पंच पर्व

करवा चौथ व्रत करने की विधि
कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को मनाया जाने वाला करकचतुर्थी या करवाचौथ का व्रत 

सौभाग्यवती स्त्रियां अपने पति की लम्बी आयु की कामना हेतु कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी (श्री करक चतुर्थी व्रत करवा चौथ के नाम से प्रसिध्द है) को करवाचौथ का व्रत रखती हैं।

कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को मनाया जाने वाला करक चतुर्थी या करवाचौथ का व्रत  चंद्रोदय व्यापिनी चतुर्थी को किया जाता है।

छान्दोग्य उपनिषद के अनुसार करवा चौथ के दिन व्रत रखने से सारे पाप नष्ट होते हैं और जीवन में किसी प्रकार का कष्ट नहीं होता है। इससे आयु में वृद्धि होती है और इस दिन गणेश तथा शिव-पार्वती और चंद्रमा की पूजा की जाती है।

 वामन पुराण में करवा चौथ व्रत का वर्णन आता है। करवा चौथ व्रत को रखने वाली स्त्रियों को प्रात:काल स्नान आदि के बाद आचमन करके पतिपुत्र-पौत्र तथा सुख-सौभाग्य की इच्छा का संकल्प लेकर इस व्रत को करना चाहिए।
 इस व्रत में भगवान शिवमाता पार्वतीश्री गणेशश्री कार्तिकेय और चंद्रमा की पूजा का विधान है। गोधूलि की बेला यानी चन्द्रोदय के एक घण्टे पूर्व श्री गणपति एवं अम्बिका गौरश्री नन्दीश्वरश्री कार्तिकेयजीश्री शिवजी ,  पार्वतीजी और चन्द्रमा का पूजन किया जाता है 
पति के सुख-सौभाग्य के लिए रखा जाने वाला यह व्रत उत्तर प्रदेशपंजाबराजस्थान और गुजरात में मुख्य रूप से मनाए जाने के साथ ही  भारत के अन्य कई राज्यों में भी मनाया जाता है।

व्रत करने की विधि :
सूर्योदय से पूर्व 
सुबह सूर्योदय से पूर्व अर्थात तारों की छांव में सुहागिनें स्नान आदि के बाद आचमन करके पतिपुत्र-पौत्र तथा सुख-सौभाग्य की इच्छा का संकल्प लेकर इस व्रत को करती हैं। 

संकल्प मंत्र -  "मम सुखसौभाग्य पुत्रपौत्रादि सुस्थिर श्री प्राप्तये करक चतुर्थी व्रतमहं करिष्ये।"

व्रत का संकल्प लेकर सरगी खाती हैं जो उन्हें उनकी सास द्वारा भेंट की जाती हैं। सरगी में मिठाईफल  सेवइयों के साथ श्रृंगार का सामान भी होता है।

सरगी खाने के बाद करवाचौथ का निर्जल व्रत आरंभ होता है।

करवा चौथ की पूजा सामग्री:
कुंकुम, शहद, अगरबत्ती, पुष्प, कच्चा दूध, शक्कर, शुद्ध घी, दही, मिठाई, गंगाजल, चंदन, अक्षत, (चावल) सिन्दूर, मेंहदी, महावर, कंघा,बिंदी, चुनरी, चूड़ी, बिछुआ, मिट्टी का करवा व ढक्कन, दीपक, रुई, कपूर, गेहूँ, शक्कर का बूरा, हल्दी, पानी का लोटा, गौरी बनाने के लिए पीली मिट्टी, लकड़ी का आसन, छलनी, आठ पूरियों की अठावरी, हलवा, दक्षिणा के लिए पैसे करवा चौथ में प्रयुक्त होने वाली संपूर्ण सामग्री को एकत्रित करें।

गणेश जी को पीले फूलों की माला, लड्डू और केले चढ़ाएं।

भगवान शिव और पार्वती को बेलपत्र और श्रृंगार की वस्तुएं अर्पित करें।


मां पार्वती को श्रृंगार सामग्री चढ़ाएं या उनका श्रृंगार करें.

श्रीकृष्ण को माखन-मिश्री और पेड़े का भोग लगाएं। उनके सामने मोगरा या चन्दन की अगरबत्ती और घी का दीपक जलाएं।

मिटटी के कर्वे पर रोली से स्वस्तिक बनाएं। कर्वे में दूध, जल और गुलाब जल मिलाकर रखें और रात को छलनी के प्रयोग से चंद्र दर्शन करें और चन्द्रमा को अर्घ्य दें।

इस दिन महिलाएं सोलह श्रृंगार जरूर करें, इससे सौंदर्य बढ़ता है।

इस दिन करवा चौथ की कथा कहनी या फिर सुननी चाहिए। कथा सुनने के बाद अपने घर के सभी बड़ों का चरण स्पर्श करना चाहिए।

सायंकाल को कथावाचन और थाली बंटाना 
देवताओं की प्रतिमा अथवा चित्र का मुख पश्चिम दिशा की ओर होना चाहिये पूजन के लिये स्वयं पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिये क्योंकि ज्ञानकर्मतेज और शक्ति का स्वामी सूर्य पूर्व से उदित होता है 

' शिवायै नमः' से पार्वती का,

' नमः शिवाय' से शिव का

' षण्मुखाय नमः' से स्वामी कार्तिकेय का

' गणेशाय नमःसे गणेश का तथा 

' सोमाय नमःसे चंद्रमा का पूजन करें।

रोली से करवा पर स्वस्तिक बनाएँ।

गौरी-गणेश और चित्रित करवा की परंपरानुसार पूजा करें। पति की दीर्घायु की कामना करें।
नमः शिवायै शर्वाण्यै सौभाग्यं संतति शुभाम्‌।
प्रयच्छ भक्तियुक्तानां नारीणां हरवल्लभे॥

शाम को एक नियत समय पर सभी स्त्रियां सोलह शृंगार कर एक खुले स्थान पर एकत्रित होती हैं। उनके हाथों में सजी थाली में मीठी  फीकी मट्ठियांनारियलफलकपड़े  शगुन रखा होता है और साथ में पानी से भरी एक गड़वी होती है जिसमें थोड़े से कच्चे चावल  चीनी के दाने  होते हैं। पीली मिट्टी से गौरी बनाकर और उनकी गोद में गणेशजी बनाकर बिठाती हैं।सभी सुहागिनों को कोई बड़ी-बूढ़ी महिला या मंदिर का पुजारी करवा चौथ व्रत की कथा सुनाता है। इसके बाद थालियां बंटाने की रस्म शुरू हो जाती है। इसे करवा खेलना भी कहते हैं।

सभी स्त्रियां गोल दायरे में बैठ जाती हैं और अपनी थाली में शुद्ध घी की जोत जलाकर अपनी-अपनी थाली पंक्ति में एक-दूसरे को पकड़ाती जाती हैं और जब उनकी थाली उनके हाथों में  जाती है तो एक चक्कर पूरा होता है। इस तरह से सभी सात बार थाली बंटाते हुए यह गीत गाती हैं-

ले वीरो कुडि़ए करवड़ाले सर्व सुहागन करवड़ा,
ले कटी  अटेरीं खुंब चरखड़ा फेरीं ना,
ग्वांड पैर पाईं नासुई  धागा फेरीं ना,
रुठड़ा मनाईं नासुतड़ा जगाईं ना,
बहन प्यारी वीरांचंद चढ़े ते पानी पीना,
लै वीरां कुडि़ए करवड़ालै सर्व सुहागिन करवड़ा।

इसके बाद वे थाली में रखा सामान जिसे बया’ कहते हैं अपनी सास को दे देती  हैं  चरण छूकर उनका आशीर्वाद लेती हैं।

चंद्रोदय के समय रात को जब चांद निकलता है तो वे भगवान शिव-पार्वती  श्री गणेश का ध्यान करते हुए चंद्रमा को छलनी की ओट से देख कर फिर पति का चेहरा देखती हैं। तब वे चंद्रमा को अघ्र्य देती हैं और पति उन्हें पानी पिलाकर उनका व्रत सम्पूर्ण करते हैं। चंद्रमा को अघ्र्य देते समय वे यह मंत्र बोलती हैं-

पीर धड़ी पेर कड़ीअर्क देंदी सर्व सुहागिन चौबारे खड़ी।
या 
"करकं क्षीरसम्पूर्णा तोयपूर्णमथापि वा। 
ददामि रत्नसंयुक्तं चिरञ्जीवतु मे पतिः॥"


तत्पश्चात सुहागिनें भोजन ग्रहण करती हैं। इस तरह करवा चौथ का व्रत पूर्ण होता है।  



पंच पर्व 

धनत्रयोदशी / धनतेरस - पांच दिवसीय दीपोत्सव पर्व का आरंभ
धनत्रयोदशी या धनतेरस

कार्तिक मास कृष्ण पक्ष त्रयोदशी को धन तेरस कहते हैं इस दिन मृत्यु के देवता यम और भगवान धन्वन्तरि की पूजा की जाती है धन त्रयोदशी या धन तेरस के दौरान लक्ष्मी पूजा को प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद लगभग 2 घण्टे 24 मिनट का समयके दौरान किया जाना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि अगर स्थिर लग्न के दौरान पूजा की जाये तो लक्ष्मी जी घर में ठहर जाती है। इसीलिए धन तेरस पूजन के लिए यह समय सबसे उपयुक्त होता है। दीवाली के त्यौहार के दौरान यह (वृषभ लग्नअधिकतर प्रदोष काल के साथ अधिव्याप्त होता है। धन तेरस के दिन आरोग्य के देवता धन्वन्तरिधन की देवी लक्ष्मीधन के देवता कुबेर और मृत्यु के देवता यमराज का पूजन किया जाता है।

शास्त्रों में वर्णित कथाओं के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन भगवान धनवंतरी अपने हाथों में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए।  मान्यता है कि भगवान धनवंतरी विष्णु के अंशावतार हैं। संसार में चिकित्सा विज्ञान के विस्तार और प्रसार के लिए ही भगवान विष्णु ने धनवंतरी का अवतार लिया था।
जिस प्रकार देवी लक्ष्मी सागर मंथन से उत्पन्न हुई थी उसी प्रकार भगवान धनवन्तरि भी अमृत (औषधिकलश के साथ सागर मंथन से उत्पन्न हुए हैं। देवी लक्ष्मी हालांकि धन देवी हैं परन्तु उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए आपको स्वास्थ्य और लम्बी आयु भी चाहिए यही कारण है धन तेरस के दिन मृत्यु के देवता यमराज और भगवान धन्वंतरि की पूजा का महत्व है। शरद्-पूर्णिमा को चंद्रमाकार्तिक द्वादशी को कामधेनु गायत्रयोदशी को धन्वंतरिचतुर्दशी को काली माता और अमावस्या को भगवती लक्ष्मी जी का सागर से प्रादुर्भाव हुआ था। इसीलिए दीपावली के दो दिन पूर्व धन तेरस को भगवान धन्वंतरि का जन्म धन तेरस के रूप में मनाया जाता है।
धन्वंतरि के अलावा इस दिनदेवी लक्ष्मी और धन के देवता कुबेर की भी पूजा करने की मान्यता है।
इस अवसर पर धनिया के बीज खरीद कर भी लोग घर में रखते हैं। दीपावली के बाद इन बीजों को लोग अपने बाग-बगीचों में या खेतों में बोते हैं।
इस दिन सायंकाल घर के मुख्य द्वार पर यमराज के निमित्त एक अन्न से भरे पात्र में दक्षिण मुख करके दीपक रखने एवं उसका पूजन करके प्रज्वलित करने एवं यमराज से प्रार्थना करने पर असामयिक मृत्यु से बचा जा सकता है।
  • शुभ मुहूर्त समय में लक्ष्मी पूजन करने के साथ सप्त धान्य (गेंहूंउडदमूंगचनाजौचावल और मसूर) की पूजा की जाती है| सप्त धान्य के साथ ही पूजन सामग्री में विशेष रुप से स्वर्ण पुष्पा (पीली केतकी / अमलतास) के पुष्प से भगवती का पूजन करना लाभकारी रहता है| इस दिन पूजा में भोग लगाने के लिये नैवेद्य के रुप में श्वेत मिष्ठान का प्रयोग किया जाता है | 
  • धन तेरस के दिन हल्दी और चावल पीस कर उसके घोल से घर के प्रवेश द्वार पर "बना दे।
  • धन तेरस के दिन घर में नई चीजखासकर बर्तन और सोना-चांदी खरीदकर लाने की पारंपरिक रिवाज है। लक्ष्मी गणेश अंकित चांदी का सिक्का खरीदें या चांदी का कोई बर्तन नया बर्तन खरीदे जिसमें दीपावली की रात श्री गणेश  देवी लक्ष्मी के लिए भोग चढ़ाएं।
  • आज के दिन चाँदी खरीदना शुभ माना गया है चाँदी चंद्रमा का प्रतीक है जो शीतलता प्रदान करता है कुछ जगह तो यह कहावत है कि धन तेरस पर खरीदी गई वस्तु में तेरह गुनी वृद्धि होती है।
  • लक्ष्मी जी  गणेश जी की चांदी की प्रतिमाओं को इस दिन घर लानाघरकार्यालय,. व्यापारिक संस्थाओं में धनसफलता  उन्नति को बढाता है
  •  आज के दिन सुन्दरकाण्ड का पाठ जरूर करें।
  •  धन तेरस की शाम को अखंड दीपक जलाना चाहिए जो दीपावली की रात तक जरूर जलता रह| अगर दीपक भैया दूज तक अखंड जलता रहे तो घर के सारे वास्तु दोष भी समाप्त हो जाते हैं|
  •   गाय के शुद्ध घी के दीपक में केसर दाल कर लाल धागे की बाती लगा कर घर के ईशान कोण में जलाएं |
  •  आर्थिक अनुकूलता के लिए अपने घर के मुख्य द्वार पर आज के दिन तेल का दीपक दो काली गुंजा दाल कर प्रज्वलित करें  गन्धादि से पूजन करके अन्न की ढ़ेरी पर रख दें। स्मरण रहे वह दीप रात भर जलते रहना चाहियेबुझना नहीं चाहिये 
  •  धन तेरस के दिन यदि घर पर छिपकली दिख जाये तो यह समझे की पूरे वर्ष आपके घर पर धन की कमी नहीं होगी
  • इस दिन सूखे धनिया के बीज खरीद कर घर में रखना भी परिवार की धन संपदा में वृ्द्धि करता हैदीपावली के दिन इन बीजों को बागखेतों में लागाया जाता है ये बीज व्यक्ति की उन्नति  धन वृ्द्धि के प्रतीक होते है.
  •  धन तेरस और हस्त नक्षत्र का संयोग हरसिंगार का बाँदा घर में ले आएं और महालक्ष्मी पूजन करने के उपरांत लाल कप़डे में लपेट कर तिजोरी में रखें। धन और समृद्धि की बढ़ोत्तरी होती हैधन लाभ के नवीन अवसर प्राप्त होंगे।
  •   अशोक वृक्ष का बांदा चित्रा नक्षत्र में लाकर रखने से ऐश्वर्य वृद्धि होती है।
  • सायंकाल पश्चात तेरह दीपक प्रज्वलित कर तिजोरी में कुबेर का पूजन करें।
  • लक्ष्मी यन्त्रकुबेर यंत्र और श्री यन्त्र की स्थापना करें 
  
    यमदीप दान
 
अकाल मृत्यु के भय को दूर करने के कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को यम के निमित दीपदान किया जाता है
ऐसा माना जाता है कि धनतेरस की शाम जो व्यक्ति यम के नाम पर दक्षिण दिशा में दीया जलाकर रखता है उसकी अकाल मृत्यु नहीं होती है। इस मान्यता के अनुसार धनतेरस की शाम लोग आंगन में यम देवता के नाम पर दीप जलाकर रखते हैं और उनकी पूजा करके प्रार्थना करते हैं कि वह घर में प्रवेश नहीं करें और किसी को कष्ट नहीं पहुंचाएं। इस दिन लोग यम देवता के नाम पर व्रत भी रखते हैं।
दीपावली के काल में धन त्रयोदशीनरक चतुर्दशी एवं यम द्वितीयाइन तीन दिनों पर यम देव के लिए दीप दान करते हैं  इनमें धन त्रयोदशी के दिन यम दीपदान का विशेष महत्त्व है
कार्तिकस्यासिते पक्षे त्रयोदश्यां निशामुखे 
यमदीपं बहिर्दद्यादपमृत्युर्विनिश्यति ।।-स्कंदपुराण
अर्थात कार्तिक मासके कृष्णपक्ष की त्रयोदशी के दिन सायंकाल (प्रदोष काल)  में घर के बाहर यमदेव के उद्देश्य से दीप रखने से अपमृत्यु का निवारण होता है 
           
कार्तिकस्यासिते पक्षे त्रयोदश्यां तु पावके।
यमदीपं बहिर्दद्यादपमृत्युर्विनश्यति।।-पद्मपुराण

कार्तिक के कृष्णपक्ष की त्रयोदशी को घर से बाहर यमराज के लिए दीप देना चाहिए इससे अपमृत्यु का नाश होता है।
दीपावली के काल में यमलोक से सूक्ष्म यमतरंगें भूलोक की ओर अधिक मात्रा में आकृष्ट होती हैं। इसलिए इस काल में यह विधि विशेष रूप से करने का विधान है      
यमदीपदान के लिए संकल्प
मम अपमृत्यु विनाशार्थम् यमदीपदानं करिष्ये ।
इसका अर्थ हैअपनी अपमृत्यु के निवारण हेतु मैं यमदीप दान करता हूं ।              
यम दीपदान के लिए प्रदोष काल में हलदी मिलाकर गुंधे हुए आटे का एक बड़ा चौमुखा दीपक बना लें। गेहूं के आटे से  बने दीप में तमोगुणी ऊर्जा तरंगे एवं आपतत्त्वात्मक तमोगुणी तरंगे (अपमृत्यु के लिए ये तरंगे कारणभूत होती हैंको शांत करने की क्षमता रहती है। स्वच्छ रुई लेकर दो लम्बी बत्तियॉं दीपक में एक -दूसरे पर आड़ी इस प्रकार रखें कि दीपक के बाहर बत्तियों के चार मुँह दिखाई दें  अब उसे तिल के तेल से भर दें और साथ ही उसमें कुछ काले तिल भी डाल दें और रोलीअक्षत एवं पुष्प से पूजन कर के घर के मुख्य द्वार पर खील अथवा गेहूँ से ढेरी बनाकर उसके ऊपर दीपक को प्रज्वलित करें  और दक्षिण दिशा (दक्षिण दिशा यम  तरंगोंके लिए पोषक होती है अर्थात दक्षिण दिशा से यमतरंगें  अधिक मात्रा में आकृष्ट एवं प्रक्षेपित होती हैंकी ओर देखते हुए  ‘ यमदेवाय नमः ’ कहते हुए दक्षिण दिशा में नमस्कार करें         
यम दीपदान का मन्त्र :
मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालेन श्यामया सह |
त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतां मम ||
इसका अर्थ हैधन त्रयोदशी पर यह दीप मैं सूर्यपुत्र अर्थात् यम देवता को अर्पित करता हूं। वे मुझे मृत्यु के पाश से मुक्त करें और मेरा कल्याण करें 
असामयिक मृत्यु के निवारण हेतु यम के चौदह नामों का उच्चारण कर तर्पण किया जाता है.यमधर्मराज मृत्यु अंतक वैवस्वत काल सर्वभूतक्षयकर औदुंबर दध्न १०नील ११परमेष्ठिन १२वृकोदर १३चित्र १४चित्रगुप्त 
ऐसा करने से अनिष्ट शक्तियों से व्यक्ति का रक्षण होकर उसके देह के चारों ओर सुरक्षा कवच का निर्माण होता है।
धन त्रयोदशी के दिन यमदीप दान करने का आध्यात्मिक एवम शास्त्रीय महत्त्व
 दीर्घ आयु की प्राप्ति
दीप प्राण शक्ति एवं तेजस्वरूप शक्ति प्रदान करता है  दीपदान करने से व्यक्ति को तेज की प्राप्ति होती है  इससे उसकी प्राण शक्ति में वृद्धि होती है और उसे दीर्घ आयु की प्राप्ति होती है 
 यमदेव का आशीर्वाद
धन त्रयोदशी के दिन ब्रह्मांड में यमतरंगों के प्रवाह कार्यरत रहते हैं  इसलिए इस दिन यमदेवता से संबंधित सर्व विधियों के फलित होने की मात्रा अन्य दिनों की तुलना में अधिक होती है  धन त्रयोदशी के दिन संकल्प कर यमदेव के लिए दीप का दान करने से उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं 
 धन त्रयोदशी के दिन यमदेव से प्रक्षेपित तरंगें विविध नरकों तक पहुंचती हैं  इसी कारण धन त्रयोदशी के दिन नरक में विद्यमान अनिष्ट शक्तियों द्वारा प्रक्षेपित तरंगें संयमित रहती हैं  परिणामस्वरूप पृथ्वी पर भी नरक तरंगों की मात्रा घटती है  इसीलिए धन त्रयोदशी के दिन यमदेव के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए उनका भाव सहित पूजन एवं दीपदान करते हैं  दीपदान से यमदेव प्रसन्न होते हैं 

संक्षेप में कहें तोयमदीप दान करना अर्थात दीप के माध्यम से यमदेव को प्रसन्न कर अपमृत्यु के लिए कारण भूत कष्टदायक तरंगों से रक्षा के लिए उनसे प्रार्थना करना 

धन्वंतरि जयंती
समुद्र मंथन के समय देवी लक्ष्मी के साथ ही देवताओं के वैद्य भगवान धन्वंतरि हाथ में दिव्य औषधियों से भरा हुआ अमृत कलश लेकर अवतरित हुए । इसीलिए यह दिन भगवान धन्वंतरि के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है । आयुर्वेदके विद्वान एवं वैद्य मंडली इस दिन भगवान धन्वंतरिका पूजन करते हैं और लोगों के दीर्घ जीवन तथा आरोग्य लाभ के लिए मंगलकामना करते हैं । इस दिन नीम के पत्तों से बना प्रसाद ग्रहण करने का महत्त्व है । माना जाता है किनीम की उत्पत्ति अमृत से हुई है और धन्वंतरि अमृत के दाता हैं । अत: इसके प्रतीकस्वरूप धन्वंतरि जयंती के दिन नीम के पत्तों से बना प्रसाद बांटते हैं ।
अतः इस दिन भगवान धन्वंतरि का पूजन श्रद्धापूर्वक करना चाहिएजिससे दीर्घ जीवन एवं आरोग्य की प्राप्ति होती है।

धनतेरस के दिन अपनी शक्ति अनुसार बर्तन क्रय करके घर लाना चाहिए एवं उसका पूजन करके प्रथम उपयोग भगवान के लिए करने से धन-धान्य की कमी वर्ष पर्यन्त नहीं रहती है।

भगवान धनवंतरी को प्रसन्न करने का अत्यंत सरल मंत्र है:  "ॐ धन्वंतरये नमः॥"

ॐ नमो भगवते महासुदर्शनाय वासुदेवाय धन्वंतराये:
अमृतकलश हस्ताय सर्व भयविनाशाय सर्व रोगनिवारणाय
त्रिलोकपथाय त्रिलोकनाथाय श्री महाविष्णुस्वरूप
श्री धनवंतरी स्वरूप श्री श्री श्री औषधचक्र नारायणाय नमः॥

अर्थात् परम भगवन कोजिन्हें सुदर्शन वासुदेव धनवंतरी कहते हैंजो अमृत कलश लिए हैंसर्व भयनाशक हैंसर्व रोग नाश करते हैंतीनों लोकों के स्वामी हैं और उनका निर्वाह करने वाले हैंउन विष्णु स्वरूप धनवंतरी को सादर नमन है।
धनतेरस के दिन भगवान धनवंतरि की मूर्ति या चित्र साफ स्थान पर स्थापित करें और पूर्व की ओर मुखकर बैठ जाएं। उसके बाद भगवान धनवंतरि का आह्वान निम्न मंत्र से करें-

सत्यं च येन निरतं रोगं विधूतं,अन्वेषित च सविधिं आरोग्यमस्य।
गूढं निगूढं औषध्यरूपंधनवंतरिं च सततं प्रणमामि नित्यं।।

इसके बाद पूजन स्थल पर चावल चढ़ाएं और आचमन के लिए जल छोड़े। भगवान धनवंतरि के चित्र पर गंधअबीरगुलाल पुष्परोलीआदि चढ़ाएं। चांदी के पात्र में खीर का नैवेद्य लगाएं। अब दोबारा आचमन के लिए जल छोड़ें। मुख शुद्धि के लिए पानलौंगसुपारी चढ़ाएं। धनवंतरि को वस्त्र (मौली) अर्पण करें। शंखपुष्पीतुलसीब्राह्मी आदि पूजनीय औषधियां भी अर्पित करें।

रोगनाश की कामना के लिए इस मंत्र का जाप करें-
ऊँ रं रूद्र रोगनाशाय धन्वन्तर्ये फट्।।
अब भगवान धनवंतरि को श्रीफल व दक्षिणा चढ़ाएं। पूजन के अंत में आरती करें।
पवित्र धनवंतरी स्तोत्र :
ॐ शंखं चक्रं जलौकां दधदमृतघटं चारुदोर्भिश्चतुर्मिः।
सूक्ष्मस्वच्छातिहृद्यांशुक परिविलसन्मौलिमंभोजनेत्रम॥
कालाम्भोदोज्ज्वलांगं कटितटविलसच्चारूपीतांबराढ्यम।
वन्दे धन्वंतरिं तं निखिलगदवनप्रौढदावाग्निलीलम॥
  
कुबेर पूजा
धनतेरस और कुबेर पूजन
धन त्रयोदशी पर देवी लक्ष्मी के साथ देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर की भी पूजा की जाती है माना जाता है  कुबेर भूमि के अंदर दबे हुए खजाने की रक्षा करते हैं
इस मंत्र द्वारा कुबेर देव का ध्यान करना चाहिए-

आवाहयामि देव त्वामिहायाहि कृपां कुरु।
कोशं वद्र्धय नित्यं त्वं परिरक्ष सुरेश्वर।।

धन प्राप्ति के लिए कुबेर देव को इस मंत्र के जाप द्वारा प्रसन्न करना चाहिए-
* ‘ऊं श्रीं ऊं ह्रीं श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं क्लीं वित्तेश्वराय नमः।’
* ऊँ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये धनधान्यसमृद्धिं में देहि दापय
* ‘ऊँ कुबेराय नमः।’
अगर कुबेर की मूर्ति नहीं है तो तिजोरी या गहनों के बक्से को श्री कुबेर के रूप में मान कर उसकी पूजा की जा सकती है । सिन्दूर से स्वस्तिक-चिह्न बना कर 'मौलीबाँध कर कुबेर का आह्वान करें पुष्पांजलि समर्पित करें
समस्त धन सम्पदा के स्वामी कुबेर के लिए धनतेरस में सायंकाल 13 दीप समर्पित किये जाते हैं।

 श्री यन्त्र  पूजन
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धन त्रयोदशी और दीपावली को यंत्र राज श्रीयंत्र की पूजा का अति विशिष्ट महत्व है  श्रीयंत्र का उल्लेख विभिन्न प्राचीन भारतीय ग्रंथों में मिलता है। महापुराणों में श्री यंत्र को देवी महालक्ष्मी का प्रतीक कहा गया है । इस यंत्र को मंदिर या तिजोरी में रखकर प्रतिदिन पूजा करने  प्रतिदिन कमलगट्टे की माला पर श्री सूक्त के पाठ श्री लक्ष्मी मंत्र के जप के साथ करने से लक्ष्मी प्रसन्न रहती है और धनसंकट दूर होता है 
इस यंत्र की कृपा से मनुष्य को धनसमृद्धियशकीर्तिऐश्वर्य आदि की प्राप्ति होती है। श्री यंत्र के पूजन से रुके हुए कार्य बनते हैं  श्री यंत्र की श्रद्धापूर्वक नियमित रूप से पूजा करने से दुख दारिद्र्य का नाश होता है ।आज श्री यन्त्र की विधिवत  स्थापना करें। श्री सूक्तमलक्ष्मी सूक्तमकनकधारा स्तोत्रलक्ष्मी सहस्त्रनाम का पाठ करें। दक्षिणावर्ती शंख  दूध भरकर श्रीयंत्र का अभिषेक करें। 

श्री लक्ष्मी  पूजन
 
माता लक्ष्मी की सामान्य पूजा उपचारों गंधअक्षतफूलफल अर्पित कर धूप और घी का दीप (घी का दीपक पूरी रात जल सकेलगाने के बाद लक्ष्मी स्तुति का पाठ करें। माँ लक्ष्मी को बताशापानमखाना या मखाने की खीरसिंगाड़ा फल जरूर अर्पित करें। बाद में स्वयं भी प्रसाद रूप में ग्रहण करें।
नमस्तेस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते।
शंखचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मी नमोस्तुते।।
नमस्ते गरुडारूढ़े कोलासुरभयंकरि।
सर्वपापहरे देवी महालक्ष्मी नमोस्तुते।।
सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्वदुष्टभयंकरि।
सर्वदु:खहरे देवी महालक्ष्मी नमोस्तुते।।
सिद्धिबुद्धिप्रदे देवी महालक्ष्मी भुक्ति-मुक्तिप्रदायिनी।
मन्त्रपूते सदादेवी महालक्ष्मी नमोस्तुते।।

 ह्रीं श्रीं ऐं क्लीं महालक्ष्मी मम गृहे आगच्छ आगच्छ  स्वाहा इस मंत्र का धन तेरस से दिवाली तक सुन्दर चमकदार स्फटिक की माला से प्रतिदिन जप करें। श्वेत रेशमी वस्त्र का आसन हो तथा मुख पूर्व अथवा उत्तर की तरफ हो
ताम्बे की तश्तरी पर चावल से अष्टदल कमल बनायें और उसके बीच में लक्ष्मी चरण रखें। अब इस थाली को पूजाघर में रख दें। धन तेरस के दिन से दीवाली तक रोज़ाना सुबह-शाम लक्ष्मी माता की आरती करें। दक्षिणावर्ती शंख में जल डालकर पूरे घर में छिड़कें।

गोवत्स द्वादशी - 
                        दीपावली के इस पञ्च दिवसीय उत्सव का शुभारम्भ कार्तिक के कृष्ण पक्ष की द्वादशी के साथ ही हो जाता है| कार्तिक मास की द्वादशी को गोवत्सद्वादशी कहते हैं । इस दिन दूध देने वाली गाय को उसके बछड़े सहित स्नान कराकरवस्त्र ओढाना चाहिये, गले में पुष्पमाला पहनाना , सींग मढ़ना, चन्दन का तिलक करना तथा ताम्बे के पात्र में सुगन्ध, अक्षत, पुष्प,तिल, और जल का मिश्रण बनाकर निम्न मंत्र से गौ के चरणों का प्रक्षालन करना चाहिये।
क्षीरोदार्णवसम्भूते सुरासुरनमस्कृते ।
सर्वदेवमये मातर्गृहाणार्घ्य नमो नमः ॥
(समुद्र मंथनके समय क्षीरसागर से उत्पन्न देवताओं तथा दानवों द्वारा नमस्कृत, सर्वदेवस्वरूपिणी माता तुम्हे बार बार नमस्कार है।)
पूजा के बाद गौ को उड़द के बड़े खिलाकर यह प्रार्थना करनी चाहिए-
“सुरभि त्वं जगन्मातर्देवी विष्णुपदे स्थिता ।
सर्वदेवमये ग्रासं मया दत्तमिमं ग्रस ॥
ततः सर्वमये देवि सर्वदेवलङ्कृते।
मातर्ममाभिलाषितं सफलं कुरू नन्दिनी ॥“



(हेजगदम्बे ! हे स्वर्गवसिनी देवी ! हे सर्वदेवमयि ! मेरे द्वारा अर्पित इस ग्रास का भक्षण करो ।हे समस्त देवताओं द्वारा अलंकृत माता ! नन्दिनी ! मेरा मनोरथ पुर्ण करो।) इसके बादरात्रि में इष्ट , ब्राम्हण , गौ तथा अपने घरके वृद्धजनों की आरती उतारनी चाहिए।
गाय के शरीर पर 33 कोटि देवताओं का वास है तथा गाय की पूजा करने पर सभी देवताओं की पूजा हो जाती है। कार्तिक मास में तो गाय की सबसे अधिक पूजा की जाती है। गाय की सेवा करने मात्र से ही अश्वमेध यज्ञ के समान फल की प्राप्ति हो जाती है। अग्नि पुराण के अनुसार गाय के पूजन से दरिद्रता मिटती है। जो मनुष्य किसी दूसरे की गाय को गो ग्रास देता है उसे परम पद मिलता है। जो नित्य गाय की सेवा करता है उसे ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। गाय का दूध, मूत्र और गोबर हमारे लिए एक बहुमूल्य उपहार हैं। जिसका गुणगान वेद और पुराणों में भी है तथा आधुनिक विज्ञान भी इसकी गुणवत्ता का लोहा मान रहा है। 
क्या न करें- गोवत्स द्वादशी को भोजन में गाय के दूध अथवा उससे तैयार किए गए किसी भी प्रकार के खाद्य पदार्थ जैसे दही, मक्खन, लस्सी अथवा घी आदि का प्रयोग नहीं करना चाहिए तथा न ही तेल में पके हुए भुजिया, नमकीन एवं पकौड़ी आदि पदार्थों का सेवन करना चाहिए। 


दूसरे दिन कार्तिककृष्ण त्रयोदशी के दिन को धनतेरस कहते हैं । भगवान धनवंतरी ने दुखी जनों के रोगनिवारणार्थ इसी दिन आयुर्वेद का प्राकट्य किया था ।
इस दिन घर के टूटे-फूटे पुराने बर्तनों के बदले नये बर्तन खरीदे जाते हैं। इस दिन चांदी के बर्तन खरीदना अत्यधिक शुभ माना जाता है। इन्हीं बर्तनों में भगवान गणेश और देवी लक्ष्मीजी की मूर्तियों को रखकर पूजा की जाती है। इस दिन लक्ष्मीजी की पूजा करते समय
 ''यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धन-धान्य अधिपतये |
धन-धान्य समृद्ध में देहि दापय स्वाहा || ''
का स्मरण करके फूल चढ़ाये। इसके पश्चात कपूर से आरती करें। इस समय देवी लक्ष्मीजी, भगवान गणेशजी और जगदीश भगवान की आरती करे। 
जिस प्रकार देवी लक्ष्मी सागर मंथन से उत्पन्न हुई थी उसी प्रकार भगवान धनवन्तरि भी अमृत कलश के साथ सागर मंथन से उत्पन्नहुए हैं। भगवान धनवंतरी नेदुखी जनों के रोग निवारणार्थ इसी दिन आयुर्वेद का प्राकट्य किया था । देवी लक्ष्मी हालांकि की धन देवी हैं परन्तु उनकीकृपा प्राप्त करने के लिए आपको स्वस्थ्य और लम्बी आयु भी चाहिए यही कारण हैदीपावली दो दिन पहले से ही यानी धनतेरस से ही दीपामालाएं सजने लगती हें।

कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन ही धन्वन्तरि का जन्म हुआ था इसलिए इस तिथि को धनतेरस के नाम से जाना जाता है। धन्वन्तरी जब प्रकट हुए थे तो उनके हाथो में अमृत से भरा कलश था। भगवानधन्वन्तरी चुकि कलश लेकर प्रकट हुए थे इसलिए ही इस अवसर पर बर्तन खरीदने कीपरम्परा है। इस दिन चांदी के बर्तन खरीदना अत्यधिक शुभ माना जाता है। इन्हीं बर्तनों में भगवान गणेश और देवी लक्ष्मीजी की मूर्तियों को रखकर पूजा की जाती है। इस दिन लक्ष्मीजी की पूजा करते समय
 ''यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धन-धान्य अधिपतये |
धन-धान्य समृद्ध में देहि दापय स्वाहा || ''
का स्मरण करके फूल चढ़ाये। इसके पश्चात कपूर से आरती करें। इस समय देवी लक्ष्मीजी, भगवान गणेशजी और जगदीश भगवान की आरती करे
कहींकहीं लोकमान्यता के अनुसार यह भी कहा जाता है कि इस दिन धन (वस्तु) खरीदने से उसमें 13 गुणावृद्धि होती है। इस अवसर पर धनिया के बीज खरीद कर भी लोग घर में रखते हैं। दीपावलीके बाद इन बीजों को लोग अपने बाग-बगीचोंमें या खेतों में बोते हैं।


इस दिन सन्ध्या के समय घर के बाहर हाथ में जलता हुआदीप लेकर भगवान यमराज की प्रसन्नता हेतु उन्हे इस मंत्र के साथ दीप दान करनाचाहिये-
मृत्युना पाशदण्डाभ्याम् कालेन श्यामया सह ।
त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतां मम ॥
(Mrityunaa Paashah Hastena Kalena bhaaryaapaa Saha
Trayodasham Deepdaanam Suryajah Pritaamivee)

(त्रयोदशीके इस दीपदान के पाश और दण्डधारी मृत्यु तथा काल के अधिष्ठाता देव भगवान देव यम, देवी श्यामला सहित मुझ पर प्रसन्न हो।)


अक्षयनवमी - आंवला नवमी





कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को अक्षयनवमी व आंवला नवमी कहते हैं।
अक्षय नवमी के दिन ही द्वापर युग का प्रारम्भ माना जाता है। अक्षय नवमी को ही विष्णु भगवान ने कुष्माण्डक दैत्य को मारा था और उसके रोम से कुष्माण्ड की बेल हुई। इसी कारण कुष्माण्ड का दान करने से उत्तम फल मिलता है। इसमें गन्ध, पुष्प और अक्षतों से कुष्माण्ड का पूजन करना चाहिये। विधि विधान से तुलसी का विवाह कराने से कन्यादान

तुल्य फल मिलता है। मान्यता है कि कार्तिक मास की नवमी को आंवला के पेड़ के नीचे अमृत की वर्षा होती है। कार्तिक शुक्ल नवमी तिथि में आंवले की पूजा को पुत्र प्राप्ति के लिए भी विशेष लाभदायक माना गया है। मान्यता है कि कार्तिक मास की नवमी को आंवला के पेड़ के नीचे अमृत की वर्षा होती है। कार्तिक शुक्ल नवमी तिथि में आंवले की पूजा को पुत्र प्राप्ति के लिए भी विशेष लाभदायक माना गया है।
विधान
प्रातः स्नान करके शुद्ध आत्मा से आंवले के वृक्ष के नीचे पूर्व दिशा मे बैठकर पूजन करना चाहीए। पूजन के बाद आंवले के वृक्ष की जड़ में दूध का अर्घ्य देना चाहीए। इसके बाद पेड़ के चारो ओर कच्चा धागा बांधना चाहिए। जगतजननी के स्वरूप देवी कूष्माण्डा के नीचे लिखे मंत्र का स्मरण करते हुए सूत वृक्ष के आस-पास लपेटें-
दुर्गतिनाशिन त्वंहि दरिद्रादि विनाशनीम्।
जयंदा धनदा कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्।।

इसके बाद घी या कर्पूर दीप जलाकर नीचे लिखे मंत्र से वृक्ष की परिक्रमा व आरती यश व सुख की कामना से करें -
यानि कानि च पापानि जन्मातरकृतानि च।
तानि तानि प्रणश्यन्ति प्रदक्षिण पदे पदे।।
इसके बाद पेड़ के नीचे ब्राह्यण को भोजन कराकर दान दक्षिणा देना चाहीए।

ततपश्चात धात्री वृक्ष (आंवला) के नीचे पूर्वाभिमुख बैठकर 'ॐ धात्र्ये नमः' मंत्र से आंवले के वृक्ष की जड़ में दूध की धार गिराते हुए पितरों का तर्पण करें। कपूर व घी के दीपक से आरती कर प्रदक्षिणा करें।
अक्षयनवमी कथा
काशी नगर में एक निःसन्तान धर्मात्मा तथा दानी वैश्य रहता था। एक दिन वैश्य की पत्नी से एक पड़ोसन बोली यदि तुम किसी पराये लड़के की बलि भैरव के नाम से चढ़ा दो तो तुम्हे पुत्र प्राप्त होगा। यह बात जब वैश्य को पता चली तो उसने अस्वीकार कर दिया। परन्तु उसकी पत्नी मौके की तलाश मे लगी रही। एक दिन एक कन्या को उसने कुएं में गिराकर भैरो देवता के नाम पर बलि दे दी इस हत्या का परिणाम विपरीत हुआ। लाभ की जगह उसके पूरे बदन में कोढ़ हो गया तथा लड़की की प्रेतात्मा उसे सताने लगी। वैश्य के पूछने पर उसकी पत्नी ने सारी बात बता दी। इस पर वैश्य कहने लगा गौवध, ब्राह्यण वध तथा बाल वध करने वाले के लिए इस संसार मे कहीं जगह नहीं है इसलिए तू गंगातट पर जाकर भगवान का भजन कर तथा गंगा में स्नान कर तभी तू इस कष्ट से छुटकारा पा सकती है।
वैश्य पत्नी गंगा किनारे रहने लगी कुछ दिन बाद गंगा माता वृद्धा का वेष धारण कर उसके पास आयी और बोली तू मथुरा जाकर कार्तिक नवमी का व्रत तथा आंवला वृक्ष की परिक्रमा कर तथा उसका पूजन कर। यह व्रत करने से तेरा यह कोढ़ दूर हो जाएगा। वृद्धा की बात मानकर वैश्य पत्नी अपने पति से आज्ञा लेकर मथुरा जाकर विधिपूर्वक आंवला का व्रत करने लगी। ऐसा करने से वह भगवान की कृपा से दिव्य शरीर वाली हो गई तथा उसे पुत्र प्राप्ति भी हुई।


पौराणिक मान्यता के अनुसार कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी से लेकर पूर्णिमा तक भगवान विष्णु आवंले के पेड़ पर निवास करते हैं। इस दिन आंवला पेड़ की पूजा-अर्चना कर दान पुण्य करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है अन्य दिनों की तुलना में नवमी पर किया गया दान पुण्य कई गुना अधिक लाभ दिलाता है एवं व्यक्ति को सभी पापों से मुक्ति मिलती है।।

ऐसी मान्यता है कि कार्तिक शुक्ल नवमी तिथि को आंवले के पेड़ से अमृत की बूंदे गिरती है और यदि इस पेड़ के नीचे व्यक्ति भोजन करता है तो भोजन में अमृत के अंश आ जाता है। जिसके प्रभाव से मनुष्य रोगमुक्त होकर दीर्घायु बनता है। मान्यता है कि आंवला नवमी के दिन ब्राह्मणों को बीज युक्त कुम्हणा दान करने पर कुम्हड़े की बीज में जितने बीज होते हैं, उतने ही साल तक दानदाता को स्वर्ग में रहने की जगह मिलती है।
- आंवले वृक्ष की विधिवत पूजा के बाद कूष्माण्ड या कुम्हडे की गंध-अक्षत से पूजा कर उसमें इन सामग्रियों को रख योग्य ब्राह्मण को तिलक लगाकर नीचे लिखे संकल्प मंत्र का स्मरण कर दान दें -
ममाखिलपापक्षयपूर्वक सुखसौभाग्यादीनामुत्तरोत्तराभिवृद्धये कूष्माण्डदानं करिष्ये।

इन सामग्रियों के अलावा यथाशक्ति गाय और भूमि का दान भी बहुत मंगलकारी और लक्ष्मी कृपा देने वाला माना गया है।
पुराणाचार्य कहते हैं कि आंवला त्योहारों पर खाये गरिष्ठ भोजन को पचाने और पति-पत्नी के मधुर सबंध बनाने वाली औषधि है। चरक संहिता के अनुसार कार्तिक शुक्ल नवमी के दिन ही महर्षि च्यवन को आंवला के सेवन से पुनर्नवा होने का वरदान प्राप्त हुआ था 

ऐसा माना जाता है

· यदि कोई आंवले का एक वृक्ष लगाता है तो उस व्यक्ति को एक राजसूय यज्ञ के बराबर फल मिलता है।
· जो भी व्यक्ति अक्षय नवमी के दिन आंवले के पेड़ के नीचे बैठकर भोजन करता है, उसकी प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि होती है एवं दीर्घायु लाभ मिलता है।
· अक्षय्यनवमी के दिन ही द्वापर युग का प्रारम्भ माना जाता है।
· अक्षय्यनवमी को ही विष्णु भगवान कुष्माण्डक दैत्य को मारा था और उसके रोम से कुष्माण्ड की बेल हुई। इसी कारण कुष्माण्ड का दान करने से उत्तम फल मिलता है। इसमें गन्ध, पुष्प और अक्षतों से कुष्माण्ड (काशीफल, सीताफल या कद्दू भी कहते हैं) का पूजन करना चाहिये।
· विधि विधान से तुलसी का विवाह कराने से कन्यादान तुल्य फल मिलता है।
· इसी दिन भगवान श्री कृष्ण ने कंस-वध से पहले तीन वन की परिक्रमा करके क्रान्ति का शंखनाद किया था।  
स्कन्द पुराण के अनुसार
पूर्वकाल में जब समस्त संसार समुद्र में डूब गया तो जगतपिता ब्रह्माजी के मन में सृष्टि उत्पन्न करने का विचार आया। वे एकाग्रचित होकर ‘ऊं नमो नारायणाय’ का उपांशु जप करने लगे। वर्षों बाद जब भगवान विष्णु उन्हें दर्शन-वरदान देने हेतु प्रकट हुए और इस कठिन तपस्या का कारण पूछा तो ब्रह्मा जी ने कहा- ‘हे! जगतगुरु मैं पुन: सृष्टि आरम्भ करना चाहता हूं। आप मेरी सहायता करें।’ तब विष्णु जी कहा- ‘ब्रह्मादेव! आप चिंता न करें।’ विष्णु जी के दिव्य दर्शन एवं आश्वासन से ब्रह्मा जी भावविभोर हो उठे। उनकी आंखों से भक्ति-प्रेम वश आंसू बह कर नारायण के चरणों पर गिर पड़े, जो तत्काल वृक्ष के रूप में परिणत हो गए। ब्रह्मा जी के आंसू और विष्णु जी के चरण के स्पर्श मात्र से वह वृक्ष अमृतमय हो गया। विष्णु जी उसे धात्री (जन्म के बाद पालन करने वाली दूसरी मां) नाम से अलंकृत किया। सृष्टि सृजन के क्रम में सबसे पहले इसी ‘धात्रीवृक्ष’ की उत्पत्ति हुई। सब वृक्षों में प्रथम उत्पन्न होने के कारण ही इसे ‘आदिरोह’ भी कहा गया है। विष्णु जी ने ब्रह्मा जी को वरदान दिया- ‘ सृष्टि सृजन के क्रम में यह धात्री वृक्ष आप की मदद करेगा। जो जीवात्मा इसके फल का नियमित सेवन करेगी, वह त्रिदोषों- वात, पित्त एवं कफ जन्य रोगों से मुक्त रहेगी। इस दिन कार्तिक नवमी को जो भी जीव धात्री वृक्ष का पूजन करेगा, उसे विष्णु लोक प्राप्त होगा।’ तभी से इस तिथि को धात्री नवमी के रूप में मनाया जाता है। पद्म पुराण में भगवान शिव ने कार्तिकेय से कहा है ‘आंवला वृक्ष साक्षात् विष्णु का ही स्वरूप है। यह विष्णु प्रिय है और इसके स्मरण मात्र से गोदान के बराबर फल मिलता है।’

भाई दूज - भाई बहन के पावन प्रेम का अदभुत प्रतीक

भाई दूज या यम द्वितीया दिवाली के दो दिन बाद कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व भाई बहन के अदभुत स्नेह का प्रतीक है यह  पांच दिवसीय दीपोत्सव का समापन दिवस भी है  दीपावली महापर्व के अंतिम दिन का पर्व है भाईदूज’दीवाली का त्योहार भाईदूज के बिना अधूरा है।   
इस दिन प्रातःकाल चंद्र-दर्शन की परंपरा है और जिसके लिए भी संभव होता है वो यमुना नदी के जल में स्नान करते हैं।
स्नानादि से निवृत्त होकर दोपहर में बहन के घर जाकर वस्त्र और द्रव्य आदि द्वारा बहन का सम्मान किया जाता है और वहीं भोजन किया जाता है। मान्यता है कि ऐसा करने से कल्याण या समृद्धि प्राप्त होती है। बदलते हुए समय को देखें तो यह व्यस्त जीवन में दो परिवारों को मिलने और साथ समय बिताने का सर्वोत्तम उपाय है। ऐसा कहा गया है कि यदि अपनी सगी बहन न हो तो पिता के भाई की कन्यामामा की पुत्रीमौसी अथवा बुआ की बेटी – ये भी बहन के समान हैंइनके हाथ का बना भोजन करें। जो पुरुष यम द्वितीया को बहन के हाथ का भोजन करता हैउसे धनआयुष्यधर्मअर्थ और अपरिमित सुख की प्राप्ति होती है। यम द्वितीय के दिन सायंकाल घर में बत्ती जलाने से पूर्वघर के बाहर चार बत्तियों से युक्त दीपक जलाकर दीप-दान करने का नियम भी है। परंपरा के अनुसार इसी दिन शीतकाल के लिए यमुनोत्री धाम के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। यह ऐसा दिन है जब यमुना स्नान करने से शनि दोष और अकाल मृत्यु का भय दूर होता है। 


भाईदूज में हर बहन रोली एवं अक्षत से अपने भाई का तिलक कर उसके उज्ज्वल भविष्य के लिए आशीष देती हैं और अपने भाई के कल्याण व दीर्घायु, यशस्वी और सर्वगुण संपन्न होने की प्रार्थना करती हैं। भाई अपनी बहन को कुछ उपहार या दक्षिणा देता है |

सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज तथा यमुना का जन्म हुआ। यमुना अपने भाई यमराज से स्नेहवश निवेदन करती थी कि वे उसके घर आकर भोजन करें। लेकिन यमराज व्यस्त रहने के कारण यमुना की बात को टाल जाते थे।

कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमुना अपने द्वार पर अचानक यमराज को खड़ा देखकर हर्ष-विभोर हो गई। प्रसन्नचित्त हो भाई का स्वागत-सत्कार किया तथा भोजन करवाया। इससे प्रसन्न होकर यमराज ने बहन से वर माँगने को कहा।

तब बहन ने भाई से कहा कि आप प्रतिवर्ष इस दिन मेरे यहां भोजन करने आया करेंगे तथा इस दिन जो बहन अपने भाई को टीका करके भोजन खिलाए उसे आपका भय न रहे। यमराज 'तथास्तुकहकर यमपुरी चले गए।

ऐसी मान्यता है कि जो भाई आज के दिन यमुना में स्नान करके पूरी श्रद्धा से बहनों के आतिथ्य को स्वीकार करते हैं उन्हें तथा उनकी बहन को यम का भय नहीं रहता। जिनकी बहनें दूर रहती हैंवे भाई अपनी बहनों से मिलने भाईदूज पर अवश्य जाते हैं और उनसे टीका कराकर उपहार आदि देते हैं।

बहनें पीढियों पर चावल के घोल से चौक बनाती हैं। इस चौक पर भाई को बैठा कर बहनें उनके हाथों की पूजा करती हैं। इस पूजा में भाई की हथेली पर बहनें चावल का घोल लगाती हैं उसके ऊपर सिन्दूर लगाकर कद्दू के फूलपानसुपारी मुद्रा आदि हाथों पर रखकर धीरे धीरे पानी हाथों पर छोड़ते हुए कुछ मंत्र बोलती हैं जैसे
 "गंगा पूजे यमुना को यमी पूजे यमराज कोसुभद्रा पूजा कृष्ण को,
गंगा यमुना नीर बहे मेरे भाई की आयु बढ़े"
बहनों को इस दिन नित्य कृत्य से निवृत्त हो अपने भाई के दीर्घ जीवनकल्याण एवं उत्कर्ष हेतु तथा स्वयं के सौभाग्य के लिए अक्षत (चावलकुंकुमादि से अष्टदल कमल बनाकर इस व्रत का संकल्प कर मृत्यु के देवता यमराज की विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिए। इसके पश्चात यमभगिनी यमुनाचित्रगुप्त और यमदूतों की पूजा करनी चाहिए। तदंतर भाई के तिलक लगाकर भोजन कराना चाहिए। इस विधि के संपन्न होने तक दोनों को व्रती रहना चाहिए।
इस समय ऊपर आसमान में चील उड़ता दिखाई दे तो बहुत ही शुभ माना जाता है। इस संदर्भ में मान्यता यह है कि बहनें भाई की आयु के लिए जो दुआ मांग रही हैं उसे यमराज ने कुबूल कर लिया है या चील जाकर यमराज को बहनों का संदेश सुनाएगा। यमराज इस दिन वह यमलोक छोड़कर बहन यमुना से मिलने यमनोत्री पहुंचते हैं। इसलिए कहा जाता है कि इस पावन मौके पर यमलोक के द्वार बंद रहते हैं।
एक अन्य मान्यता के अनुसार इसी दिन चित्रगुप्त की पूजा से पितृ दोषकेतु ग्रह दोष की बाधा दूर होती है। ज्योतिष की दृष्टि से केतु के प्रसन्न होने से राहु स्वतठीक हो जाते हैं इस कारण चित्रगुप्त को प्रधान देवता मानते हुए पूजा करने से दैहिक भौतिक तापों से भी मुक्ति मिलती है।
भाईदूज की एक पौराणिक कथा यह भी है कि इस दिन भगवान कृष्ण नरकासुर को मारने के बाद अपनी बहन सुभद्रा के पास गए थे। तब सुभद्रा ने अपने भाई कृष्ण का पारंपरिक रूप से स्वागत किया और उनकी पूजा आरती की।

भाई दूज के लिए ऎसा भी प्रचलित है कि महावीर भगवान ने इसी दिन निर्वाण प्राप्त किया था जिससे उनके भाई राजा नंदीवर्घन महावीर को खोने से बहुत व्यथित हुए। तब उस दिन उनकी बहन सुदर्शना ने अपने भाई को काफी दिलासा दी और फिर उनकी सुख शांति के लिए हमेशा उनका साथ निभाया और उनकी रक्षा के लिए पूजा अर्चना की। तभी से सभी महिलाएं भइया दूज मनाकर भाई बहन के प्रेम का सम्मान करते आए हैं।

पूजा विधान इस दिन बहने अपने भाई की दीर्घायु की कामना के लिए व्रत रखती हैं। सुबह सुबह स्त्रानध्यान करने के बाद पूजा की थाली सजाकर भाई का तिलक करती हैं और उन्हें बुरी नजरों से बचाने के लिए उनकी आरती उतारती हैं। बदले में भाई भी बहनों के इस अटूट प्यार को देखकर उन्हें उपहार देते हैं। 
वस्तुतः इस त्योहार का मुख्य उद्देश्य है भाई-बहन के मध्य सौमनस्य और सद्भावना का पावन प्रवाह अनवरत प्रवाहित रखना तथा एक-दूसरे के प्रति निष्कपट प्रेम को प्रोत्साहित करना है। इस प्रकार 'दीपोत्सव-पर्वका धार्मिकसामाजिक एवं राष्ट्रीय महत्व अनुपम है।

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