देती हैं व चरण छूकर उनका आशीर्वाद लेती हैं।
चंद्रोदय के समय : रात को जब चांद निकलता है तो वे भगवान शिव-पार्वती व श्री गणेश का ध्यान करते हुए चंद्रमा को छलनी की ओट से देख कर फिर पति का चेहरा देखती हैं। तब वे चंद्रमा को अघ्र्य देती हैं और पति उन्हें पानी पिलाकर उनका व्रत सम्पूर्ण करते हैं। चंद्रमा को अघ्र्य देते समय वे यह मंत्र बोलती हैं-
पीर धड़ी पेर कड़ी, अर्क देंदी सर्व सुहागिन चौबारे खड़ी।
या
"करकं क्षीरसम्पूर्णा तोयपूर्णमथापि वा।
ददामि रत्नसंयुक्तं चिरञ्जीवतु मे पतिः॥"
या
"करकं क्षीरसम्पूर्णा तोयपूर्णमथापि वा।
ददामि रत्नसंयुक्तं चिरञ्जीवतु मे पतिः॥"
तत्पश्चात सुहागिनें भोजन ग्रहण करती हैं। इस तरह करवा चौथ का व्रत पूर्ण होता है।
पंच पर्व
धनत्रयोदशी / धनतेरस - पांच दिवसीय दीपोत्सव पर्व का आरंभ
धनत्रयोदशी या धनतेरस
कार्तिक मास कृष्ण पक्ष त्रयोदशी को धन तेरस कहते हैं इस दिन मृत्यु के देवता यम और भगवान धन्वन्तरि की पूजा की जाती है | धन त्रयोदशी या धन तेरस के दौरान लक्ष्मी पूजा को प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद लगभग 2 घण्टे 24 मिनट का समय) के दौरान किया जाना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि अगर स्थिर लग्न के दौरान पूजा की जाये तो लक्ष्मी जी घर में ठहर जाती है। इसीलिए धन तेरस पूजन के लिए यह समय सबसे उपयुक्त होता है। दीवाली के त्यौहार के दौरान यह (वृषभ लग्न) अधिकतर प्रदोष काल के साथ अधिव्याप्त होता है। धन तेरस के दिन आरोग्य के देवता धन्वन्तरि, धन की देवी लक्ष्मी, धन के देवता कुबेर और मृत्यु के देवता यमराज का पूजन किया जाता है।
शास्त्रों में वर्णित कथाओं के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन भगवान धनवंतरी अपने हाथों में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए। मान्यता है कि भगवान धनवंतरी विष्णु के अंशावतार हैं। संसार में चिकित्सा विज्ञान के विस्तार और प्रसार के लिए ही भगवान विष्णु ने धनवंतरी का अवतार लिया था।
जिस प्रकार देवी लक्ष्मी सागर मंथन से उत्पन्न हुई थी उसी प्रकार भगवान धनवन्तरि भी अमृत (औषधि) कलश के साथ सागर मंथन से उत्पन्न हुए हैं। देवी लक्ष्मी हालांकि धन देवी हैं परन्तु उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए आपको स्वास्थ्य और लम्बी आयु भी चाहिए यही कारण है धन तेरस के दिन मृत्यु के देवता यमराज और भगवान धन्वंतरि की पूजा का महत्व है। शरद्-पूर्णिमा को चंद्रमा, कार्तिक द्वादशी को कामधेनु गाय, त्रयोदशी को धन्वंतरि, चतुर्दशी को काली माता और अमावस्या को भगवती लक्ष्मी जी का सागर से प्रादुर्भाव हुआ था। इसीलिए दीपावली के दो दिन पूर्व धन तेरस को भगवान धन्वंतरि का जन्म धन तेरस के रूप में मनाया जाता है।
धन्वंतरि के अलावा इस दिन, देवी लक्ष्मी और धन के देवता कुबेर की भी पूजा करने की मान्यता है।
इस अवसर पर धनिया के बीज खरीद कर भी लोग घर में रखते हैं। दीपावली के बाद इन बीजों को लोग अपने बाग-बगीचों में या खेतों में बोते हैं।
इस दिन सायंकाल घर के मुख्य द्वार पर यमराज के निमित्त एक अन्न से भरे पात्र में दक्षिण मुख करके दीपक रखने एवं उसका पूजन करके प्रज्वलित करने एवं यमराज से प्रार्थना करने पर असामयिक मृत्यु से बचा जा सकता है।
- शुभ मुहूर्त समय में लक्ष्मी पूजन करने के साथ सप्त धान्य (गेंहूं, उडद, मूंग, चना, जौ, चावल और मसूर) की पूजा की जाती है| सप्त धान्य के साथ ही पूजन सामग्री में विशेष रुप से स्वर्ण पुष्पा (पीली केतकी / अमलतास) के पुष्प से भगवती का पूजन करना लाभकारी रहता है| इस दिन पूजा में भोग लगाने के लिये नैवेद्य के रुप में श्वेत मिष्ठान का प्रयोग किया जाता है |
- धन तेरस के दिन हल्दी और चावल पीस कर उसके घोल से घर के प्रवेश द्वार पर "ॐ" बना दे।
- धन तेरस के दिन घर में नई चीज, खासकर बर्तन और सोना-चांदी खरीदकर लाने की पारंपरिक रिवाज है। लक्ष्मी गणेश अंकित चांदी का सिक्का खरीदें या चांदी का कोई बर्तन नया बर्तन खरीदे जिसमें दीपावली की रात श्री गणेश व देवी लक्ष्मी के लिए भोग चढ़ाएं।
- आज के दिन चाँदी खरीदना शुभ माना गया है चाँदी चंद्रमा का प्रतीक है जो शीतलता प्रदान करता है कुछ जगह तो यह कहावत है कि धन तेरस पर खरीदी गई वस्तु में तेरह गुनी वृद्धि होती है।
- लक्ष्मी जी व गणेश जी की चांदी की प्रतिमाओं को इस दिन घर लाना, घर- कार्यालय,. व्यापारिक संस्थाओं में धन, सफलता व उन्नति को बढाता है
- आज के दिन सुन्दरकाण्ड का पाठ जरूर करें।
- धन तेरस की शाम को अखंड दीपक जलाना चाहिए जो दीपावली की रात तक जरूर जलता रह| अगर दीपक भैया दूज तक अखंड जलता रहे तो घर के सारे वास्तु दोष भी समाप्त हो जाते हैं|
- गाय के शुद्ध घी के दीपक में केसर दाल कर लाल धागे की बाती लगा कर घर के ईशान कोण में जलाएं |
- आर्थिक अनुकूलता के लिए अपने घर के मुख्य द्वार पर आज के दिन तेल का दीपक दो काली गुंजा दाल कर प्रज्वलित करें गन्धादि से पूजन करके अन्न की ढ़ेरी पर रख दें। स्मरण रहे वह दीप रात भर जलते रहना चाहिये, बुझना नहीं चाहिये ।
- धन तेरस के दिन यदि घर पर छिपकली दिख जाये तो यह समझे की पूरे वर्ष आपके घर पर धन की कमी नहीं होगी
- इस दिन सूखे धनिया के बीज खरीद कर घर में रखना भी परिवार की धन संपदा में वृ्द्धि करता है. दीपावली के दिन इन बीजों को बाग/ खेतों में लागाया जाता है ये बीज व्यक्ति की उन्नति व धन वृ्द्धि के प्रतीक होते है.
- धन तेरस और हस्त नक्षत्र का संयोग हरसिंगार का बाँदा घर में ले आएं और महालक्ष्मी पूजन करने के उपरांत लाल कप़डे में लपेट कर तिजोरी में रखें। धन और समृद्धि की बढ़ोत्तरी होती है, धन लाभ के नवीन अवसर प्राप्त होंगे।
- अशोक वृक्ष का बांदा चित्रा नक्षत्र में लाकर रखने से ऐश्वर्य वृद्धि होती है।
- सायंकाल पश्चात तेरह दीपक प्रज्वलित कर तिजोरी में कुबेर का पूजन करें।
- लक्ष्मी यन्त्र, कुबेर यंत्र और श्री यन्त्र की स्थापना करें
यमदीप दान
अकाल मृत्यु के भय को दूर करने के कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को यम के निमित दीपदान किया जाता है
ऐसा माना जाता है कि धनतेरस की शाम जो व्यक्ति यम के नाम पर दक्षिण दिशा में दीया जलाकर रखता है उसकी अकाल मृत्यु नहीं होती है। इस मान्यता के अनुसार धनतेरस की शाम लोग आंगन में यम देवता के नाम पर दीप जलाकर रखते हैं और उनकी पूजा करके प्रार्थना करते हैं कि वह घर में प्रवेश नहीं करें और किसी को कष्ट नहीं पहुंचाएं। इस दिन लोग यम देवता के नाम पर व्रत भी रखते हैं।
दीपावली के काल में धन त्रयोदशी, नरक चतुर्दशी एवं यम द्वितीया, इन तीन दिनों पर यम देव के लिए दीप दान करते हैं । इनमें धन त्रयोदशी के दिन यम दीपदान का विशेष महत्त्व है
कार्तिकस्यासिते पक्षे त्रयोदश्यां निशामुखे ।
यमदीपं बहिर्दद्यादपमृत्युर्विनिश्यति ।।-स्कंदपुराण
अर्थात कार्तिक मासके कृष्णपक्ष की त्रयोदशी के दिन सायंकाल (प्रदोष काल) में घर के बाहर यमदेव के उद्देश्य से दीप रखने से अपमृत्यु का निवारण होता है ।
कार्तिकस्यासिते पक्षे त्रयोदश्यां तु पावके।
यमदीपं बहिर्दद्यादपमृत्युर्विनश्यति।।-पद्मपुराण
कार्तिक के कृष्णपक्ष की त्रयोदशी को घर से बाहर यमराज के लिए दीप देना चाहिए इससे अपमृत्यु का नाश होता है।
दीपावली के काल में यमलोक से सूक्ष्म यमतरंगें भूलोक की ओर अधिक मात्रा में आकृष्ट होती हैं। इसलिए इस काल में यह विधि विशेष रूप से करने का विधान है ।
यमदीपदान के लिए संकल्प
मम अपमृत्यु विनाशार्थम् यमदीपदानं करिष्ये ।
इसका अर्थ है, अपनी अपमृत्यु के निवारण हेतु मैं यमदीप दान करता हूं ।
यम दीपदान के लिए प्रदोष काल में हलदी मिलाकर गुंधे हुए आटे का एक बड़ा चौमुखा दीपक बना लें। गेहूं के आटे से बने दीप में तमोगुणी ऊर्जा तरंगे एवं आपतत्त्वात्मक तमोगुणी तरंगे (अपमृत्यु के लिए ये तरंगे कारणभूत होती हैं) को शांत करने की क्षमता रहती है। स्वच्छ रुई लेकर दो लम्बी बत्तियॉं दीपक में एक -दूसरे पर आड़ी इस प्रकार रखें कि दीपक के बाहर बत्तियों के चार मुँह दिखाई दें । अब उसे तिल के तेल से भर दें और साथ ही उसमें कुछ काले तिल भी डाल दें और रोली, अक्षत एवं पुष्प से पूजन कर के घर के मुख्य द्वार पर खील अथवा गेहूँ से ढेरी बनाकर उसके ऊपर दीपक को प्रज्वलित करें और दक्षिण दिशा (दक्षिण दिशा यम तरंगोंके लिए पोषक होती है अर्थात दक्षिण दिशा से यमतरंगें अधिक मात्रा में आकृष्ट एवं प्रक्षेपित होती हैं) की ओर देखते हुए ‘ॐ यमदेवाय नमः ’ कहते हुए दक्षिण दिशा में नमस्कार करें ।
यम दीपदान का मन्त्र :
मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालेन श्यामया सह |
त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतां मम ||
इसका अर्थ है, धन त्रयोदशी पर यह दीप मैं सूर्यपुत्र अर्थात् यम देवता को अर्पित करता हूं। वे मुझे मृत्यु के पाश से मुक्त करें और मेरा कल्याण करें ।
असामयिक मृत्यु के निवारण हेतु यम के चौदह नामों का उच्चारण कर तर्पण किया जाता है, १.यम, २. धर्मराज ३. मृत्यु ४. अंतक ५. वैवस्वत ६. काल ७. सर्वभूतक्षयकर ८. औदुंबर ९. दध्न १०. नील ११. परमेष्ठिन १२. वृकोदर १३. चित्र १४. चित्रगुप्त ।
ऐसा करने से अनिष्ट शक्तियों से व्यक्ति का रक्षण होकर उसके देह के चारों ओर सुरक्षा कवच का निर्माण होता है।
धन त्रयोदशी के दिन यमदीप दान करने का आध्यात्मिक एवम शास्त्रीय महत्त्व
दीर्घ आयु की प्राप्ति
दीप प्राण शक्ति एवं तेजस्वरूप शक्ति प्रदान करता है । दीपदान करने से व्यक्ति को तेज की प्राप्ति होती है । इससे उसकी प्राण शक्ति में वृद्धि होती है और उसे दीर्घ आयु की प्राप्ति होती है ।
यमदेव का आशीर्वाद
धन त्रयोदशी के दिन ब्रह्मांड में यमतरंगों के प्रवाह कार्यरत रहते हैं । इसलिए इस दिन यमदेवता से संबंधित सर्व विधियों के फलित होने की मात्रा अन्य दिनों की तुलना में अधिक होती है । धन त्रयोदशी के दिन संकल्प कर यमदेव के लिए दीप का दान करने से उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं ।
धन त्रयोदशी के दिन यमदेव से प्रक्षेपित तरंगें विविध नरकों तक पहुंचती हैं । इसी कारण धन त्रयोदशी के दिन नरक में विद्यमान अनिष्ट शक्तियों द्वारा प्रक्षेपित तरंगें संयमित रहती हैं । परिणामस्वरूप पृथ्वी पर भी नरक तरंगों की मात्रा घटती है । इसीलिए धन त्रयोदशी के दिन यमदेव के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए उनका भाव सहित पूजन एवं दीपदान करते हैं । दीपदान से यमदेव प्रसन्न होते हैं ।
संक्षेप में कहें तो, यमदीप दान करना अर्थात दीप के माध्यम से यमदेव को प्रसन्न कर अपमृत्यु के लिए कारण भूत कष्टदायक तरंगों से रक्षा के लिए उनसे प्रार्थना करना ।
धन्वंतरि जयंती
समुद्र मंथन के समय देवी लक्ष्मी के साथ ही देवताओं के वैद्य भगवान धन्वंतरि हाथ में दिव्य औषधियों से भरा हुआ अमृत कलश लेकर अवतरित हुए । इसीलिए यह दिन भगवान धन्वंतरि के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है । आयुर्वेदके विद्वान एवं वैद्य मंडली इस दिन भगवान धन्वंतरिका पूजन करते हैं और लोगों के दीर्घ जीवन तथा आरोग्य लाभ के लिए मंगलकामना करते हैं । इस दिन नीम के पत्तों से बना प्रसाद ग्रहण करने का महत्त्व है । माना जाता है कि, नीम की उत्पत्ति अमृत से हुई है और धन्वंतरि अमृत के दाता हैं । अत: इसके प्रतीकस्वरूप धन्वंतरि जयंती के दिन नीम के पत्तों से बना प्रसाद बांटते हैं ।
अतः इस दिन भगवान धन्वंतरि का पूजन श्रद्धापूर्वक करना चाहिए, जिससे दीर्घ जीवन एवं आरोग्य की प्राप्ति होती है।
धनतेरस के दिन अपनी शक्ति अनुसार बर्तन क्रय करके घर लाना चाहिए एवं उसका पूजन करके प्रथम उपयोग भगवान के लिए करने से धन-धान्य की कमी वर्ष पर्यन्त नहीं रहती है।
भगवान धनवंतरी को प्रसन्न करने का अत्यंत सरल मंत्र है: "ॐ धन्वंतरये नमः॥"
ॐ नमो भगवते महासुदर्शनाय वासुदेवाय धन्वंतराये:
अमृतकलश हस्ताय सर्व भयविनाशाय सर्व रोगनिवारणाय
त्रिलोकपथाय त्रिलोकनाथाय श्री महाविष्णुस्वरूप
श्री धनवंतरी स्वरूप श्री श्री श्री औषधचक्र नारायणाय नमः॥
अर्थात् परम भगवन को, जिन्हें सुदर्शन वासुदेव धनवंतरी कहते हैं, जो अमृत कलश लिए हैं, सर्व भयनाशक हैं, सर्व रोग नाश करते हैं, तीनों लोकों के स्वामी हैं और उनका निर्वाह करने वाले हैं; उन विष्णु स्वरूप धनवंतरी को सादर नमन है।
धनतेरस के दिन भगवान धनवंतरि की मूर्ति या चित्र साफ स्थान पर स्थापित करें और पूर्व की ओर मुखकर बैठ जाएं। उसके बाद भगवान धनवंतरि का आह्वान निम्न मंत्र से करें-
सत्यं च येन निरतं रोगं विधूतं,अन्वेषित च सविधिं आरोग्यमस्य।
गूढं निगूढं औषध्यरूपं, धनवंतरिं च सततं प्रणमामि नित्यं।।
इसके बाद पूजन स्थल पर चावल चढ़ाएं और आचमन के लिए जल छोड़े। भगवान धनवंतरि के चित्र पर गंध, अबीर, गुलाल पुष्प, रोली, आदि चढ़ाएं। चांदी के पात्र में खीर का नैवेद्य लगाएं। अब दोबारा आचमन के लिए जल छोड़ें। मुख शुद्धि के लिए पान, लौंग, सुपारी चढ़ाएं। धनवंतरि को वस्त्र (मौली) अर्पण करें। शंखपुष्पी, तुलसी, ब्राह्मी आदि पूजनीय औषधियां भी अर्पित करें।
रोगनाश की कामना के लिए इस मंत्र का जाप करें-
ऊँ रं रूद्र रोगनाशाय धन्वन्तर्ये फट्।।
अब भगवान धनवंतरि को श्रीफल व दक्षिणा चढ़ाएं। पूजन के अंत में आरती करें।
पवित्र धनवंतरी स्तोत्र :
ॐ शंखं चक्रं जलौकां दधदमृतघटं चारुदोर्भिश्चतुर्मिः।
सूक्ष्मस्वच्छातिहृद्यांशुक परिविलसन्मौलिमंभोजनेत्रम॥
कालाम्भोदोज्ज्वलांगं कटितटविलसच्चारूपीतांबराढ्यम।
वन्दे धन्वंतरिं तं निखिलगदवनप्रौढदावाग्निलीलम॥
कुबेर पूजा

धन त्रयोदशी पर देवी लक्ष्मी के साथ देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर की भी पूजा की जाती है माना जाता है कुबेर भूमि के अंदर दबे हुए खजाने की रक्षा करते हैं
इस मंत्र द्वारा कुबेर देव का ध्यान करना चाहिए-
आवाहयामि देव त्वामिहायाहि कृपां कुरु।
कोशं वद्र्धय नित्यं त्वं परिरक्ष सुरेश्वर।।
धन प्राप्ति के लिए कुबेर देव को इस मंत्र के जाप द्वारा प्रसन्न करना चाहिए-
* ‘ऊं श्रीं ऊं ह्रीं श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं क्लीं वित्तेश्वराय नमः।’
* ऊँ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये धनधान्यसमृद्धिं में देहि दापय
* ‘ऊँ कुबेराय नमः।’
अगर कुबेर की मूर्ति नहीं है तो तिजोरी या गहनों के बक्से को श्री कुबेर के रूप में मान कर उसकी पूजा की जा सकती है । सिन्दूर से स्वस्तिक-चिह्न बना कर 'मौली' बाँध कर कुबेर का आह्वान करें पुष्पांजलि समर्पित करें
समस्त धन सम्पदा के स्वामी कुबेर के लिए धनतेरस में सायंकाल 13 दीप समर्पित किये जाते हैं।
श्री यन्त्र पूजन
धन त्रयोदशी और दीपावली को यंत्र राज श्रीयंत्र की पूजा का अति विशिष्ट महत्व है । श्रीयंत्र का उल्लेख विभिन्न प्राचीन भारतीय ग्रंथों में मिलता है। महापुराणों में श्री यंत्र को देवी महालक्ष्मी का प्रतीक कहा गया है । इस यंत्र को मंदिर या तिजोरी में रखकर प्रतिदिन पूजा करने व प्रतिदिन कमलगट्टे की माला पर श्री सूक्त के पाठ श्री लक्ष्मी मंत्र के जप के साथ करने से लक्ष्मी प्रसन्न रहती है और धनसंकट दूर होता है ।
इस यंत्र की कृपा से मनुष्य को धन, समृद्धि, यश, कीर्ति, ऐश्वर्य आदि की प्राप्ति होती है। श्री यंत्र के पूजन से रुके हुए कार्य बनते हैं । श्री यंत्र की श्रद्धापूर्वक नियमित रूप से पूजा करने से दुख दारिद्र्य का नाश होता है ।आज श्री यन्त्र की विधिवत स्थापना करें। श्री सूक्तम, लक्ष्मी सूक्तम, कनकधारा स्तोत्र, लक्ष्मी सहस्त्रनाम का पाठ करें। दक्षिणावर्ती शंख दूध भरकर श्रीयंत्र का अभिषेक करें।
श्री लक्ष्मी पूजन
माता लक्ष्मी की सामान्य पूजा उपचारों गंध, अक्षत, फूल, फल अर्पित कर धूप और घी का दीप (घी का दीपक पूरी रात जल सके) लगाने के बाद लक्ष्मी स्तुति का पाठ करें। माँ लक्ष्मी को बताशा, पान, मखाना या मखाने की खीर, सिंगाड़ा फल जरूर अर्पित करें। बाद में स्वयं भी प्रसाद रूप में ग्रहण करें।
नमस्तेस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते।
शंखचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मी नमोस्तुते।।
नमस्ते गरुडारूढ़े कोलासुरभयंकरि।
सर्वपापहरे देवी महालक्ष्मी नमोस्तुते।।
सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्वदुष्टभयंकरि।
सर्वदु:खहरे देवी महालक्ष्मी नमोस्तुते।।
सिद्धिबुद्धिप्रदे देवी महालक्ष्मी भुक्ति-मुक्तिप्रदायिनी।
मन्त्रपूते सदादेवी महालक्ष्मी नमोस्तुते।।
“ॐ ह्रीं श्रीं ऐं क्लीं महालक्ष्मी मम गृहे आगच्छ आगच्छ ॐ स्वाहा” इस मंत्र का धन तेरस से दिवाली तक सुन्दर चमकदार स्फटिक की माला से प्रतिदिन जप करें। श्वेत रेशमी वस्त्र का आसन हो तथा मुख पूर्व अथवा उत्तर की तरफ हो
ताम्बे की तश्तरी पर चावल से अष्टदल कमल बनायें और उसके बीच में लक्ष्मी चरण रखें। अब इस थाली को पूजाघर में रख दें। धन तेरस के दिन से दीवाली तक रोज़ाना सुबह-शाम लक्ष्मी माता की आरती करें। दक्षिणावर्ती शंख में जल डालकर पूरे घर में छिड़कें।
गोवत्स द्वादशी -
दीपावली के इस पञ्च दिवसीय उत्सव का शुभारम्भ कार्तिक के कृष्ण पक्ष की द्वादशी के साथ ही हो जाता है| कार्तिक मास की द्वादशी को गोवत्सद्वादशी कहते हैं । इस दिन दूध देने वाली गाय को उसके बछड़े सहित स्नान कराकरवस्त्र ओढाना चाहिये, गले में पुष्पमाला पहनाना , सींग मढ़ना, चन्दन का तिलक करना तथा ताम्बे के पात्र में सुगन्ध, अक्षत, पुष्प,तिल, और जल का मिश्रण बनाकर निम्न मंत्र से गौ के चरणों का प्रक्षालन करना चाहिये।
क्षीरोदार्णवसम्भूते सुरासुरनमस्कृते ।
सर्वदेवमये मातर्गृहाणार्घ्य नमो नमः ॥
(समुद्र मंथनके समय क्षीरसागर से उत्पन्न देवताओं तथा दानवों द्वारा नमस्कृत, सर्वदेवस्वरूपिणी माता तुम्हे बार बार नमस्कार है।)
पूजा के बाद गौ को उड़द के बड़े खिलाकर यह प्रार्थना करनी चाहिए-
“सुरभि त्वं जगन्मातर्देवी विष्णुपदे स्थिता ।
सर्वदेवमये ग्रासं मया दत्तमिमं ग्रस ॥
ततः सर्वमये देवि सर्वदेवलङ्कृते।
मातर्ममाभिलाषितं सफलं कुरू नन्दिनी ॥“
(हेजगदम्बे ! हे स्वर्गवसिनी देवी ! हे सर्वदेवमयि ! मेरे द्वारा अर्पित इस ग्रास का भक्षण करो ।हे समस्त देवताओं द्वारा अलंकृत माता ! नन्दिनी ! मेरा मनोरथ पुर्ण करो।) इसके बादरात्रि में इष्ट , ब्राम्हण , गौ तथा अपने घरके वृद्धजनों की आरती उतारनी चाहिए।
गाय के शरीर पर 33 कोटि देवताओं का वास है तथा गाय की पूजा करने पर सभी देवताओं की पूजा हो जाती है। कार्तिक मास में तो गाय की सबसे अधिक पूजा की जाती है। गाय की सेवा करने मात्र से ही अश्वमेध यज्ञ के समान फल की प्राप्ति हो जाती है। अग्नि पुराण के अनुसार गाय के पूजन से दरिद्रता मिटती है। जो मनुष्य किसी दूसरे की गाय को गो ग्रास देता है उसे परम पद मिलता है। जो नित्य गाय की सेवा करता है उसे ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। गाय का दूध, मूत्र और गोबर हमारे लिए एक बहुमूल्य उपहार हैं। जिसका गुणगान वेद और पुराणों में भी है तथा आधुनिक विज्ञान भी इसकी गुणवत्ता का लोहा मान रहा है।
क्या न करें- गोवत्स द्वादशी को भोजन में गाय के दूध अथवा उससे तैयार किए गए किसी भी प्रकार के खाद्य पदार्थ जैसे दही, मक्खन, लस्सी अथवा घी आदि का प्रयोग नहीं करना चाहिए तथा न ही तेल में पके हुए भुजिया, नमकीन एवं पकौड़ी आदि पदार्थों का सेवन करना चाहिए।
दूसरे दिन कार्तिककृष्ण त्रयोदशी के दिन को धनतेरस कहते हैं । भगवान धनवंतरी ने दुखी जनों के रोगनिवारणार्थ इसी दिन आयुर्वेद का प्राकट्य किया था ।
इस दिन घर के टूटे-फूटे पुराने बर्तनों के बदले नये बर्तन खरीदे जाते हैं। इस दिन चांदी के बर्तन खरीदना अत्यधिक शुभ माना जाता है। इन्हीं बर्तनों में भगवान गणेश और देवी लक्ष्मीजी की मूर्तियों को रखकर पूजा की जाती है। इस दिन लक्ष्मीजी की पूजा करते समय
''यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धन-धान्य अधिपतये |
धन-धान्य समृद्ध में देहि दापय स्वाहा || ''
का स्मरण करके फूल चढ़ाये। इसके पश्चात कपूर से आरती करें। इस समय देवी लक्ष्मीजी, भगवान गणेशजी और जगदीश भगवान की आरती करे।
जिस प्रकार देवी लक्ष्मी सागर मंथन से उत्पन्न हुई थी उसी प्रकार भगवान धनवन्तरि भी अमृत कलश के साथ सागर मंथन से उत्पन्नहुए हैं। भगवान धनवंतरी नेदुखी जनों के रोग निवारणार्थ इसी दिन आयुर्वेद का प्राकट्य किया था । देवी लक्ष्मी हालांकि की धन देवी हैं परन्तु उनकीकृपा प्राप्त करने के लिए आपको स्वस्थ्य और लम्बी आयु भी चाहिए यही कारण हैदीपावली दो दिन पहले से ही यानी धनतेरस से ही दीपामालाएं सजने लगती हें।
कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन ही धन्वन्तरि का जन्म हुआ था इसलिए इस तिथि को धनतेरस के नाम से जाना जाता है। धन्वन्तरी जब प्रकट हुए थे तो उनके हाथो में अमृत से भरा कलश था। भगवानधन्वन्तरी चुकि कलश लेकर प्रकट हुए थे इसलिए ही इस अवसर पर बर्तन खरीदने कीपरम्परा है। इस दिन चांदी के बर्तन खरीदना अत्यधिक शुभ माना जाता है। इन्हीं बर्तनों में भगवान गणेश और देवी लक्ष्मीजी की मूर्तियों को रखकर पूजा की जाती है। इस दिन लक्ष्मीजी की पूजा करते समय
''यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धन-धान्य अधिपतये |
धन-धान्य समृद्ध में देहि दापय स्वाहा || ''
का स्मरण करके फूल चढ़ाये। इसके पश्चात कपूर से आरती करें। इस समय देवी लक्ष्मीजी, भगवान गणेशजी और जगदीश भगवान की आरती करे
कहींकहीं लोकमान्यता के अनुसार यह भी कहा जाता है कि इस दिन धन (वस्तु) खरीदने से उसमें 13 गुणावृद्धि होती है। इस अवसर पर धनिया के बीज खरीद कर भी लोग घर में रखते हैं। दीपावलीके बाद इन बीजों को लोग अपने बाग-बगीचोंमें या खेतों में बोते हैं।
इस दिन सन्ध्या के समय घर के बाहर हाथ में जलता हुआदीप लेकर भगवान यमराज की प्रसन्नता हेतु उन्हे इस मंत्र के साथ दीप दान करनाचाहिये-
मृत्युना पाशदण्डाभ्याम् कालेन श्यामया सह ।
त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतां मम ॥
(Mrityunaa Paashah Hastena Kalena bhaaryaapaa Saha
Trayodasham Deepdaanam Suryajah Pritaamivee)
(त्रयोदशीके इस दीपदान के पाश और दण्डधारी मृत्यु तथा काल के अधिष्ठाता देव भगवान देव यम, देवी श्यामला सहित मुझ पर प्रसन्न हो।)



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