ज्येष्ठ एकादशी व्रत
अपरा एकादशी कब
अपरा एकादशी व्रत (ज्येष्ठ कृष्ण 11) (2 जून 2024स्मार्त /3 जून 2024 वैष्णव जन)
राधे राधे जय श्री कृष्ण।
जैसा कि हम जानते हैं कि एकादशी या तिथि युक्त व्रतों को लेकर हमेशा कुछ ना कुछ कन्फ्यूजन रहता है। वर्तमान में ज्येष्ठ मास चल रहा है। इसमें भी दो एकादशियां आती हैं। पहली एकादशी ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की ग्यारस को पड़ती है। जिसे हम 🌺अपरा एकादशी 🌺 के नाम से जानते हैं।
दूसरी एकादशी ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की ग्यारस को पड़ती है। जिसे हम 🌺 निर्जला एकादशी 🌺 के नाम से जानते हैं। 🌺 निर्जला एकादशी 🌺 के समय और तारीख के बारे में हम Next अर्थात आगामी वीडियो में चर्चा करेंगे।
एकादशीका व्रत करनेवाला दशमीको जौ, गेहूँ और मूँगके पदार्थका एक बार भोजन करे। एकादशीको प्रातः स्नानादि करके उपवास रखे और द्वादशीको पारण करके भोजन करे।
ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की ग्यारस को पड़ने वाली इस एकादशी का नाम 'अपरा' है। इस एकादशी व्रत के करने से अपार पाप दूर होते हैं।
यह एकादशी 2 जून, 2024 ई. को अरुणोदय के समय दशमी तिथि से विद्धा है, अतः वैष्णव लोग 2 जून, 2024 ई. के दिन एकादशी व्रत न करके 3 जून, 2024 ई. को करेंगे। लेकिन स्मार्त्त लोग, जो 'अरुणोदये दशमीवेध' वर्जित नहीं करते (मानते), वे तो 2 जून, 2024 ई. को ही यह व्रत रखेंगे। गरुड़पुराण का वाक्य है- "
दशमीशेष-संयुक्तो यदि स्यादरुणोदयः। नैवोयोष्यं वैष्णवेन तद्दिनैकादशीव्रतम् ।।'
इस व्रत के बारे में आगे बताया गया है कि जो लोग सद्वैद्य होकर गरीबोंका इलाज नहीं करते, षट्शास्त्री अर्थात छहो शास्त्रों का ज्ञाता होकर जो बिना माँ-बाप के अर्थात अनाथ बच्चों को नहीं पढ़ाते, सद्वत राजा होकर भी गरीब प्रजाको कभी नहीं सँभालते, सबल होकर भी अपाहिजको आपत्तिसे नहीं बचाते और धनवान् होकर भी आपदाग्रस्त परिवारोंको सहायता नहीं देते, वे नरकमें जानेयोग्य पापी होते हैं।
किंतु अपरा एकादशी के व्रत में ऐसी शक्ति है कि यह ऐसे व्यक्तियोंको भी निष्पाप करके वैकुण्ठमें भेज देता है।
गरुड़पुराण का वाक्य है- "
दशमीशेष-संयुक्तो यदि स्यादरुणोदयः।
नैवोयोष्यं वैष्णवेन तद्दिनैकादशीव्रतम् ।।'
अर्थात
गरुड़पुराण के अनुसार-
यदि एकादशी अरुणोदय के समय दसवीं से संयुक्त या विद्ध है तो वैष्णव जनों को यह एकादशी व्रत नहीं करना चाहिए।
गरुड़पुराण के इस कथन के अनुसार- सभी वैष्णव जनों को अगली तारीख की एकादशी करनी चाहिए परंतु त्रयोदशी से पहले आपको पारण करना है।
इस व्रत को विधिपूर्वक रखने तथा किसी गरीब परिवार की सामर्थ के अनुसार अन्न धन आदि से सहायता करने से अनेक प्रकार के ज्ञात अथवा अज्ञानतावश किए गए पापों का क्षय हो जाता है।
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🌺 राधे राधे जय श्री कृष्ण।🌺
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निर्जला एकादशी व्रत की पूजा विधि
इस व्रत में सूर्योदय से पहले उठना जरूरी होता है। फिर तीर्थ स्नान करने का विधान है। ऐसा न कर पाएं तो पानी में गंगाजल की कुछ बूंदे और एक चुटकी तिल मिलाकर नहाते हैं। फिर व्रत करने का संकल्प लिया जाता है। इसके बाद उगते हुए सूरज को जल चढ़ाकर दिन की शुरुआत होती है। एकादशी तिथि के सूर्योदय से अगले दिन द्वादशी तिथि के सूर्योदय तक जल नहीं पिया जाता और भोजन भी नहीं किया जाता है।
1. भगवान विष्णु की पूजा, दान और दिनभर व्रत रखने का संकल्प लेना चाहिए। भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा करनी चाहिए।
2. पीले कपड़े पहनकर पूजा करनी चाहिए। पूजा में पीले फूल और पीली मिठाई जरूरी शामिल करनी चाहिए।
3. इसके बाद ऊं नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करें। फिर श्रद्धा और भक्ति से कथा सुननी चाहिए।
4. जल से कलश भरे और उसे सफेद वस्त्र से ढंक कर रखें। उस पर चीनी और दक्षिणा रखकर ब्राह्मण को दान दें।
जल कलश और तिल दान से अश्वमेध यज्ञ का पुण्य
पुरी के ज्योतिषाचार्य डॉ. गणेश मिश्र के मुताबिक निर्जला एकादशी पर जरुरतमंद लोगों को जल दान के साथ ही अन्न, कपड़े, आसन, जूता, छाता, पंखा और फलों का दान करना चाहिए। इस दिन जल से भरे कलश और तिल का दान करने से अश्वमेध यज्ञ करने जितना पुण्य मिलता है। जिससे पाप खत्म हो जाते हैं।
इस दान से व्रत करने वाले के पितर भी तृप्त हो जाते हैं। इस व्रत से अन्य एकादशियों पर अन्न खाने का दोष भी खत्म हो जाता है और हर एकादशी व्रत के पुण्य का फल मिलता है। श्रद्धा से जो इस पवित्र एकादशी का व्रत करता है, वह हर तरह के पापों से मुक्त होता है।
नौतपा के चलते जलदान से मिलता है पुण्य
निर्जला एकादशी ज्येष्ठ महीने में नौतपा के दौरान आती है, इस महीने में जल की पूजा और दान करने का भी बहुत महत्व होता है, ये ही वजह है कि इस दिन पानी से भरे मटकों का दान करते हैं और जरुरतमंद लोगों को पानी पिलाया जाता है। इस तिथि पर तुलसी, पीपल और बरगद में भी पानी चढ़ाने से कई गुना पुण्य मिलता है।
निर्जला एकादशी पर भूल से भी न करें ये काम
1- निर्जला एकादशी के दिन बाल और शिविंग नहीं करनी चाहिए। वहीं शास्त्रों में नाखून काटना भी वर्जित बताया गया है। क्योंकि अगर आप ऐसा करने हैं तो आपके जीवन में दरिद्री छा सकती है। साथ ही मां लक्ष्मी रुष्ट हो सकती हैं।
2- निर्जला के दिन सुबह जल्दी उठ जाना चाहिए। साथ ही जल्दी स्नान करके साफ- स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। वहीं इसके बाद सूर्य देव को जल अर्पित करना चाहिए। वहीं अगर आप सुबह देर तक सोते हैं, तो मां लक्ष्मी नाराज हो सकती हैं।
3- निर्जला एकादशी के दिन पीले या सफेद रंग के वस्त्र धारण करने चाहिए। पीले रंग का संबंध भगवान विष्णु से माना जाता है। साथ ही काले रंग के वस्त्र नहीं पहनने चाहिए।
4- अगर आप प्याज और लहसुन का सेवन करते हैं, तो एकादशी के दिन भूलकर भी प्याज और लहसुन का सेवन नहीं करना चाहिए। क्योंकि प्याज और लहसुन को तामसिक भोजन माना जाता है और इनका सेवन करने से मन पूजा में नहीं लगता है। जिससे पूजा का पूरा फल प्राप्त नहीं हो पाता है। इसलिए निर्जला एकादशी के दिन प्याज लहसुन का सेवन नहीं करना चाहिए। अगर आपके घर में कोई व्रत नहीं भी है तो भी प्याज लहसुन का प्रयोग न करें। वहीं इस दिन भूलकर शराब का सेवन भी नहीं करना चाहिए।
राधे राधे जय श्री कृष्ण।
ज्येष्ठ मास में भी दो एकादशियां आती हैं। पहली एकादशी ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की ग्यारस को पड़ती है। जिसे हम 🌺अपरा एकादशी 🌺 के नाम से जानते हैं।
दूसरी एकादशी ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की ग्यारस को पड़ती है। जिसे हम 🌺 निर्जला एकादशी 🌺 के नाम से जानते हैं।
ज्येष्ठ शुक्ला एकादशी का नाम निर्जला है; अतः नामके अनुसार बिना जल ग्रहण किए यह एकादशी वृत किया जाता है।
🌺 निर्जला एकादशी 🌺 के इस व्रत के द्वारा स्वर्गादिके सिवा शरीर में आयु और आरोग्यवृद्धिके तत्त्व विशेषरूपसे स्वत: विकसित हो जाते हैं।
अब हम इस वीडियो में हम 🌺 निर्जला एकादशी 🌺 2024 के समय और तारीख के बारे में चर्चा करेंगे।
इस बार की 🌺 निर्जला एकादशी 🌺 18 जून, 2024 ई. को पहले दिन षष्टि-घट्यात्मक अर्थात पूरा दिन अर्थात पूरे 60 घड़ी है।
साथ ही दूसरे दिन भी यही (एकादशी) विद्यमान् है। और यहां द्वादशी का क्षय भी नहीं है।
अतः 18 जून, 2024 ई. को ही स्मार्त्त और वैष्णव दोनों को उत्तरवर्ती द्वादशीयुता एकादशी के दिन ही निर्जला एकादशी का व्रत करना चाहिए।
नारदजी के वाक्यानुसार
"सम्पूर्णकादशी यत्र प्रभाते पुनरेव सा।
सर्वैरेवोत्तरा कार्या परतो द्वादशी यदि ।।"
नारदजी के अनुसार- यदि द्वादशी अगले दिन हो तो सभी को उत्तरवर्ती द्वादशीयुता एकादशी करनी चाहिए।
निर्जला एकादशी का आरंभ 17 जून को सुबह 4 बजकर 43 मिनट से हो जाएगा और इसके बाद 18 जून को सुबह 6 बजकर 24 मिनट तक रहेगी। निर्जला एकादशी का व्रत 18 जून को रखा जाएगा और इस व्रत का पारण अगले दिन सुबह 19 जून को दान पुण्य करने के बाद होगा।
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