तुलसी–विष्णु विवाह विधिः अर्थ सहित

🌷2⃣🌷 तुलसी पूजा (१) 
🌷2⃣🌷 श्री तुलसी पूजन विधि (२) 
🌷3⃣🌷 श्री तुलसी लघुपूजा (३) 
🌷4⃣🌷 श्री तुलसीपूजा (४) 
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🌷1⃣🌷 तुलसी पूजा (१) 🌷🌷🌷
🟩🟩🟩 हिन्दी अर्थ सहित 🟩🟩🟩
यह विधि प्रातःकाल या सायंकाल तुलसी-वृन्दावन में की जाती है।
शुद्ध मन, स्नान के पश्चात, दीप जलाकर, तुलसी के समीप पूर्वमुख या उत्तरमुख होकर पूजन किया जाता है।
॥ अथ तुलसी पूजा प्रारंभः ॥
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
(पूजन से पूर्व गणेशजी का स्मरण करें)
॥ अथ तुलसीपूजनं लिख्यते ॥
श्रीमहादेव उवाच —
(भगवान शिव पार्वतीजी से कहते हैं)
शुभे पक्षे शुभे वारे शुभे ऋक्षे शुभोदये ।
केशवार्थे शुभांशे च रोपयेत्तुलसीं मुनिः ॥ १॥
हिन्दी अर्थ:
किसी भी शुभ पक्ष, शुभ वार, शुभ नक्षत्र और शुभ प्रभात में,
भगवान केशव (विष्णु) के निमित्त भक्त को तुलसी रोपनी चाहिए।
गृहस्थो गृहमध्ये वा गृहस्थोपवनेपि वा ।
शुचौ देशे तु तुलसीमर्च्चयेद्बुद्धिमान्नरः ॥ २॥
हिन्दी अर्थ:
गृहस्थ व्यक्ति चाहे घर के मध्य भाग में या घर के उपवन में,
शुद्ध स्थान पर तुलसी का पूजन करे — यही बुद्धिमान का आचरण है।
मूले च वेदिकां कृत्वा आलवालसमन्विताम् ।
प्रातःसंध्याविधिं कृत्वा स्नानपूर्वं दिने दिने ॥ ३॥
हिन्दी अर्थ:
तुलसी के मूल में छोटी वेदिका (चबूतरा) बनाकर, अलंकरण सहित रखें।
प्रत्येक दिन स्नान और प्रातःसंध्या के बाद पूजन प्रारंभ करें।
गायत्र्यष्टजपं कृत्वा तुलसीं पूजयेत्ततः ।
प्राङ्मुखोदङ्मुखो वापि स्थित्वा प्रयतमानसः ॥ ४॥
हिन्दी अर्थ:
गायत्री मंत्र का आठ बार जप करके, फिर एकाग्रचित्त होकर,
पूर्वमुख या उत्तरमुख होकर तुलसी माता की पूजा करें।
ध्यायेच्च तुलसीं देवीं श्यामां कमललोचनाम् ।
प्रसन्नपद्मकल्हारवराभयचतुर्भुजाम् ॥ ५॥
हिन्दी अर्थ:
तुलसी देवी का ध्यान करें — जो श्यामवर्णा हैं, कमलनयन हैं,
हाथों में कमल, कल्हार पुष्प, वर और अभय मुद्रा धारण करती हैं।
किरीटहारकेयूरकुंडलादिविभूषिताम् ।
धवलांशुकसंयुक्तां पद्मासननिषेदुषीम् ॥ ६॥
हिन्दी अर्थ:
मुकुट, हार, केयूर, कुंडल आदि से विभूषित हैं,
श्वेत वस्त्र धारण कर कमलासन पर विराजमान हैं।
(यह ध्यान है)
👉 "इति ध्यानम्"
देवि त्रैलोक्यजननि सर्वलोकैकपावनि ।
आगच्छ भगवत्यत्र प्रसीद तुलसि द्रुतम् ॥ ७॥
हिन्दी अर्थ:
हे देवी! तीनों लोकों की जननी, सब लोकों को पवित्र करने वाली तुलसी माता!
आप यहाँ पधारें और कृपा करें।
(यह आवाहन मंत्र है)
👉 "आवाहनम्"
सर्व देवमये देवि सर्वदा विष्णुवल्लभे ।
रत्नस्वर्णमयं दिव्यं गृहाणासनमव्यये ॥ ८॥
हिन्दी अर्थ:
हे देवि! जो सभी देवताओं का स्वरूप हैं, सदैव विष्णु की वल्लभा हैं,
आप यह रत्नस्वर्णमय दिव्य आसन ग्रहण करें।
👉 "आसनम्"
सर्वदेवमयाकारे सर्वदेवनमोऽस्तुते ।
पाद्यं गृहाण देवेशि तुलसि त्वं प्रसीद मे ॥ ९॥
हिन्दी अर्थ:
सर्वदेवमयी, सर्वदेवों से नमस्कृत तुलसीदेवी!
आप मेरे द्वारा अर्पित यह पाद्य (पाँव धोने का जल) स्वीकार करें।
👉 "पाद्यम्"
सर्व देवमयाकारे सर्वांगमणिशोभिते ।
इदमर्घंगृहानत्वं देवि दैत्यांन्तकप्रिये ॥ १०॥
हिन्दी अर्थ:
हे सर्वदेवमयी, मणियों से शोभायमान तुलसी!
दैत्य-संहारक विष्णु की प्रिया! आप यह अर्घ्य स्वीकार करें।
👉 "अर्घ्यम्"
सर्वलोकस्य रक्षार्थं सदा संनिधिकारिणि ।
गृहाण तुलसि प्रीत्या इदमाचमनीयकं ॥ ११॥
हिन्दी अर्थ:
हे तुलसी! जो सदा लोक-रक्षा के लिए उपस्थित रहती हैं,
कृपा कर यह आचमनीय जल स्वीकार करें।
👉 "आचमनम्"
गंगादिभ्यो नदीभ्यश्च समानीतमिदं जलम् ।
स्नानार्थं तुलसि स्वच्छं प्रीत्या तत्प्रतिगृह्यताम् ॥ १२॥
हिन्दी अर्थ:
गंगा आदि पवित्र नदियों से प्राप्त यह जल तुलसी स्नानार्थ अर्पित है,
हे तुलसी! इसे प्रसन्नता से स्वीकार करें।
👉 "स्नानम्"
क्षिरोदमथनोद्भूते चंद्रलक्ष्मीसहोदरे ।
गृह्यतां परिधानार्थमिदं क्षौमांबरं शुभे ॥ १३॥
हिन्दी अर्थ:
हे तुलसी! जो क्षीरसागर-मंथन से उत्पन्न, चंद्र-लक्ष्मी की सहोदर हैं —
आप यह शुभ वस्त्र स्वीकार करें।
👉 "वस्त्रम्"
श्रीगंधं कुंकुमं दिव्यं कर्पूरागरुसंयुतम् ।
कल्पितं ते महादेवि प्रीत्यर्थं प्रतिगृह्यताम् ॥ १४॥
हिन्दी अर्थ:
हे महादेवी तुलसी! कर्पूर-अगरु सहित चंदन-कुंकुम गंध आपको प्रीत्यर्थ अर्पित है, कृपया स्वीकार करें।
👉 "गंधम्"
नीलोत्पलं तु कल्हारमालत्यादीनि शोभने ।
पद्मादिगंधवंतीनि पुष्पाणि प्रतिगृह्यताम् ॥ १५॥
हिन्दी अर्थ:
हे सुशोभने तुलसीदेवी! नीलकमल, कल्हार, मालती और सुगंधित पुष्प स्वीकार करें।
👉 "पुष्पम्"
धूपं गृहाण देवेशि मनोहारि सगुग्गलम् ।
आज्यमिश्रं तु तुलसि भक्ताभिष्टप्रदायिनि ॥ १६॥
हिन्दी अर्थ:
हे देवेशि तुलसी! गंधयुक्त गुग्गुल से मिश्रित सुगंधित धूप स्वीकार करें।
👉 "धूपम्"
अज्ञानतिमिरांधस्य ज्ञानदीपप्रदायिनी ।
त्वया तु तुलसि प्रीता दीपोयं प्रतिगृह्यताम् ॥ १७॥
हिन्दी अर्थ:
हे तुलसी! जो अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान का दीप देती हैं,
यह दीपक स्वीकार करें।
👉 "दीपम्"
नमस्ते जगतां नाथे प्राणिनां प्रियदर्शने ।
यथाशक्ति मया दत्तं नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम् ॥ १८॥
हिन्दी अर्थ:
हे तुलसी माता! जो जगत की नाथा और सब प्राणियों की प्रिय हैं,
मैं अपनी शक्ति अनुसार यह नैवेद्य (भोजन) अर्पित करता हूँ, कृपया स्वीकार करें।
👉 "नैवेद्यम्"
नमो भगवते श्रेष्ठे नारायणजगन्मये ।
तुलसि त्वरया देवि पानीयं प्रतिगृह्यताम् ॥ १९॥
हिन्दी अर्थ:
हे तुलसी! जो भगवान नारायण की जगन्मयी शक्ति हैं,
आप यह जल ग्रहण करें।
👉 "पानीयम्"
अमृतेमृतसंभूते तुलस्यमृतरूपिणि ।
कर्पूरादिसमायुक्तं तांबूलं प्रतिगृह्यताम् ॥ २०॥
हिन्दी अर्थ:
हे तुलसी! जो अमृतस्वरूपिणी हैं, अमृत से उत्पन्न हैं,
कर्पूरादि मिश्रित यह ताम्बूल (पान) स्वीकार करें।
👉 "तांबूलम्"
दक्षिणा दक्षिणकरे त्वद्भक्तानां प्रियंकरि ।
करोमि ते सदा भक्त्या विष्णुकांते प्रदक्षिणाम् ॥ २१॥
हिन्दी अर्थ:
हे विष्णु-कांता तुलसी! दक्षिण हाथ से प्रदक्षिणा करते हुए,
मैं आपको प्रणाम करता हूँ — आप भक्तों की प्रिय हैं।
👉 (प्रदक्षिणा)
नमो नमो जगद्धात्र्यै जगदाद्यै नमो नमः ।
नमो नमो जगद्भूत्यै नमस्ते परमेश्वरि ॥ २२॥
हिन्दी अर्थ:
हे जगद्भवानी तुलसी! जगत की सृष्टिकर्त्री, पालनकर्त्री, और परमेश्वरी!
आपको बारंबार नमस्कार।
👉 (नमस्कार)
प्रसीद मम देवेशि कृपया परया सदा ।
अभिष्टफलसिद्ध्यर्थ कुरु मे माधवप्रिये ॥ २३॥
हिन्दी अर्थ:
हे देवी! माधवप्रिया तुलसी! सदा मुझ पर कृपा करें
और मेरे मनोवांछित फल को सिद्ध करें।
इत्येवमर्च्चयेन्नित्यं प्रातरेव शुचिर्नरः ।
मध्याह्ने वाथ सायाह्ने पूजयेत्प्रयतो नरः ॥ २४॥
हिन्दी अर्थ:
इस प्रकार का पूजन शुद्ध व्यक्ति नित्य प्रातः करे,
या मध्यान्ह अथवा सायंकाल श्रद्धा से करे।
🌿॥ इति तुलसीपूजासम्पूर्णा ॥🌿
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उपसंहार
जो व्यक्ति इस तुलसी पूजन विधि का पालन करता है —
उसके घर में श्रीहरि विष्णु सदैव निवास करते हैं,
पाप नष्ट होते हैं, आयु, आरोग्य, सौभाग्य और धन की वृद्धि होती है।
तुलसी माता उसकी रक्षा करती हैं और उसे मोक्ष के मार्ग पर ले जाती हैं।
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🌷2⃣🌷 श्री तुलसी पूजन विधि (२)🌷🌷🌷
🟩🟩🟩🟩 हिन्दी अर्थ  सहित 🟩🟩🟩🟩

विघ्नेश्वर पूजन (हरिद्राबिम्बे)
शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥
अर्थ:
जो शुभ्र वस्त्र धारण किए हैं, शशि के समान गौरवर्ण हैं, चार भुजाओं वाले विष्णु हैं —
ऐसे प्रसन्नमुख श्रीगणेश का ध्यान करता हूँ, जो सभी विघ्नों को दूर करते हैं।
श्री परमेश्वर प्रीत्यर्थं आदौ विघ्नेश्वर पूजां करिष्ये।
अर्थ:
परमेश्वर की प्रसन्नता के लिए सबसे पहले विघ्नेश्वर (गणपति) की पूजा करता हूँ।
🍁गणेश आवाहन एवं पूजन
अस्मिन् हरिद्राबिम्बे सुमुखं श्रीविघ्नेश्वरं ध्यायामि।
आवाहयामि, आसनं, पाद्यं, अर्घ्यं, आचमनीयं, मधुपर्कं समर्पयामि।
अर्थ:
मैं हल्दी के प्रतीक में सुमुख विघ्नेश्वर का ध्यान करता हूँ।
हे गणेश! आपको आमंत्रित करता हूँ, आसन, पाद्य, अर्घ्य, जल, मधुपर्क आदि अर्पण करता हूँ।
सुमुखाय नमः... स्कन्दपूर्वजाय नमः।
अर्थ:
(गणेश जी के १६ नामों द्वारा पूजा)
हे सुमुख, एकदंत, कपिल, लम्बोदर, विकट, विघ्नराज, गणाध्यक्ष, गजानन, वक्रतुण्ड, हेरम्ब आदि रूपों में आपकी वंदना करता हूँ।
वक्रतुण्ड महाकाय कोटिसूर्यसमप्रभ ।
अविघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥
अर्थ:
हे वक्रतुण्ड महाकाय गणेश! आप करोड़ सूर्यों के समान तेजस्वी हैं —
मेरे सभी कार्य बिना विघ्न पूरे हों, ऐसी कृपा करें।
🍁 तुलसी पूजन का संकल्प
श्रीपरमेश्वर प्रीत्यर्थं श्री तुलसीदेवी प्रीत्यर्थं दीर्घसौमङ्गल्यप्राप्त्यर्थं सर्वाभीष्टसिद्ध्यर्थं श्री तुलसीपूजां करिष्ये।
अर्थ:
परमेश्वर एवं श्री तुलसी देवी की प्रसन्नता के लिए, दीर्घ सौभाग्य और सर्व इच्छाओं की सिद्धि हेतु मैं श्री तुलसी पूजन करूँगा।
🍁तुलसी ध्यान
ध्यायामि तुलसीं देवीं श्यामां कमललोचनाम्।
प्रसन्नां पद्मकल्हारवराभयचतुर्भुजाम् ॥
अर्थ:
मैं श्री तुलसी देवी का ध्यान करता हूँ — जो श्याम वर्ण की हैं, कमल समान नेत्रों वाली,
चार भुजाओं से वर और अभय देती हुईं, प्रसन्नमुखी देवी हैं।
देवीं त्रैलोक्य जननीं सर्वलोकैकपावनीम् ॥
अर्थ:
तुलसी देवी तीनों लोकों की जननी हैं, सबको पवित्र करनेवाली हैं।
🍁आवाहन
अस्मिन् क्षुपे श्री तुलसीं आवाहयामि।
अर्थ:
इस पौधे में, हे देवी! मैं आपको सादर आमंत्रित करता हूँ कि आप यहाँ विराजें।
🍁> रत्नसिंहासनं चारु भुक्तिमुक्तिफलप्रदे।
मया दत्तं महादेवि सङ्गृहाण सुरार्चिते॥
अर्थ:
हे देवी! मैंने आपको सुंदर रत्नमय सिंहासन अर्पित किया है — इसे स्वीकार करें, जो भक्ति और मोक्ष दोनों देनेवाली हैं।
-🍁पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय, स्नान आदि
श्री तुलस्यै नमः — पाद्यं, अर्घ्यं, आचमनीयं, मधुपर्कं, स्नानं, वस्त्रं, आभरणं, गन्धं, पुष्पं, अक्षतान्, दीपं, नैवेद्यं, ताम्बूलं, नीराजनं समर्पयामि।
अर्थ:
हे श्री तुलसी देवी! आपके चरणों में पाद्य, अर्घ्य, मधुपर्क, स्नान, वस्त्र, आभूषण, चंदन, पुष्प, अक्षत, दीप, भोजन, ताम्बूल और आरती समर्पित करता हूँ।
🌹अङ्गपूजा (देवी के शरीर की पूजा)
तुलसीदेव्यै नमः पादौ पूजयामि... अभीष्टदायै नमः सर्वाण्यङ्गानि पूजयामि।
अर्थ:
मैं तुलसी देवी के चरणों से लेकर सिर तक सभी अंगों की पूजा करता हूँ —
आप हरिप्रिया हैं, त्रैलोक्यजननी हैं, और भक्तों की सभी मनोकामनाएँ पूरी करती हैं।
🍁धूप, दीप, नैवेद्य
गुग्गुलं गोघृतं चैव दशाङ्गं सुमनोहरम्।
धूपं गृहाण वरदे सर्वाभीष्टफलप्रदे ॥
अर्थ:
हे वरदायिनी देवी! यह सुगंधित धूप और गाय के घी से बनी अर्पण स्वीकार करें।
साज्यं त्रिवर्तिसंयुक्तं... दीपं गृहाण देवेशि त्रैलोक्यतिमिरापहम् ॥
अर्थ:
हे तुलसीश्वरि! यह घी का दीपक त्रिवर्ति सहित प्रस्तुत है — जो अंधकार का नाश करने वाला है।
नैवेद्यं षड्रसोपेतं फलसूपसमन्वितम्... गृहाण तुलसीश्वरि ॥
अर्थ:
हे देवी! यह षड्रसयुक्त नैवेद्य (छः स्वादों से युक्त भोजन), फल और सूप सहित प्रस्तुत है, कृपया स्वीकार करें।
🍁👉ताम्बूल, नीराजन, प्रदक्षिणा, नमस्कार
पूगीफलसंयुक्तं नागवल्लीदलैर्युतं... ताम्बूलं समर्पयामि।
अर्थ:
हे देवी! सुपारी, पान और कर्पूरयुक्त ताम्बूल अर्पित है, कृपया स्वीकार करें।
प्रकृष्टपापनाशाय प्रकृष्टफलसिद्धये।
प्रदक्षिणं करोमि त्वां सर्वाभीष्टफलप्रदे॥
अर्थ:
आप पापों का नाश करती हैं, और सभी इच्छाओं की पूर्ति करती हैं।
आपकी प्रदक्षिणा से आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य और ज्ञान प्राप्त होता है।
नमस्ते तुलसीदेवि सर्वाभीष्टफलप्रदे।
नमस्ते त्रिजगद्वन्द्ये नमस्ते लोकरक्षिके॥
अर्थ:
हे तुलसी देवी! आपको नमस्कार, आप सबकी इच्छाएँ पूर्ण करती हैं, तीनों लोकों द्वारा वंदिता हैं, और सबकी रक्षा करती हैं।
👉🍁पुष्पाञ्जलि एवं क्षीरार्घ्य
तुलस्यै तु नमस्तुभ्यं नमस्ते फलदायिनि।
इदमर्घ्यं प्रदास्यामि सुप्रीता भव सर्वदा॥
अर्थ:
हे तुलसी देवी! आपको नमस्कार — यह क्षीरार्घ्य (दूध से भरा अर्घ्य) अर्पित है,
आप सदा मुझ पर प्रसन्न रहें।
👉🍁अन्तिम प्रार्थना
देहि मे विजयं देवि विद्यां देहि महेश्वरि।
त्वमिति प्रार्थये नित्यं शीघ्रमेव फलं कुरु॥
अर्थ:
हे देवी! मुझे विजय दो, विद्या दो, आरोग्य दो, और जो भी साधना मैंने की है — उसका शीघ्र फल प्रदान करो।
ॐ तत्सद् ब्रह्मार्पणमस्तु ॥
अर्थ:
जो भी पूजा की गई — वह सब ब्रह्म को अर्पित है।
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---👉🍁सारांश भावार्थ:
(तुलसी पूजन का यह विधान अत्यंत मंगलकारी है।
जो भक्त पूरे भाव से तुलसी का आवाहन, पूजन, धूप–दीप–नैवेद्य अर्पण और प्रार्थना करते हैं —
उनके सभी संकट दूर होते हैं, घर में लक्ष्मी का स्थायी वास होता है,
और भगवान विष्णु–लक्ष्मी का आशीर्वाद सदैव प्राप्त होता है।)
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🌷3⃣🌷 श्री तुलसी लघुपूजा (३) 🌷🌷
🟩🟩🟩 हिन्दी अर्थ सहित 🟩🟩🟩🟩

👉🍁 प्रारंभिक प्रार्थना
शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥
अर्थ:
जो श्वेत वस्त्र धारण करते हैं, चन्द्रमा के समान गौरवर्ण हैं, चार भुजाओं वाले हैं, और प्रसन्न मुखमंडल से सुशोभित हैं —
उन श्रीविष्णु का ध्यान मैं करता हूँ, जिससे मेरे सब विघ्न दूर हों।
🍁संकल्प
श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थं तुलसीदेवी प्रीत्यर्थं
सर्वारिष्टशान्त्यर्थं सर्वमङ्गलप्राप्त्यर्थं तुलसीपूजां करिष्ये ॥
अर्थ:
परमेश्वर की प्रसन्नता के लिए, तुलसी देवी की कृपा प्राप्ति के लिए,
सभी प्रकार के विघ्न-उपद्रवों की शांति और समस्त मंगल की प्राप्ति हेतु मैं तुलसी देवी की पूजा करूँगा।
---
🍁ध्यान (पूर्वांग पूजा)
ध्यायामि तुलसीं देर्वीं श्यामां कमललोचनाम् ।
प्रसन्नां पद्मकल्हार वराभय चतुर्भुजाम् ॥
अर्थ:
मैं तुलसी देवी का ध्यान करता हूँ — जो श्यामवर्णा हैं, कमल की भाँति सुंदर नेत्रों वाली हैं,
प्रसन्नमुख, कमल और कल्हार पुष्प धारण करने वाली, वरद (वर देने की) और अभय (भय मिटाने की) मुद्रा में चार भुजाओं से सुशोभित हैं।
🍁
किरीट हार केयूर कुण्डलादिविभूषिताम् ।
धवलांशुकसंयुक्तां पद्मासन निषेदुषीम् ॥
अर्थ:
जो किरीट, हार, केयूर (बाजूबंद), कुण्डल आदि आभूषणों से अलंकृत हैं,
धवल वस्त्र धारण करती हैं और कमलासन पर विराजमान हैं — ऐसी तुलसी देवी का मैं ध्यान करता हूँ।
🍁
तुलसीं देवीं ध्यायामि ॥
मैं तुलसी देवी का ध्यान करता हूँ।
---
👉🍁आवाहन (तुलसी का पूजन प्रारंभ)
अस्मिन् तुलसी क्षुपे तुलसीं देवीं आवाहयामि ।
इस तुलसी पौधे में मैं तुलसी देवी का आवाहन करता हूँ।
विष्णुवल्लभायै नमः — आसनं समर्पयामि ।
हे विष्णुप्रिया तुलसी! आपको आसन अर्पित करता हूँ।
सर्वदेवमयायै नमः — पाद्यं समर्पयामि ।
हे सर्वदेवमयी! आपके चरणों के लिए पाद्य (पानी) अर्पित करता हूँ।
सर्वतीर्थमयायै नमः — अर्घ्यं समर्पयामि ।
हे सर्वतीर्थमयी! अर्घ्य (सत्कारार्थ जल) अर्पित करता हूँ।
दैत्यान्तकृत्प्रियायै नमः — आचमनीयं समर्पयामि ।
हे दैत्यों के विनाशक विष्णु की प्रिया! आचमनीय जल अर्पित करता हूँ।
सर्वलोकहितायै नमः — स्नानं समर्पयामि ।
हे लोकहितायिनी देवी! आपको स्नान अर्पित करता हूँ।
लक्ष्मी सहोदर्यै नमः — वस्रयुग्मं कञ्चुकं च समर्पयामि ।
हे लक्ष्मी की सहोदर (बहन) तुलसी देवी! आपको वस्त्र और कंचुकी (अंगवस्त्र) अर्पित करता हूँ।
महादेव्यै नमः — गन्धं कुङ्कुमं समर्पयामि ।
हे महादेवी! सुगंधित चंदन और कुंकुम अर्पित करता हूँ।
रमावासायै नमः — अक्षतान् समर्पयामि ।
हे रामावासा देवी! आपको अक्षत (चावल) अर्पित करता हूँ।
अभीष्टदायै नमः — पुष्पाणि समर्पयामि ।
हे इच्छित फल देनेवाली देवी! आपको पुष्प अर्पित करता हूँ।
👉🍁 अर्चना (नामस्मरण)
वृन्दायै नमः । वृन्दावन्यै नमः । विश्वपूजितायै नमः ।
विश्वपावन्यै नमः । पुष्प सारायै नमः । नन्दिन्यै नमः । तुलस्यै नमः ।
कृष्णजीवन्यै नमः ।
अर्थ:
वृन्दा को नमस्कार, वृन्दावन में वासिनी देवी को नमस्कार,
संसारभर में पूजित और पवित्र करनेवाली देवी को नमस्कार,
पुष्पों की सारभूता, नन्दिनी और कृष्ण के जीवन समान प्रिय देवी तुलसी को नमस्कार।
(यहाँ आप १६ नाम, १०८ नाम या १००० नाम से अर्चना कर सकते हैं।)
👉🍁अन्य उपचार
पापहारिण्यै नमः — धूपं समर्पयामि ।
हे पापहरिणी देवी! धूप अर्पित करता हूँ।
भगवत्यै नमः — दीपं समर्पयामि ।
हे भगवती! आपको दीप अर्पित करता हूँ।
अमृतसम्भूतायै नमः — नैवेद्यं समर्पयामि ।
हे अमृतसम्भूता देवी! नैवेद्य (भोजन) अर्पित करता हूँ।
जगद्धात्र्यै नमः — ताम्बूलं फलानि च समर्पयामि ।
हे जगत की धात्री देवी! पान (ताम्बूल) और फल अर्पित करता हूँ।
सुदक्षिणायै नमः — नीराजनं समर्पयामि ।
हे सुदक्षिणा देवी! आपको आरती अर्पित करता हूँ।
परमेश्वर्यै नमः — पुष्पाञ्जलिं समर्पयामि ।
हे परमेश्वरी देवी! पुष्पांजलि अर्पित करता हूँ।
अभीष्टदायै नमः — प्रदक्षिणनमस्कारान् समर्पयामि ।
हे अभीष्टफलप्रदा देवी! आपको प्रदक्षिणा और नमस्कार अर्पित करता हूँ।
👉🍁स्तोत्र एवं प्रदक्षिणा
यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च ।
तानि तानि विनश्यन्ति प्रदक्षिणपदे पदे ॥
अर्थ:
पूर्व जन्मों में या इस जन्म में जो भी पाप हुए हों,
वे सब तुलसी की प्रदक्षिणा के प्रत्येक चरण से नष्ट हो जाते हैं।
👉🍁समर्पण मंत्र
तुलसी देव्यै नमः — सर्वोपचारान् समर्पयामि ।
हे तुलसी देवी! आपको सभी उपचार (पूजा के समस्त उपहार) अर्पित करता हूँ।
👉🍁 कर्मफल समर्पण
कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतेः स्वभावात् ।
करोमि यद्यत्सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयामि ॥
अर्थ:
शरीर, वाणी, मन, इन्द्रियों, बुद्धि या स्वभाव से मैं जो कुछ भी करता हूँ,
वह सब नारायण को समर्पित करता हूँ।
🍁 समापन
॥ ॐ तत्सत् — ब्रह्मार्पणमस्तु ॥
अर्थ:
यह सब ब्रह्म (परमात्मा) को अर्पित हो — यही सत्य है।
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फलश्रुति:(लाभ)
जो भक्त श्रद्धापूर्वक तुलसी देवी की इस लघुपूजा को करता है,
उसके सब पाप नष्ट होते हैं, विष्णु-लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है,
और उसके जीवन में आरोग्य, समृद्धि, और शांति का वास होता है।
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🌷4⃣🌷 श्री तुलसीपूजा (४) 🌷🌷🌷
🌷“तुलसी लघुपूजा – २” हिन्दी भावार्थ सहित 🌷
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👉🍁 प्रारंभिक मंगलाचरण

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥

अर्थ:
जो श्वेत वस्त्र धारण करते हैं, चन्द्रमा के समान उज्ज्वल हैं,
चार भुजाओं वाले और प्रसन्नमुख हैं —
ऐसे श्रीविष्णु का ध्यान करता हूँ ताकि सभी विघ्न दूर हों।

-🍁 संकल्प

परमेश्वरप्रीत्यर्थं श्री तुलसीदेवीप्रीत्यर्थं
दीर्घसौमङ्गल्यप्राप्यर्थं सत्सन्तानसिद्ध्यर्थं
समस्तसम्पत्प्राप्त्यर्थं सर्वाभीष्टसिद्ध्यर्थं तुलसीपूजां करिष्ये ॥

अर्थ:
परमेश्वर और तुलसी देवी की प्रसन्नता के लिए,
दीर्घ सौभाग्य प्राप्त करने के लिए, उत्तम संतान की सिद्धि के लिए,
समस्त ऐश्वर्य-संपत्ति प्राप्ति और सभी इच्छाओं की पूर्ति हेतु मैं तुलसी पूजा करूँगा।

(फिर ‘अप उपस्पृश्य’ — जल लेकर आत्मशुद्धि करें।)

👉🍁 आवाहन एवं ध्यान

अस्मिन् तुलसीक्षुपे तुलसीं वृन्दां ध्यायामि । आवाहयामि ॥

अर्थ:
इस तुलसी पौधे में मैं दिव्य देवी “वृन्दा तुलसी” का ध्यान करता हूँ और उन्हें आवाहन करता हूँ।

👉🍁 उपचार अर्पण

वृन्दावन्यै नमः — आसनं समर्पयामि ।
हे वृन्दावनवासी देवी तुलसी! आपको आसन अर्पित करता हूँ।

विश्वपूजितायै नमः — पाद्यं समर्पयामि ।
हे विश्वभर में पूज्य देवी! आपके चरणों के लिए पाद्य (आगमन-जल) अर्पित करता हूँ।

विश्वपावन्यै नमः — अर्घ्यं समर्पयामि ।
हे पवित्रतादायिनी देवी! आपको अर्घ्य अर्पित करता हूँ।

पुष्पसारायै नमः — आचमनीयं समर्पयामि ।
हे पुष्पों की सारभूता देवी! आचमनीय जल अर्पित करता हूँ।

नन्दिन्यै नमः — स्नानं समर्पयामि ।
हे नन्दिनी रूपा देवी! आपको स्नान अर्पित करता हूँ।

तुलस्यै नमः — वस्रं समर्पयामि ।
हे तुलसी देवी! आपको वस्त्र अर्पित करता हूँ।

कृष्णजीवन्यै नमः — गन्धं समर्पयामि । कुंकुमं समर्पयामि ॥
हे श्रीकृष्ण के प्राणस्वरूपा तुलसी! आपको चंदन और कुंकुम अर्पित करता हूँ।

👉🍁 अर्चना (नामस्मरण)

वृन्दायै नमः । गोलोकवासिन्यै नमः । कृष्णप्रियायै नमः ।
सर्वरोगहरायै नमः । सन्ततिप्रदायै नमः । सौमङ्गल्यदायै नमः ।
सौभाग्यप्रदायै नमः । पतिव्रतायै नमः । अतुलायै नमः । वृन्दावन्यै नमः ॥

अर्थ:
वृन्दा को नमस्कार,
गोलोकधाम में वास करनेवाली को नमस्कार,
कृष्ण की परमप्रिय को नमस्कार,
सभी रोगों का नाश करनेवाली को नमस्कार,
संतान प्रदान करनेवाली, सौम्य-मंगलदायिनी,
सौभाग्य देनेवाली, पतिव्रता स्वरूपिणी,
अतुलनीय महिमा वाली और वृन्दावनवासिनी तुलसी देवी को बारंबार नमस्कार।

--👉🍁दीप, धूप, नैवेद्य आदि

विश्वपूजितायै नमः — धूपं दर्शयामि । दीपं दर्शयामि ॥
हे विश्वपूजिता देवी! आपको धूप और दीप अर्पित करता हूँ।

विश्वपावन्यै नमः — नैवेद्यं समर्पयामि ॥
हे विश्वपावनी देवी! आपको नैवेद्य (भोजन) अर्पित करता हूँ।

पुष्पसारायै नमः — कर्पूरनीराजनं दर्शयामि ॥
हे पुष्पसारायै! आपको कर्पूर आरती अर्पित करता हूँ।

नन्दिन्यै नमः — पुष्पाञ्जलिं समर्पयामि ॥
हे नन्दिनी देवी! आपको पुष्पांजलि अर्पित करता हूँ।

तुलस्यै नमः — प्रदक्षिणं करोमि ॥
हे तुलसी देवी! मैं आपकी प्रदक्षिणा करता हूँ।

कृष्णजीविन्यै नमः — नमस्कारं समर्पयामि ॥
हे कृष्णजीविनी देवी! मैं आपको नमस्कार करता हूँ।

👉🍁 विशेष प्रार्थना

ओङ्कारपूर्विके देवि सर्ववेदस्वरूपिणि ।
सर्वदेवमये देवि सौमङ्गल्यं प्रयच्छ मे ॥

अर्थ:
हे ‘ॐ’ से पूज्य देवी! जो सभी वेदों का स्वरूप और सभी देवताओं से परिपूर्ण हैं,
मुझे चिरस्थायी सौमंगल्य (सौभाग्य और कल्याण) प्रदान करें।

वृन्दे मां सर्वदा देवि कृपादृष्ट्या विलोकय ।
पत्युरायुश्च भाग्यं च सदा देहि हरिप्रिये ॥

अर्थ:
हे देवी वृन्दा! मुझे सदा अपनी कृपादृष्टि से देखें,
और मेरे पति को दीर्घायु और शुभभाग्य प्रदान करें, हे हरि की प्रिये!

प्रसीद मम देवेशि प्रसीद हरिवल्लभे ।
इति प्रार्थ्य द्वादशवारं नमस्कुर्यात् तुलसीस्तुतिं पठेत् । पूजां तुलसीचरणयोरर्पयेत् ॥

अर्थ:
हे देवेश्वरी! हे हरिवल्लभे तुलसी! मुझ पर प्रसन्न हों।
ऐसे बारह बार प्रार्थना करके तुलसी स्तुति का पाठ करें,
और समस्त पूजा तुलसी के चरणों में अर्पित करें।

 फलश्रुति ( लाभ)

 इस विधि से तुलसी देवी की पूजा करनेवाला व्यक्ति
— दीर्घ सौभाग्य, उत्तम संतान, गृह-शांति, और विष्णु-लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करता है।
उसका जीवन पवित्र, रोगमुक्त, और सौम्य सुख-समृद्धि से परिपूर्ण होता है।
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(भावार्थ सार:
यह पूजा केवल तुलसी पौधे की नहीं, अपितु तुलसी देवी — श्रीहरि की अर्धांगिनी शक्ति — का सम्मान है।
वह भक्ति, पतिव्रता, आरोग्य, और ऐश्वर्य की दात्री हैं।
उनकी कृपा से गृहस्थ जीवन में शांति और विष्णुभक्ति दोनों का वास होता है।)

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‼️तुलसी–विष्णु विवाह विधिः अर्थ सहित ‼️   
(व्रतचूडामणि एवं सनत्कुमार संहितान्तर्गत)
(कार्तिक शुक्ल एकादशी–द्वादशी के पवित्र दिन तुलसी व श्रीविष्णु (शालिग्राम)  विवाह  विधि)
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  🚩✊जय हिंदुत्व✊🚩
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कार्तिक शुक्ल एकादशी 
देवउठनी एकादशी एवं शुभ तुलसी-विवाह 
हम सभी जानते हैं कि आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी से कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तक की चार महीनों की कालावधि " चातुर्मास " के नाम से जानी जाती है। 
आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी " देवशयनी एकादशी " कहलाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार देवशयनी एकादशी के दिन से सृष्टि के पालक भगवान श्रीहरि विष्णु चातुर्मास योग-निद्रा में चले जाते हैं। जगत पालक के साथ-साथ अन्य देव शक्तियां भी प्रसुप्त अवस्था में आ जाती हैं। अतः चातुर्मास में देवताओं के सो जाने का तर्क सामने रखकर मुंडन , यज्ञोपवीत , पाणिग्रहण संस्कार , गृह प्रवेश आदि मांगलिक कार्यों के निषेध का विधान है।

उपर्युक्त चार महीनों को वर्षा-काल के रूप में गिना जाता था। अतः गुरुओं एवं संतो के लिए ये चार महीने विश्राम - काल बन जाते थे। किसी एक स्थान पर ठहर कर वे इस कालावधि को साधना-काल के रूप में प्रयोग करते थे।
कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी " देवउठनी एकादशी " कहलाती है। यह वह पवित्र दिन होता है , जब भगवान विष्णु ४ महीने की योगनिद्रा के बाद उठते (जागते) हैं। अतः इसे " देवउठनी एकादशी " के नाम से जाना जाता है।

चार महीनों से निषिद्ध सारे शुभ संस्कार एवं मंगलमय कार्य पुनः इस तिथि से प्रारंभ हो जाते हैं। सनातन हिंदू समाज में देवउठनी एकादशी प्रत्येक वर्ष अत्यंत श्रद्धा और पवित्रता के साथ मनाई जाती है।

तुलसी विवाह का प्रसंग 
पुराणों में ऐसा उल्लेख है कि एक कल्प में जलंधर नामक महाबली दैत्य हुआ। वह देवताओं को दु:ख देता था। तब देवताओं के कष्ट को देखकर शिवजी ने उस दैत्य से घोर संग्राम किया , फिर भी वह मरता नहीं था। तुलसीदास जी बालकाण्ड में इसका कारण बताते हुए लिखते हैं -
परम   सती   असुराधिप   नारी।
तेहि बल ताहि न जितहिं पुरारी।।
दानवराज जलंधर की पत्नी वृंदा पतिव्रता थी। उसके पातिव्रत्य-बल के कारण त्रिपुर जैसे असुर का नाश करनेवाले महादेव भी उस दैत्य को जीत नहीं पा रहे थे।

तब भगवान विष्णु ने छल करके देवताओं का कार्य करने के लिए वृंदा के पातिव्रत्य-धर्म का नाश कर दिया। 
छल करि टारेउ तासु ब्रत प्रभु सुर कारज कीन्ह।
जब तेहिं जानें  मरम तब  श्राप कोप करि दीन्ह।।
पातिव्रत्य-धर्म के नाश होते ही दैत्य जलंधर मारा गया। अतः वृंदा ने क्रोध में भगवान को जड़ होने का शाप दे दिया। शाप के कारण सर्वसमर्थ होते हुए भी भगवान शालिग्राम रूप में धरा पर प्रकट हुए। 

एक समय वृंदा ने भगवान विष्णु को अपने पति के रूप में चाहा था। उसकी मनोकामना को पूर्ण करने के लिए भगवान ने उसका शाप भी स्वीकार किया। वृंदा ने अपना सतीत्व नष्ट हो जाने से अपने शरीर को दूषित मानकर अग्नि में भस्म कर दिया। सती की चिता की भस्म से " तुलसी " की उत्पत्ति हुई। इस तुलसी रूप में प्रभु ने उसे अपनाया। अपने पातिव्रत्य के प्रभाव से वृंदा " तुलसी " होकर भगवान विष्णु की अर्धांगिनी बनी। कार्तिक शुक्ल एकादशी को ही तुलसी का पाणिग्रहण संस्कार भगवान विष्णु के साथ हुआ था। 

भगवान को तुलसी इतनी प्रिय लगी कि बिना उसके शालिग्राम की पूजा ही नहीं होती। इसी प्रसंग की ओर तुलसीदास जी संकेत करते हुए अरण्यकांड में लिखते हैं - 
अजहुं तुलसिका हरिहि प्रिय।
जहां विष्णु सहस्त्रनाम में भगवान का एक नाम " तुलसीवल्लभ " है , तो वहीं तुलसी भी " विष्णुप्रिया " के नाम से जानी जाती है।
मिथिलेश ओझा की ओर से आपको देवउठनी एकादशी एवं शुभ तुलसी-विवाह की हार्दिक शुभकामनाएं।

।। भगवान विष्णु एवं विष्णुप्रिया की जय ।।


देशकालौ ततः स्मृत्वा गणेशं तत्र पूजयेत् ।
पुण्याहं वाचयित्वाऽथ नान्दीश्राद्धं समाचरेत् ॥ १॥

अर्थ:
उचित देश और काल का स्मरण करके सबसे पहले गणेशजी की पूजा करें।
इसके बाद “पुण्याह वाचन” (शुभता की घोषणा) और नान्दी श्राद्ध (पूर्वजों का तर्पण) करें।

🍁

वेदवाद्यादिनिर्घोषैः विष्णुमूर्तिं समानयेत् ।
तुलस्या निकटे सा तु स्थाप्या चान्तर्हिता घटैः ॥ २॥

अर्थ:
वेदी पर वेदघोष, शंख, मृदंग आदि के मंगल नाद के साथ विष्णु मूर्ति को लाएँ।
तुलसी देवी के निकट मूर्ति को स्थापित करें, बीच में घड़े आदि प्रतीक रूप में रखें।

🍁

आगच्छ भगवन् देव अर्हयिष्यामि केशव ।
तुभ्यं ददामि तुलसीं सर्वकामप्रदो भव ॥ ३॥

अर्थ:
हे भगवन् केशव! कृपा करके यहाँ पधारिए।
मैं आपको तुलसी देवी को अर्पण करता हूँ — आप सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाले हों।

🍁

दद्याद् द्विवारमर्घ्यं च पाद्यं विष्टरमेव च ।
ततश्चाचमनीयं च त्रिरुक्त्वा च प्रदापयेत् ॥ ४॥

अर्थ:
दो बार अर्घ्य, पाद्य (पाँव धोने का जल), आसन, और तीन बार आचमनी जल अर्पित करें।

🍁
पयो दधि घृतं क्षौद्रं कांस्यपात्रपुटे घृतम् ।
मधुपर्कं गृहाण त्वं वासुदव नमोऽस्तु ते ॥ ५॥

अर्थ:
दूध, दही, घी, शहद और घृत से युक्त मधुपर्क (मधुर मिश्रण) अर्पित करें —
“हे वासुदेव! नमस्कार, इसे स्वीकार करें।”

🍁
ततो ये स्वकुलाचाराः कर्तव्या विष्णुतुष्टये ।
हरिद्रालेपनाभ्यङ्गः कार्यः सर्वं विधाय च ॥ ६॥

अर्थ:
इसके बाद अपने कुलाचार (परिवार के रीति) के अनुसार विष्णु की प्रसन्नता हेतु सभी कर्म करें —
जैसे हल्दी का लेप और अभ्यंग (स्नानादि)।

🍁
गोधूलि समये पूज्यौ तुलसीकेशवौ पुनः ।
पृथक्पृथक्ततः कार्यौ सम्मुखं मङ्गलं पठेत् ॥ ७॥

अर्थ:
गोधूलि बेला (साँझ) में तुलसी और केशव दोनों की पुनः पूजा करें।
उन्हें आमने-सामने रखकर मंगल गीत (विवाह गीत) गाएँ।

🍁
इष्टदेशे भास्वरे तु सङ्कल्पं तु समर्पयेत् ।
स्वगोत्रप्रवरानुक्त्चा तथा त्रिपुरुषादिकम् ॥ ८॥

अर्थ:
विवाह स्थान को प्रकाशित कर, वहाँ संकल्प लें —
अपना गोत्र, प्रवर, और तीन पीढ़ियों के नाम स्मरण कर संकल्प करें।

🍁
अनादिमध्यनिधन त्रैलोक्यप्रतिपालक ।
इमां गृहाण तुलसीं विवाहविधिनेश्वर ॥ ९॥

अर्थ:
हे अनादि, अनन्त, त्रिलोक के पालनकर्ता प्रभो!
विवाह विधि के अनुसार आप इस तुलसी देवी को स्वीकार करें।

🍁
पार्वती बीजसम्भूतां वृन्दाभस्मनि संस्थिताम् ।
अनादिमध्यनिधनां वल्लभां ते ददाम्यहम् ॥ १०॥

अर्थ:
हे प्रभो! यह तुलसी देवी पार्वती के बीज से उत्पन्न हैं,
वृन्दा देवी के भस्म पर स्थित हैं,
अनादि–अनन्त और आपकी प्रिय हैं —
मैं इन्हें आपको समर्पित करता हूँ।

🍁
पयोघृतैश्च सेवाभिः कन्यावद्वर्धितां मया ।
त्वत्प्रियां तुलसीं तुभ्यं दास्यामि त्वं गृहाण भोः ॥ ११॥

अर्थ:
जिसे मैंने कन्या की तरह दूध, घी और सेवा से पाला है,
वह आपकी प्रिय तुलसी देवी है —
हे प्रभो! कृपा कर उसे स्वीकार करें।

🍁
एवं दत्वा तु तुलसीं पश्चात्तौ पूजयेत्ततः ।
रात्रौ जागरणं कुर्यात् विवाहोत्सवपूर्वकम् ॥ १२॥

अर्थ:
ऐसे तुलसी का दान कर, दोनों (तुलसी और विष्णु) की पुनः पूजा करें।
फिर रात्रि में विवाहोत्सव के रूप में जागरण करें।

🍁
प्रतिवर्षमिदं कुर्यात् कार्तिकव्रतसिद्धये ।
ततः प्रभातसमये तुलसीं विष्णुमर्चयेत् ॥ १३॥

अर्थ:
यह विधि प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास में करें —
इससे कार्तिक व्रत की सिद्धि होती है।
प्रभात में तुलसी और विष्णु की फिर से पूजा करें।

🍁
वह्नि संस्थापनं कृत्वा द्वादशाक्षरविद्यया ।
पायसाज्य क्षौद्रतिलैः हुनेदष्टोत्तरं शतम् ॥ १४॥

अर्थ:
अग्नि स्थापित कर द्वादशाक्षर मंत्र (“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”) से
पायस, घी, शहद और तिल से १०८ आहुतियाँ दें।

🍁
ततः स्विष्टकृतं हुत्वा दद्यात्पूर्णाहुतिं ततः ।
आचार्यं च समभ्यर्च्य होमशेषं समापयेत् ॥ १५॥

अर्थ:
उसके बाद स्विष्टकृत होम और पूर्णाहुति दें।
आचार्य का सम्मान करें और होम को पूर्ण करें।

🍁
चतुरो वार्षिकान्मासान् नियमं यस्य यत्कृतम् ।

कथयित्वा द्विजेभ्यस्तत् तथाऽन्यत्परिपूजयेत् ॥ १६॥

अर्थ:

चातुर्मास्य व्रत में जो भी नियम पालन किया हो,

उसे ब्राह्मणों को बताकर सबको विधिपूर्वक पूजें।

🍁

इदं व्रतं मया देव कृतं प्रीत्यै तव प्रभो ।

नूनं सम्पूर्णतां यातु त्वत्प्रसादात् जनार्दन ॥ १७॥

अर्थ:

हे प्रभो! यह व्रत मैंने आपकी प्रसन्नता के लिए किया है।

आपकी कृपा से यह पूर्णता प्राप्त करे — हे जनार्दन!

🍁

रेवतीतुर्यचरणे द्वादशीसंयुते नरः ।

न कुर्यात्पारणां कुर्वन् व्रतं निष्फलतां व्रजेत् ॥ १८॥

अर्थ:

यदि रेवती नक्षत्र और द्वादशी का संयोग हो,

तो उस दिन पारण (उपवास तोड़ना) नहीं करना चाहिए —

ऐसा करने से व्रत निष्फल हो जाता है।

🍁

ततो येषां पदार्थानां वर्जनं तु कृतं भवेत् ।

चातुर्मास्येऽथवा तूर्जे ब्राह्मणेभ्यः समर्पयेत् ॥ १९॥

अर्थ:

चातुर्मास्य या कार्तिक में जिन वस्तुओं का त्याग किया गया हो,

उन्हें ब्राह्मणों को दान कर देना चाहिए।

🍁

ततः सर्वं समश्नीयात् यद्यदुक्तं व्रते स्थितः ।

दम्पतिभ्यां सहैवात्र भोक्तव्यं वा द्विजैः सह ॥ २०॥

अर्थ:

व्रत समाप्ति के बाद दम्पति या ब्राह्मणों के साथ बैठकर भोजन करें।

यह शुभ और पूण्यफलप्रद है।

🍁

ततो भुक्तोत्तरं यानि गलितानि दलानि च ।

तुलस्यास्तानि भुक्त्वा तु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ २१॥

अर्थ:

भोजन के पश्चात जो तुलसी के सूखे या गिरे हुए पत्ते हों,

उनका सेवन करने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।

🍁

भोजनानन्तरं विष्णोरर्पितं तुलसीदलम् ।

भक्षणात्पापनिर्मुक्तिः चान्द्रायण शताधिकम् ॥ २२॥

अर्थ:

भोजन के बाद भगवान विष्णु को अर्पित तुलसीदल का सेवन करने से

मनुष्य सौ चान्द्रायण व्रतों से भी अधिक पापमुक्त हो जाता है।

🍁

इक्षुखण्डं तथा धात्रीफलं पूगीफलं तथा ।

भुक्त्वा तु भोजनस्यान्ते तस्योच्छिष्टं विनश्यति ॥ २३॥

एषु त्रिषु न भुक्तं चेदैककमपि येन तु ।

ज्ञेयं उच्छिष्ट आवर्षं नरोऽसौ नात्र संशयः ॥ २४॥

अर्थ:

भोजन के अंत में यदि कोई गन्ना, आंवला या सुपारी खा ले,

तो उसका भोजन उच्छिष्ट नहीं रहता (शुद्ध रहता है)।

परंतु जो इन तीनों में से कुछ भी न खाए,

वह वर्ष भर “उच्छिष्ट” (अपवित्र) माना जाता है — इसमें संदेह नहीं।

🍁

ततः सायं पुनः पूज्यौ इक्षुवंशैश्च मण्डितौ ।

तुलसीवासुदेवौ च कृतकृत्यो भवेत्ततः ॥ २५॥

अर्थ:

सायंकाल पुनः तुलसी और वासुदेव की पूजा करें,

उन्हें गन्ने के डंडों से सजाएँ।

इस प्रकार पूजक सब कृतार्थ हो जाता है।

🍁

ततो विसर्जनं कुर्यात् दत्वा देयादिकं हरेः ।

वैकुण्ठं गच्छ भगवन् तुलस्या सहितः प्रभो ॥ २६॥

मत्कृतं पूजनं गृह्य सन्तुष्टो भव सर्वदा ।

गच्छ गच्छ सुरश्रेष्ठ स्वस्थानं परमेश्वर ॥ २७॥

अर्थ:

इसके बाद भगवान को विसर्जन दें, दान दें,

और प्रार्थना करें —

“हे भगवन्! तुलसी सहित वैकुण्ठधाम पधारिए।”

“मेरी पूजा स्वीकार कर प्रसन्न रहें।”

🍁

यत्र ब्रह्मादयो देवाः तत्र गच्छ जनार्दन ।

एवं विसृज्य देवेशं आचार्याय प्रदापयेत् ॥ २८॥

अर्थ:

“हे जनार्दन! जहाँ ब्रह्मा आदि देवता निवास करते हैं, वहाँ जाइए।”

फिर आचार्य को दान देकर पूजन समाप्त करें।

🍁

मूर्त्यादिकं सर्वमेव कृतकृत्यो भवेन्नरः ।

प्रतिवर्षं करोत्येवं तुलस्युद्वाहनं शुभम् ॥ २९॥

अर्थ:

जो व्यक्ति प्रतिवर्ष इस तुलसी विवाह का आयोजन करता है,

वह सभी कार्यों में सिद्धि प्राप्त करता है और परम शुभ फल पाता है।

🍁 आध्यात्मिक फल --

इह लोके परत्रापि विपुलं सद्यशो भवेत् ।

प्रतिवर्षं तु यः कुर्यात् तुलसीकरपीडनम् ।

भक्तिमान् धनधान्यैश्च युक्तो भवति निश्चितम् ॥ ३०॥

अर्थ:

जो भक्त हर वर्ष तुलसी–विष्णु विवाह करता है,

वह इस लोक और परलोक दोनों में यश, भक्ति, धन और समृद्धि प्राप्त करता है।

वह निश्चय ही भगवद्प्रसाद का पात्र बनता है।

 समापन 

इति सनत्कुमारसंहितान्तर्गतम् वृन्दावनद्वादशीव्रतम् सम्पूर्णम् ।

अर्थ:

इस प्रकार सनत्कुमार संहिता में वर्णित वृन्दावन द्वादशी व्रत (तुलसी–विष्णु विवाह विधि) पूर्ण होती है।

सारांश :

(🌿 तुलसी–विष्णु विवाह कार्तिक शुक्ल एकादशी–द्वादशी के संयोग में किया जाता है।

🌿 यह विवाह स्वयं वृन्दा देवी (तुलसी) और श्रीविष्णु (शालिग्राम) के मिलन का प्रतीक है।

🌿 जो भक्त इस विवाह को श्रद्धा से करता है —

वह अपने घर में लक्ष्मी–नारायण की अनन्त कृपा प्राप्त करता है,

और पापों से मुक्त होकर वैकुण्ठ लोक का अधिकारी बनता है।)

इमां गृहाण तुलसीं विवाहविधिनेश्वर।”

🌿 जय श्री तुलसी–श्रीविष्णु विवाहित मंगलम! 🌿 
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🍁वृंदावन पूजा अथवा तुलसी विष्णु पूजा🍁
🚩✊जय हिंदुत्व✊🚩
(कार्तिक शुक्ल द्वादशी तुलसी विवाह दिवस पूजा)

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🍁 प्रारंभिक संकल्प एवं ध्यान 

संस्कृत:

कार्तिके शुक्लद्वादश्यां वृन्दावने महाविष्णुं तुलसीं च पूजयेत्।

तुलसी समीपे महाविष्णु प्रतिमा निधाय, विघ्नेशं सम्पूज्य—

अर्थ:

कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष द्वादशी को तुलसी और भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए।

तुलसी के समीप विष्णु की प्रतिमा स्थापित कर, पहले गणेश जी की पूजा करें ताकि सभी विघ्न दूर हों।

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्।

प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥

अर्थ:

श्वेत वस्त्रधारी, चतुर्भुज, चन्द्र के समान श्वेतवर्ण, प्रसन्न मुख विष्णु का ध्यान करो —

जो सभी विघ्नों का नाश करते हैं।

🌺 संकल्प 

संस्कृत:

श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थं शुभे ... तिथौ तुलसी महाविष्णु प्रसादसिद्ध्यर्थं तुलसी महाविष्णुपूजां करिष्ये।

अर्थ:

परमेश्वर श्री हरि की प्रसन्नता और तुलसी-विष्णु विवाह से प्राप्त पुण्य और कृपा के लिए

मैं तुलसी और भगवान महाविष्णु की पूजा करूँगा।

🍁ध्यान 

तुलसी ध्यानम्:

ध्यायामि तुलसीं देवीं श्यामां कमललोचनाम्।

प्रसन्नवदनाम्भोजां वरदामभयप्रदाम्॥

अर्थ:

मैं देवी तुलसी का ध्यान करता हूँ — जिनका वर्ण श्यामल है, नेत्र कमल समान, मुख प्रसन्न है,

जो वर और अभय प्रदान करने वाली हैं।

विष्णु ध्यानम्:

ध्यायामि विष्णुं वरदं तुलसीप्रियवल्लभम्।

पीताम्बरं पद्मनेत्रं वासुदेवं वरप्रदम्॥

अर्थ:

मैं भगवान विष्णु का ध्यान करता हूँ — जो तुलसी के प्रिय हैं, पीताम्बर धारण करते हैं,

कमल के समान नेत्र वाले हैं, और वर देने में आनंदित रहते हैं।

🍁आवाहन एवं आसन

आगच्छागच्छ देवेश तेजोराशे जगत्पते।

क्रियमाणां मया पूजां वासुदेव गृद्दाण भोः॥

अर्थ:

हे देवेश, हे जगत्पति वासुदेव!

कृपया मेरे द्वारा की जा रही इस पूजा को स्वीकार करें और सन्निहित हों।

नानारत्नसमायुक्तं... आसनं कृपया विष्णो तुलसि प्रतिगृह्यताम्।

अर्थ:

हे विष्णु और तुलसी! रत्नों से जड़े इस आसन को कृपया स्वीकार करें।

आप दोनों को नमस्कार कर आसन समर्पित करता हूँ।

🍁 पाद्य, अर्घ्य, आचमन

गङ्गादिसर्वतीर्थेभ्यो... पाद्यार्थं प्रतिगृह्यताम्।

अर्थ:

गंगा आदि पवित्र नदियों से लाया गया यह जल आपके चरणों को धोने के लिए है — इसे स्वीकार करें।

अर्घ्यं गृहाण देवि त्वं... अक्षय्यफलदायिनि।

अर्थ:

हे देवी तुलसी! यह अर्घ्य (स्वागत जल) अक्षत आदि से युक्त है, कृपया इसे स्वीकार करें —

यह अक्षय पुण्य देने वाला है।

कर्पूरवासितं तोयं... आचम्यतां जगन्नाथ।

अर्थ:

हे जगन्नाथ! कपूर से सुगंधित यह आचमन जल भक्तिपूर्वक स्वीकार करें।

🍁 मधुपर्क, पञ्चामृत, स्नान, वस्त्र

मधुपर्कं गृहाणेदं मधुसूदनवल्लभे।

अर्थ:

हे मधुसूदन की प्रिया तुलसी! मधु, दधि, घृत से बना यह मधुपर्क स्वीकार करें।

पञ्चामृतं गृहाणेदं... दामोदरकुटुम्बिनि।

अर्थ:

हे तुलसी! यह दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से बना पञ्चामृत है — इसे स्वीकार करें।

स्नानं —

गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती आदि नदियों से लाया गया यह स्नान जल आपको समर्पित है।

वस्त्रं —

पीताम्बर वस्त्र धारण करें, जो सभी पापों का नाश करने वाला है।

आभरणानि —

हे तुलसीश्वर! स्वर्णमुकुट, हार, केयूर, कटक आदि दिव्य आभूषण स्वीकार करें।

-🍁गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य

गन्धं स्वीकुरुतं देवौ रमेशहरिवल्लभे।

– चन्दन, अगुरु, कर्पूर, कस्तूरी से युक्त सुगंध।

पुष्पैः अर्चये तुलसीहरी।

– मल्लिका, मन्दार, चम्पा, शतपत्र, कमल आदि फूलों से पूजा।

धूपं गृहाण वरदे...

– धूप प्रज्ज्वलित कर दोनों देवों को अर्पित करें।

दीपं देवि गृहाणेमं...

– तीन बाती वाला गोघृत दीपक अर्पण करें।

नैवेद्यं गृह्यताम् —

– विविध फल, क्षीर (दूध), घृत, भोज्य पदार्थों का नैवेद्य अर्पण।

ताम्बूलं प्रतिगृह्यताम् —

– कर्पूर, पूगफल और पान के साथ ताम्बूल अर्पण।

🍁 नीराजन, प्रदक्षिणा, नमस्कार

नीराजनं गृहाणेदं कर्पूरैः कलितं मया।

– कपूर आरती से भगवान को नीराजन।

प्रदक्षिणा मन्त्र:

प्रकृष्टपापनाशाय प्रकृष्टफलसिद्धये।

युवां प्रदक्षिणी कुर्वे तुलसीशौ प्रसीदतम् ॥

अर्थ:

सर्वश्रेष्ठ पापों के नाश और उत्तम फल की सिद्धि हेतु

मैं आप दोनों की प्रदक्षिणा करता हूँ — कृपया प्रसन्न हों।

🍁प्रार्थना और समर्पण

नमोऽस्तु पीयूषसमुद्भवायै... नमस्तुलस्यै जगतां जनन्यै॥

अर्थ:

अमृत से उत्पन्न, जगत् की जननी तुलसी देवी को नमस्कार।

जन्म और मृत्यु के भय को नाश करने वाली आपको प्रणाम।

शङ्खचक्रगदापाणे द्वारकानिलयाच्युत।

रक्ष मां शरणागतम् ॥

अर्थ:

हे शंख, चक्र, गदा धारण करने वाले द्वारकावासी अच्युत!

मैं शरण में आया हूँ — मेरी रक्षा करें।

🍁 पुष्पाञ्जलि एवं फलाश्रुति

पुष्पाञ्जलिं गृहाणेदं... नताभीष्टफलप्रदे।

अर्थ:

हे देवी तुलसी! यह पुष्पाञ्जलि स्वीकार करें और भक्त को इच्छित फल प्रदान करें।

आयुरारोग्यमतुलमैश्वर्यं पुत्रसम्पदः।

देहि मे सकलान्कामान् तुलस्यमृतसम्भवे॥

अर्थ:

हे अमृत से उत्पन्न तुलसी! मुझे दीर्घायु, आरोग्य, ऐश्वर्य, पुत्र-संतान और सभी इच्छाएँ प्रदान करें।

-🍁 उपसंहार

कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा... नारायणायेति समर्पयामि॥

अर्थ:

मैं अपने शरीर, वाणी, मन और इन्द्रियों से जो कुछ भी करता हूँ,

वह सब नारायण को ही समर्पित करता हूँ।

ॐ तत्सत — यह सत्य और पूर्णता का सूचक है।

-सारांश 

यह पूजा तुलसी और भगवान विष्णु के दिव्य विवाह की लीला का प्रतीक है।

इससे घर में सुख, सौभाग्य, आरोग्य और वैकुण्ठ तुल्य वातावरण बनता है।

जो व्यक्ति कार्तिक शुक्ल द्वादशी को यह पूजन करता है,

उसे सैकड़ों यज्ञों का फल और मोक्ष का अधिकार प्राप्त होता है।

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🍁 तुलसी-विवाह-विधिः🍁
🚩✊जय हिंदुत्व✊🚩
 (संस्कृत पाठ एवं हिन्दी अर्थ सहित) 🌸

---यह संपूर्ण विधि कार्तिक शुक्ल एकादशी–द्वादशी के पवित्र दिन तुलसी व श्रीविष्णु (शालिग्राम) के दिव्य विवाह में की जाती है।

(१) मण्डप-तैयारी एवं तुलसी-पूजन

संस्कृत:

इक्षुदण्डनिर्मिते पुष्पाद्यलङ्कृते मण्डपे विवाहः ।

तुलसी हरिद्राचन्दनकुङ्कुमपुष्पाद्यालङ्कृता स्वीयवेद्यां प्रथमं पूज्यते ॥

हिन्दी अर्थ:

गन्ने (ईख) के डण्डों से बना हुआ और पुष्पों से सजाया गया विवाह-मण्डप तैयार करें।

तुलसी माता को हरिद्रा (हल्दी), चन्दन, कुंकुम और पुष्पों से सुशोभित करके उनके आसन पर पहले पूजन करें।

(२) विघ्नेश्वर ध्यान एवं पूजन

संस्कृत:

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।

प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥

हिन्दी अर्थ:

श्वेत वस्त्रधारी, चन्द्र समान उज्ज्वल वर्ण वाले, चतुर्भुज विष्णु स्वरूप श्रीगणेश जी का ध्यान करें,

जो प्रसन्न मुख वाले हैं, वे समस्त विघ्नों का नाश करें।

(३) संकल्प

संस्कृत:

परमेश्वरप्रीत्यर्थं शुभे शोभने मुहूर्ते ... शुभतिथौ

तुलस्याः विष्णुना सह विवाहोत्सवमाचरिष्ये ॥

हिन्दी अर्थ:

परमेश्वर की प्रसन्नता के लिए, इस शुभ मुहूर्त और शुभ तिथि में,

मैं तुलसी देवी का भगवान विष्णु के साथ विवाहोत्सव संपन्न करूँगा।

(फिर जल से उपस्पर्शन करें अर्थात् हाथ धोकर शुद्ध हों।)

(४) आरम्भिक पूजन

संस्कृत:

विघ्नेश्वरपूजां कलशपूजां तुलसीपूजां च यथाविधि निर्वर्त्य ...

विष्णुं विवाहार्थे वरार्ह वस्रालङ्करण पुष्पमालादिभिः अलङ्कृत्य

वाद्यधोषगीतपुरस्सरं विवाहमण्डपमानीय कर्ता नारिकेल-कदलीफल- ताम्बूलादिभिः उपसृत्य मण्डपे आसने प्रतिष्ठाप्य प्रार्थयेत् —

हिन्दी अर्थ:

विघ्नेश (गणेश), कलश और तुलसी माता की पूजन विधि पूर्ण करने के बाद,

भगवान विष्णु (शालिग्राम) को वर के रूप में सुंदर वस्त्र, पुष्पमालाओं से सजाएँ।

वाद्य, शंख, गीत और मंगल ध्वनि के साथ उन्हें विवाह मण्डप में लाकर आसन पर प्रतिष्ठित करें।

फिर यह प्रार्थना करें —

(५) श्रीविष्णुप्रार्थना

संस्कृत:

आगच्छ भगवन् देव अर्हयिष्यामि केशव ।

तुभ्यं ददामि तुलसीं प्रतीच्छन् कामदो भव ॥

हिन्दी अर्थ:

हे भगवन् केशव! पधारिए, मैं आपकी पूजा-अर्चना करना चाहता हूँ।

मैं आपको तुलसी देवी अर्पण करता हूँ, आप इसे स्वीकार करें और मनोवांछित फल प्रदान करें।

(६) अर्घ्यादि पूजन

संस्कृत:

आसनमिदं, अलङ्क्रियताम् । पाद्यं समर्पयामि ।

अर्घ्यं समर्पयामि, आचमनीयं समर्पयामि ।

मधुपर्कं समर्पयामि । हरिद्रालेप-मङ्गलविधिं समर्पयामि ।

तैलाभ्यङ्गपूर्वकं मङ्गलस्नानं समर्पयामि ।

वस्रालङ्करणपुष्पमालाः समर्पयामि ।

गन्धान्धारयामि । गन्धोपरि हरिद्राकुङ्कमं समर्पयामि ।

पुष्पैः पूजयामि । १२-२४-१०८ नामभिरर्चयेत् ॥

हिन्दी अर्थ:

हे भगवन्! यह आसन ग्रहण करें, मैं आपको पाद्य (पाँव धोने का जल), अर्घ्य (आदर जल), आचमनीय (पीने हेतु जल) समर्पित करता हूँ।

मधुपर्क (मधु-दूध मिश्रित अर्घ्य) अर्पित करता हूँ।

हल्दी लेप, तेल-स्नान, वस्त्र, पुष्पमाला, गंध-कुंकुम, और पुष्पों से आपको पूजता हूँ।

फिर १२, २४ या १०८ नामों से विष्णु जी की आराधना करें।

(७) कन्यादान विधान

संस्कृत:

(वधूवरौ परस्परमभिमुखौ स्थापयित्वा)

गोत्रोद्भवां ... शर्मणः प्रपौत्रीं ... शर्मणः पौत्रीं ... शर्मणः पुत्रीं

तुलसीनाम्नीं इमां कन्यकां अजाय अनादये श्रीविष्णवे वराय ददामि ॥

(त्रिरुक्त्वा)

हिन्दी अर्थ:

वधू (तुलसी) और वर (शालिग्राम विष्णु) को आमने-सामने स्थापित करें।

फिर यह कहें —

“अमुक गोत्रोत्पन्न तुलसी नामक कन्या को मैं अनादि भगवान विष्णु को वर के रूप में तीन बार अर्पित करता हूँ।”

(८) विशेष प्रार्थना

संस्कृत:

अनादिमध्यनिधन त्रैलोक्य प्रतिपालक ।

इमां गृहाण तुलसीं विवाह विधिनेश्वर ॥

पार्वती बीजसंभूतां बृन्दाभस्मनि संस्थिताम् ।

अनादिमध्यनिधनां वल्लभां ते ददाम्यहम् ॥

हिन्दी अर्थ:

हे अनादि, मध्यहीन, अनंत भगवान! तीनों लोकों के रक्षक प्रभो!

आप इस तुलसी देवी को विवाह विधि के अनुसार स्वीकार करें।

यह तुलसी पार्वती के बीज से उत्पन्न हुईं, जो ब्रिंदा की भस्म पर स्थित हैं —

आपकी प्रिय वल्लभा हैं — इन्हें मैं आपको अर्पित करता हूँ।

-(९) समर्पण मंत्र

संस्कृत:

पयोघृतैश्च सेवाभिः कन्यावद्वर्धितां मया ।

त्वत्प्रियां तुलसीं तुभ्यं ददामि त्वं गृहाण भोः ॥

हिन्दी अर्थ:

दूध-घृत से स्नान कराई गई, कन्या समान पालन की गई —

आपकी प्रिय तुलसी को मैं आपको अर्पित करता हूँ; कृपया स्वीकार करें।

(१०) विवाह-मिलन एवं समापन

संस्कृत:

वाद्यघोष - वेदस्वस्तिवाचन - मङ्गलाशीर्भिः उभौ मेलयित्वा

गीतादिभिः सन्तोषयेत् ।

सायमपि पुनः पूजां कृत्वा स्रीधनं यथाशक्ति दद्यात् ॥

हिन्दी अर्थ:

वाद्य, वेद मंत्र, स्वस्तिवाचन और मंगल गीतों के साथ तुलसी-विष्णु का मिलन कराएँ।

सायंकाल पुनः पूजन करें और यथाशक्ति तुलसी विवाह का दान (श्रद्धानुसार वस्त्र, धन या अन्न) करें।

(११) विसर्जन एवं आशीर्वाद

संस्कृत:

विवाहोत्सवपूर्तौ —

वैकुण्ठं गच्छ भगवन् तुलस्या सहितः प्रभो ।

मत्कृतं पूजनं गृह्य सन्तुष्टो भव सर्वदा ।

गच्छ गच्छ सुरश्रेष्ठ स्वस्थानं परमेश्वर ।

यत्र ब्रह्मादयो देवाः तत्र गच्छ जनार्दन ॥

हिन्दी अर्थ:

हे भगवन्! तुलसी सहित आप अपने वैकुण्ठ धाम में पधारिए।

मेरे द्वारा किया गया यह पूजन स्वीकार कर सदैव प्रसन्न रहें।

हे जनार्दन! आप ब्रह्मा आदि देवताओं के लोक में, अपने परम स्थान पर पधारें।

(१२) मङ्गल आरती एवं रक्षा

संस्कृत:

इति उभौ अभ्यनुज्ञापयेत् मङ्गलारार्तिकेन सह ।

तुलसीं यथापूर्वं रक्षेत् ॥

हिन्दी अर्थ:

फिर दोनों (विष्णु एवं तुलसी) का मङ्गल आरती करें,

और तुलसी माता को यथापूर्व स्थान पर सावधानी से रखकर उनकी रक्षा करें।

 

आध्यात्मिक लाभ ---

जो इस तुलसी-विष्णु विवाह-विधि को श्रद्धा एवं भक्ति से संपन्न करता है,

वह सकल पापों से मुक्त होकर अखण्ड सौभाग्य, सुख,

 समृद्धि और विष्णुपद की प्राप्ति करता है।

उसके घर में सदैव लक्ष्मी, मंगल और आरोग्य निवास करते हैं।
  🚩✊जय हिंदुत्व✊🚩
☀!! श्री हरि: शरणम् !! ☀
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🌹देवउठनी एकादशी व्रत कथा🌹

देवउठनी एकादशी की व्रत कथाएँ कई हैं, 
जिनमें एक प्रमुख कथा राजा और एक स्त्री की है। एक अन्य कथा में भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी की बातचीत है, जिसमें भगवान वर्षा ऋतु के दौरान चार महीने के लिए शयन करने का निर्णय लेते हैं। 
राजा और स्त्री वाली कथा
एक राज्य में एकादशी को अन्न नहीं बेचा जाता था और प्रजा फलाहार करती थी। एक दिन भगवान विष्णु ने एक सुंदर स्त्री का रूप धारण किया और सड़क पर बैठ गए। राजा, उस स्त्री के सौंदर्य पर मोहित होकर, उसे रानी बनने का प्रस्ताव देते हैं, लेकिन स्त्री एक शर्त रखती है कि उसे राज्य का अधिकार और बनाया हुआ भोजन खाना होगा। 
परीक्षा: एकादशी के दिन, स्त्री के रूप में, भगवान विष्णु ने राजा को मांसाहार खाने के लिए मजबूर करने की कोशिश की, लेकिन राजा ने एकादशी व्रत का हवाला दिया। 
शर्त: स्त्री ने शर्त याद दिलाई और कहा कि अगर राजा ने खाना नहीं खाया तो वह राजकुमार का सिर काट देगी। 
धर्म की रक्षा: राजा ने अपनी बड़ी रानी से सलाह ली, जिन्होंने कहा कि धर्म को नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि पुत्र दोबारा आ सकता है, लेकिन धर्म नहीं। 
प्रकट हुए भगवान: जब राजकुमार ने यह सुना तो उसने स्वयं को बलिदान करने की पेशकश की। तभी रानी के रूप में भगवान विष्णु प्रकट हुए और राजा की धर्मपरायणता से प्रसन्न होकर उसे वरदान दिया। 
वरदान और मुक्ति: भगवान विष्णु ने राजा को मुक्ति और परम लोक में निवास का वरदान दिया। राजा ने अपना राज्य पुत्र को सौंप दिया और विमान में बैठकर स्वर्ग चले गए। 
भगवान विष्णु और लक्ष्मी जी की कथा
एक बार लक्ष्मी जी ने भगवान विष्णु से आग्रह किया कि वे दिन-रात जागते रहते हैं और जब सोते हैं तो लाखों वर्षों के लिए सो जाते हैं, जिससे समस्त सृष्टि का नाश हो जाता है। इसलिए उन्हें नियमित रूप से विश्राम करना चाहिए। 
भगवान विष्णु ने लक्ष्मी जी की बात मानी और कहा कि वे वर्षा ऋतु के दौरान चार महीने के लिए शयन करेंगे। इस दौरान उन्हें भी आराम मिलेगा। 
उन्होंने कहा कि उनकी यह निद्रा 'अल्पनिद्रा' कहलाएगी और यह उनके भक्तों के लिए मंगलकारी रहेगी। जो भी भक्त इस दौरान उनकी सेवा करेंगे, उनके घर में लक्ष्मी सहित वे निवास करेंगे।

।। तुलसीगीता ।।

यह श्रीहरि एवं तुलसी संवाद रूप का शुद्ध पाठ है हिन्दी अनुवाद, सहित यह मूलस्रोत- बृहद्धर्मपुराण, पद्मपुराण, और तुलसीमहात्म्य से संकलित यह गीता तुलसी आराधना का सार है।

श्रीभगवानुवाच-
प्राग्दत्वार्घं ततोऽभ्यर्च्य गन्धपुष्पाक्षतादिना।
स्तुत्वा भगवतीं तां च प्रणमेद्दण्डवद्भुवि।।१।।

पहले तुलसी देवी को अर्घ्य देकर, गंध, पुष्प, अक्षत आदि से पूजन करें, फिर भगवती तुलसी की स्तुति करके भूमि पर दण्डवत प्रणाम करें।

श्रियं श्रिये श्रियावासे नित्यं श्रीधवसत् रते।
भक्त्या दत्तं मया देवि अर्घं गृह्ण नमोऽस्तु ते।।२।।

हे देवी! आप लक्ष्मी की स्वरूपा, लक्ष्मी के निवास-स्थान और श्रीहरि की प्रिय हैं। मैं श्रद्धा से दिया हुआ यह अर्घ्य आपको समर्पित करता हूँ- आपको नमस्कार।

निर्मिता त्वं पुरा देवैरर्चिता त्वं सुरासुरैः।
तुलसि हर मे पापं पूजां गृह्ण नमोऽस्तु ते।।३।।

हे तुलसी! तुम देवताओं द्वारा निर्मित और देवासुर दोनों द्वारा पूजित हो। मेरे पापों का नाश करो, मेरी पूजा स्वीकार करो- तुम्हें नमस्कार।

महाप्रसादजननी आधिव्याधिविनाशिनी।
सर्वसौभाग्यदे देवि तुलसि त्वां नमोऽस्तु ते।।४।।

हे तुलसी देवी! आप महाप्रसाद की जननी हैं, समस्त रोग-दोषों का नाश करने वाली हैं,और सर्व सौभाग्य प्रदान करने वाली देवी हैं- आपको नमस्कार।

या दृष्टा निखिलाघसंघशमना... तस्यै तुलस्यै नमः।।५।।

हे तुलसी! जिनका दर्शन पापों को हर लेता है, जिनका स्पर्श शरीर को पवित्र करता है, जिनका पूजन रोगों का नाश करता है,जिनका जल मृत्यु के भय को मिटाता है, जो भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में रोपित होकर मुक्ति प्रदान करती हैं- ऐसी तुलसी देवी को बार-बार नमस्कार।

भगवत्यास्तुलस्यास्तु माहात्म्यामृतसागरे।
लोभात् कूर्द्दितुमिच्छामि क्षुद्रस्तत् क्षम्यतां त्वया।।६।।

हे तुलसी भगवती! आपके महात्म्य रूप अमृत-सागर में डूबने की इच्छा मुझे लोभवश हो रही है। मैं क्षुद्र मानव हूँ, कृपा कर इसे क्षमा करें।

श्रवणाद्वादशीयोगे शालग्रामशिलार्चने।
यद्फलं सङ्गमे प्रोक्तं तुलसीपूजनेन तत्।।७।।

श्रवण नक्षत्रयुक्त द्वादशी तिथि पर शालग्राम की पूजा से जो फल मिलता है, वही फल तुलसी पूजा से प्राप्त होता है।

धात्रीफलेन यत् पुण्यं जयन्त्यां समुपोषणे।
तद्फलं लभते मर्त्यास्तुलसीपूजनेन तत्।।८।।

जयन्ती तिथि पर उपवास करने या आंवले (धात्रीफल) के सेवन से जो पुण्य मिलता है,
वही तुलसी पूजा से प्राप्त होता है।

यद्फलं प्रयागस्नाने काश्यां प्राणविमोक्षणे।
तद्फलं विहितं देवैस्तुलसीपूजनेन तत्।।९।।

प्रयाग में स्नान करने या काशी में शरीर त्यागने से जो फल मिलता है, वही फल तुलसी पूजन से भी मिलता है।

चतुर्णामपि वर्णानामाश्रमाणां विशेषतः।
स्त्रीणां च पुरुषाणां च पूजितेष्टं ददाति च।।१०।।

तुलसी देवी चारों वर्णों और चारों आश्रमों के लोगों- स्त्री, पुरुष सभी को उनकी इच्छा अनुसार वर देती हैं।

तुलसी रोपिता सिक्ता दृष्टा स्पृष्टा च पावयेत्।
आराधिता प्रयत्नेन सर्वकामफलप्रदा।।११।।

जो तुलसी को रोपता है, सींचता है, देखता या छूता है- वह पवित्र हो जाता है। जो तुलसी की भक्तिपूर्वक आराधना करता है, उसे सभी कामनाओं के फल मिलते हैं।

प्रदक्षिणं भ्रमित्वा ये नमस्कुर्वन्ति नित्यशः।
न तेषां दुरितं किञ्चिदक्षीणमवशिष्यते।।१२।।

जो प्रतिदिन तुलसी की परिक्रमा और प्रणाम करते हैं, उनके सभी पाप क्षीण हो जाते हैं।

पूज्यमाना च तुलसी यस्य वेश्मनि तिष्ठति।
तस्य सर्वाणि श्रेयांसि वर्धन्तेऽहरहः सदा।।१३।।

जिसके घर में तुलसी पूजित रूप में विद्यमान रहती हैं, उसके घर में दिन-प्रतिदिन शुभता और समृद्धि बढ़ती रहती है।

पक्षे पक्षे च द्वादश्यां... तुलसीवनपूजनम्।।१४।।

हर पक्ष की द्वादशी तिथि को स्वयं ब्रह्मा आदि देवता भी तुलसीवन की पूजा करते हैं।

अनन्यमनसा नित्यं तुलसीं स्तौति यो जनः।
पितृदेवमनुष्याणां प्रियो भवति सर्वदा।।१५।।

जो व्यक्ति नित्य तुलसी की भक्ति से स्तुति करता है, वह देवताओं, पितरों और मनुष्यों- सभी का प्रिय बन जाता है।

रतिं करोमि नान्यत्र तुलसीकाननं विना... कलौ तिष्ठामि भामिनि।।१६-१७।।

भगवान श्रीहरि कहते हैं- हे प्रिये तुलसी! मुझे अन्य किसी स्थान में उतनी रति नहीं जितनी तुलसीवन में है। सत्य कहता हूँ- कलियुग में मैं तीर्थों और पर्वतों को छोड़कर सदैव तुलसीवन में निवास करता हूँ।

न धात्रा सफला यत्र न विष्णुस्तुलसीवनम्।
तत् स्मशानसमं स्थानं सन्ति यत्र न वैष्णवाः।।१८।।

जहाँ विष्णु या तुलसीवन नहीं है, वह स्थान मृत-भूमि के समान है;जहाँ वैष्णव नहीं रहते, वह स्थान भी स्मशान तुल्य है।

तुलसीगन्धमादाय यत्र गच्छति मारुतः।
दिशो दश च पूताः स्युर्भूतग्रामाश्चतुर्दशः।।१९।।

जहाँ तुलसी की सुगंध लेकर वायु प्रवाहित होती है, वहाँ की दसों दिशाएँ और चौदहों लोक शुद्ध हो जाते हैं।

तुलसीवनसंभूता छाया पतति यत्र वै।
तत्र श्राद्धं प्रदातव्यं पितॄणां तृप्तिहेतवे।।२०।।

जहाँ तुलसीवन की छाया पड़ती है, वहाँ श्राद्ध करने से पितर अत्यंत तृप्त होते हैं।

तुलसी पूजिता नित्यं सेविता रोपिता शुभा।
स्नापिता तुलसी यैस्तु ते वसन्ति ममालये।।२१।।

जो लोग तुलसी की नित्य पूजा, सेवा, रोपण और स्नान करते हैं, वे मेरे धाम में निवास करते हैं।

सर्वपापहरं सर्वकामदं तुलसीवनम्।
न पश्यति समं सत्ये तुलसीवनरोपणात्।।२२।।

तुलसीवन पापों का नाशक और सभी कामनाओं का पूरक है। सत्य युग में भी तुलसीवनारोपण के समान कोई पुण्य नहीं।

तुलस्यलङ्कृता ये वै तुलसीवनपूजकाः।
तुलसीस्थापका ये च ते त्याज्या यमकिङ्करैः।।२३।।

जो तुलसीवन की स्थापना, पूजन और तुलसीमाला धारण करते हैं, यमदूत उन्हें कभी नहीं छूते।

दर्शनं नर्मदायास्तु गङ्गास्नानं कलौ युगे।
तुलसीदलसंस्पर्शः सममेतत्त्रयं स्मृतम्।।२४।।

कलियुग में नर्मदा-दर्शन, गंगा-स्नान और तुलसीदल-स्पर्श- तीनों समान पुण्यदायक माने गए हैं।

दारिद्र्यदुःखरोगार्तिपापानि सुबहून्यपि।
हरते तुलसीक्षेत्रं रोगानिव हरीतकी।।२५।।

जैसे हरड़ रोगों को हर लेती है, वैसे ही तुलसीवन दारिद्र्य, दुःख, रोग और पाप- सबको दूर कर देता है।

तुलसीकानने यस्तु मुहूर्तमपि विश्रमेत्।
जन्मकोटिकृतात् पापात् मुच्यते नात्र संशयः।।२६।।

जो व्यक्ति तुलसीवन में केवल एक मुहूर्त भी विश्राम करता है, वह करोड़ों जन्मों के पापों से मुक्त हो जाता है।

नित्यं तुलसिकारण्ये तिष्ठामि स्पृहया युतः।
अपि मे क्षतपत्रैकं कश्चिद्धन्योऽर्पयेदिति।।२७।।

भगवान श्रीहरि कहते हैं- मैं तुलसीवन में सदा रहता हूँ, इस आशा से कि कोई धन्य भक्त मुझे एक भी तुलसीपत्र अर्पित करे।

तुलसीनाम यो ब्रुयात् त्रिकालं वदने नरः।
विवर्णवदनो भूत्वा तल्लिपिं मार्जयेद्यमः।।२८।।

जो मनुष्य दिन में तीन बार “तुलसी” नाम लेता है, उसके मुख की लिपि (कर्मफल) यमराज स्वयं मिटा देते हैं।

शुक्लपक्षे यदा देवि तृतीया बुधसंयुता।
श्रवणया च संयुक्ता तुलसी पुण्यदा तदा।।२९।।

जब शुक्लपक्ष की तृतीया बुधवार के साथ और श्रवण नक्षत्रयुक्त हो, उस दिन तुलसी पूजा विशेष पुण्य प्रदान करती है।

            ।। इति श्री तुलसीगीता सम्पूर्ण: ।।

तुलसी देवी श्रीहरि की अर्धांगिनी स्वरूपा हैं। जो मनुष्य श्रद्धा से तुलसी की सेवा, पूजन, रोपण या नामस्मरण करता है,वह विष्णुलोक का अधिकारी होता है। तुलसीवन ही कलियुग का जीवंत तीर्थ है।

               ।। जय जय तुलसी मैया की ।।

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