दीपावली-पूजन-पद्धति ः(बही- वसनापूजन; चालीसा एवं आरती आदि सहित)
卐 दीपावली-पूजन-पद्धतिः 卐
(बही- वसनापूजन, चालीसा एवं आरती आदि सहित)
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महालक्ष्मी-पूजन-सामग्री
1. श्रीमहालक्ष्मीजी की मूर्ति या चित्र
(महालक्ष्मी की मूर्ति श्वेत संगमरमर, स्वर्ण, रजत धातु की हो सकती मिट्टी की मूर्ति नई होनी चाहिए। है)
2. श्रीगणेशजी की मूर्ति
3. पुष्पमाला 5 और खिले हुए कमल के फूल (लाल, श्वेत)
4. पान 21
5. लौंग, सुपारी 11 (साबूत), इलायची 10 ग्राम
6. धूप, अगरबत्ती आदि
7. आम्र के पत्ते, चंदन केशरयुक्त
8. अक्षत 1 पाव
9. दूध 200 ग्राम
10. दही 100 ग्राम
11. जल-कलश, धनियाँ 20 ग्राम, गुड़ 50 ग्राम
12. गंगाजल
13. यज्ञोपवीत 2 जोड़ा (चार)
14. चाँदी का सिक्का 5 या 1
15. शर्करा १०० ग्राम
16. मौसम के अनुसार फल सेव 5 व केले
17. लाल और खेत रंग के वस्त्र
18. हल्दी
19. व्यवसायी लोगों के लिए, कलम, दवात और नई बही (रजिस्टर), ५ हल्दी, ५ सुपारी, ५ कमलगट्टा,५ करञ्ज, ५ दूर्वा
20. तुला (तराजू)
21. आभूषण
22. श्वेत स्वच्छ धोती, 1 मीटर लाल कपड़ा
23. उपवस्व (अँगोछा, छोटा तौलिया)
24. मौली दो
25. चंदन
26. अबीर-गुलाल 10 ग्राम
27. कपूर 10 ग्राम
28. शुद्ध घी 200 आम
29. दीपक के लिए तेल
30. नारियल 1 जलदार
31. खील (धान का लावा), बताशे 100 ग्राम
32. नैवेद्य (मिष्ठात्र) 500 प्राम
33. रुई 10 ग्राम, दियासलाई
34. अर्घ्यपात्र सहित, अन्य सभी पात्र
35. चौकी (आसन)
36. मधु (शहद) 50 आम
37. पंचमेवा 1 पाव
38. सिन्दूर 10 ग्राम
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दीपावली-पूजन क्यों ?
कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाने वाला पर्व धनतेरस के रूप में जाता है। यह धनतेरस दीपावली के आगमन की शुभ सूचना भी देता है।
परम्परानुसार धनतेरस के दिन सोने-चाँदी के जेवरात, सिक्के व बर्तन खरीदने का भी विधान है।
इस दिन महालक्ष्मी के स्थिर स्वरूप के पूजन का विशेष महत्त्व है। धन त्रयोदशी के दिन यमराज को प्रसन्न करने के लिए दीपदान किया जाता है।
धनतेरस के दिन ही वैद्यराज धन्वंतरि की जयन्ती का भी उत्त्सव मनाया जाता है। इस दिन सायंकाल मिट्टी के दीये में तिल या सरसों का तेल भरकर, पैसा व कौड़ी डालकर, उसमें चौमुखी बत्ती डालें, दीये को प्रज्वलितकर गंध-पुष्पादि से उसका पूजन करें, फिर दक्षिण दिशा की ओर मुँह करके
"मृत्युना दण्डपाशाभ्यां कालेन श्यामया सह ।
त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यज प्रीयतां मम।
इस मंत्र के साथ यमराज का ध्यान करते हुये दीपदान करे। इससे यमराज प्रसन्न होकर दीर्घायु प्रदान करते हैं। दीपक में पैसा व कौड़ी भी डालना चाहिए।
मध्यरात्रि (निशाकाल) में घर में रखे सोने-चांदी के आभूषण, सिक्के व नये बर्तन को गणेश-लक्ष्मी के सम्मुख रखकर भगवती पराम्बा महालक्ष्मी के स्थिर स्वरूप का पूजन-अर्चन करने से सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। पूजन में ॐ भगवती को कटसरैया (स्वर्णपुष्प) के फूल, नैवेद्य में श्वेत मिष्ठान्न व अन्य पूजन सामग्री अर्पित करने से घर में लक्ष्मी की वृद्धि होती है।
श्री व समृद्धि की कामना का पर्व दीपावली
दीपावली पर शास्त्रीय मान्यता के अनुसार प्रत्येक आराधना व उपासना में आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक तीन रूपों का समुचित व्यवहार होता है। इस पर्व पर सोने व चाँदी के सिक्कों के रूप में आधिभौतिक लक्ष्मी का आधिदैविक लक्ष्मी से सम्बन्ध मानते हुए पूजन किया जाता है। इस दिन प्रमुख रूप से लक्ष्मी तथा गणेश की पूजा की जाती है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार कार्तिक अमावस्या को मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् राम चौदह (14) वर्ष का वनवास पूर्णकर रावण का वध करने के बाद अयोध्या लौटे थे। अयोध्यावासियों ने भगवान् राम के लौटने की खुशी में दीप जलाकर महोत्सव मनाया था। इसी दिन उज्जैन सम्म्राट् विक्रमादित्य का राजतिलक भी हुआ था। विक्रमी संवत् का शुभारम्भ इसी दिन से हुआ। अतः एक प्रकार से यह 'नववर्ष' का प्रथम दिन भी है, आज ही के दिन व्यापारी अपना बही-खाता बदलते हैं तथा लाभ-हानि का ब्यौरा तैयार करते हैं।
गणेश-लक्ष्मी की मृण्मयी (मिट्टी की) या चाँदी की प्रतिमा बाजार से खरीदकर उनका विधिवत् पूजन-अर्चन किया जाता है। धन के देव कुबेर, चित्रगुप्त, महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती आदि का पूजन भी किया जाता है। इस पावन पर्व पर दीपकों की पूजा का विशेष महत्त्व है।
पूजन कैसे करें
दो थालियों में छह-छह चौमुखे दीपक प्रज्वलित कर रखें, 26 छोटे दीपक भी प्रज्वलित कर लें। व्यापारीगण दुकान की गद्दी पर पाटे या अन्य सुन्दर आसन पर गणेश की नूतन प्रतिमा के दाहिने महालक्ष्मी की नूतन प्रतिमा स्थापित करें। गौरी-गणेश की प्रतिष्ठाकर षोडशोपचार पूजन कर दें, तदनन्तर नवग्रह, षोडशमातृका तथा कलश का स्थापन पूजन कर प्रधान पूजन में भगवती महालक्ष्मी का पूजन करें। पूजन से पूर्व नूतन प्रतिमा तथा द्रव्य लक्ष्मी (सोने-चाँदी के सिक्के या आभूषण) की प्रतिष्ठा करें।
अथ दीपावली-पूजन- पद्धतिः
समय स्नान-सन्ध्यादि नित्यकृत्यों को समाप्त करके, सामग्रियों को यथास्थान पर रख ले। यजमान सायंकाल के पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठ जाय। आचमन और प्राणायाम करके हाथ में जल-अक्षतादि लेकर पूजन का संकल्प करें-
देशकालौ संकीर्त्य अमुकगोत्रः (अमुक शर्मा/वर्मा/गुप्तः) मम श्रीमहाकाली-महालक्ष्मी-महासरस्वत्यादि-देवता-प्रीति-द्वारा शुभ-मुहूर्ते अमुकामुक-व्यापारे विपण्यां निर्विघ्नता पूर्वकम-हरहर्लक्ष्मी-प्राप्त्यर्थं महाकाली-महालक्ष्मी-महासरस्वती-लेखनी-तुलापुरुष-धर्मराज-कुबेर-पूजने च करिष्ये। तत्रादौ निर्विघ्नता सिद्ध्यर्थं लक्ष्मी-गणपति-पूजां करिष्ये। लक्ष्मीगणपतिं सम्पूज्य ।
इस प्रकार यजमान देशकाल, दूकान तथा व्यापार आदि का नाम उच्चारण करके, निर्विघ्नता के लिये मिट्टी के गणेश-लक्ष्मीजी की नूतन प्रतिमा का पूजन करे। गणेशपूजन के पूर्व उन नूतन प्रतिमा की निम्न रीति से प्राणप्रतिष्ठा कर ले।
प्रतिष्ठा
बायें हाथ में अक्षत लेकर निम्न मन्त्रों को पढ़ते हुए दाहिने हाथ से अक्षतों को गणेशजी व लक्ष्मीजी की प्रतिमा पर छोड़ता जाय -
ॐ मनो जूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तनोत्वरिष्ट यज्ञ समिमं दधातु। विश्वे देवास इह मादयन्तामो३म्प्रतिष्ठ ।।
ॐ अस्यै प्राणाः प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणाः क्षरन्तु च। अस्यै देदत्वमचयैि मामहेति च कश्चन ।।
इस प्रकार प्राण-प्रतिष्ठाकर भगवान् गणेश-लक्ष्मी का षोडशोपचार पूजन करके, तदनन्तर नवग्रह, षोडशमातृका तथा (कलश) का पूजनादि करे ।
श्रीमहाकाली (दावात) -
पूजा मशीपात्रे कालीं ध्यायेत्-खड्गं चक्रगदेषु चापपरिघाञ्छूलं भुशुण्डीं शिरः शंखं संदधतीं करैस्त्रिनयनां सर्वाङ्गभूषावृताम्। ॐ नीलाश्मद्युतिमास्यपाददशकां सेवे महाकालिकां यामस्तौ स्वपिते हरौ कमलजौ हन्तुं मधु कैटभम् ।। आवाहयेन्महाकालीं महासुखप्रदायिनीम्। कार्तिकस्यासिते पक्षे पूजनार्थं समाचरेत् ।। यथेमां वाचं कल्याणीमिति महाकाल्यै नमः इति मंत्रेणसम्पूज्य प्रार्थयेत्-जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते ।। दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च। धारयन्त्यायुधानीत्यं देवानां च हिताय वै।। नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे । महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि ।। महाकालि नमस्तेऽस्तु सुखरात्रिं कुरुष्व मे ।।
श्रीमहाकाली (दावात) - पूजन
स्याही-युक्त दवात को भगवती महालक्ष्मी के सामने पुष्प तथा अक्षतपुञ्ज पर रखकर उसमें रोरी से स्वस्तिक बना दे तथा मौली लपेट दे।
'ॐ श्रीमहाकाल्यै नमः।'
इस नाम-मन्त्र से गन्ध-पुष्पादि पञ्चोपचारों से या षोडशोपचारों से दावात में भगवती महाकाली का पूजन करे और अन्त में इस प्रकार प्रार्थना-पूर्वक उन्हें प्रणाम करे-
कालिके ! त्वं जगन्मातर्मसिरूपेण वर्तसे। उत्पन्ना त्वं च लोकानां व्यवहारप्रसिद्धये ।।
या कालिका रोगहरा सुवन्द्या भक्तैः समस्तैर्व्यवहारदक्षैः । जनैर्जनानां भयहारिणी च सा लोकमाता मम सौख्यदास्तु ।।
लक्ष्मीपूजनम्
कार्तिक कृष्ण अमावास्या को भगवती श्रीमहालक्ष्मी एवं भगवान् श्रीगणेश की नूतन प्रतिमाओं का प्रतिष्ठापूर्वक 卐 विशेष पूजन किया जाता है। पूजन के लिये किसी चौकी अथवा कपड़े के पवित्र आसन पर ही गणेशजी के दाहिने भाग में माता महालक्ष्मी की मूर्ति को भी स्थापित करना चाहिये। मूर्तिमयी श्रीमहालक्ष्मी के समीप ही किसी पवित्र पात्र अथवा थैली (वस्त्रादि) में केसरयुक्त चन्दन से वहीं स्वस्तिकादि को अङ्कित्त करके उस द्रव्यरूपा लक्ष्मी (रुपयों) को भी स्थापित करके, एक साथ ही दोनों की श्रीसूक्त के मन्त्रों के द्वारा षोडशोपचारों से पूजन करना चाहिये और यह बात विशेष ध्यान 卐 देने योग्य है कि द्रव्यलक्ष्मी के रुपये सुवर्ण या रजतनिर्मित ही होने चाहिये।
ध्यान-मन्त्र
ॐ या श्रीः पद्मासनस्था विपुल-कटि-तटी पद्म-पत्रायताक्षी, गम्भीरा-वर्तनाभिः स्तन-भरनमिता शुभ्रवस्खोत्तरीया। लक्ष्मीर्दिव्यैर्गजेन्द्रैर्मणिगण-सहितैः स्नापिता हेम-कुम्भैर्नित्यं सा पद्म-हस्ता मम वसतु गृहे सर्व-माङ्गल्य-युक्ता ! । अरुण-कमल-संस्था तद्रजः पुञ्जवर्णा, कर-कमल-धृतेष्टाऽ भीति युग्माम्बुजा च । ॐ मणि-कटक-विचित्रालङ्कता-कल्प-जालैः सकल - भुवनगाना सन्ततं श्रीः श्रियै नः।। ॐ हिरण्यव-र्णां हरिणीं सुवर्ण-रजतस्त्रजाम्। चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जात-वेदो मऽआवह।। श्रीमहालक्ष्म्यै नमः, ध्यानं समर्पयामि। ध्यानार्थे च पुष्पाणि समर्पयामि।
ध्यान के लिये पुष्प अर्पित करें।
आवाहन
सर्व-लोकस्य जननीं सर्व-सौख्यप्रदायिनीम्। सर्व-देवमयी-मीशां देवीम-आवाहयाम्यहम्।। ॐ तां म आवह जातवेदो लक्ष्मी-मन-पगा-मिनीम्। यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम् ।। ॐ महालक्ष्म्यै नमः। महालक्ष्मीम-आवाहयामि आवाहनार्थे पुष्पाणि समर्पयामि।
आवाहनार्थ पुष्प दें।
आसन
तप्त-काञ्चन-वर्णाभं मुक्तामणि-विराजितम्। अमलं कमलं दिव्यं आसनं प्रति-गृह्यताम् ।। ॐ अश्वपूर्वां रथ-मध्यां हस्ति-नाद-प्रमोदिनीम् । श्रियं देवीमुपह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम् ।।
ॐ महालक्ष्म्यै नमः। आसनार्थे पुष्यं समर्पयामि।
आसन के लिये कमलादि के पुष्प अर्पण करें।
पाद्यं
गङ्गादि-तीर्थ-सम्भूतं गन्ध-पुष्पादिभिर्युतम्। पाद्यं ददाम्यहं देवि गृहाणाशु नमोऽस्तु ते ।। ॐ कां सोस्मितां हिरण्य-प्राकारामार्द्रा ज्वलन्तीं तृप्तां तर्प-यन्तीम्। पद्ये-स्थितां पद्म-वर्णां तामिहोप-ह्वये श्रियम् ।। ॐ महालक्ष्म्यै नमः। पाद्यजलं समर्पयामि।
चन्दन पुष्पादि-युक्त जल अर्पित करे।
अर्घ्य
अष्टगन्धसमायुक्तं स्वर्णपात्रप्रपूरितम् । अर्घ्यं गृहाण मद्दत्तं महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ।।
चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम्।
तां पद्मनेमीं शरणं प्र पद्येऽलक्ष्मीमें नश्यतां त्वां वृणे ।।
ॐ महालक्ष्म्यै नमः। अर्घ्यं समर्पयामि।
अष्टगन्ध मिश्रित जल अर्घ्यपात्र से देवी के हाथ में दे।
आचमन
सर्वलोकस्य या शक्तिर्ब्रह्मविष्ण्वादिभिः स्तुता। ददाम्याचमनं तस्यै महालक्ष्म्यै मनोहरम् ।।
ॐ आदित्यवर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः। तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मायान्तरा याश्च बाह्या ऽअलक्ष्मीः ।।
ॐ महालक्ष्म्यै नमः। आचमनं समर्पयामि।
आचमन के लिये जल चढ़ाये।
स्नान
मन्दाकिन्याः समानीतैर्हेमाम्भोरुहवासितैः। स्नानं कुरुष्व देवेशि सलिलैश्च सुगन्धिभिः ।। ॐ महालक्ष्म्यै नमः। स्नानं समर्पयामि। स्नानीय जल अर्पित करे।
स्नानान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि। स्नान के बाद 'ॐ महालक्ष्म्यै नमः' ऐसा उच्चारण कर आचमन के लिये जल दे।
दुग्ध-स्नान
कामधेनुसमुत्पन्नं सर्वेषां जीवनं परम्। पावनं यज्ञहेतुश्च पयः स्नानार्थमर्पितम्।।
ॐ पयः पृथिव्यां पय ओषधीषु पयो दिव्यन्तरिक्षे पयो घाः। पयस्वतीः प्रदिशः सन्तु मह्यम् ।।
ॐ महालक्ष्म्यै नमः। पयः स्नानं समर्पयामि । पयः स्नानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि।
गौ कच्चे दूध से स्नान करावे, पुनः शुद्धजल से स्नान कराये।
दधि-स्नान
पयसस्तु समुद्भूतं मधुराम्लं शशिप्रभम् । दध्यानीतं मया देवि स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ।। ॐ दधिक्राव्णो अकारिषं जिष्णोरश्वस्य वाजिनः । सुरभि नो मुखाकरता ण आयू षि तारिषत् ।। ॐ महालक्ष्म्यै नमः। दधिस्नानं समर्पयामि । दधिस्नानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि।
दधि से स्नान कराये फिर शुद्ध जल से स्नान कराये।
घृत-स्नान
नवनीतसमुत्पन्नं सर्वसन्तोषकारकम्। घृतं तुभ्यं प्रदास्यामि स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ।। ॐ घृतं घृतपावानः पिबत वसां वसापावानः पिबतान्तरिक्षस्य हविरसि स्वाहा। दिशः प्रदिश आदिशो विदिश उद्दिशो दिगभ्यः स्वाहा।। ॐ महालक्ष्म्यै नमः। घृतस्नानं समर्पयामि। घृतस्नानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि। घृत से स्नान कराये तथा फिर शुद्ध जल से स्नान कराये।
मधु-स्नान
तरुपुष्पसमुद्भूतं सुस्वादु मधुरं मधु। तेजः पुष्टिकरं दिव्यं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ।। ॐ मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः। माध्वीर्नः सन्त्वोषधी ।। मधुनक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिव रजः। मधु द्यौरस्तु नः पिता ।। मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमाँ२अस्तु सूर्यः। माध्वीर्गावो भवन्तु नः ।। ॐ महालक्ष्म्यै नमः। मधुस्नानं समर्पयामि। मधुस्नानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि।
मधु (शहद) से स्नान कराये, पुनः शुद्ध जल से स्नान कराये।
शर्करा-स्नान
इक्षुसारसमुद्भूता शर्करा पुष्टिकारिका। मलापहारिका दिव्या स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ।। ॐ अपा रसमुद्वयस् सूर्ये सन्त समाहितम्। अपा रसस्य यो रसस्तं वो गृह्णाम्युत्तममुपयाम गृहीतोऽ सीन्द्राय त्वा जुष्टं गृह्णाम्येष तेयोनिरिन्द्राय त्वा जुष्टतमम् ।। ॐ महालक्ष्म्यै नमः। शर्करास्नानं समर्पयामि, शर्करास्नानान्ते पुनः शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि।
शर्करा से स्नान कराकर पश्चात् शुद्धजल से स्नान कराये।
पञ्चामृत-स्नान
एकत्र मिश्रित पञ्चामृत से एकतंत्र से निम्न मन्त्र से स्नान कराये
पयोदधि घृतं चैव मधुशर्करयान्वितम्। पञ्चामृतं मयानीतं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ।। ॐ पञ्च नद्यः सरस्वतीमपि यन्ति सस्रोतसः। सरस्वती तु पञ्चधा सो देशेऽ भवत् सरित् ।। ॐ महालक्ष्म्यै नमः, पञ्चामृत स्नानं समर्पयामि, पञ्चामृतस्नानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि।
पञ्चामृतस्नान के अनन्तर शुद्ध जल से स्नान कराये।
यदि अभिषेक करना अभीष्ट हो तो शुद्धजल अथवा दुग्धादि से 'श्रीसूक्त' का पाठ करते हुए अखण्ड जलधारा से स्नान (अभिषेक) कराये। धातु की मूर्ति, अथवा द्रव्यलक्ष्मी पर अभिषेक किया जाता है, इसे पृथक् पात्र में करना चाहिये।
गन्ध-स्नान
मलयाचलसम्भूतं चन्दनागरुसम्भवम्। चन्दनं देवदेवेशि स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ।। ॐ महालक्ष्म्यै नमः। गन्धोदकस्नानं समर्पयामि। गन्ध (चन्दन), मिश्रित जल से स्नान कराये।
शुद्धोदक
स्नान मन्दाकिन्यास्तु यद्वारि सर्वपापहरं शुभम्। तदिदं कल्पितं तुभ्यं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ।। ॐ महालक्ष्म्यै नमः। शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि ।
गङ्गाजल अथवा शुद्धजल से स्नान कराये। तदनन्तर प्रतिमा का अङ्ग-प्रोक्षणकर (पोंछकर) उसे यथास्थान आसन पर स्थापित करे और निम्नरूप से उत्तराङ्ग पूजन करे।
आचमन
शुद्धोदक स्नान के बाद 'ॐ महालक्ष्म्यै नमः' ऐसा कहकर आचमनीय जल अर्पित करे।
वस्त्र
दिव्याम्बरं नूतनं हि क्षौमं त्वति मनोहरम्। दीयमानं मया देवि गृहाण जगदम्बिके ।। ॐ उपैतुमां देव सखः कीर्तिश्च मणिना सह। प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे ।। ॐ महालक्ष्म्यै नमः। वस्त्रं समर्पयामि, आचमनीयं जलं च समर्पयामि ।
वस्त्र अर्पित करे, आचमनीय जल दे।
उपवस्त्र
कञ्चुकीमुपवस्त्रं च नानारत्लैः समन्वितम्। गृहाण त्वं मया दत्तं मङ्गले जगदीश्वरि ।। ॐ महालक्ष्म्यै नमः। उपवस्त्रं समर्पयामि, आचमनीयं जलं च समर्पयामि ।
कञ्जुकी आदि उत्तरीय वस्त्र चढ़ाये, आचमन के लिये जल दे।
आभूषण
रत्नकङ्कणवैदूर्यमुक्ताहारादिकानि च। सुप्रसन्नेन मनसा दत्तानि स्वीकुरुष्व भोः ।। ॐ क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम्। अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्गुद मे गृहात् ।। ॐ महालक्ष्म्यै नमः। नानाविधानि कुण्डलकटकादीनि आभूषणानि समर्पयामि। अलंकारार्थे अक्षतान् समर्पयामि।
आभूषण समर्पित करे अथवा अक्षत चढ़ाये।
गन्ध
श्रीखण्डं चन्दनं दिव्यं गन्धाढ्यं सुमनोहरम्। विलेपनं सुरश्रेष्ठे ! चन्दनं प्रतिगृह्यताम् ।। ॐ गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्य पुष्टां करीषिणीम्। ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोप ह्वये श्रियम् ।। ॐ महालक्ष्म्यै नमः। गन्धं समर्पयामि।
अनामिका अंगुली से केसरादि मिश्रित चन्दन अर्पित करे।
रक्तचन्दन
रक्तचन्दनसंमिश्र पारिजातसमुद्भवम्। मया दत्तं महालक्ष्मि चन्दनं प्रतिगृह्यताम् ।। ॐ महालक्ष्म्यै नमः। रक्तचन्दनं समर्पयमि।
अनामिका अंगुली से रक्तचन्दन चढ़ाये।
सिन्दूरं
रक्तवर्णं च सिन्दूरतिलकप्रिये। भक्त्या दत्तं मया देवि सिन्दूरं प्रतिगृह्यताम् ।। ॐ सिन्धोरिव प्राध्वने शूधनासो वात प्रमियः पतयन्ति यह्वाः। घृतस्य धारा अरुषो न वाजी काष्ठा भिन्दन्नर्मिभिः पिन्वमानः ।। महालक्ष्म्यै नमः। सिन्दूरं समर्पयामि।
देवीजी को सिन्दूर चढ़ाये।
कुङ्कुम
कुङ्कुमं कामदं दिव्यं कुङ्कुमं कामरूपिणम्। अखण्डकामसौभाग्यं कुङ्कुमं प्रतिगृह्यताम् ।।
ॐ महालक्ष्म्यै नमः। कुङ्कुमं समर्पयामि।
कुङ्कुम अर्पित करे।
इत्र
तैलानि च सुगन्धीनि द्रव्याणि विविधानि च। मया दत्तानि लेपार्थं गृहाण परमेश्वरि ।। ॐ महालक्ष्म्यै नमः। पुष्पसारं च समर्पयामि। सुगन्धित इन्त्र चढ़ाये।
अक्षत
अक्षताश्च सुरश्रेष्ठे कुङ्कुमाक्ता सुशोभिताः। मया निवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्वरि ।। ॐ महालक्ष्म्यै नमः। अक्षतान् समर्पयामि।
कुङ्कुमाक्त अक्षत अर्पित करे।
पुष्पमाला
माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्यादीनि वै प्रभो!। मयानीतानि पुष्पाणि पूजार्थं प्रतिगृह्यताम्।। ॐ मनसः काममाकृतिं वाचः सत्य मशीमहि। पशूनां रूपमन्त्रस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः ॥ ॐ महालक्ष्म्यै नमः। पुष्यं पुष्पमालां च समर्पयामि।
देवीजी को पुष्पों तथा पुष्प मालाओं से अलंकृत करे। यथा सम्भव लाल कमल के फूलों से पूजा करे।
दूर्वा
विष्णवादिसर्वदेवानां प्रियां सर्वसुशोभनाम्। क्षीरसागरसम्भूते दूर्वां स्वीकुरु सर्वदा।। ॐ काण्डात् काण्डात् प्ररोहन्ती परुषः परुषस्परि। एवा नो दूर्वे प्र तनु सहस्त्रेण शतेन च।। ॐ महालक्ष्म्यै नमः। दूर्वांकुरान् समर्पयामि।
दूब चढ़ाये।
अङ्ग-पूजा
रोली, कुङ्कुममिश्रित अक्षत-पुष्पों से निम्नाङ्कित एक-एक नाम-मन्त्र पढ़ते हुए अङ्ग पूजा करे-
ॐ चपलायै नमः, पादौ पूजयामि। ॐ चञ्चलायै नमः, जानुनी पूजायामि। ॐ कमलायै नमः, कटिं पूजयामि। ॐ कात्यायन्यै नमः, नाभिं पूजयामि। ॐ जगन्मात्रे नमः, जठरं पूजयामि। ॐ विश्ववल्लभायै नमः, वक्षःस्थलं पूजयामि। ॐ कमलवासिन्यै नमः, हस्तौ पूजयामि। ॐ पद्माननायै नमः, मुखं पूजयामि। ॐ कमलपत्राक्ष्यै नमः, नेत्रत्रयं पूजयामि। ॐ श्रियै नमः, शिरः पूजयामि। ॐ महालक्ष्म्यै नमः, सर्वाङ्ग पूजयामि।
पूर्वादिक्रमेण अष्टदिक्षु अष्टसिद्धिपूजा
अणिग्ने नमः। महिग्ने नमः। गरिम्णे नमः। लधिग्ने नमः। ॐ प्राप्त्यै नमः। प्राकाम्यै नमः। ईशितायै नमः। वशितायै नमः।
अष्टलक्ष्मीपूजा
पूर्वादिक्रमेण ॐ आद्यलक्ष्म्यै नमः। विद्यालक्ष्म्यै नमः। सौभाग्यलक्ष्म्यै नमः । अमृतलक्ष्म्यै नमः। कामलक्ष्म्यै नमः। सत्यलक्ष्म्यै नमः। भोगलक्ष्म्यै नमः। योगलक्ष्म्यै नमः।
धूप
वनस्पतिरसोद्धद्भूतो गन्धाढ्यः सुमनोहरः। आभ्रेयः सर्वदेवानां धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम्।। ॐ कर्दमेन प्रजाभूता मयि संभव कर्दम। श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम् ।। ॐ महालक्ष्म्यै नमः, धूपमाघ्रापयामि।
धूप आम्रापित करे।
दीप
कार्पासवर्तिसंयुक्तं घृतयुक्तं मनोहरम्। तमोनाशकरं दीपं गृहाण परमेश्वरि ।। ॐ आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे। नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले ।। ॐ महालक्ष्म्यै नमः। दीपं दर्शयामि।
दीपक दिखाये और फिर हाथ धो ले।
नैवेद्य
नैवेद्यं गृह्यतां देवि भक्ष्यभोज्यसमन्वितम्। षड्रसैरन्वितं दिव्यं लक्ष्मि देवि नमोऽस्तु ते ।। ॐ आर्द्रा पुष्करिणीं पुष्टिं पिङ्गलां पद्ममालिनीम्। चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ।। ॐ महालक्ष्म्यै नमः। नैवेद्यं निवेदयामि, गुड़धान्यं निवेदयामि मध्ये पानीयम्, उतरापोऽशनार्थं हस्तप्रक्षालनार्थं मुखप्रक्षालनार्थं च जलं समर्पयामि।
देवीजी को नैवेद्य सामग्री व गुड़-धनिया का नैवेद्य निवेदित कर पानीय जल एवं हस्तादि प्रक्षालन के लिये भी जल अर्पित करे।
करोद्वर्तन
'ॐ महालक्ष्म्यै नमः'
यह कहकर करोद्वर्तन के लिये हाथों में चन्दन उपलेपित करे ।
आचमन
शीतलं निर्मलं तोयं कर्पूरेण सुवासितम्। आचम्यतां जलं होतत् प्रसीद परमेश्वरि ।। ॐ महालक्ष्म्यै नमः, आचमनीयं जलं समर्पयामि।
नैवेद्य निवेदन करके आचमन के लिये जल दे।
ऋतुफल
फलेन फलितं सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम्। तस्मात् फलप्रदानेन पूर्णाः सन्तु मनोरथाः ।। ॐ याः फलिनीर्या अफला अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः। बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्व हसः ।। ॐ महालक्ष्म्यै नमः। अखण्डऋतुफलं समर्पयामि। आचमनीयं जलं च समर्पयामि।
ऋतुफल अर्पित करे।
ताम्बूल
पूगीफलं महद्दिव्यं नागवल्लीदलैर्युतम्। एलादिचूर्णासंयुक्तं ताम्बूलं प्रतिगृह्यताम् ।। ॐ आईं यः करणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम्। सूर्या हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह।। ॐ महालक्ष्म्यै नमः। मुखवासार्थे एलालवङ्गादिभिर्युतं पूगीफल-ताम्बूलं समर्पयामि।
देवीजी को पान, सुपाड़ी, लौंग-इलायची अर्पित करे।
दक्षिणा
हिरण्यगर्भगर्भस्थं हेमबीजं विभावसोः । अनन्तपुण्यफलदमतः शान्तिं प्रयच्छ मे ।। ॐ तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्। यस्यां हिरण्यं प्रभूतिं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरुषानहम् ।। ॐ महालक्ष्म्यै नमः, दक्षिणां समर्पयामि।
दक्षिणा चढ़ाये।
नीराजन
चक्षुर्दं सर्वलोकानां तिमिरस्य निवारणम्। आर्तिक्यं कल्पितं भक्त्या गृहाण परमेश्वरि ।। ॐ आ रात्रि पार्थिव रजः पितुरप्रायि धामभिः। दिवः सदा सि बृहती वि तिष्ठसु आ त्वेषं वर्तते तमः ।। ॐ महालक्ष्म्यै नमः, नीराजनं समर्पयामि।
आरती करे तथा जल छोड़े, हाथ धोये।
प्रदक्षिणा
यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च। तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिण पदे पदे ।। ॐ महालक्ष्म्यै नमः, प्रदक्षिणां समर्पयामि।
कमलागट्टा 5 करञ्ज, 5 हल्दी की गाँठ, 5 सुपारी, अक्षत और पुष्प हाथ में लेकर प्रदक्षिणा करे।
प्रार्थना
ॐ यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम्। सूक्तं पञ्चदशर्च च श्रीकामः सततं जपेत् ।। सुरासुरेन्द्रादिकिरीटमौक्तिकैर्युक्तं सदा यत्तत्व पादपङ्कजम्।
परावरं पातु वरं सुमङ्गलं नमामि भक्त्याखिलकामसिद्धये ।।
भवानि त्वं महालक्ष्मीः सर्वकामप्रदायिनी। सुपूजिता प्रसन्ना स्यान्महालक्ष्मि ! नमोऽस्तु ते ।।
ॐ नमस्ते सर्वदेवानां वरदासि हरिप्रिये! । या गतिस्त्वत्प्रपन्नानां सा मे भूयात् त्वदर्चनात् ।। विश्वरूपस्य भार्याऽसि पद्ये पद्मालये शुभे। महालक्ष्मि नमस्तुभ्यं सुखरात्रि कुरुष्व मे ।।
सुखरात्रिप्रभातेऽद्य तन्मे लक्ष्मीर्व्यपोहतु ।। ॐ वर्षाकाले महाघोरे यन्मया दुष्कृतं कृतम्।
या रात्रिः सर्वभूतानां या च देवे व्यवस्थिता। संवत्सरप्रिया या च सा ममास्तु सुमङ्गला ।।
माता त्वं सर्वभूतानां देवानां सृष्टिसम्भवा। आख्याता भूतले देवि सुखरात्रि नमोऽस्तु ते।। महालक्ष्मि नमस्तुभ्यं प्रसन्ना भव मंगले। स्वर्णवित्तादिरूपेण मद्गृहे त्वं चिरं वस ।।
ॐ महालक्ष्म्यै नमः, मम व्यापारे वृद्धिपूर्वकं लक्ष्मी सुस्थिरा भव।
पुष्पादि थैली में छोड़ दे।
समर्पण
पूजन के अन्त में 'कृतेनानेन पूजनेन भगवती महालक्ष्मीदेवी प्रीयतां न मम।' यह वाक्य उच्चारणकर समस्त पूजन-कर्म भगवती महालक्ष्मी को समर्पित करे तथा जल गिराये।
भगवत्ती महालक्ष्मी के यथालब्बोचार-पूजन के अनन्तर महालक्ष्मी पूजन के अङ्ग-रूप श्रीदेहलीविनायक, लेखनी, 卐सरस्वती, कुबेर, तुला-मान तथा दीपकों की पूजा की जाती है। संक्षेप में उन्हें भी यहाँ दिया जा रहा है। सर्वप्रथम 'देहलीविनायक' की पूजा की जाती है।
देहलीविनायक-पूजन
व्यापारिक प्रतिष्ठानादि में दीवालों पर 'ॐ श्रीगणेशाय नमः' 'स्वस्तिक चिह्न क्र', 'शुभ-लाभ आदि माङ्गलिक एवं कल्याणकर शब्द सिन्दूरादि से लिखे जाते हैं। इन्हीं शब्दों पर 'ॐ देहलीविनायकाय नमः' इस नाममन्त्र द्वारा गन्ध-पुष्पादि से पूजन करे ।
लेखनी
पूजन लेखनी (कलम) पर मौली बाँधकर सामने रख ले और निम्न मंत्र पढ़े।
लेखनी निर्मिता पूर्वं ब्रह्मणा परमेष्ठिना। लोकानां च हितार्थाय तस्मात्तां पूजयाम्यहम् ।।
'ॐ लेखनीस्थायै देव्यै नमः'
इस नाम-मन्व द्वारा गन्ध-पुष्पाक्षत आदि से पूजनकर इस प्रकार प्रार्थना करे
शास्त्राणां व्यवहाराणां विद्यानामाप्नुयाद्यतः। अतस्त्वां पूजयिष्यामि मम हस्ते स्थिरा भव ।।
सरस्वती (पञ्जिका-बही खाता)- पूजन
नवीनपत्रे (पञ्जिकायाम्) स्वस्तिक गणपत्यादि पञ्चनामानि च लिखित्वा। श्रीगणेशाय नमः, श्रीमहाकाल्यै नमः, श्रीमहालक्ष्म्यै नमः, श्रीमहासरस्वत्यै नमः, श्रीहनुमते नमः इत्यादि
पांच नाम लिखकर मिती (मास, पक्ष, तिथि, अंग्रेजी तारीख) डालकर सरस्वती का पूजन करे। पत्रिका- बही-खाता-वसना में रोली या केसरयुक्त चन्दन से स्वस्तिक चिह्न बनाये। वहीं में १ पान रखे उसमें सरस्वती का ध्यानकर पूजन करे-
सरस्वती का ध्यान
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता, या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता, सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ।।
'ॐ वीणापुस्तकधारिण्यै श्रीसरस्वत्यै नमः' इस नाम-मन्त्र से गन्धादि उपचारों द्वारा पूजन करे फिर
प्रार्थना करे
प्रार्थना ॐ पावका नः सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती। यज्ञं वष्टु धियावसुः ।। शारदे लोकमातस्त्वमाश्रिताभीष्टदायिनी। पुष्पाञ्जलिं गृहाण त्वं मया भक्त्या समर्पितम्।। पाहि पाहि जगद्वन्द्धे नमस्ते भक्तवत्सले । नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं नमो नमः ।। पाशाङ्कुशधरा वाणी वीणापुस्तकधारिणी। मम वक्त्रे वसेन्नित्यं दुग्धकुन्देन्दुनिर्मला ।। महाविद्या महावाणी श्रुतिस्मृतिप्रदायिनी। साक्षात्सरस्वतीदेवी जिह्वाग्रे मम तिष्ठतु।।
लेखिन्यै ते नमस्तेऽस्तु लाभकत्र्यै नमो नमः। सर्वविद्याप्रकाशिन्यै शुभदायै नमो नमः ॥
पुस्तके चार्चिता देवि सर्वविद्यान्नदा भव ।।
भाण्डागार में कुबेर-पूजन
तिजोरी अथवा रुपये रखे जाने वाले संदूक में रोली अथवा केसरयुक्त चन्दन से सुशोभित कर उसमें अक्षत, फूल से निधिपति कुबेर का आवाहन करे-
स्वर्णभासं कुबेरं च गदापाण्यश्ववाहनम्। चित्रिणीपद्मासहितं निधीश्वरमहं भजे।। आवाहयामि देव त्वामिहायाहि कृपां कुरु। कोशं वर्द्धय नित्यं त्वं परिरक्ष सुरेश्वर ।।
आवाहन के पश्चात् 'ॐ कुबेराय नमः' इस नाम-मन्त्र से यथालब्धोपचार पूजनकर अन्त में इस प्रकार
प्रार्थना करे
धनदाय नमस्तुभ्यं निधिपद्माधिपाय च। भगवन् त्वत्प्रसादेन धनधान्यादिसम्पदः ।। कुबेराय नमस्तुभ्यं नानाभाण्डारसंस्थितः। यत्र लक्ष्मीर्भवेद्देव धनं संचिनु नमोऽस्तु ते।।
दीपावली पूजन-पद्धतिः
इस प्रकार प्रार्थनाकर पूर्वपूजित हल्दी, धनिया, करञ्ज, कमलगट्टा, द्रव्य, दूर्वादि से युक्त थैली तिजोरी में रखे उसके पश्चात् महालक्ष्मी की प्रार्थना करे-
महालक्ष्मि नमस्तुभ्यं प्रसन्ना भव मङ्गले। स्वर्णवित्तादिरूपेण मद्गृहे त्वं चिरं वस ।। मम व्यापारे वृद्धिपूर्वकं लक्ष्मी सुस्थिरा भव। स्थिरो भव वीड्वङ्ग आशुर्भाव वाज्यर्व्वन्। पृथुर्भव सुखदस्त्वमग्नेः पुरीषवाहणः ।।
इस मन्त्र को उच्चारण करके भण्डागार में महालक्ष्मी की स्थापना करें।
तुला तथा मान-पूजन
सिन्दूर से तराजू आदि पर स्वस्तिक बनाये। मौली लपेटकर तुलाधिष्ठातृदेवता का इस प्रकार ध्यान करे-नमस्ते सर्वदेवानां शक्तित्वे सत्यमाश्रिता। साक्षीभूता जगद्धात्री निर्मिता विश्वयोनिना ।।
ध्यान करने के बाद 'ॐ तुलाधिष्ठातृदेवतायै नमः' इस नाममन्त्र से गन्धाक्षतादि उपचारों द्वारा पूजन करके नमस्कार करे।
धर्मराजपूजनम्
धर्मराजाय नमः' इस मन्त्र के द्वारा पूर्व की तरह पूजन करके प्रार्थना करे-
'ॐ एहि धर्मवतां श्रेष्ठ धर्माधर्मविचारक। धर्मेण धारयेल्लोकान् धर्मराज नमोऽस्तु ते ।।
उसके बाद गजराज पूजन करे
वसनव्यवहाराणां साक्षाद्देवः शचीपतिः। त्वमेव रचितो राज्ञा लोकानां स्थितिहेतवे ।। अतस्त्वां पूजयिष्यामि गजराज नमोऽस्तु ते। ददातु वसने वृद्धिं धनैर्युक्तं करोतु माम्।।
गजाधिष्ठातृदेवेभ्यो नमो नमः। गंधाक्षतपुष्प से इस प्रकार पूर्व की तरह पूजन करके प्रार्थना करे-गजराज नमस्तेऽस्तु नरकार्णवतारक। सुखदः पुत्रपौत्रादेः सर्वदा वृद्धिहेतवे ।।
उसके बाद देहली पर विपणि पूजन करे
'विपणाधिष्ठातृदेवतायै नमो नमः।' इस मन्त्र के द्वारा पूर्व की तरह पूजन करके प्रार्थना करें। प्रार्थना-विपणि त्वं महादेवि धनधान्यप्रवर्द्धिनी। मद् गृहे सुयशो देहि धनधान्यादिकं तथा ।।
आयुः पशून्ग्रजां देहि सर्वसम्पत्करी भव ।।
दीपमालिका (दीपक) पूजन
किसी पात्र में सात, ग्वारह, इक्कीस या उससे अधिक दीपकों को प्रज्वलित करके महालक्ष्मी के समीप रखकर उस दीप-ज्योति का 'ॐ दीपावल्यै नमः' इस नाममन्त्र से गन्धादि उपचारों द्वारा पूजन करके इस प्रकार प्रार्थना करे-
त्वं ज्योतिस्त्वं रविश्चन्द्रो विद्युदग्निश्च तारकाः। सर्वेषां ज्योतिषां ज्योतिर्दीपावल्यै नमो नमः ।। अग्निज्योतिरविज्योतिश्चन्द्रज्योतिस्तथैव च। उत्तमः सर्वज्योतीनां दीपोऽयं प्रतिगृह्यताम् ।। दीपावलिर्मया दत्ता गृहाण त्वं सुरेश्वरि। आरार्तिकप्रदानेन ज्ञानदृष्टिप्रदा भव ॥
दीपमालिकाओं का पूजन करके अपने आचार के अनुसार संतरा, ईख, पानी फल, धान का लावा (खील) इत्यादि पदार्थों का भोग के निमित्त नैवेद्य अर्पण करे। धान का लावा (खील) गणेश, महालक्ष्मी तथा अन्य सभी देवी-देवताओं को भी अर्पण करे। अन्त में अन्य सभी दीपकों को प्रज्वलित कर सम्पूर्ण गृह प्रकाशित तथा अलंकृत करे।
ॐ इद हविः प्रजननं मे अस्तु दशवीर सर्वगण सर्वगण स्वस्तये। आत्मसनि प्रजासनि पशुसनि लोकसन्यभयसनि। अग्निः प्रजां बहुलां मे करोत्वन्नं पयो रेतो अस्मासु घत्त ।। कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम् । सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानी सहितं नमामि ।।
प्रधान आरती
इस प्रकार भगवती महालक्ष्मी तथा उनके सभी अङ्ग प्रत्यङ्गों एवं उपाङ्गों का पूजन करके उसके बाद प्रधान आरती करनी चाहिये। इसके लिये एक थाली में अष्टदल कमल आदि माङ्गलिक चिह्न बनाकर अक्षत तथा पुष्पों के आसन पर किसी दीपक आदि में घृतयुक्त बत्ती प्रज्वलित करे। एक पृथक् पात्र में कर्पूर भी प्रज्वलित कर वह पात्र भी थाली में यथास्थान रख लें, आरती-थाल का जल से प्रोक्षण कर लें। पुनः आसन पर खड़े होकर अन्य पारिवारिकजनों के साथ घण्टानादपूर्वक निम्न आरती गाते हुये साङ्ग महालक्ष्मीजी की मङ्गल आरती करे-
श्रीलक्ष्मीजी की आरती
जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।
तुमको निसिदिन सेवत हर-विष्णू-धाता ।। जय.
उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता।
सूर्य-चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता ।। जय.
दुर्गा रूप निरञ्जनि सुख-सम्पत्ति दाता।
卐जो कोई तुमको ध्यावत, ऋधि-सिधि-धन पाता।। जय.
तुम पाताल-निवासिनि तुम ही शुभ दाता। कर्म प्रभाव-प्रकाशिनि, भवनिधि की त्राता ।। जय.
जिस घर तुम रहती, तहँ सब सद्गुण आता।
सब सम्भव हो जाता, मन नहीं घबराता ।। जय.
तुम बिन यज्ञ न होवे, वस्त्र न हो पाता।
खान-पान को वैभव सब तुम से आता।। जय.
शुभ-गुण-मन्दिर सुन्दर, क्षीरोदधि-जाता ।
रत्न चतुर्दश तुम बिन कोई नहीं पाता ।। जय.
महालक्ष्मीजी की आरति, जो कोई नर गाता।
उर आनन्द समाता, पाप उतर जाता ।। जय.
स्थिर चर जगत बचावै, कर्मप्रचुर ल्याता।
राम प्रताप मैयाजी की, शुभ दृष्टि पाता।। जय.
श्रीलक्ष्मीजी की आरती समाप्त।
श्रीगणेशजी की आरती
लडुअन को भोग लगे सन्त करें सेवा ॥ जय.
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा ।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा ।।
एक दन्त दयावन्त चार भुजाधारी।
मस्तक सिन्दूर सोहे मूसे की सवारी ॥ जय.
अन्धन को आँख देत कोढ़िन को काया।
बाँझन को पुत्र देत निर्धन को माया ॥ जय.
पान चढ़े पुष्प चढ़े और चढ़े मेवा।
सूरदास शरण आये सुफल कीजै सेवा ॥ जय.
दीनन की लाज राखो शम्भु सुत वारी।
कामना को पूरा करो जग बलिहारी ॥ जय.
श्रीगणेशजी की आरती समाप्त।
मन्त्र पुष्पाञ्जलि
दोनों हाथों में कमल आदि के पुष्प लेकर हाथ जोड़े और निम्न मन्त्रों का पाठ करे-
ॐ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् ।
ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ।।
ॐ राजाधिराजाय प्रसह्य साहिने नमो वयं वैश्रवणाय कुर्महे। स मे कामान् कामकामाय महां कामेश्वरो वैश्रवणो ददातु ।।
कुबेराय वैश्रवणाय महाराजाय नमः। ॐ स्वस्ति साम्राज्यं भौज्यं स्वराज्यं वैराज्यं पारमेष्ठ्यं राज्यं महाराज्यमाधिपत्यमयं समन्तपर्यायी स्यात् सार्वभौमः सर्वायुषान्तादापरार्धात्। 卐पृथिव्यै समुद्रपर्यन्ताया एकराडिति तदप्येष श्लोकोऽभिगीतो मरुतः परिवेष्टारो मरुत्तस्यावसन् गृहे। आविक्षितस्य कामप्रेर्विश्वेदेवाः सभासद इति। ॐ विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात्। सं बाहुभ्यां धमति सं पतत्रैर्ध्यावाभूमी जनयन देव एकः ।। महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णुपल्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात् । ॐ या श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मीः पापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धिः । श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा तां त्वां नताः स्म परिपालय देवि विश्वम् ।। ॐ महालक्ष्म्यै नमः, मन्त्रपुष्पाञ्जलिं समर्पयामि।
हाथ में लिये फूल महालक्ष्मी पर चढ़ा दे। प्रदक्षिणा कर साष्टाङ्ग प्रणाम करे, पुनः हाथ जोड़कर क्षमा-प्रार्थना करे।
क्षमा-प्रार्थना-
नमस्ते सर्वदेवानां वरदासि हरिप्रिये। या गतिस्त्वत्प्रपन्नानां सा मे भूयात्त्वदर्चनात् ।। आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्। पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वरि ।। मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि। यत्पूजितं मया देवि परिपूर्णं तदस्तु मे ।।
त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव । त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव, त्वमेव सर्वं मम देवदेव ।। पापोऽहं पापकर्माहं पापात्मा पापसम्भवः। त्राहि मां परमेशानि सर्वपापहरा भव ।। अपराधसहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया। दासोऽयमिति मां मत्त्वा क्षमस्व परमेश्वरि ।। सरसिजनिलये सरोजहस्ते धवलतरांशुकगन्धमाल्यशोभे । भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम् ।।
पुनः ब्राह्मण तथा गुरुजनों को प्रणाम करके गुड़धनिया का प्रसाद लोगों में वितरण कर दे। पञ्चामृत, चरणामृत को भी ले वितरण करे। आचार्य को दक्षिणा तथा ब्राह्मणों को भूयसी दक्षिणा दे।
श्रीर्वर्चस्वमायुष्यमारोग्यमाविधात् पवमानं महीयते धान्यं धनं पशुं बहुपुत्रलाभं शत संवत्सरं दीर्घमायुः।
आचार्य इस मन्त्र का उच्चारण करके यजमान को तिलकाशीर्वाद प्रदान करें ।
विसर्जन
पूजन के समाप्त होने के बाद हाथ में अक्षत लेकर नूतन गणेश एवं महालक्ष्मी की प्रतिमा को छोड़कर अन्य सभी आवाहित, प्रतिष्ठित एवं पूजित देवताओं को अक्षत छोड़ते हुये निम्न मन्त्र से विसर्जित करें-
यान्तु देवगणाः सर्वे पूजामादाय मामकीम्। इष्टकामसमृद्ध्यर्थं पुनरागमनाय च ।। प्रमादात् कुर्वतां कर्म प्रच्यर्वताध्वरेषु यत्। स्मरणादेव तद्विष्णोः सम्पूर्ण स्यादिति श्रुतिः ।। ॐ विष्णवे नमः, ॐ विष्णवे नमः, ॐ विष्णवे नमः ।। अनया पूजया श्रीमहालक्ष्मीप्रीयतान्नमम।
यह कहकर जल छोड़ दे।
ॐतत्सद् लक्ष्म्यार्पणमस्तु ।
इति दीपावली-पूजा-सम्पूर्णम्।
प्रकाशक :
विनजीत2 पब्लिशर्स एंड प्रिंटर्स
वेस्ट विनोद नगर दिल्ली 110092
मुद्रक :
विनजीत2 पब्लिशर्स एंड प्रिंटर्स
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