113. ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष | अपरा (अचला ) एकादशी व्रत

अपरा (अचला ) एकादशी व्रत दिनांक 2 जून  रविवार को जानिये शुभ मुहूर्त, महत्व, पूजन विधि एवं व्रत कथा                                                                                                 note --एकादशी व्रत मे साबूदाना, चावल एवं सेम खाना वर्जित है                                                                                             👇👇👇👇👇👇👇👇👇                                                                 अपरा एकादशी शुभ मुहूर्त                                                                                                       एकादशी रविवार 2 जून को सुबह 05:04 से शुरू होगी और इसका समापन 3 जून सोमवार को 02:41पर होगा अतः व्रत 2 जून रविवार को रखा जाएगा                                                                           👇👇👇👇👇👇👇👇👇                                                           अपरा एकादशी महत्व                                                                                                          पौरानिक कथा के अनुसार इस व्रत को रखने से घर मे सदैव सुख -शांति बनी रहती है और धन -वैभव की कमी नहीं होती भगवान विष्णु को समर्पित यह व्रत जीवन मे खुशहाली एवं आनंद प्रदान करता है                                                                                   🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹                                                      अपरा एकादशी व्रत पूजन विधि                                                                                    👇👇👇👇👇👇👇👇👇                                                         इस दौरान प्रातः काल स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करें                                                                                                               भगवान विष्णु का ध्यान करें  एवं संकल्प ले एवं सूर्य भगवान को अर्ध्य ताबे  के लोटे से दे एवं हाथ जोड़े                                             अब एक चौकी ले उस पर पीला कपड़ा बिछाये और विष्णु जी की फोटो या प्रतिमा स्थापित करें                                                               फिर पंचामृत से स्नान कराये भगवान विष्णु को फूल माला अर्पित करें एवं कलश स्थापित  करें    जिसके नीचे चावल या गेहूं रखें उस कलश मे आम के पत्ते रखें एवं एक सिक्का डाले उसके बाद धूप दीप, मौसमी फल भोग प्रसाद एवं तुलसी दल चढ़ाये, पूजा के दौरान श्री विष्णु के मंत्रो का जाप करें एकादशी पोथी पढ़े एवं आरती करें शाम को फिर कपूर आरती करें भोग लगाकर व्रत का पारण करें दूसरे दिन फिर किसी जरूरत मंद ब्राह्मण को भोजन करा कर दान दक्षिणा दे एवं वस्त्र आदि देकर विदा करें एवं खुद भी भोजन करें                                                                                                             👇🌹👇🌹👇🌹👇🌹👇                                                                                                                                                                                                    *अपरा (अचला) एकादशी व्रत कथा*
👇👇👇👇👇👇👇
भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे राजन! यह एकादशी ‘अचला’ तथा’ अपरा दो नामों से जानी जाती है। पुराणों के अनुसार ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की एकादशी अपरा एकादशी है, क्योंकि यह अपार धन देने वाली है। जो मनुष्य इस व्रत को करते हैं, वे संसार में प्रसिद्ध हो जाते हैं।
👇👇👇👇👇👇👇
इस दिन भगवान त्रिविक्रम की पूजा की जाती है। अपरा एकादशी के व्रत के प्रभाव से ब्रह्म हत्या, भू‍त योनि, दूसरे की निंदा आदि के सब पाप दूर हो जाते हैं। इस व्रत के करने से परस्त्री गमन, झूठी गवाही देना, झूठ बोलना, झूठे शास्त्र पढ़ना या बनाना, झूठा ज्योतिषी बनना तथा झूठा वैद्य बनना आदि सब पाप नष्ट हो जाते हैं।
👇👇👇👇👇👇👇👇
जो क्षत्रिय युद्ध से भाग जाए वे नरकगामी होते हैं, परंतु अपरा एकादशी का व्रत करने से वे भी स्वर्ग को प्राप्त होते हैं। जो शिष्य गुरु से शिक्षा ग्रहण करते हैं फिर उनकी निंदा करते हैं वे अवश्य नरक में पड़ते हैं। मगर अपरा एकादशी का व्रत करने से वे भी इस पाप से मुक्त हो जाते हैं।
👇👇👇👇👇👇👇👇
जो फल तीनों पुष्कर में कार्तिक पूर्णिमा को स्नान करने से या गंगा तट पर पितरों को पिंडदान करने से प्राप्त होता है, वही अपरा एकादशी का व्रत करने से प्राप्त होता है। मकर के सूर्य में प्रयागराज के स्नान से, शिवरात्रि का व्रत करने से, सिंह राशि के बृहस्पति में गोमती नदी के स्नान से, कुंभ में केदारनाथ के दर्शन या बद्रीनाथ के दर्शन, सूर्यग्रहण में कुरुक्षेत्र के स्नान से, स्वर्णदान करने से अथवा अर्द्ध प्रसूता गौदान से जो फल मिलता है, वही फल अपरा एकादशी के व्रत से मिलता है।
👇👇👇👇👇👇👇
यह व्रत पापरूपी वृक्ष को काटने के लिए कुल्हाड़ी है। पापरूपी ईंधन को जलाने के लिए ‍अग्नि, पापरूपी अंधकार को मिटाने के लिए सूर्य के समान, मृगों को मारने के लिए सिंह के समान है। अत: मनुष्य को पापों से डरते हुए इस व्रत को अवश्य करना चाहिए। अपरा एकादशी का व्रत तथा भगवान का पूजन करने से मनुष्य सब पापों से छूटकर विष्णु लोक को जाता है।
👇👇👇👇👇👇👇👇👇
इसकी प्रचलित कथा के अनुसार प्राचीन काल में महीध्वज नामक एक धर्मात्मा राजा था। उसका छोटा भाई वज्रध्वज बड़ा ही क्रूर, अधर्मी तथा अन्यायी था। वह अपने बड़े भाई से द्वेष रखता था। उस पापी ने एक दिन रात्रि में अपने बड़े भाई की हत्या करके उसकी देह को एक जंगली पीपल के नीचे गाड़ दिया। इस अकाल मृत्यु से राजा प्रेतात्मा के रूप में उसी पीपल पर रहने लगा और अनेक उत्पात करने लगा।
👇👇👇👇👇👇👇👇👇
एक दिन अचानक धौम्य नामक ॠषि उधर से गुजरे। उन्होंने प्रेत को देखा और तपोबल से उसके अतीत को जान लिया। अपने तपोबल से प्रेत उत्पात का कारण समझा। ॠषि ने प्रसन्न होकर उस प्रेत को पीपल के पेड़ से उतारा तथा परलोक विद्या का उपदेश दिया।
👇👇👇👇👇👇👇👇
दयालु ॠषि ने राजा की प्रेत योनि से मुक्ति के लिए स्वयं ही अपरा (अचला) एकादशी का व्रत किया और उसे अगति से छुड़ाने को उसका पुण्य प्रेत को अर्पित कर दिया। इस पुण्य के प्रभाव से राजा की प्रेत योनि से मुक्ति हो गई। वह ॠषि को धन्यवाद देता हुआ दिव्य देह धारण कर पुष्पक विमान में बैठकर स्वर्ग को चला गया।
👇👇👇👇👇👇👇👇
हे राजन! यह अपरा एकादशी की कथा मैंने लोकहित के लिए कही है। इसे पढ़ने अथवा सुनने से मनुष्य सब पापों से छूट जाता है                                                             🙏🌹जय श्री महाकाल 🌹🙏

Comments

Popular posts from this blog

श्री गंगा स्तोत्र

100.2. एकादशी व्रत कथा - एकादशी महात्म्य

शनि जयंती पर विशेष