षष्ठी माता कथा आरम्भ
षष्ठी माता कथा आरम्भ (संस्कृत)
नारद उवाच
षष्ठी मङ्गलचण्डी च मनसा प्रकृतेः कला।
उत्पतिमासां चरितं श्रोतमिच्छामि तत्त्वतः ।१।
नारायण उवाच
षष्ठांशा प्रकृतेर्या च सा च षष्ठी प्रकीर्तिता।
बालकानामधिष्टात्री विष्णुमाया च बालदा । २।
मातृकासु च विख्याता देवसेनाभिधा च या।
प्राणाधिकप्रिया साध्वी स्कन्दभार्या च सुव्रता।३।
आयुःप्रदा बालानां धात्री रक्षणकारिणी।
सततं शिशुपार्श्वस्था योगेन सिद्धियोगिनी ।४।
तस्याः पूजनविधिं ब्रह्मन्नितिहासमिदं श्रृणु।
यच्छुतं धर्मवक्त्रेण सुखदं पुत्रदं परम्।५।
राजा प्रियव्रतश्चासीत् स्वायम्भुवमनोः सुतः।
योगीन्द्रो नीद्वहद्वार्या तपस्यासु रतः सदा।६।
बह्याज्ञया च यत्नेन कृतदारो बभूव ह।
सुचिरं कृतदारश्यन लेभे तनयं मुने।७।
बभूव ह। पुत्रेष्टियज्ञं तं चापि कारयामास कश्यपः।
मालिन्यै तस्य कान्तायै मुनिर्यज्ञचरूं ददौ ।८।
भुक्त्वा च तं चरूं तस्याः सद्यो गर्भो वभुव है।
दधार तं च सा देवी दैवं द्वादशवत्सरम्।९।
ततः सुषाव सा ब्रह्मन् कुमारं कनकप्र भम्।
सर्वावयवसम्पन्ने मृतमुत्तारलोचनम् ।१०।
तं दृष्टवा रूरूदुः सर्वा नार्यश्च बान्धवस्त्रियः।
मूर्च्छामवाप तन्माता पुत्रशोकेन भूयसा । ११।
श्मशानं च ययौ राजा गृहीत्वां बालकं मुने।
रूरोद तत्र कान्तारे पुत्र कृत्वा स्ववक्षसि ।१२।
नोत्सृजद् बालके राजाप्राणांस्त्युक्त समुद्यतः।
ज्ञानयोगंन विसस्मार पुत्रशोकात् सुदारूणत् ।१३।
एतस्मिन्नतरे तत्र विमानं च ददर्श सः।
शुद्धस्फटिक सकाशं मणिराजविनिर्मितम् ।१४।
तेजसा ज्वलितं शश्वच्छोभितं क्षौमवाससा।
नानाचित्रवचित्राढ्यं पुष्पमालाविराजितम् ।१५।
ददर्श तत्र देवीं च कमनीयां मनोहराम्।
श्वेतचम्पकवर्णाभां शाश्वत् सुस्थिरयौवनाम्।१६।
ईषद्धास्यप्रसन्नास्यो रत्नभूषणभूषिताम् ।
कृपामयीं योगसिद्धां भक्तानुग्रहकातराम्।१७।
दृष्ट्वा तां पुरतो राजा तुष्टाव परमादरम्।
चकार पूजनं तस्या विहाय बालकं भुवि।१८।
प्रप्रच्छ राजा तां तुष्टां ग्रीष्मसूर्य समप्रभाम्।
तेजसा ज्वलितां शान्तां कान्तां स्कन्दस्य नारद।19।
राजोवाच
का त्वं सुशोभने कान्ते कस्य कान्तासि सुव्रते ।
कस्य कन्या वरारोहे धन्या मान्या च योषिताम्।२०।
नृपेन्द्रस्य वचः श्रुत्वा जगन्मङ्गल चण्डिका ।
उवाच देवसेना सा देवानां रणकारिणी । २११s
देवानां दैत्यग्रस्तानां पुरा सेना बभूव सा।
जयं ददौ सा तेभ्यश्च देवसेना च तेन सा।२२।
देवेसेनोवाच
ब्रह्मणो मानसी कन्या देवसेनाहमीश्वरी।
सृष्ट्वा तां मनसा धाता ददौ स्कन्दाय भूमिप।२३।
मातृकाशु च विख्याता स्कन्दभार्या च सुव्रता।
विश्वे षष्ठीति विख्याता षष्ठांशा प्रकृतेः परा। २४।
कर्मणा बहुपुत्रश्च वंशहीनः स्वकर्मणा।
अपुत्राय पुत्रदाहं प्रियादात्री प्रियाय च।
धनदाहं दरिदेभ्यः कर्मिभ्यश्च स्वकर्मदा ।२५।
सुखं दुःखं भयं शोको हर्षो मंगलमेव च।
सम्पति विपति सर्व भवति कर्मणा।२६।
कर्मणा मृतपुत्रश्च कर्मणा चिरजीविनः । २७।
कर्मणा गुणवांश्चैव कर्मणा चांगहीनकः।
कर्मणा बहुभार्यश्च भार्याहीनश्च कर्मणा।२८।
कर्मणा रूपवान् धर्मी रोगी शाश्वत् स्वकर्मणा ।
कर्मण च भवेद् व्याधिः कर्मणाऽरोग्यमेव च।२९।
तस्मात् कर्मपरं राजन् सर्वेभ्य श्रुतौ श्रुतम्।
इत्येव मुक्त्वा सा देवी गृहीत्वा बालकं मुने। ३०।
महाज्ञानेन सा देवी जीवयामास लीलया।
राजाददर्शतं बालं सस्मितं कनक प्रभम्।३१।
देवसेना च पश्यन्तं नृपमापृच्छय या नदा।
गृहीत्वा बालकं देवी गगनं गन्तुमुद्यता ।३२।
पुनस्तुष्टाव तां राजा शुष्ककण्डोष्ठतालुकः।
नृपस्तोत्रेण सा देवी परितुष्टा बभूव ह ।३३।
देव्युवाच
उवाच तें नृप ब्रह्मन् वेदोक्त ब्रह्मन् वेदोक्तं कर्मनिर्मितम्।
त्रिषु लोकेषु त्वं राजा स्वयायम्भुवमनोः सुतः ।३४।
मम पूजां च सर्वत्र कारयित्वा स्वयं कुरू।
तदा दास्यामि पुत्रं ते कुलपदां मनोहरम्। ३५।
सुव्रतं नाम विख्यातं गुणवन्तं सुपण्डितम् ।
जातिस्परं च योगीन्द्रं नारायणकलात्मकम् ।३६।
शतक्रतुकरं श्रेष्ठं क्षत्रियाणां च वेन्दितम्।
देव्युवाच
उवाच तें नृप ब्रह्मन् वेदोक्तं कर्मनिर्मितम्।
विषु लोकेषु त्वं राजा स्वयायम्भुवमनोः सुतः ।34।
मम पूजां च सर्वत्र कारयित्वा स्वयं कुरू।
तदा दास्यामि पुत्रं ते कुलपद्म मनोहरम्। ३५।
सुव्रतं नाम विख्यातं गुणवन्तं सुपण्डितम् ।
जातिस्मरं च योगीन्द्रं नारायणकलात्मकम् ।३६।
शतक्रतुकरं श्रेष्ठं क्षत्रियाणां च वन्दितम।
मत्तमातंगलक्षाणां धृतवन्तं बलं शुभम् ।३७।
धनिनं गुणिनं शुद्ध विदुषां प्रियमेव च ।
योगिनां ज्ञानिनां चैव सिद्धिरूपं तपस्विनाम्। ३८।
यशस्विनं च लोकेषु दातारं सर्वसम्पदाम् ।
इत्येवमुक्त्वा सादेवी तस्मै तद्बालकंददौ ।३९।
राजा चकार स्वीकारं पूजार्थ च प्रियव्रतः।
जगाम देवी स्वर्ग च दत्वा तस्मै शुभं वरम् ।४०।
आजगाम सहामात्यः स्वगृहं हृष्टमानसः ।
आगत्यं कथयामास वृत्तान्तं पुत्रहेतुकम् ।४१।
श्रुत्वा बभूवुः सन्तुष्टा नरा नार्यश्च नारद।
मंगलं कारयामास सर्वत्र पुत्रह तु कम् ।४२।
देवीं च पूजयामास ब्राह्मणेभ्यो धनं ददौ।
राजा च प्रति मासेषु शुक्लषष्ठयां महोत्सवम्। ४३।
षष्ठया देव्याश्च यत्नेन कारयामास सर्वतः।
बालानां सूतिकागारे षष्ठाहे यत्न पूर्वकम्।४४।
तत्पूजो कारयामासं चैकविंशतिवासरे।
बालानां शुभकार्ये च शुभान्नप्राशने तथा।४५।
सर्वत्र वर्धयामास स्वयमेव चकार ह।
॥इति देवीभागवतन्तर्गतेषष्ठी माता कथा सम्पूर्णम् ॥
षष्ठी माता कथा आरम्भ (हिन्दी)
नारद जी ने कहा-हे ब्रह्मन्। षष्ठी देवी, मंगलचण्डी और मनसादेवी ही मूल प्रकृति की अंशावतार है। अतः इनकी उत्पति और चरित्र जानना चाहता हूँ ।। 1।। नारायण ने कहा-हे नारद ! मूल प्रकृति के छठे अंश को ही षष्ठी देवी कहा है। ये बालकों की अधिष्ठात्री देवी है। भगवान विष्णु की माया और सबको बालक देने वाली हैं ।। 2 ।। यह षोडश मातृकाओं में देवसेना के नाम से विख्यात है । यह स्कन्द कुमार की प्राणों से भी अधिक प्रिय, सुन्दर व्रतवाली, पतिव्रता पत्नी हैं ।। ३ ।। यह बालकों को आयु देती हैं। बालकों की माता के रूप में सदा रक्षा करती है। यह सिद्धयोगिनी अपने योगबल से बालकों के बगल में सर्वदा खड़ी रहती है ।। ।। 4 ।। इन षष्ठी देवी की पूजाविधि और इतिहास सुनिए। इससे परम सुख मिलता है और सन्तान की प्राप्ति होती है। इस इतिहास को मैने धर्म के मुख से सुना था ।। 5 ।। स्वयाम्भूव मनु के पुत्र राजा प्रियव्रत हुए। बह योगी राज होकर सदा तपस्या किया करते थे। इसलिए उन्होने विवाह नहीं किया ।। 6 ।। तब ब्रह्माजी के प्रयत्न रूप से. उनके आदेशको मानकर राजा ने विवाह करना स्वीकार किया। हे नारद जी। विवाह के बाद बहुत वर्ष बीत जाने पर भी राजा को कोई पुत्र नही हुआ ।। 7 ।। महर्षि कश्यप जी ने उनसे पुत्रेष्टि यज्ञ कराया। यज्ञ समाप्ति पर कश्यपजी ने उनकी रानी मालिनी को यज्ञीय चरू दिया ।। 8 । उस चरू के खाने के साथ ही रानी को तत्काल गर्भ रह गया और यह देवी-दैववर्ष की गणनानुसार बारह वर्ष तक गर्भवती रह गयो। हे ब्रह्मन ! उसने सुवर्णकी तरह कान्ति मान् एक पुत्र को जन्म दिया जिसके सब अंग प्रत्यंग बन चुके थे। लेकिन वह मरा हुआ था और आँखो की पुतलियों उल्टी हुई थी ।। 10 ।। उस बालक को देखकर रनिवास की सभी स्त्रियों और भाई-बन्धु को नारियों रोने लगी । उसकी माता अपने नवजात पुत्र की यह अवस्था देखकर, महान् शोक के कारण मूर्च्छित हो गयी ।।11।। हे नारद जी। उस बालक को लेकर स्वयं राजा प्रियव्रत श्मशान में गये और उस वन में जाकर बालक को छाती से लगा कर रोने लगे।। 12 ।। वह अपना प्राण त्याग करने पर कटिबद्ध हो गये लेकिन बालक का त्याग करना उन्हें स्वीकार नहीं हुआ पुत्रशोक के कारण उनका ज्ञान योग जाता रहा ।। 13 ।। इसी समय उन्होने एक विमान देखा जो शुद्ध स्फटिक मणि की तरह स्वच्छ और अच्छी-अच्छी मणियों से बना हुआ था ।। 14 ।। वह विमान अपने तेज से प्रज्ज्वलित हो रहा था, रेशमी वस्त्रों से सुशोभित था । उसमें अनेक तरह की रंग-बिरंगी फूलों की मालाएँ लटक रही थी ।। 15 ।। उत्त विमान में राजा ने एक कमनीय और सुन्दर देवी का दर्शन किया। उनके शरीर का रंग सफेद चम्पा के फूल की तरह था। वह निरन्तर युवती बनी रहती थी ।। 16 ।। उनके प्रसन्न मुख मण्डल पर मन्द मुस्कराहट थी। वह रत्नों की बने हुए आभूषणों से अलंकृत थी। वह करूणामयी सिद्धयोगिनी थी और अपने भक्तों के उपर अनुग्रह करने के लिए तत्पर थी ।। 17 ।। उनको अपने सामने देखकर राजा प्रियव्रत ने बालक को जमीन पर लिटा दिया और और उनकी पूजा करके परम आदर से उनकी स्तुति की ।। 18 ।। तब है नारद, तेज से प्रज्वलित शान्त ग्रीष्मऋतु के सूर्य के समान प्रखर प्रभा से शोभायमान की भार्या से राजा ने प्रश्न किया ।। 19 ।। राजा ने पूछा हे लावण्यवती आप कौन हैं? हे सुन्दरी आप किस की पत्नी हैं? हे पतिव्रता । आपके पिता का क्या नाम हैं? हे सुन्दर जॉघवाली! आपकी आकृति से स्पष्ट है कि आप नारियों में श्रेष्ठ सौभाग्यवती और पूजित है ।। 20 महाराज की बात सुनकर देवसेना बोली वह जगन्मंगल चण्डिका थी और देवताओं की ओर से रण करनेवाली है।। 21 अत्यन्त प्राचीन काल की घटना है कि उस समय दैत्यों ने देवताओं का राज्य छीन लिया था। तब उन्होंने देवताओं की सेना का संचालन अपने हाथों में लेकर देवताओं को जय दिलवायी थी। तभी से उनका नाम देवसेना पड गया ।। 22 ।। श्री देवसेना ने कहा हे राजन। ब्रह्मा की मानसी कन्या हूँ। मेरा नाम देवसेना है। मैं स्वयं ईश्वरी हूँ। मुझे ब्रह्मा ने अपने मनोबल से स्कन्द कुमार की पत्नी बना दिया ।। 23 ।। मैं षोडश मातृकाओं में स्कन्दकुमार की पतिव्रता भार्या के नाम से प्रसिद्ध हूँ। इस संसार में लोग मुझे षष्ठी के नाम से पुकारते है क्योंकि मैं प्रकृति की षष्ठअंशरूपणी हूँ ।। 24 ।। मैं स्वयं अपुत्रों को पुत्र, पत्नी रहितों को भार्या, दरिद्रों को धन और कर्म करने वाले को कर्म प्रदान करती हूँ ।। 25 ।। सुख, दुःख, भय, शोक, हर्ष, मंगल, सम्पति और विपति ये सब कर्म से होते हैं ।। 26 ।। अपने कर्म के फल से लोगोंको बहुतों पुत्र होते है। अपने कर्म से वंशहीन भी होते है। अपने कर्म से पुत्र हो होकर मर मर जाते है और अपने कर्म से ही चिरंजीवी संतान होती है। ।। 27 ।। कर्म से लोग गुणवान और कर्म से अंगहीन होते है। कर्म से अनेक स्त्रियों मिलती है और कर्म से एक भी स्त्री नहीं मिलती ।। 28 ।। कर्म से ही मनुष्य रूपवान तथा कर्म से ही निरन्तर रोगग्रस्त रहता है। कर्म से ही व्याधि, तथा कर्म से ही नीरोगता होती है। अतः हे राजन कर्म सबसे बलवान है। ऐसा श्रुति में कहा गया है ।। 29 ।1 इतना कहकर हे नारद जी! देवी ने बालक को उठा लिया ।। 30 ।। और अपने महाविज्ञान के प्रभाव से लीला करके उस बालक को जीवित कर दिया। राजा ने देखा कि उस बालकके शरीर की कान्ति स्वर्ण की भाँति निखर आयी और वह मुस्कुराता रहा ।। 31 ।। राजा के देखते se
२४
२५
an ।३४।
mas देखते देवसेना ने उस बालक को अपनी गोद "स्लामिया और राजा से विदा माँगकर आकाश में जाने को तयार हो गयी 32 यह देखकर राजा के कण्ठ ओठ और तालू चढकन लग और वह पुन उनकी स्तुति करने लगे । तब राजा के स्तोत्र स दवी संतुष्ट हुई ।। 33 ।। और हे नारद जी वह राजा से कहन लगीं की कर्म क निमार्ण वेदोक्त है (कर्म बडा बलवान होता है। दवी न कहा आप स्वायम्भूव मनु के पुत्र है और तीनों लोकों के एक छत्र सम्राद ।। 34 ।। इसलिए आप मेरी पूजाका सर्वत्र अपन साम्राज्य के अन्दर प्रचार करो और स्वयं आप मेरी पूजा करें। यदि आप एसी प्रतिज्ञा करेंगे तभी मैं आपके वंश के लिए कमलस्वरूप पुत्र दूंगी आपका यह पुत्र भगवान के नारायण का कलावतार सुव्रत के नाम स प्रसिद्ध होगा। यह गुणवान अत्यन्त विद्वान अपने पूर्वजन्म की बात स्मरण रखने वालायोगियो में श्रेष्ठ होगा 36 सा यज्ञ करদ থালা | श्रेष्ठ समस्त क्षत्रिय में पूजनीय एक लाख मतवाल हाथियों के तुल्य बलशाली शुभकारक होगा ।। 37 ।। धनी गुणी शुद्ध विद्वानां का प्रिय 35
ज्ञानियों तथा तपस्वियों को सिद्धि देने वाला होगा ।। 38 ।। त्रिलोक में यशस्वी और सब सम्पदा का दान करने वाला होगा। यह कहकर षष्ठी देवी ने उस बालक को राजा के हाथों में दे दिया ।। 39 ।। राजा प्रियव्रत ने स्वयं पूजा करने तथा पूजा का प्रचार करने के लिए वचन दिया। तब देवी ने उन्हें शुभवरदान देकर स्वर्गलोक को चली गयी ।। 40 ।। राजा का अन्तःकरण प्रसन्न हो गया और वह अपने मन्त्री आदि के साथ अपने महल में लौट आये। पश्चात उन्होनें पुत्र का पूरा वृत्तान्त सब से कह दिया ।। 41 ।। हे नारदजी महल के सभी पुरूष और रनिवास की सभी स्त्रियों यह वृत्तान्त सुनकर बडी प्रसन्न हुई । पुत्र के पुनर्जन्म प्राप्त करने के उपलक्ष्य में राजा ने सर्वत्र उत्सव कराया ।। 42 ।। राजा ने स्वयं षष्ठी देवी को पूजन कर ब्राह्मणों को धन दिया । तब से प्रत्येक महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि के दिन राजा षष्ठी देवी का महोत्सव करते रहे ।। 43 ।। तभी से अपने साम्राज्य के अन्तर्गत सभी प्रान्तों में षष्ठी देवी के पूजन का यत्नपूर्वक प्रचार कराया । सूतिकागार में बालकों की छट्ठी के दिन यत्न पूर्वक ।। 44 // षष्ठया देव्याश्च यत्नेन कारयामास सर्वतः । बालानां सूतिकागारे षष्ठाहे यत्न पूर्वकम्। ४४। तत्पूजो कारयामासं चैकविंशतिवासरे। बालानां शुभकार्ये च शुभान्नप्राशने तथा।४५। सर्वत्र वर्धयामास स्वयमेव चकार ह। ॥इति देवीभागवतन्तर्गतेषष्ठी माता कथा सम्पूर्णम् ॥
मत्तमातंगलक्षाणां धृतवन्तं बलं शुभम् ।३७। धनिनं गुणिनं शुद्ध विदुषां प्रियमेव च । योगिनां ज्ञानिनां चैव सिद्धिरूपं तपस्विनाम्। ३८। यशस्विनं च लोकेषु दातारं सर्वसम्पदाम् । इत्येवमुक्त्वा सादेवी तस्मै तद्बालकंददौ ।३९। राजा चकार स्वीकारं पूजार्थ च प्रियव्रतः। जगाम देवी स्वर्ग च दत्वा तस्मै शुभं वरम् ।४०। आजगाम सहामात्यः स्वगृहं हृष्टमानसः । आगत्यं कथयामास वृत्तान्तं पुत्रहेतुकम् ।४१। श्रुत्वा बभूवुः सन्तुष्टा नरा नार्यश्च नारद। मंगलं कारयामास सर्वत्र पुत्रह तु कम् ।४२। देवीं च पूजयामास ब्राह्मणेभ्यो धनं ददौ। राजा च प्रति मासेषु शुक्लषष्ठयां महोत्सवम्। ४३।
ज्ञानियों तथा तपस्वियों को सिद्धि देने वाला होगा ।। 38 ।।
त्रिलोक में यशस्वी और सब सम्पदा का दान करने वाला होगा। यह कहकर षष्ठी देवी ने उस बालक को राजा के हाथों में दे दिया ।। 39 ।। राजा प्रियव्रत ने स्वयं पूजा करने तथा पूजा का प्रचार करने के लिए वचन दिया। तब देवी ने उन्हें शुभवरदान देकर स्वर्गलोक को चली गयी ।। 40 ।। राजा का अन्तःकरण प्रसन्न हो गया और वह अपने मन्त्री आदि के साथ अपने महल में लौट आये। पश्चात उन्होनें पुत्र का पूरा वृत्तान्त सब से कह दिया ।। 41 ।। हे नारदजी महल के सभी पुरूष और रनिवास की सभी स्त्रियों यह वृत्तान्त सुनकर बडी प्रसन्न हुई । पुत्र के पुनर्जन्म प्राप्त करने के उपलक्ष्य में राजा ने सर्वत्र उत्सव कराया ।। 42 ।। राजा ने स्वयं षष्ठी देवी को पूजन कर ब्राह्मणों को धन दिया । तब से प्रत्येक महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि के दिन राजा षष्ठी देवी का महोत्सव करते रहे ।। 43 ।। तभी से अपने साम्राज्य के अन्तर्गत सभी प्रान्तों में षष्ठी देवी के पूजन का यत्नपूर्वक प्रचार कराया । सूतिकागार में बालकों की छट्ठी के दिन यत्न पूर्वक ।। 44 // षष्ठी 1
देवी की पूजा करवायी। बालक के उत्पन्न होने के इक्कीसवे दिन बालकों के अन्य शुभ कार्य के दिन और शुभ अन्नप्राशन संस्कार के दिन ।। 45 ।। सर्वत्र उनकी पूजा करवाई और उनकी पूजा की । ।। इस प्रकार देवीभागवत अनुसार षष्ठी माता कथा समाप्त हई ।। 466
आरती षष्ठी माता की
आरती स्कन्द दुलारी की। षष्ठी कार्तिकय प्यारी की
जगतजननि जगकी विस्तारिणी,
नित्य सत्य साकेत बिहारिणी।
परम दयामय दीनो द्वारिणी,
मैया भक्तन हितकारी की।। आरती ।।
सती शिरोमणि पति हितकारिणी,
देवसेवा हित वन रण बिहारिणी ।
देवहित देवनायक स्वीकारिणी,
कीर्ति सब लोकन छाई,
त्याग धर्म मूरति धारी की।। आरती ।।
विमल कीर्ति सब लोकन छाई,
नाम लेत पावन मति आई।
सुमिरत कटत कष्ट दुखदाई,
शरणागत जन भयहारी की।। आरती ।।
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