अनन्त चतुर्दशी व्रत की विधि
अनन्त व्रत की विधि
प्रातःकाल नित्यकर्म व स्नान आदि करने के उपरान्त पवित्र मन से भगवान का स्मरण करें। सर्वत्र सुख की कामना से लम्बोदर विध्न विनाशक श्री गणेश जी का ध्यान करें प्रसन्न मन से श्री चतुर्भुज विष्णु भगवान को प्रणाम करें। 'सव्र मंगलं मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके, शरण्ये व्यम्बके गौरि नारायणि नमास्तुते' यह श्लोक पढ़कर माता भगवती की स्तुति करके विद्या बल और वाणी की देवी सरस्वती को नमन करें। सर्वभूतेषु भगवान शंकर और इष्ट अन्य सभी देवी देवताओं की स्तुति करें। इस प्रकार से धूप-दीप करके देवमूर्ति के समक्ष एकान्त में दत्तचित्त से कथा पढ़ें अथवा सुनें-
॥ श्रीः ॥
॥ अनन्त चतुर्दशी व्रत निर्णय ।।
भाद्र शुक्लपक्ष की चतुर्दशी तिथि ही अनन्त व्रत के लिए उत्तम चतुर्दशी कही गई है। "उदये त्रिमुहूर्ताऽपि ग्राह्माऽनन्वव्रते तिथिः"
(कालमाधव)
"मुहूर्त्तमपि चेद् भाद्रे पूर्णिमायां चतुर्दशी। सम्पूर्णां तां विदुस्तस्यां पूजयेद्विष्णुभव्ययम्।"
(स्कन्दपुराण)
उपर्युक्त वचनों के अनुसार यद्यपि अनन्तचतुर्दशी उदयव्यापिनी ही लेनी चाहिए, किन्तु "मध्याह्न भोज्यवेलायां समुत्तीर्य सरित्तटे" इस वचन से कथा में मध्याह्न को कर्मकाल कहने से तथा 'पूजाव्रतेषु सर्वेषु मध्याहनव्यापिनी तिथिः इस माधवीय वचन के अनुसार सामान्यार्थक विधि वाक्य के विषपरक होने से अक्ताः शर्कराः उपदधाति की तरह चतुर्दशी को भी मध्याहनव्यापिनी ही लेना चाहिए, ऐसा दिवोदास के प्रतापमार्तण्ड और निर्णय सिन्धु में भी निर्णय किया गया है, अतः मध्याह्रव्यापिनी की ग्राह्य है।
सम्पादक
अनन्त चतुर्दशी कथा प्रारम्भ
सूतजी ने कहा-पूर्वकाल में श्री गंगा जी के तट पर धर्मवीर युधिष्ठिर ने वीर जरासन्ध को मारने के लिए राजसूय यज्ञ प्रारम्भ किया। उस युधिष्ठिर ने श्री कृष्ण चन्द्र के सहित भीमसेन, अर्जुन आदि भाइयों के साथ अनेक रत्नों से शोभित, मोती जड़ी हुई स्वर्ग के समान विशाल भारी यज्ञशाला बनवाई और उसमें यज्ञ के लिए सम्पूर्ण राजाओं को अनेक प्रकार से प्रयत्न कर बुलाया। एक दिन गांधारी के गर्भ से उत्पन्न, राजा धृतराष्ट्र का पुत्र, जो दुर्योधन नाम से विख्यात था, उस यज्ञशाला में आया। वहां कारीगरों की विविधता से उसे आंगन के स्थल भाग में जल की भ्रान्ति हुई और वह वस्त्र को ऊपर उठाकर धीरे-धीरे चलने लगा। यह देखकर द्रोपदी आदि श्रेष्ठ स्त्रियाँ मुस्कराने लगीं और वह दुर्योधन आगे जाकर पानी को भूमि समझकर उस पानी के बीच में गिर पड़ा। यह देखकर सम्पूर्ण राजा लोग, ऋषिगण, तपस्वी और द्रोपदी आदि स्त्रियाँ हँसने लगीं। यह देखकर राजाओं का भी राजा दुर्योधन अत्यन्त क्रोधित होकर अपने मामा शकुनि के साथ अपने राज्य में जाने के लिए उद्यत हुआ। उस समय शकुनि ने अत्यन्त मीठी वाणी में कहा कि हे राजन! अभी बहुत कार्य करना है इसलिए आप क्रोध न करें। हे राजेन्द्र ! यज्ञशाला में चलने के लिए उठिए। तब 'ऐसा ही सही' यह कहकर राजा दुर्योधन यज्ञशाला में चला। यज्ञ सम्पूर्ण होने पर राजा लोग यज्ञशाला से अपने-अपने राज्यो में जाने लगे। तदनंतर दुर्योधन भी राजाओं के साथ हस्तिनापुर में आया। वहां पाण्डु के श्रेष्ठपुत्र युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन आदि को बुलाया और अपने राज्य में जाकर जुआ खेलने लगा उस जुए में निष्पाप पाण्डवों का सम्पूर्ण धन और राज्यादि जीत लिया। तब भाइयों के सहित युधिष्ठिर बड़ी विपत्ति को प्राप्त हो जंगलों में वनचरों के समान रहने लगे। पाण्डवों के इस समाचार को सुनकर भाइयों सहित युधिष्ठिर को देखने की इच्छा से जगदीश्वर श्रीकृष्ण जी वहाँ गये। सूतजी ने कहा- दुख से अत्यन्त दुर्बल होकर वन में रहते हुए पाण्डवों ने जब श्रीकृष्ण को देखा तो क्रम से पूजनादि और प्रणाम किया। अनन्तर युधिष्ठिर बोले- हे प्रभो ! भाइयों सहित हमको यह अत्यन्त दुख प्राप्त हुआ है। इस दुःख स्वरूप सागर से हम कैसे छूटेंगे, सो कहिये। कौन से उत्तम देवता का पूजन करें अथवा कोन सा व्रत करें जिससे हमारा राज्य हमें मिले और आपकी कृपा से हमारा कल्याण हो। तब श्रीकृष्ण ने कहा- ये युधिष्ठिर! पुरुषों और स्त्रियों के सम्पूर्ण पाप का नाश करने वाला अत्यन्त उत्तम एक अनन्त व्रत है। वह भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की चतुर्दशी को होता है। उस व्रत के अनुष्ठान मात्र से सम्पूर्ण पापों का नाश होता है। राजा युधिष्ठिर बोले-कि हे वसुदेव ! आपने जो अनन्त व्रत कहा सो वह अनन्त कौन है? मुझसे सत्य-सत्य कहिये। श्रीकृष्ण ने कहा- हे धर्मराज ! अनन्त हमारा ही नाम है, इसे हमारा ही स्वरूप जानो, सूर्य आदि जितने ग्रहरूप हैं और काल (समय) जो कहे जाते हैं वे सब पल घड़ी, मुहूर्त, दिवस, रात्रि आदि रूप से पक्ष, मास ऋतु, वर्ष, युग और कालादि की व्यवस्था सब हमको ही जानो। यह जो काल हमने कहा है वह 'अनन्त' इस नाम से प्रसिद्ध है। वही कालरूप मैं पृथ्वी का भार उतारने के लिए इस कृष्ण नाम से उत्पन्न हुआ हूँ। दानवों का नाश करने और साधुओं की रक्षा करने के लिए वसुदेव के कुल में मुझे उत्पन्न हुआ जानो। ऐसा वचन सुनकर युधिष्ठिर बोले- हे जानने वालों में श्रेष्ठ ! अनन्त व्रत का महात्म्य और विधि कहिये। इस व्रत का अनुष्ठान करने वाले प्राणी को क्या पुण्य होता है, क्या फल मिलता है, क्या दान किया जाता है और किस देवता की पूजा की जाती है, पूर्वकाल में यह अनन्त व्रत किसने किया और मृत्युलोक में किसके द्वारा प्रकाशित हुआ, विस्तार सहित इस अनन्त व्रत को हमसे कहिये। श्रीकृष्ण जी ने कहा-सतयुग में सुमन्तु नाम का एक ब्राह्मण था, उसने वशिष्ठ गोत्र में उत्पन्न सुंदर रूपवती दीक्षा नाम की भृगु ऋषि की कन्या से वेदोक्त विधि से विवाह किया। हे राजन! उस स्त्री से कुछ समय बाद अनेक सुंदर लक्षणों से युक्त एक कन्या उत्पन्न हुई। यह शीला नाम की अत्यन्त सुशीला कन्या पिता के घर में बढ़ने लगी। एक दिन उसकी पतिव्रता माता कालज्वर के दाह से दुःखी होकर नदी के जल में प्राण त्याग कर स्वर्ग चली गई। तदन्तर उस सुमन्तु नामक ब्राह्मण ने धर्मपुंस ब्राह्मण की दुःशीला नाम की कन्या से विधिवत विवाह किया। वह कन्या नाम के सदृश ही दुष्ट स्वभाव की, कर्कश वचन बोलने वाली और प्रचण्ड थी और वह शीला नाम की कन्या पिता के घर में गृहकार्य करने में बड़ी चतुर हुई। वह दीवारों में बाहर के दरवाजों के ऊपर स्वास्तिक, शंख, कमल, नीले, पीले, सफेद और काले रंगों से अनेक प्रकार के चित्रों को लिख-लिखकर सजाया करती थी। इसके अनन्तर इसी तरह बहुत दिन बीतने पर कौमार्य अवस्था में प्राप्त वह कल्याणी शीला पिता के घर में बड़ी हो गई। उसको देखकर पिता चिंता करने लगा कि यह कन्या पृथ्वी पर किस गुणवान वर को दें, ऐसा विचार कर दुःखी होने लगा। इसी समय मुनियों में उत्तम, वेद-वेदांग को जानने वाले कौडिन्य नाम के मुनि विवाह की इच्छा से आये और बोले
पृष्ठ १० बाक
कौडिन्य मुनि भी नवविवाहिता, सुमन्तु की कन्या शीला को बैलगाड़ी पर बैठाकर धीरे-धीरे मार्ग में चलने लगे। जाते हुए पवित्र यमुना नदी को देखकर उसके किनारे गाड़ी खड़ी करके शिष्यों को उसकी देखरेख में नियुक्त कर स्वयं स्नान सन्ध्यादिक आवश्यक कार्य करने गये। मध्याह्न में भोजन के समय रथ से उतर कर नदी के किनारे उस शीला ने लाल वस्त्र पहने हुए स्त्रियों के झुण्ड को देखा। उन स्त्रियों के समूह को चतुर्दशी में भक्तिपूर्वक श्री जनार्दन भगवान का पूजन करते देखकर उसके पास जा वह शीला धीरे से पूछने लगी कि हे पूज्य स्त्रियों! यह क्या करती हो ! इस प्रकार के व्रत का क्या नाम है? ऐसा सुनकर उस शीला से वे स्त्रियाँ बोलीं- यह अनन्त का व्रत है, इसमें अनन्त भगवान की पूजा की जाती है। ऐसा सुनकर शीला ने कहा कि मैं भी इस उत्तम व्रत को करूँगी। इस व्रत की क्या विधि है? इसमें क्या दान होता है? कौन देवता पूजे जाते हैं? वे स्त्रियाँ बोलीं- हे शीले ! उत्तम अन्न को प्रस्थमात्र (१ सेर) लेकर मालपुआ आदि पकवान बनाकर आध 1 ब्राह्मण को देवे, और आधा स्वयं भोजन करे फिर शक्ति के अनुसार दक्षिणा देवे, और यह व्रत नदी के तट पर करे तथा भगवान की कथा सुने। कुशा के शेषनाग बनाकर बांस के पात्र में रखे, फिर स्नान कराकर मण्डल के भीतर रख उस अननत भगवान का विधिवत पूजन करे। चन्दन, पुष्प, धूप, दीप और अनेक प्रकार के नैवेद्य उनके आगे रखकर तथा मजबूत सूत का डोरा केशर में रंगकर चौदह गांठ देकर हाथ में इस मन्त्र से बांधे- "हे वासुदेव ! जिनका अन्त नहीं है ऐसे संसाररूपी महासमुद्र में डूबे हुए मेरा अच्छी तरह उद्वार करो और अपने अनन्त रूप में लीन करो। हे सूत्ररूपी अनन्त भगवान। आपको बार-बार प्रणाम है।" इस प्रकार सूत्ररूपी अनन्त को हाथ में बांधकर स्वस्थ चित्त हो भोजन करे। संसार रूपी अनन्त नारायण का ध्यान करके भोजन कर अपने घर जाए। हे भद्रे ! यह व्रत तुमसे कहा। श्रीकृष्ण बोले- हे राजेन्द्र ! प्रसन्न चित्त से ऐसा व्रत का विधान सुनकर उस शीला ने भी सुंदर डोरे को बायें हाथ में बांधकर व्रत किया। जैसे चौदह गांठ देकर बायें हाथ में बांधना कहा था वैसे ही बांधकर फिर पाथेय (सम्बल) जो बचा था उसका आधा ब्राह्मण को दे बाकी स्वयं खाया। फिर प्रसन्नचित्त हो जब पति के साथ बैलगाड़ी में बैठकर अपने घर को गई। तभी से उसको शुभ शकुनों से व्रत के प्रति विश्वास हो गया। अनन्त व्रत करने से गोधन आदि से युक्त और धन-धान्यादिक से उसका घर भरापूरा हो गया। वह सोने में पिरोये माणिक्य और मोतियों के हारों से भूषित रहती और उसके यहां इतने अतिथि आने लगे कि वह पूजन में सर्वदा व्यस्त रहती थी। मणिमय सुवर्ण के हारों से भूषित हुई वह मणियुक्त करधनी तथा मोतियों की मलाओं से अलंकृत, उत्तम वस्त्र पहिनी हुई सावित्री के समान शोभित होने लगी ओर घर में पति के साथ आनन्द से रहने लगी। किसी समय उसके पति कौडिन्य ने बैठी हुई शीला के हाथ में बंधा हुआ सुन्दर डोरा देखा। उसको देखकर वह बोली कि हे शीले ! यह डोरा क्या मुझे वश में करने को बाँधा है? तुमने इसे क्यों धारण किया है? इसका कारण कहो। यह सुनकर शीला बोली- जिसके प्रसाद से सम्पूर्ण धन-धान्य और सम्पदाएँ मनुष्य को मिलती हैं वही अनन्त मैंने धारण किया है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि हे पाण्डुपुत्र ! लक्ष्मी के मद से अंधे हुए शीला के पति उस ब्राह्मण ने शीला का वचन सुनकर उसके डोरे को जल्दी से तोड़ डाला और वह कौन अनन्त है? ऐसा कहते हुए पापात्मा उस मूर्ख ने डोरा जलती हुई अग्नि में डाल दिया। तब शीला ने व्याकुल होकर हाहाकार करती हुई दौड़कर डोरे को लेकर दूध में डाल दिया, उस पापकर्म से उसकी लक्ष्मी क्षीण होने लगी। गौ आदि को चोर ले गए, घर में आग लग गई, धन नष्ट हो गया, जो जिस प्रकार घर में आया था वह उसी प्रकार फिर चला गया। कुटुम्ब में भी कलह होने लगा, भाइयों में लड़ाई होने लगी, अनन्त को फेंकने के पाप से घर में दारिद्रय घुस गया। हे युधिष्ठिर ! उसके साथ संसार में कोई बातचीत न करता, वह शरीर से अतिशय संतप्त हो गया और मन से भी दुःखी बड़े भीषण दुःख को प्राप्त हुआ। तब उस कौडिन्य ने स्त्री से कहा कि हे शाले ! मैं सहसा उत्पन्न हुए शोक के कारण दुःखी हो गया हूँ। मेरा सम्पूर्ण धन नाश हो गया, स्वजनों से कलह होता है, मुझेसे कोई बोलता नहीं है। शरीर में नित्य ज्वर आदि ताप रहते हैं। चित्त में बड़ा भारी खेद होता है-इस अनर्थ का क्या कारण है? क्या तुम जानती हो? और क्या करने से भाग्य अच्छा होगा। तब सुंदर वस्ववाली शीला पति से बोली कि अनन्त को फेंकने के पाप का यह फल है और अब हे महाभाग ! उसके लिए उपाय करें तो फिर सब हो जाय। शीला के ऐसा कहने पर वह ब्रह्मर्षि मन से हरि भगवान की शरण में गए। इसके अनन्तर वह कौडिन्य निर्वेद को प्राप्त होकर वन को चला गया और उत्तम ब्राह्मण वायु का भक्षण कर तप करने लगा और उस परमेश्वर का मन से ध्यान करने लगा जिसके प्रसाद से मुझे धनादि मिला, जिसका अपमान करने से मैं निर्धन होकर दुःख को प्राप्त हुआ। तथा यह सारा धन आदि मुझको अतिशय सुख और दुःख देने वाला हुआ, ऐसा विचार करते हुए गहन वन में फिरने लगा। वहां पर उसने फूला हुआ एक आम का वृक्ष देखा, जिस पर एक भी पक्षी नहीं था और करोड़ों कीड़े लगे थे। उस आम के वृक्ष से उसने पूछा कि हे सौम्य ! तुमने कहीं अनन्त भगवान को देखा हो तो कहो, मेरे चित्त में अतिशय दुःख है। यह सुनकर आम का वृक्ष बोला कि हे ब्राह्मण ! मैंने अनन्त को नहीं देखा। यह सुनकर वह दुःखी होकर चल दिया और अनन्त भगवान को कहां देखेंगे ऐसा विचार करता हुआ घूमने लगा, इतने में बछड़े सहित एक गाय को देखा जो वन में इधर- उधर दौड़ रही थी। हे पाण्डव! वह ब्राह्मण गैया से बोला हे गौ ! तुमने यदि अनन्त भगवान को देखा हो तो कहो। तब गौ बोली कि हे कौडिन्य ! मैं अनन्त को नहीं जानती। वहां से आगे जाकर घास पर बैठे हुए वृषभ को देखकर उससे पूछने लगा कि हे गौ के पति ! तुमने अनन्त भगवान को देखा है? वह वृषभ बोला मैंने अनन्त भगवान को नहीं देखा है, इसके बाद आगे जाते हुए कौडिन्य ने बड़ी सुंदर दो पुष्करिणी (तलैया) देखीं। जिनका जल इसमें से उसमें और उसमें से इसमें आता-जाता हुआ अनेक प्रकार से किल्लौल करता था और कमल, कहार, कुमुदिनी आदि के पत्तों से शोभित हो रहा था। भ्रमर, हंस, चकोर और बगुलादिकों से सेवित ऐसी उक्त वापियों को देखकर ब्राह्मण ने उनसे पूछा कि तुम दोनों ने अनन्त भगवान को तो नहीं देखा है? यह सुनकर वे पुष्करिणी बोली कि हे द्विज! हमने अनन्त भगवान को तो नहीं देखा। उसके बाद आगे जाकर एक गदहा और एक हाथी देखा। उन दोनों से भी ब्राह्मण ने पूछा कि आप लोगों ने तो कहीं अनंत भगवान को नहीं देखा? इस प्रकार सबसे पूछता हुआ वह ब्राह्मण निराश हो उसी जगह बैठ गया। हे राजन युधिष्ठिर ! वह कौडिन्य जीवन से निराश और बड़ा विकल हो गया, बहुत गर्म ऊर्ध्व श्वांस लेकर भूमि में गिर पड़ा। कुछ देर बाद जब होश में आकर 'हे अनन्त !' ऐसा कहते हुए उठा तो अपने चित्त में निश्चत किया कि अब मैं प्राणों को त्याग दूँगा। श्रीकृष्ण कहते हैं-हे धर्मराज ! जब उस ब्राह्मण ने प्राण देने के लिए वृक्ष में फांसी लगायी, उसी समय दयाद्रहृदय हो अनन्त भगवान प्रत्यक्ष हो गए और वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण कर बोले कि यहाँ आओ यह कहकर उस कौडिन्य का दाहिना हाथ पकड़कर एक गुफा में ले गए। उस गुफा में कौडिन्य ने एक शहर देखा जिसमें बड़े स्वरूपवान स्त्री-पुरुष विद्यमान थे और शुभदायक दिव्य सिंहासन पर भगवान बैठे थे जिनके अगल-बगल शंख, चक्र, गदा और गरुड़ शोभायमान हो रहे हैं कभी न समाप्त होने वाली विभूति (ऐश्वर्य के प्रकारों से अपरिमित प्रभाव वाले) और कौस्तुभमणि, वनमालादिक अनेक प्रकार के आभूषण धारण किए हुए विश्वरूप अनन्त भगवान को उस कौडिन्य ने देखा। अतिशय प्रकाशमान उपर्युक्त स्वरूप वाले अनन्त को देखकर उनके आगे ऊंचे स्वर से 'हे प्रभो! आपकी जय हो' ऐसा कह और प्रमाण करके बोला कि हे पुण्डरीकाक्ष! मैं पापरूप और पाप कर्म करने वाला हूँ, मेरी आत्मा पापरूप है और पाप से ही उत्पन्न हुआ हूँ, मेरी रक्षा करें और मेरे सम्पूर्ण पापों को नष्ट कर दें उसका वचन सुनकर अनन्त भगवान बड़े कोमल वचन से बोले कि हे विपेन्द्र ! डरो मत, जो तुम्हारे मन में हो सो कहो। कौडिन्य ने कहा- हे प्रभो! मैंने धन से उन्मत्त होकर अनन्त का डोरा तोड़ डाला। उस पापकर्म से मेरा धन नष्ट हो गया। घर में अपने जनों से कलह होता है जिसके कारण मुझसे कोई भी नहीं बोलता। इस प्रकार दुःखी हो आपके दर्शन की इच्छा से मैं जंगल में फिरने लगा। हे देवताओं के भी स्वामी! आपने कृपाकर अपना दर्शन दिया। अब मुझसे दया करके उस पाप की शांति कहिए। श्रीकृष्ण बोले- हे युधिष्ठिर! भक्तों से प्रसन्न किये गये देवता क्या नहीं देते? अनन्त भगवान भी उस ब्राह्मण का वचन सुनकर बोले, अनन्त भगवान ने कहा- हे कौडिन्य! तुम अपने घर जाओ, देरी मत करो और भक्ति-पूर्वक चौदह वर्ष तक अनन्त का व्रत करो। इससे सम्पूर्ण पापों से छूटकर पुत्र-पौत्र को उत्पन्न कर इच्छित भोगों को भोगकर सिद्धि पाओगे। ऐसा सुनकर कौडिन्य ने कहा- हे स्वामी! मैं कुछ पूछता हूँ उसे कहिए। वह आम का वृक्ष कौन था? और कमल, कुमुदिनी, कहार आदि से सुशोभित परम सुंदर दो पुष्करिणी जंगल में देखी हैं। सो क्या थीं? वह गदहा कौन था? वह हाथी कौन था? और वह उत्तम वृद्ध कौन था? अनंतदेव बोले-वह आम का वृक्ष वेद विद्या को अच्छी तरह से जानने वाला ब्राह्मण था, उसने शिष्यों को विद्या नहीं दी-इसलिए वह वृक्ष हुआ और जो गौ देखी थी वह बीज को खाने वाली पृथ्वी रही और जो घास पर वृषभ देखा था, वह सत्यलोक में धर्म था और धर्म-अधर्म का निर्णय ठीक वचन सुनकर बोले, अनन्त भगवान ने कहा- हे कौडिन्य ! तुम अपने घर जाओ, देरी मत करो और भक्ति-पूर्वक चौदह वर्ष तक अनन्त का व्रत करो। इससे सम्पूर्ण पापों से छूटकर पुत्र-पौत्र को उत्पन्न कर इच्छित भोगों को भोगकर सिद्धि पाओगे। ऐसा सुनकर कौडिन्य ने कहा- हे स्वामी! मैं कुछ पूछता हूँ उसे कहिए। वह आम का वृक्ष कौन था? और कमल, कुमुदिनी, कहार आदि से सुशोभित परम सुंदर दो पुष्करिणी जंगल में देखी हैं। सो क्या थीं? वह गदहा कौन था? वह हाथी कौन था? और वह उत्तम वृद्ध कौन था? अनंतदेव बोले-वह आम का वृक्ष वेद विद्या को अच्छी तरह से जानने वाला ब्राह्मण था, उसने शिष्यों को विद्या नहीं दी-इसलिए वह वृक्ष हुआ और जो गौ देखी थी वह बीज को खाने वाली पृथ्वी रही और जो घास पर वृषभ देखा था, वह सत्यलोक में धर्म था और धर्म-अधर्म का निर्णय ठीक नहीं करता था। वह पुष्करिणी दोनों बहिन और ब्राह्मणी थीं। धर्म अधर्म आदि जो कुछ होता परस्पर देतीं और ले लेती रहीं तथा उन्होंने वेद पाठ करने वाले ब्राह्मणों तथा गरीबों को कुछ नहीं दिया। भिक्षुकों को भिक्षा नहीं दी उस पापकर्म से दोनों का जल आपस में इधर का उधर और उधर का इधर होता रहता है, और गदहा जो देखा वह क्रोध था, जो हाथी देखा वह अभिमान था, जो ब्राह्मण था वह मैं ही अनन्त हूँ और जो गुफा थी वह कठिन संसार सागर है। ऐसा कहकर भगवान अनन्त उसी जगह अन्तर्धान हो गये। चौदह वर्ष तक अनन्त व्रत करके जैसा अनन्त भगवान ने कहा था वह सब सुख भोगकर फिर अन्त में अनन्तलोक को गया। इसी तरह से हे राजर्षि ! तुम भी कथा सुनते हुए व्रत करो।
६॥ आरती ॐ जय जगदीश हरे ॥
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करें।॥ ॐ॥
जो ध्यावे फल पावे दुःख विनशे मन का।।
सुख सम्पत्ति घर आवे कष्ट मिटे तन का॥ ॐ॥
मात-पिता तुम मेरे शरण गहूं किसकी ॥
मैं मूरख खल कामी कृपा करो भर्ता॥ ॐ॥
तुम बिन और न दूजा आस करूं जिसकी ॥ ॐ॥
विषय विकार मिटाओ पाप हरो देवा ॥
तुम पूरण परमात्मा तुम अन्तर्यामी ।।
पारब्रह्म परमेश्वर तुम सबके स्वामी ॥ ॐ॥
तुम करुणा के सागर तुम पालन कर्ता ॥
तुम हो एक अगोचर सबके प्राणपति॥
किस विधि मिलूं तुमको मैं कुमति॥ ॐ॥
दीन बन्धु दुःख हर्ता तुम ठाकुर मेरे ॥
करुणा हस्त बढ़ाओं द्वार पड़ा तेरे ॥ ॐ॥
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओं संतन की सेवा ॥ ॐ ॥
श्री भगवान जी की आरती जो काई नर गावे।।॥
कहत शिवानन्दस्वामी मनवांछित फल पावे ॥ ॐ ॥
॥ इति ।।
हर प्रकार की कंठी माला, रुद्राक्ष, तुलसी हरीनाम, कमल गट्टा की माला, भगवान की पोशाक, शंख, राम नामी चादर, मूर्ति, नवरत्न अंगूठी, सिंहासन, लड्डू गोपाल, आसन, जनेऊ, पूजा पाठ की सामग्री व धार्मिक पुस्तकें, रामायण, गीता, सुखसागर, शिवपुराण, वेद, उपनिषद, शास्त्र पुराण आदि मिलने का एक मात्र केन्द्र अब रोहिणी में भी खुल गया है एक बार पधार कर सेवा का मौका अवश्य दें।
मानस मानस प्रकाशन (पूजन भण्डार )
डी-11, 378 डी.डी. मार्केट के सामने साईंबाबा मन्दिर के पास, सैक्टर -7, रोहिणी, दिल्ली-1100085 फोन : 9868261424, 9868261425
24
23
Comments
Post a Comment