अथ कार्तिक महात्म्य
कार्तिक स्नान
अथ कार्तिक महात्म्य
विषय सूची
पहला अध्याय
दूसरा अध्याय
तीसरा अध्याय
चौथा अध्याय
पांचवां अध्याय
छटा अध्याय
सातवां अध्याय
आठवां अध्याय
नवां अध्याय
दसवां अध्याय
ग्यारहवां अध्याय
बारहवां अध्याय
तेरहवां अध्याय
चौदहवां अध्याय
पंद्रहवां अध्याय
सोलहवां अध्याय
सत्रहवां अध्याय
अठारहवां अध्याय
उन्नीसवां अध्याय
बीसवां अध्याय
इक्कीसवां अध्याय
बाईसवां अध्याय
तेईसवां अध्याय
चौबीसवां अध्याय
पच्चीसवां अध्याय
छब्बीसवां अध्याय
सत्ताईसवां अध्याय
अट्ठाईसवां अध्याय
उन्नतीसवां अध्याय
तीसवां अध्याय
इक्तीसवां अध्याय
बत्तीसवां अध्याय
तेतीसवां अध्याय
चौतीसवां अध्याय
तुलसी विवाह-विधि
पैतीसवां अध्याय
कुशकुणिड का हवन
श्री तुलसी चालीसा
तुलसीजी की आरती
श्री सालिग्राम की आरती
श्री तुलसीजी की आरती
श्री यमुनाजी की आरती
श्री गंगाजी की आरती
श्री त्रिवेणीजी की आरती
श्री हनुमानजी की आरती
श्री शंकरजी की आरती
ओम जय जगदीश हरे
श्री विष्णु स्तुति
श्री कमलनेत्र स्तोत्र
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पहला अध्याय
नैमिषारण्य तीर्थ में श्री सूतजी महाराज अट्ठासी हजार शौनकादिक ऋषियों से बोले अब मैं आपके सामने कार्तिक महात्म्य की श्रेष्ठ कथा कहता हूं, जिसे सुनकर मनुष्य सब प्रकार के पापों से छूटकर बैकुण्ठ को प्राप्त कर लेता है।
सूतजी ने कहा – श्रीकृष्ण जी से आज्ञा लेकर नारदजी के चले जाने पर सत्यभामा प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण से बोली, "हे नाथ ! मेरा जीवन सफल हो गया, मेरे माता-पिता भी धन्य हैं। जो आपकी सोलह हजार रानियों में, मैं अत्यधिक प्यारी हुई। मैंने वह कल्पवृक्ष आदि आपके साथ नारद जी को विधि-पूर्वक दान में दे दिया। परन्तु वही कल्पवृक्ष मेरे घर में सदा लहराया करता है। जिसकी बात को मृत्यु लोक में कोई भी स्त्री नहीं जानती। हे स्वामी ! अब मैं आपसे जो पूछना चाहती हूं सो विस्तारपूर्वक कहिए। जिसे सुनकर मैं अपने हितकार्य करूं। जिसके करने से कल्प पर्यन्त भी आप मुझसे विमुख न हों।
सूतजी कहने लगे – सत्यभामा के ऐसे वचनों को सुनकर श्री कृष्ण जी हंसते हुए, सत्यभामा की बांह पकड़कर कल्पवृक्ष के नीचे गए और बोले, हे प्रिये ! सोलह हजार स्त्रियों में से मुझे तुम प्राणों के समान प्यारी हो। तुम्हारे लिए देवताओं और देवराज इन्द्र से भी मैंने विरोध किया था। उस महा-अदभुत वार्ता को सुनो। सूतजी बोले एक दिन श्रीकृष्ण भगवान ने सत्यभामा के साथ गरुड़ पर सवार होकर इन्द्रलोक में जाकर कल्पवृक्ष मांगा। तब इन्द्रे के न देने पर गरुड़ का इन्द्र से घोर युद्ध हुआ था।
हे प्रिये ! जब मैं तुम्हें हर चीज दे सकता हूं, तुम्हारा हर एक कार्य पूरा कर सकता हूं तो क्या तुम्हारे आश्चर्यजनक प्रश्न का उत्तर न दूंगा?
यह सुन सत्यभामा बोली, हे प्रभु ! पूर्व जन्म में मेरा कैसा स्वभाव था ? मैं किसकी पुत्री थी ? मैंने कौन से दान, व्रत या तप नहीं किया जिससे मुझे मृत्युलोक में जन्म लेना पड़ा ? और ऐसे कौन से शुभ कर्म किए कि यहां आकर आपकी अर्द्धांगिनी हुई और आप गरुड़ पर सवार होकर मुझे साथ में लिए इन्द्रादि देवताओं के स्थानों में फिरते हो।
तब भगवान बोले, हे कांते ! तुम पूर्व जन्म में किसकी पुत्री थीं, कौन से पुण्य और व्रतादिक तथा शुभकार्य तुमने किए थे वह सब कहता हूं। पूर्व समय में सतयुग के अन्त में मायापुरी में अत्रिगोत्र में वेदों और यज्ञों का जानने वाला देवर्मा नाम का ब्राह्मण रहता था। वह रोज़ अतिथियों की सेवा, हवन और सूर्य भगवान की पूजा किया करता था। इसलिए सूर्य की तरह तेजस्वी था। उस ब्राह्मण के बुढ़ापे में एक गुणवती नाम की कन्या हुई जिसका विवाह उस पुत्रहीन ब्राह्मण ने अपने चन्द्र नाम के शिष्य के साथ कर दिया और वे दोनों पिता-पुत्र की तरह रहने लगे।
एक समय वे दोनों कुशा और समाधी लेने के लिए वन में हिमालय की तलहटी में पहुंचे तो उन्होंने एक राक्षस को अपनी तरफ आते देखा जिसके भय से उनके शरीर शिथिल हो गये और उनमें भागने की शक्ति भी नहीं रही। तब राक्षस ने दोनों को मार डाला। उनके धर्मात्मा होने के कारण मेरे पार्षद उनको बैकुण्ठ में ले गए क्योंकि उन्होंने आजीवन सूर्य की पूजा की थी, इसलिए मैं दोनों पर अति प्रसन्न हुआ। जब वे दोनों विमान पर चढ़े हुए सूर्य के समान तेजस्वी, रूपवान, चन्दन और माला धारण किए हुए बैकुण्ठ में आये तब मेरे पास दिव्य भोगों के भोग भोगने लगे।
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दूसरा अध्याय
श्री कृष्ण भगवान बोले – हे प्रिये ! जब गुणवती ने राक्षस द्वारा अपने पिता और पति का मरना सुना तो दुःखित हुई और रुदन करने लगी। हे स्वामी ! हे पिता ! आप मुझे छोड़कर कहां चले गए ! मैं आपके बिना क्या करूं ? अब मेरे भोजन वस्त्र का प्रबन्ध कौन करेगा ? अब मैं किसकी शरण लूं ! मैं विधवा हो गई हूं। विधाता का मेरे ऊपर कोप हुआ। कैसे जीऊं?
श्री कृष्ण जी बोले – कुकरी के समान विलाप करती हुई, हवा से हिलते हुए केले के पत्ते की तरह कांपती हुई पृथ्वी पर गिर पड़ी।
थोड़ी देर में सावधान होने पर फिर विलाप करने लगी और शोक समुद्र में डूब गई। उस गुणवती ने घर की सब वस्तुएं बेच कर यथा-विधि से अपने पति को पारलौकिक क्रिया की और उसी नगरी विष्णु भगवान की भक्ति में तत्पर होकर इन्द्रियों को वश में कर शान्ति से रहने लगी और मरण तक एकादशी और कार्तिक मास के व्रतादि करती रही।
हे प्रिये ! यह दोनों व्रत मुझे अत्यन्त प्यारे हैं। जिसके करने से भोग और मोक्ष की प्राप्ति होती है। पुत्र और सम्पत्ति मिलती है। कार्तिक की तुला राशि पर सूर्य निकलने पर महापापी जो भी प्रातःकाल स्नान करते है, वे भी मुक्त्ति को प्राप्त होते हैं। जो मनुष्य स्नान, जागरण, दीपदान और तुलसी का पालन करते हैं, वे झाड़ना, सतिया काढ़ना तथा विष्णु की पूजा आदि का कार्य जो मनुष्य करते हैं वह जीवन मुक्त होते हैं।
इस प्रकार वह गुणवती हरेक वर्ष कार्तिक व्रत और विष्णु भगवान का नित्य ही पूजन करती रही। एक समय वृद्धावस्था के कारण दुर्बल होने से, रोग और ज्वर से पीड़ित होने पर भी वह गंगा स्नान को गई। ज्योंही शंपानी में उतरी जाड़े के मारे कांपने लगी। उसी समय गुणवती ने आकाश से आता हुआ विमान देखा। शंख, चक्र, गदा, पद्म आदि आयुधों को लिए हुए विष्णु के रूप धारण करने वाले पार्षद गरुड़ की ध्वजा वाले अप्सराओं से युक्त ऐसे विमान में बिठाकर बैकुण्ठ को ले गए। प्रदीप्त अग्नि के समान कीर्ति वाली गुणवती विमान में बैठी हुई कार्तिक व्रत के प्रभाव से मेरे पास आ गई।
जब ब्रह्मादि देवताओं की प्रार्थना से मैं पृथ्वी पर आया तब वे गण भी मेरे साथ आए। हे भामिनी ! यह सब यादव मेरे गण हैं और तुम्हारे पिता देवाशर्मा भी इस जन्म में सत्राजित हुए और तुम्हारे पति चन्द्रशर्मा इस जन्म में अक्रूर हैं और हे देवी तुम वही गुणवती हो जो कार्तिक के स्नान के प्रभाव से मेरे लिए अत्यन्त प्रिय हो। तुमने तो मेरे मन मन्दिर के सामने तुलसी का बगीचा लगाया। उसी से यह कल्पवृक्ष तुम्हारे आंगन में है।
कार्तिक में जो पहले तुमने दीपदान किए हैं उसी के फल से तुम्हारी सुन्दर देह और घर में लक्ष्मी देवी का निवास है। जो सम्पूर्ण व्रतादिक पति स्वरूप को अर्पण किये थे इसलिए तुम मेरी पत्नी बनी हो। और तुमने जन्म-मृत्यु तक जो कार्तिक व्रत उपवास किये हैं। इससे तुम्हारा वियोग मुझसे कदापि नहीं होता। इसी प्रकार जब ब्रह्मादि देवताओं की प्रार्थना कार्तिक में व्रत करने वाले तुम्हारे समान मेरे होंगे।
सूत जी बोले- –सत्यभामा जी अपने पूर्व जन्म का सब हाल जानकर बड़ी प्रसन्न है।
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तीसरा अध्याय
सत्यभामा बोली – हे भगवन् ! आप काल परूप हैं और काल के सम्पूर्ण भाग समान । तब फिर कार्तिक मास ही क्यों श्रेष्ठ हे देव! सब तिथियों में एकादशी और व महीनों में कार्तिक का महीना ही आपको भगवानाय है।
श्रीकृष्ण बोले- हे कान्ते ! तुमने अच्छा श्न किया। एकाग्रचित्त होकर बेन के पुत्र पृथु और महर्षि नारद का संवाद सुनो। जसे पहले पृथु ने नारद से पूछा तब नारद की ने कार्तिक मास की श्रेष्ठता कही।
नारद जी बोले – पहले सागर का पुत्र शंख नामक राक्षस त्रिलोकी के मथने में समर्थ हुआ। उसने सम्पूर्ण देवताओं को जीत स्वर्ग से निकाल इन्द्रादि सम्पूर्ण लोकपालों के अधिकार अपने हाथ में कर लिए। सब देवता उसके भय के मारे अपने-अपने स्त्री-पुत्र आदि लेकर बहुत वर्ष पर्यन्त सुमेरु पर्वत की गुफाओं में रह रहे थे, तब शंखासुर ने विचार किया। मैंने देवताओं को जीत तो लिया है तो भी वे बलवान मालूम होते हैं। हां, अब जान पड़ा कि वे सब वेद-मन्त्रों से युक्त हैं इससे उनके वेद मन्त्रों का हरण करने से वे सब बलहीन हो जाएंगे।
ऐसा विचार कर वह असुर विष्णु भगवान को नींद से ग्रस्त देख स्वयंभू ब्रह्मा जी के लोक में जाकर वहां से वेदों को निकालकर चलने को तत्पर हुआ। तब वे उसके भय के मारे यज्ञ के मन्त्र और बीजों समेत जल में प्रवेश कर गये। तब तो शंखासुर भी उन्हें ढूंढ़ता हुआ समुद्र के भीतर विचरने लगा। परन्तु वे वेद एक स्थान पर कहीं भी प्राप्त न हुए। पीछे से ब्रह्माजी सब देवताओं को संग ले और पूजा की सब सामग्री इकट्टी कर बैकुण्ठ में विष्णु भगवान की शरण में गये।
वहां उनके जगाने के निमित्त सब देवता गाने-बजाने लगे और गंध धूप बार-बार देने लगे। उनकी भक्ति से सन्तुष्ट होकर भगवान् ने नेत्र खोले। तब सब देवताओं ने विष्णु भगवान् के दर्शन किये और षोडशोपचार से पूजा करके दंडवत् पृथ्वी पर गिर पड़े। तब तो माधव भगवान् उनसे कहने लगे हे देवगण! मैं तुम्हारे भजन कीर्तन आदि कार्यों से प्रसन्न हुआ हूं। मैं आप लोगों की मनोकामना पूर्ण करूंगा। आश्विन शुक्ल पक्ष की एकादशी से देव उठनी एकादशी तक पहर भर रात्रि रहे तब से जो मनुष्य तुम्हारी तरह भजन और कीर्तन करेंगे वे मुझे प्रसन्न कर मुझे प्राप्त होंगे।
शंखासुर जिन वेदों को हर लाया है वे सब जल में स्थित हैं। उन्हें मैं शंखासुर को मारकर लाऊंगा। अब से बीज मन्त्र समेत सब वेद प्रतिवर्ष कार्तिक के महीने में सदा जल में निवास करेंगे। मत्स्यरूप धारण कर मैं जल में जाता हूं। तुम सम्पूर्ण मुनियों को लेकर संग आओ। इस लोक में जो अच्छे मनुष्य प्रातःकाल स्नान करते हैं वे निश्चय अक्षत स्नान के फल को प्राप्त होते हैं। जो कार्तिक में सदा व्रत करते हैं उनको हे इन्द्र ! तुम मेरे लोक में पहुंचा दिया करो। हे यम ! तुम सदा उनकी विध्नों से रक्षा करते रहो और हे वरुण! तुम उनको पुत्र पौत्र आदि देते रहो। हे कुबेर! तुम उनकी धन वृद्धि करो जिससे यह मेरा रूप धारण कर साक्षात् जीवन मुक्त हो जायें और हे अन्य देवताओं! जो जन्म से मरण तक उन बातों को धारण करते हैं वे तुम्हारे द्वारा भी पूज्य हैं। जैसे तुमने मुझे एकादशी को जगाया है इसलिए यह तिथि सदा मनाने योग्य है।
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चौथा अध्याय
नारद जी बोले- ऐसा कहकर विष्णु भगवान् मछली रूप धारण कर कश्यप की अंजली में प्राप्त हुए। उस मछली पर दया करके मुनि ने उसको कमंडल में डाल लिया। जब वह उसमें न समाई तब कुंए में डाला। कुंए से तालाब में, तालाब से समुद्र में डाली गई। तब मत्स्यरूपधारी भगवान् शंखासुर को मारते हुए और अपने हाथ में दबाकर चदरीवन को गए और वहां सब ऋषियों को बुलाकर बोले कि जल के भीतर वेद निमग्न हो गए हैं। तुम उन्हें ढूंढ़ो और शीघ्रता पूर्वक जल में से निकालकर रहस्य समेत ले आओ तब तक मैं सब देवताओं समेत प्रयाग में निवास करूंगा।
नारद जी बोले- तब तपोबली उन मुनियों ने बीज और यज्ञ मन्त्रों सहित वेदों का उद्धार किया। उन ऋषियों में से जिसने जो निकाला वह भाग उसी ऋषि के नाम से प्रसिद्ध हुआ। पीछे सब मुनि मिलकर प्रयागराज को गए और प्राप्त हुए वेद ब्रह्मा सहित विष्णु भगवान् को अर्पण किए। सम्पूर्ण वेदों को पाकर ब्रह्माजी ने प्रसन्न हो देव और ऋषियों सहित अश्वमेघ यज्ञ किया। यज्ञ के अन्त में देवता गन्धर्व पन्नग गुह्यक पृथ्वी पर दंडवत कर प्रार्थना करने लगे।
देवता बोले- हे देवाधि देव ! हमारी विज्ञप्ति श्रवण करो यह हमारी प्रसन्नता का स्थान है इसे तुम वरदान दो। हे रमापते! इन ब्रह्माजी ने इस स्थान में नष्ट हुए वेद फिर पाये और हमने यज्ञ के भाग प्राप्त किये। इसलिए आपके प्रसाद से यह स्थान पृथ्वी में अत्यन्त श्रेष्ठ हो और पुण्य देने वाला हो और यह महीना भी ब्रह्म हत्या आदि को दूर कर अक्षय फल देनेवाला हो।
श्री विष्णु बोले-हे देवताओं ! जो बात तुमने कही है यही मुझे भी अभीष्ट है, सो ऐसा ही हो। यह ब्रह्म क्षेम नाम से संबको सुलभ होगा। सूर्यवंशी राजा भागीरथ यहां गंगाजी को लायेंगे और इस जगह पर सूर्य की पुत्री यमुनाजी का संगम होगा। जो पुरुष अपेन पित्रीश्वरों को यहां श्राद्ध करेंगे उनके पितृगण मेरे स्वरूप को धारण करेंगे। मकर संक्रान्ति माघ मास में प्रातःकाल स्नान करने से उनके दर्शन मात्र से ही सम्पूर्ण पाप ऐसे नष्ट हो जाते हैं जैसे सूर्य से अन्धेरे का नाश हो जाता है। और उनको मैं सालोक्य सामीप्य और सारूप इन तीनों प्रकार की मुक्ति क्रम से देता हूं। हे मुनिवरों ! मैं सर्वज्ञ रूप से बदरी वन में सदैव निवास करता हूं। जो फल और स्थान सो वर्ष में मिलता है वह तुमको वहां एक दिन ही प्राप्त होवेगा। उस स्थान के दर्शन कर वाले मनुष्य जीवन मुक्त हो जाते हैं।
सूतज बोले- विष्णु देवताओं से ऐसा कहकर ब्रह्मार्ज सहित वहीं अन्तर्धान हो गए और इन्द्रादिक देवता भी अंशों से यहां रहकर अन्तर्धान हो गए। जो मनुष्य शुद्ध चित्त से इस पवित्र कथा को सुनते हैं उनको प्रयागराज और बदरी वन में जाने का फल मिलता है।
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पांचवां अध्याय
राजा वेन के पुत्र पृथु बोले – हे मुनि ! तुमने कार्तिक के महाफल वर्णन किया है। अब इस महीने के स्नान की विधि और नियम कहिए।
नारद जी बोले- हे राजन् ! तुम विष्णु के अंश से उत्पन्न हुए हो तुमसे कोई बात छिपी नहीं है तथापि में नियमों का वर्णन करता हूं। आश्विन मास में शुक्ल पक्ष की एकादशी से सावधान होकर कार्तिक के व्रतों को प्रारम्भ करें। पहर रात्रि रहे तब प्रतिदिन उठें और जल का पात्र लेकर ग्राम से बाहर उत्तर दिशा को जायें। जनेऊ को कान पर चढ़ाकर उत्तर को मुख करके भूमि पर तृण बिछाये और सिर को कपड़े से ढक लें मुख को बन्द कर थूकना और श्वांस लेना बन्द करके मल-मूत्र त्याग करें। जो रात्री हो तो दक्षिण को मुख करे। जो मल-मूत्र द्वारा शरीर की शुद्धि और जो मुख शुद्ध नहीं करते हैं उनके मन्त्र फलदायक नहीं होते। इसलिए दांतुन करना उचित है। दांतुन लाते समय वृक्ष से कहें कि हे वनस्पति ! हमको आयु, बल, यश, तेज, संतान, द्रव्य, वेद पाठ की शक्ति और बुद्धि दें। इस मन्त्र को पढ़कर गूलर आदि किसी दूध के वृक्ष की बारह अंगुल लम्बी दांतुन लावें। व्रत के दिन ऐसा न करें। प्रतिपदा, अमावस्या, नवमी, षष्ठी तिथियों और सूर्यवार तथा चन्द्रमा सूर्य ग्रहण के दिन दांतुन न करें। कटेरी, संभालू, कपास, पीपल, वट, अरंड और गंधहीन वृक्षों की दांतुन न करें। तदनन्तर विष्णु और शिव के मन्दिर में प्रसन्नता और विधि-पूर्वक पुष्प, गन्थ, तांबूल ले जायें। वहां भगवान् की पाद्यादि से स्तुति करके नमस्कार करें और भजन गावें। देवालय में भजन कीर्तन करने वाले विष्णु स्वरूप होते हैं। जैसे सतयुगादि में तप, यज्ञ, दान आदि भगवान् को तुष्टि देने वाले हैं वैसे ही हैं। कलियुग में भक्ति-पूर्वक भजन-कीर्तन मोक्ष देने वाले होते हैं।
नारदजी बोले- सिरस, धतूरा, कटेर, मल्लिका, सेमर, आक, कनेर के फूल तथा अक्षतों से विष्णु की पूजा नहीं होती। जयकुन्द, सिरस, चमेली, मालती, केतकी आदि के फूलों से सूर्य की पूजा लक्ष्मी चाहने वालों को करना उचित नहीं है। यथा योग्य विधि से ही देवताओं की पूजा करके भगवान् से क्षमा प्रार्थना करें, कि हे सुरेश्वर! हे देव! मैंने मन्त्रहीन भक्ति की, और क्रियाहीन पूजन किया है वह परिपूर्ण होवे। फिर प्रदक्षिणा करके दण्डवत करें फिर क्षमा प्रार्थना करके गान करके समाप्त करें। जो कार्तिक की रात्रि में विधिपूर्वक विष्णु और शिव का पूजन करते हैं वे अपने पूर्वजों सहित निष्पाप बैकुण्ठ को चले जाते हैं।
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छठा अध्याय
नारद जी बोले- दो घड़ी रात रह जाए तब उठकर तिल, कुशा, अक्षत, फूल, धूप, दीप आदि लेकर पवित्र होकर किसी नदी, तालाब, कुंआ आदि जलाशय पर जाए। मनुष्य की बनाई हुई नहर आदि तथा देवताओं की बनाई हुई नदियों में व संगम में स्नान करने से दस गुना फल है। तीर्थ में उसका दुगना । विष्णु का स्मरण करके स्नान का संकल्प' कर तीर्थ तथा देवता आदि को क्रम से अर्ध्यादि दें। और कहें हे हृषिकेश ! इस मेरे अर्ध्य को ग्रहण करिये, आपको नमस्कार है। बैकुण्ठ में प्रयाग में अथवा बदरिकाश्रम में जहां मुनि वेद और यज्ञों सहित जहां तीन प्रकार से विष्णु ने पद स्थापित किया है वहां सब देवता हमारी रक्षा करें। हे कृष्ण! कार्तिक मास में दिए हुए अर्ध्य को ग्रहण कीजिए।
भागीरथी, विष्णु, शिव, सूर्य आदि को नमस्कार करके जल में घुसे और नाभिपर्यन्त जल में घुस कर विधिपूर्वक स्नान करें। गृहस्थी तिल और आंवले का चूर्ण मलकर स्नान करें। विधवा स्त्री और सन्यासी तुलसी की जड़ की मिट्टी लगा कर स्नान करें। परन्तु सप्तमी, अमावस्या द्वितीया और त्रयोदशी इन तिथियों में आंवला और तिल न लगायें। स्नान, मन्त्र-भक्ति, भावना जिन प्रभु ने देवताओं के कार्य के निमित्त रूप धारण किया था वे कृपा करके मुझे पवित्र करें विष्णु की आज्ञा से इन्द्र सहित सब देवता कार्तिक के व्रत करने कालों की रक्षा करें। व्रती मनुष्य इस प्रकार स्नान करके हाथ में पवित्री धारण कर देव, ऋषि और पितरों का तर्पण करें। कार्तिक के महीने में तर्पण में जितने तिल होते हैं उतने वर्ष पितर स्वर्ग में वास करते हैं। तदनन्तर जल में से निकल कर पवित्र वस्त्र धारण कर प्रातः काल के कर्मों को समाप्त कर हरि भगवान् का अर्चन करें।
तीर्थ और देवताओं का स्मरण करके भक्तिपूर्वक गंध पुष्प और फलों से अर्ध्य प्रदान करें। तब वेदपाठी ब्राह्मणों का पूजन करें। ब्राह्मण विष्णु रूप हैं। इसलिये अपने कल्याण चाहने वाले कदापि इनका अपमान और विरोध न करें। फिर हरि की प्यारी तुलसीजी की पूजा कर परिक्रमा दे नमस्कार करें। और कहें कि देवताओं ने प्रथम तुम्हें बनाया, मुनियों ने पूजा है सो तुम मेरे पाप का हरण करो। भक्तिपूर्वक पूर्वोक्त विधियों को करने वाला नारायण की सालोक्यता को प्राप्त होता है। रोग और पातकों का नाश करने वाला उत्तम बुद्धि, पुत्र और धन तथा मुक्ति के देने वाले विष्णु भगवान् के प्यारे कार्तिक के व्रतों के सिवाय दूसरे व्रत उत्तम नहीं हैं।
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सातवां अध्याय
नारद जी बोले- हे महाराज ! कार्तिक व्रत धारण करने वाले मनुष्यों के नियम संक्षेप में सुना सब प्रकार के आमिष मांस, शहद, राई तथा नशा करने वाली वस्तुओं का परित्याग कर दें। पराया अन्न, परद्रोह, विदेश गमन, बिना तीर्थ के अन्य स्थान में रहना छोड़ देवें तथा देवता, वेद, ब्राह्मण, गुरु, गौ, व्रतीः स्त्री, राजा और बड़ों की निन्दा त्याग देरे: दाल, तिल, तेल, खरीदा हुआ पकवान भाव और शब्द से दूषित वसतुओं को छोड़ दें। जीवधारी का मांस, चूना, जभीरा का फल, मसूर, बासी अन्न न खायें। बकरी, भैंस, गौ के दूध के सिवा अन्य दूध तथा ब्राह्मणों से खरीदा हुआ रस पृथ्वी से पैदा हुआ नमक ' ये भी सब छोड़ देवें। तांबे के पात्र में रखा हुआ पंचगव्य, पोखर का जन और अपने आप पकाया हुआ अन्न मांस के तुल्य कहा है। तथा कार्तिक व्रती ब्रह्मचर्य से रहें। पृथ्वी पर शयन करे। पत्तों पर खायें और चौथे पहर भोजन करे।
नरक चौदस को तेल लगायें इस तिथि को छोड़कर कार्तिक स्नान करने वाला तेल न लगाये। घिया, बैंगन, कुम्हड़ा, कटेरी, तरबूज, कैंथ ये सब छोड़ देवें। शिवद्रोही और वेद से विपरित चलने वालों से संभाषण न करें तथा उपरोक्त मनुष्य और कौओं के देखे अन्न को तथा दोबारा पकाये हुए और दग्ध अन्न को न खायें। विष्णु भगवान् की प्रसन्नता के लिए सामर्थ्य भर चन्द्रायणी व्रतों को करें। क्रम से काशीफल कटेरी, नई मूली, नारियल, तरबूज, आंवला, घीया, पर्वल, बेर, बैंगन, लौकी और तुलसी इसके शाक को प्रतिपदादि तिथियों में त्याग देवें। रविवार के दिन आंवले का सेवन न करें। इन वस्तुओं के सिवाय व्रती मनुष्य जिन प्रस्तुओं का त्याग न करे उनमें से पहले ब्राह्मणों को भेंट करके फिर आप भोजन करे। व्रती पुरुष माघ में भी उक्त नियमों पर चले और प्रबोधनी एकादशी में जागरण कृत्य करे। यथोवत रीति से कार्तिक के व्रत करने बालों को देख कर यम के दूत भाग जाते हैं। जैसे सिंह के डर से हाथी। विष्णु के व्रत करने वाला मनुष्य जहां पर आदर पूर्वक रहता है, वहां भूत-पिशाच आदि नहीं रहते। यथा रीति से कार्तिक व्रती पुण्यों को मुख वाला ब्रह्मा भी कहने में असमर्थ है। विष्णु का व्रत सम्पूर्ण पापों का नाशकर उत्तम धन, पुत्र, नाती, धान्य को बढ़ाने वाला है। इन व्रतों को नियमपूर्वक करने से अन्य तीर्थों के सेवन की क्या आवश्यकता है?
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आठवा अध्याय
नारद जी बोले- हे राजन् अब मैं कार्तिक के व्रतों का संक्षेप में उद्यापन सुनाता हूं। व्रत पूरा होने के फल और विष्णु भगवान् को प्रसन्नता के लिए कार्तिक शुक्ला चतुर्दशी को उद्यापन करे। तुलसी के ऊपर चार द्वारों का मण्डप बनाकर तोरन वन्दनवार बांधकर फूल और चमर से सजावे और चारों द्वारों पर मिट्टी के बने पुण्यशील, सुशीलजय और विजय द्वारपालों का पूजन करे और तुलसी के पास चार रंगों से सुशोभित सर्वतोभद्र चक्र बनावे। इसके ऊपर पंच रत्न और नारियल रख कर एक सुन्दर कलश स्थापित करे। फिर वहां शंख, चक्र, गदाधरी पीताम्बर से युक्त लक्ष्मी सहित विष्णु भगवान् की स्थापना करके पूजन करे। व्रती पुरुष मण्डल में इन्द्रादि को पूजे। द्वादशी को भगवान् जागरण कर भजन कीर्तन करता रहे।
प्रातः काल उठकर नित्य नैमित्तिक कर्म करे। पश्चात हवन करे, ब्राह्मणों को भोजन करावे, धन का लोभ छोड़ यथाशक्ति दक्षिणा देवे। उठें, त्रयोदशी को देवताओं ने उनके दर्शन किए और चतुर्दशी को पूजन करे। उस दिन शांत और सावधानी से उपवास करे। गुरु की आज्ञा को प्राप्त करके भगवान् कृष्ण की स्वर्णमयी प्रतिमा का पूजन षोडशोपचार से करके और विविध भोग अर्पण करे। रात्रि में उपवास कर ऐसे बैकुन्ठ को पावे। इस बैकुण्ठ चतुर्दशी के महात्म्य को देवता और शेषजी सौ वर्ष में भी नहीं कह सकते। जो भगवान् चक्रपाणि के जागरण में भक्त्तिपूर्वक आंगन में गायन और नृत्य करते हैं उनको सहस गोओं के दान करने का फल मिलता है। इसी दिन विष्णु भगवान् मत्स्यरूप हुए थे।
अतः उनको प्रसन्न करने के लिए इस तिथि में उन ब्राह्मणों को खीर आदि अन्न के भोजन करावे तथा 'अतो देवा, मन्त्रो से तिल और खीर का हवन करे। तत्पश्चा यथा-शक्ति दक्षिणा दे और नमस्कार करे जिसके करने से अक्षय फल मिलता है। फिर विधि-पूर्वक कपिला गौ का पूजन करे औ उपदेश करने वाले गुरु को सपत्नीक वर आभूषण से सुसज्जित कर समापन करावें प्रार्थना मन्त्र से आपकी प्रसन्नता से मे सात जन्म के पाप नष्ट हो जायें और मे मनोरथ सफल होवें और मरणोपरान्त मुझ विष्णुलोक की प्राप्ति हो। ऐसे उन ब्राह्मण से क्षमापन कराके और प्रसन्न कर पूजा के सामग्री गौर के समेत गुरु को निवेदन क फिर अपने बांधवों सहित स्वयं भोजन करे कार्तिक और माघ की यह विधि कही है।
सम्यक रीति से कार्तिक का व्रत करने वाला सम्पूर्ण कामनाओं से युक्त विष्णु भगवान् के समीप चला जाता है।
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नवां अध्याय
राजा पृथु ने कहा- हे नारद जी! आपने कार्तिक मास के व्रत में तुलसी की जड़ में भगवान् विष्णु का निवास बताकर उस स्थान की मिट्टी का पूजन बतलाया है। अब में भी श्री तुलसीजी के महात्म्य को सुनना चाहता हूं। तुलसी कहां और कैसे उत्पन्न हुई, ये बताने की कृपा करें?
नारदजी ने कहा- हे राजन् ! एक समय जब देवगुरु बृहस्पति और देवराज इन्द्र कैलाश पर्वत पर शंकरजी का दर्शन करने के लिए गये तो शंकर जी ने उनकी परीक्षा ली। उन से जटाधारी दिगम्बर ने उनका मार्ग में ही अनुरोध कर डाला। यद्यपि वे तेजस्वी, शान्त, लम्बी भुजा और चौड़ी छाती वाले गौरवर्ण अपने, विशाल नेत्रोंयुक्त तथा सिर पर जटा धारे वैसे ही बैठे थे। तथापि इन्द्र ने शंकरजी को न पहचान उनका नाम-धाम आदि परिचय-पूछा और कहा शंकरजी अपने स्थान पर है-या कहीं गये हैं।
इस पर उस तपस्वी ने कुछ नहीं कहा, परन्तु त्रिलोकी नाथ के ऐश्वर्य से वर्भित होकर इन्द्र कब चुप रहते, उन्होंने क्रोध से घुड़क कर कहा- अरे ! मैं पूछता हूं तू उत्तर क्यों नहीं देता? मैं अभी तुझे इस वज से मारता हूं फिर देखता हूं तुझ दुर्मति की रक्षा कौन करता है। फिर ज्योंही दिगम्बर को मारने के लिए हाथ में वज्ज्र लिया त्योंही भगवान् शंकर ने वज्र सहित उसका हाथ स्तम्भित कर दिया और विक्राल नेत्र कर ज्योंही उसे देखा तो ऐसा विदित हुआ मानो यह दिगम्बर प्रज्वलित हो उठा है और तेज से जला देगा। भुजायें स्तम्भित होने से इन्द्र के क्रोध और दुख का अन्त न रहा परन्तु ज्योंही बृहस्पति जी ने उसको प्रज्वलित देखा योंही अपनी बुद्धि से उनको भगवान् शंकर जानकर प्रणाम किया और इन्द्र को भी उनके बरणों में गिराया फिर बृहस्पति जी बोले-हे दीनानाथ ! अपना क्रोध रोक कर इन्द्र का अपराध क्षमा कीजिए।
बृहस्पति जी के वचन सुनकर महेश्वर गम्भीर वाणी में बोले-में अपने नेत्रों से निकले क्रोध को कैसे रोकूं?
तब बृहस्पति बोले- हे भगवान् ! भक्तों पर तो दया करनी ही चाहिए अतः अपना भक्तवत्सल नाम सार्थक कीजिए और इस तेज को शांत कर इन्द्र का उद्धार कीजिए। तब भगवान् शंकर ने कहा मैं तुम्हारी स्तुति से प्रसन्न हू। ज़ो तुमने इसे जीवन दान दिलाया। अब मैं तुम्हें अपने वरदान द्वारा जीव नाम विख्यात करता हूं। मेरे नेत्रों की अग्नि इन्द्र को पीड़ित नहीं करेगी। ऐसा दे शंकरजी ने अपने माथे से निकले हुए को लेकर क्षीर सागर में डाल दिया। लीलाधारी भगवान् अन्तर्ध्यान हो गए। और बृहस्पति दोनों भय से मुक्त हो परमसुखी हुए। इस प्रकार जिनको जा की इच्छा थी उन्हें जानकर इन्द्र और बृहस्प अपने स्थान को चले गये।
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दसवां अध्याय
राजा पृथु ने कहा- हे देवर्षि! आपक नमस्कार है, अब कृपा कर आप यह कहि कि जिस समय भगवान् शंकर ने माथे व तेज क्षीर सागर में डाल दिया उस सम क्या हुआ?
नारद जी ने कहा- हे राजन् ! जब शंकरजी ने तेज क्षीर सागर में डाल दिया तो वह शीघ्र ही बालक होकर गंगासागर के संगम पर बैठकर संसार को भय देने वाला रुदन करने लगा। उसके रुदन से समस्त संसार व्याकुल हो उठा लोकपालों के मन में भी व्याकुलता हुई अधिक कहने से क्या है? 'चराचर चलायमान हो गये। शंकर सुवन के रुदन से ब्रह्मांड व्याकुल होकर लोक पितामह ब्रह्माजी की शरण में गए और सबने मिल-कर ब्रह्माजी को प्रणाम किया और स्तुति की, फिर कहा-हे पितामह यह बड़ा भयंकर समय आया है, इसका नाश कीजिए।
देवताओं की यह बात सुनकर ब्रह्माजी सत्यलोक से उस बालक को देखने के लिए समुद्र तट पर आये। समुद्र से ब्रह्माजी को आता देख उन्होंने प्रणाम किया और बालक को उठाकर उनकी गोद में दे दिया।
तब विस्मित होकर ब्रह्माजी ने पूछा- हे साहि तुम शीघ्र बताओ कि यह बालक किसका है
तब समुद्र ने कहा- हे प्रभो ! यह तो मैं नहीं जानता किन्तु मुझे इतना अवश्य ज्ञात है कि यह गंगासागर के संगम पर प्रगट हुआ है अतः आप इस बालक का जाति-कर्म आदि संस्कार कीजिए। इसका जातक फल बताइये।
नारदजी कहते हैं कि इधर तो सागर ब्रह्मा जी से ऐसे कह रहा था उधर सागर पुत्र भी ब्रह्माजी के गले में हाथ डाल कर बार-बार उनको आकर्षण कर रहा था। अब तो उसने ब्रह्माजी का गला जोर से पकड़ा कि वे पीड़ित हो नेत्रों से आंसू डालने लगे। किसी प्रकार उन्होंने अपने दोनों हाथ से जोर लगाकर गला छुड़ाया और सागर से कहा सुनो मैं तुम्हारे पुत्र का जातक फल कहता हूं। मेरी आंखों से जो जल निकलता है इस कारण इसका नाम जलन्धर होगा।
यह पैदा होने के साथ ही तरुण हो गया था। इससे यह सब शास्त्रों का पारंगत, महापराक्रमी, महाबीर, जवान और रणदुर्गम तथा सभी दैत्यों का पारंगत और भगवान विष्णु को जीतने वाला होगा। यह कहीं भी नहीं हारेगा। एक भगवान् शंकर को छोड़कर सबसे आवस्थ होगा। जहां से यह उत्पन्न हुआ है फिर वहीं जाएगा। इसकी पत्नी बड़ी प्रतिव्रता सौभाग्य- शाली, सर्वांगसुन्दरी, परम-मनोहर, मृदु-भाषिणी तथा शील की सागर होगी।
अब नारद जी ने कहा- हे राजन ! सागर से यह कहकर ब्रह्माजी ने शुक्राचार्य को बुला कर बालक का राज्याभिषेक कराया फिर अन्तर्ध्यान हो गये, अब तो उस बालक को देख सागर बहुत प्रसन्न हुआ और कितने ही उपाय से उसका पालन कर के बड़ा किया।
फिर कालनेम नामक असुर को बुला उसकी वृन्दा नाम की पुत्री से उसका विवाह कररा दिया। अब शुक्राचार्य के प्रभाव से वह दैत्यों पर राज्य करने लगा।
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ग्यारहवां अध्याय
नारदजी ने कहा- एक समय जलन्धर पत्नी सहित असुरों से सम्मानित हो सभा में बैठा था। तो परम कीर्तिवान श्री शुक्राचार्य जीन वहां पहुंचे, जिनके तेज से सब दिशाए प्रकाशित हो गयीं। गुरुजी को आता देख असुरों सहित सागर पुत्र ने उठकर बड़े आदर से उनको प्रणाम किया, तेजस्व शुक्राचार्यजी ने उनको प्रणाम किया, तेजस्वी शुक्राचार्यजी ने सबको आशीर्वाद दिया फिर एक आसन पर बैठकर सब दैत्य भी यथ स्थान पर बैठ गये। और सागर-पुत्र ने नम्रतापूर्वक यह प्रश्न किया- हे गुरुजी राहु का सिर किसने काटा था? आप हमें यह बतलाएं।
इस पर श्री शुक्राचार्यजी ने विरोचन पुत्र हिरण्य कशिपु और उसके धर्मात्मा पौत्र का परिचय देकर देवताओं और असुरों द्वारा समुद्र-मन्थन की सब कथा को संक्षेप में कहकर, यह बतलाया कि जब समुद्र से अमृत निकला वो उसे देव रूप से राहू पीने चला। इस पर इन्द्र के पक्षपाती भगवान् विष्णु ने राहु का सिर काट डाला। यह सुनने के साथ ही जालन्धर के नेत्र लाल हो गए, उसने बड़ा क्रोध किया। फिर अपने धस्मर नामक दूत को बुलाकर गुरु का कहा हुआ सब वृतान्त सुनाया और उसे यह आज्ञा दी- कि तुम शीघ्र ही इन्द्रपुरी में जाकर इन्द्र को थोरी शरण में लाओ। धस्मर जलन्धर का बड़ा निपुण दूत था।
वह शीघ्र ही इन्द की सुधर्मा नामक सभा जा पहुंचा और जलन्धर के शब्दों में कहा, हे देवताधम ! तुमने समुद्र को क्यों मथा और मेरे पिता के सब रत्नों को क्यों लिया । ऐसा करके तुमने अच्छा नहीं किया । यदि तू अपना भला चाहता है तो उन रत्नों सहित, देवताओं के साथ मेरी शरण आ। अन्यथा हे सुराधम ! मैं सत्य कहता कि तेरा राज्य ध्वंस हो जाएगा।
इस पर इन्द्र बहुत विस्मित हुआ और कहने लगा । पहले सागर ने मेरे भय से सब पर्वतों क अपनी कुक्षि में क्यों स्थान दिया और में शत्रु दैत्यों की क्यों रक्षा की? इसी कारण मैंने उनके सब रत्न हरण किए हैं। मैं भी सत्य कहता हूं कि मेरा द्रोही सुखी नहीं रह सकता !
इन्द्र की बात सुनकर वह दूत शीघ्र ही जलन्धर के पास आया और सब बातें उसे कह सुनाई। जिन्हें सुनते ही वह दैत्य मारे क्रोध के अपने होंठ काटने लगा और देवताओं को जीत के लिए उसने उद्योग आरम्भकिया। फिर तो सब दिशाओं तथा पाताल से करोड़ों दैत्य उसके पास पहुंच गए। शुम्भ-निशुम्भ सेनापतियों को साथ लेकर जलन्धर इन्द्र से युद्ध करने लगा शीघ्र ही इन्द्र के नन्दन वन में उसने अपनी विशाल सेना उतार दी। वीरों की शंख ध्वनि और छोड़ देवता उनसे युद्ध करने चले। भयानक घोर गर्जन से इन्द्रपुरी गूंज उठी। अमरावती मारकाट हुई। दोनों पक्षों के आचार्य अपने-अपने मृतकों को जिलाने लगे। असुरों के आचार्य गुरु शुक्र अपनी मृतसंजीवनी विद्या से और देव गुरु बृहस्पति द्रोणागिरी से औषधि लाकर मुर्दों को जिलाते रहे।
इस पर जलन्धर ने अपने गुरु शुक्राचार्य जी से क्रुद्ध होकर कहा- मेरे हाथ से मरे हुए देवता, जी कैसे जाते 'हैं। जिलाने वाली विद्या तो सब आपके पास ही है। फिर यह क्या बात है?
इस पर श्री शुक्राचार्यजी ने देवगुरु श्री बृहस्पति जी द्वारा द्रोणागिरी से औषधि लाकर देवताओं के जिलाने की बात कह दी। यह सुनकर जलन्धर और भी क्रुध हो गया। श्री शुक्राचार्य जी ने कहा-क्रुद्ध क्यों होते हो? यदि शक्ति हो तो द्रोणागिरि पर्वत को उखाड़कर समुद्र में फेंक दो। तब मेरे कथन की सत्यता प्रमाणित हो जाएगी।
इस पर जलन्धर क्रुद्ध होकर शीघ्र ही द्रोणागिरि पर्वत के पास जा पहुंचा और अपनी भुजाओं द्वारा उसे जड़ से उखाड़ कर समुद्र में फेंक दिया। यह भगवान् शंकर का तेज था। इसमें जलन्धर की कोई विचित्रता नहीं। पश्चात् यह सागर-पुत्र युद्ध भूमि में आकर बड़े वेग से, देवताओं का संहार करने लगा। जब बृहस्पति औषधि लेने के लिए द्रोणागिरि पर्वत पर पहुंचे तो द्रोणागिरी की जगह वहां पर उन्हें सूना मैदान मिला। तो वह भयभीत होकर देवताओं के पास आए और कहा कि युद्ध बन्द कर दो। तुम लोग अब जलन्धर को नहीं जीत सकोगे। पहले इन्द्र ने जो भगवान् शंकर का अपमान किया था। यह उसी का फल है। यह सुनकर देवता युद्ध की आशा त्याग, अत्यन्त ही व्याकुल हो इधर-उधर भाग निकले। सिंधु-सुत निर्भय होकर अमरावती में प्रविष्ट हो गया इन्द्र आदि देवताओं ने गुफाओं में शरण ली।
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बारहवां अध्याय
श्री नारदजी ने कहा-तब जलन्धर को अपनी खोज में आते देख कर इन्द्र आदि देवता भय-कम्पित होकर वहां से भाग निकले। भाग कर वह बैकुन्ठ से भगवान् विष्णु के पास पहुंचे। फिर देवताओं ने अपनी रक्षा के लिए उनकी स्तुति की।
देवताओं की उस दीन वाणी को सुन कर करुणा सागर भगवान् विष्णु ने उनसे कहा- देवताओं! तुम भय को त्याग दो। युद्ध में मैं शीघ्र ही उस जलन्धर को देखूंगा।
ऐसा कहने के साथ ही भगवान् गरुड़ पर जा बैठे। तब देवताओं सहित उन्हें युद्ध क्षेत्र की ओर प्रयाण करते देख समुद्रतनया लक्ष्मी के नेत्रों में जल भर आया और उन्होंने कहा-
हे नाथ ! यदि मैं सर्वदा आपकी प्रिय हूं और भक्त हूं तो मेरा भाई आप द्वारा युद्ध में कैसे मारा जाना चाहिए?
इस पर भगवान विष्णु ने कहा- यदि तुम्हारी ऐसी ही प्रीति है तो मैं उसे अपने हाथों से नहीं मारूंगा। परन्तु युद्ध में तो जाऊंगा ही। क्योंकि देवताओं ने मेरी बड़ी स्तुति की है। ऐसा कहकर शंख, चक्र, गदा, पदमधारी भगवान् विष्णु गरुड़ पर चढ़े हुए शीघ्र ही युद्ध के उस स्थान में जा पहुंचे, जहां पर कि जलन्धर विद्यमान था।
विष्णु के तेज से अर्पित देवता सिंहनाद करने लगे, फिर तो अरुण के अनुज गरुड़ के पंखों की प्रबल वायु से पीड़ित हो दैत्य इस प्रकार घूमने लगे जैसे आंधी से बादल आकाश में घूमते हैं, तब अपने वीर दैत्यों को पीड़ित होते देखकर जलन्धर ने क्रुध होकर भगवान् विष्णु को अदभुत वचन कह कर उन पर कठोर आक्रमण कर दिया। यहां से आगे की वार्ता वर्षा ऋतु की सम्पति की द्योतक है।
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तेरहवां अध्याय
नारदजी बोले- दैत्यों के तीक्ष्ण प्रहारों से व्याकुल देवता इधर-उधर भागने लगे। तद इन्द्र आदि को इस प्रकार भयभीत देखकर गरुड़ पर चढ़े भगवान् युद्ध में आगे बढ़े। उन्होंने अपना शारंग नामक धनुष उठाकर बड़े जोर से टंकोर किया। त्रिलोकी शब्दित हो गई। पलमात्र में ही भगवान् विष्णु ने हजारों दैत्यों के सिर काट गिराये। यह देखकर जलन्धर के क्रोध की सीमा न रही। फिर तो भगवान् विष्णु और जलन्धर का महान संग्राम हुआ। बाणों से आकाश भर गया। लोग आश्चर्य करने लगे। भगवान् विष्णु ने अपने बाणों के वेग से उस दैत्य की ध्वजा, क्षत्र और धनुष बाण काट डाले तथा एकजण से उसकी छाती में प्रहार किया। इससे व्यथित हो उसने अपनी प्रचण्ड गदा उठा गरुड़ के मस्तक पर दे मारी। गरुड़ पृथ्वी पर गिर पड़ा, साथ ही क्रोध से उस दैत्य ने होठ काटे और भगवान् विष्णु की छाती में भी एक तीक्ष्ण बाण मारा।
इसके उत्तर में भगवान् विष्णु ने उसकी गदा काट दी और अपने शारंग धनुष पर बाण चढ़ा-चढ़ाकर उसको बींधना प्रारम्भ किया। जलन्धर भी उन पर अपने पैने बाण बरसाने लगा। उसी समय जलन्धर ने भगवान् विष्णु को कई पैने बाण मारकर वैष्णव धनुष को काट दिया। धनुष कट जाने पर भगवान् ने गदा ग्रहण कर ली और शीघ्र ही जलन्धर को खींचकर मारी । परन्तु उस अग्निवत अमोघ गदा की मार से भी वह चलायमान न हुआ और मदोन्मत्त हाथी के संमान उसे यानी गदा की मार को फूल की माला ही जाना। साथ ही उस युद्ध दुर्मद ने अत्यन्त ही क्रुद्ध होकर एक अग्निमुख त्रिश्ल उठाकर विष्णु पर छोड़ दिया।
भगवान् विष्णु ने शिव के चरणों, का स्मरण कर नन्दक नामक त्रिशूल से उसके त्रिशूल को छेद दिया। जलन्धर ने झटक कर भगवान् विष्णु की छाती में एक मुष्टिक मारा। उसके उत्तर में भगवान विष्णु ने भी उसकी छाती पर अपनी मुष्टिका का प्रहार किया। फिर दोनों घुटने टेक कर बाहों और मुष्टकों से बाहू युद्ध करने लगे। कितनी ही देर तक भगवान् विष्णु उसके साथ युद्ध करते रहे। वह कुछ श्रमित से हो गए।
तव सर्वश्रेष्ठ मायावी भगवान् उस दैत्यराज से मेघ वाणी में बोले- 'हे रण दुर्मम दैत्य-श्रेष्ठ ! तू धन्य है, जो इस महायुद्ध में इतने बड़े-बड़े आयुधों से भी भयभीत न हुआ। तेरे इस युद्ध से मैं बड़ा प्रसन्न हूं। तू जो चाहे मांग। मैं अदेय वस्तु भी आज तुझको दे दूंगा।'
मायावी भगवान् विष्णु की ऐसी वाणी सुनकर जलन्धर ने कहा-'हे भावुक ! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो यह वर दीजिए कि आप मेरी बहन के साथ तथा अपने सारे कुटुम्बियों सहित मेरे घर पर निवास करेंगे।'
नारदजी कहते हैं उसके ऐसे वचन सुनकर भगवान विष्णु को खेद तो हुआ किन्तु उसी क्षण उन देवेश ने 'तथास्तु' कह दिया। अव भगवान् विष्णु सब देवताओं के साथ जलन्धरपुर में जाकर निवास करने लगे। जलन्धर अपनी बहन लक्ष्मी और देवताओं सहित भगवान् विष्णु को वहां पाकर बड़ा प्रसन्न हुआ। फिर तो देवताओं के पास जो रत्न आदि थे, उनके स्थानों पर दैत्यों को स्थापित कर जलन्धर पृथ्वी पर आया।
निशुम्भ को पाताल में स्थापित कर दिया और देव, दानव, यज्ञ, गंधर्व, सर्प, राक्षस, मनुष्य आदि सबको अपना वशवर्ती बनाकर त्रिभुवन पर शासन करने लगा। उसने धर्मानुसार सुपुत्रों के समान प्रजा का पालन किया। उसके धर्मराज्य में सभी सुखी थे।
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चौदहवां अध्याय
नारद जी बोले- हे राजन ! तब उसको इस प्रकार धर्मपूर्वक राज्य करते देखकर देवता क्षुब्ध हो गए। उन्होंने देवाधिदेव भगवान् शंकर का मन में स्मरण करना आरम्भ कर दिया कितने ही प्रकार से स्तुति की। तब भक्तों की कामना पूर्ण करने वाले भगवान शंकर ने नारद जी को बुला कर देव कार्य करने की इच्छा से उनको देवपुरी भेजा। शंकर भक्त नारद भगवान् शंकर की आज्ञा से देवपुरी में गए। इन्द्र आदि सभी देवता व्याकुल होकर शीघ्रता से उठकर श्री नारदजी की स्तुति करने लगे। उत्कण्ठा भरी दृष्टि से सबने नारदजी की ओर देखा। अपने सब दुःखों को कहंकर उन्हें नाश करने की प्रार्थना की।
नारदजी ने कहा- मैं सब कुछ जानता हूं। इसके लिए अब मैं दैत्यराज जलन्धर के पास जा रहा हूं। ऐसा कहकर और देवताओं को आश्वासित कर, श्री नारदजी जलन्धर की सभा में आए।
जलन्धर ने श्री नारदजी के चरणों की पूजा करके हंसते हुए कहा-'हे ब्राह्मण ! कहिए, आप कहां से आ रहे हैं और कहां-कहां पर आपने क्या-क्या देखा यहां कैसे आए हैं? मेरे योग्य जो सेवा हो उसके लिए आज्ञा कीजिए। है?
जलन्धर के इस प्रकार के वचन सुनकर श्री नारदजी प्रसन्न होकर बोले- 'हे दानवराज महा बुद्धिमान जलन्धर तुम धन्य हो। क्योंकि इस समय सब रत्नों के भोक्ता एक तुम ही हो। हे दैत्य श्रेष्ठ! अब आप मेरे आगमन का कारण सुनिए कि जिसके लिए मैं आज यहां आया हूं।
दैत्यराज ! मैं स्वेच्छा से कैलाश पर्वत गय था। जहां दस हजार योजनों में कल्प वृक्ष वन है। वहां पर मैंने सैकड़ों कामधेनुओं को विचरते हुए देखा तथा यह देखा कि वह वन चिन्ता-मणि से प्रकाशित परम दिव्य अदभुत और सब स्वर्णमय है। मैंने वहां पार्वती के साथ स्थित शंकर को भी देखा जो सर्वांग सुन्दर, गौरवर्ण, त्रिनेत्र और मस्तक पर चन्द्रमा धारण किए हुए हैं। यह देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि इनके समान समृद्धिशाली त्रिलोकी में कोई है या कि नहीं हे देत्येन्द्र ! उसी समय मुझे तुम्हारी भी समृद्धि का स्मरण हो आया और उसे देखने की इच्छा से मैं तुम्हारे पास चला आया है।
यह सुनकर जलन्धर को बड़ा हर्ष हुआ। उसने श्री नारदजी को अपनी सब समृद्धि दिखला दी। उसे देख, देवताओं का कार्य करने के इच्छुक शिव प्रेरित श्री नारद जी ने जलन्धर की बड़ी प्रशंसा की और कहा- 'निश्चय ही तुम त्रिलोकपति होने के योग्य थे। तुम्हारे लिए ऐसा होना कोई विचित्र बात नहीं है। मैं देखता हूं कि और तो तुम्हारे पास सब कुछ है और किसी बात की कमी -नहीं है। ऐरावत तुम्हारे पास है। उच्चैः श्रवा घोड़ा तुम्हारे पास है। कल्पवृक्ष और कुबेर की निधि तुम्हारे घर है। मणियों और रत्नों के ढेर भी तुम्हारे यहां लगे हुए हैं। ब्रह्माजी का हंस युक्त विमान भी तुम्हारे पास है और द्युलोक, पाताल और पृथ्वी पर जितने भी रत्न आदि हैं वह सब तुम्हारे ही तो हैं। मैं तुम्हारे इस प्रकार के सब रत्न आदि ऐश्वर्यो को देखकर बड़ा प्रसन्न हूं। परन्तु तुम्हारे पास कोई स्त्री-रत्न नहीं है उसके बिना तुम्हारा यह सब फीका है। तुम कोई स्त्री रत्न ग्रहण करो।
नारद जी के इस प्रकार व वचन सुनकर दैत्यराज काम से व्याकुल हो गया। उसने नारदजी को प्रणाम करके पूछ कि ऐसी स्त्री कहां मिलेगी, जो कि सब रत्नों में श्रेष्ठ हो। यदि ऐसा रत्न कहीं मिल तो मैं आपकी आज्ञा से उसे अवश्य लाऊंगा।
नारद जी ने कहा- ऐसा रत्न तो कैलाश पर्वत पर योगी शंकर के पास ही है। उनकी सर्वाग सुन्दर पत्नी देवी पार्वती बहुत ही मनोहर है। उसके समान सुन्दरी मैंने आज तक नहीं देखी। शंकर से बढ़कर समृद्धिमान दूसरा कोई नहीं है। उसके इंस रत्न की महिमा तीनों लोक में कहीं पर भी नहीं है। तभी तो परम विरक्त आत्माराम शंकर भी उसके वश में हो गए हैं।' देवर्षि नारद उस दैत्य से ऐसा कहकर कार्य करने की इच्छा से आकाश मार्ग को चले गए।
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पन्द्रहवां अध्याय
देवर्षि नारद जी से राजा पृथु ने कहा- हे, देवर्षि ! दैत्यराज ने क्या किया। वह सब मुझे विस्तार पूर्वक सुनाइए।
देवर्षि नारद बोले- उसके चले जाने पर, जलन्धर ने अपने राहु नामक दूत को बुलाकर कैलाश पर जाने की आज्ञा दी और कहा कि वहां पर एक जटाधारी शम्भू नामक योगी रहता है। उससे मेरा आक्रमण और ऐश्वर्य कहकर, उसकी सर्वांग सुन्दरी भामिनी को मेरे लिए मांग लाओ। तब उन वचनों को सुनकरक वह दूत शिव के स्थान पर पहुंचा। परन्तु नन्दी ने उसे सभा के भीतर नहीं जाने दिया। किन्तु वह अपनी उग्रता से शिव की सभा में चला गया और शिव के आगे बैठकर उनकी आज्ञा ले, वह सब सन्देश कह सुनाया जो कि दैत्यराज ने कहा था। फिर तो उस शामक दूत के ऐसा कहते ही भगवान् शूलपाणि के आगे पृथ्वी फोड़कर एक शब्द बाला पुरुष प्रगट हो गया जिसका कि सिंह के समान मुख था और जो कि मानो दूसरा नृसिंह था वह दौडकर राहू को खाने चला। राहू बडे जोर से भागा। परन्तु उस पुरुष ने उसको पकड़ लिया। उसने शिव की शरण ले अपनी रक्षा मांगी। शिव जी ने उस पुरुष से राहू को छोड देने के लिए कहा कि मुझे बड़े जोर की भूख लगी है मैं क्या खाऊं?
महेश्वर ने कहा- यदि तुझे भूख लगी है. कर ले।' तो शीघ्र ही अपने हाथ-पैरों का मांस भक्षण कर।
शिवजी की आज्ञा से वह पुरुष शीघ्र ही अपने हाथों और पैरों का मांस भक्षण कर गया अब केवल उसका सिर मात्र शेष रह गया। तब उसका ऐसा कृत्य देखकर शिवजी ने प्रसन्न होकर उसको अपना आज्ञा-पालक जानकर, उसे अपना परम प्रिय गण बना लिया और कहा कि मेरी पूजा के समय अब तेरी भी सदैव पूजा होती रहेगी और जो तेरी पूजा नहीं करेंगे वे मेरे प्रिय न होगे। शिवजी से ऐसा वर पाकर उस पुरुष को बड़ी प्रसन्नता हुई। उस दिन से वह शिवजी के द्वार पर 'स्तकीति मुख' नामक गण होकर स्थित रहने लगा।
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सोलहवां अध्याय
राजा पृथु ने कहा- 'नारद जी ! यह तो आपने महा प्रभु शंकर की बड़ी अदभुत कथा सुनाई है। कृपा कर आप अब यह बतलाइये कि उस समय राहू उस पुरुष से छूट कर कहां गया?
जब राजा पृथु ने देवर्षि नारद से ऐसा प्रश्न पूछा, तो देवर्षि ने कहा- उससे छूटने पर वह बर्बर नाम से विख्यात हो गया और मानों नया जन्म पाकर उसने अपने आपको धन्य माना। तथा वह धीरे-धीरे जलन्धर के पास गया। वहां जाकर उसने शंकरजी की चेष्टा कही। उसे सुनकर दैत्यराज को बड़ा क्रोध आया और उसने सब दैत्यों को सेना सजाने की आज्ञा दी। कालनेमि और शुम्भ-निशुम्भ आदि सभी महाबलि दैत्य तैयार होने लगे। एक से एक महाबली दैत्य करोड़ों की संख्या में निकल कर युद्ध के लिए सम्बद्ध हो गए। महाप्रतापी सिंधु पुत्र शिवजी से युद्ध के लिए निकला। उसके आगे महर्षि शुक्र और छिन्न सिर राहू हुआ। फिर तो उसी समय जलन्धर का मुकुट खिसक कर पृथ्वी पर गिर पड़ा, आकाश में मेघ छा गए और बड़े अपशकुन हुए।
उधर इन्द्र आदि सब देवताओं ने एकत्र होकर कैलाश पर जाकर शिवजी के पास पहुंच कर सारा वृत्तांत कहा और यह भी कहा कि आपने जलन्धर से युद्ध करने के लिए जो भगवान् विष्णु को भेजा था वह उसके वशवर्ती हो गए हैं तथा लक्ष्मी सहित जलन्धर के अधीन होकर उस के घर में निवास करते हैं। अब देवताओं को भी उसके यहां निवास करना पड़ रहा है। अब वह सागर-पुत्र आपसे युद्ध करने के लिए आ रहा है। अतएव आप उसे मारकर हमारी रक्षा कीजिए।
देवताओं से यह सब कुछ सुनकर शंकरजी ने भगवान् विष्णु से पूछा- 'हे ऋषिकेश ! युद्ध में आपने जलन्धर का संहार क्यों नहीं किया। और बैकुण्ठ को छोड़कर आप उसके घर कैसे चले गए हैं?'
यह सुनकर भगवान् विष्णु ने हाथ जोड़कर नम्रतापूर्वक शंकर से कहा- 'उसे आपका अंशीवा लक्ष्मी का भाई होने के कारण नहीं मारा है। वह बड़ा ही वीर व देवताओं से अजय है। मैं सत्य कहता हूं कि
उसे कोई भी नहीं मार सकता। इस पर मुग्ध होकर, मैंने स्वयं उसके घर में रहने का वर दे दिया हैं और इसी कारण मैं उसके घर में रहता हूं।
' हे सुरवर्य विष्णु आप यह क्या कहते हैं। उसे देते हैं जालंधर को मैं अवश्य मारूंगा। इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है। अब अम्प सब देवता जलन्धर को मेरे द्वारा मरा हुआ ही जानकर अपने स्थान को जाइये।'
जब शंकरजी ने ऐसा कहा तो सब देवता सन्देह रहित होकर अपने स्थान को चले गए। ठीक उसी समय पराक्रमी जलन्धर अपनी विशाल सेना के साथ कैलाश पर्वत को घेर कर सिंहनाद करने लगा। दैत्यों के नाद और कोलाहल से शिवजी क्रुद्ध हो गए। उन्होंने अपने नन्दी आदि गणों को उसके साथ युद्ध करने की आज्ञा दे दी। कैलाश पर्वत के समीप भीषण युद्ध होने लगा। दैत्य अनेकों प्रकार के अस्त्र-शस्त्र बरसाने लगे। भेरी, मृदंग, शंख और तीरों तकृ हाथी, घोड़ों और रथों के शब्द से पृथ्वी कांपने लगी। युद्ध में कट कर मरे हुए हाथी-घोड़े और पैदेलों का पहाड़ सा लग गया। जिससे कि युद्ध भूमि और भी आगम्य हो गई दैत्यों के आचार्यः श्री शुक्राचार्य जी अपनी मृतसंजीवनी विद्या से सब दैत्यों को जिलाने लगे।
यह देखकर शिवजी गण व्याकुल हो गए और उनके पास जाकर सारा वृत्तांत सुनाया। उसे सुनकर भगवान् रुद्र के क्रोध की सीमा न रही। वह अपने भयंकर रूप से दिशाओं को प्रज्वलित करने लगे। फिर तो उस समय उनके मुख से एक बड़ी भयंकर कन्या उत्पन्न हुई। जिसकी कि दोनों जंघाएं ताल वृक्ष के समान थीं। वह युद्ध भूमि में जाकर सब असुरों का चर्बन करने लगी। तब युद्ध भूमि इस प्रकार विचरते हुए वह शुक्र जी के समीप पहुंची और उन्हें शीघ्र ही अपने उदर में विलुप्त कर लिया। फिर स्वयं भी अन्तर्धान हो गई। शुक्र के गुप्त हो जाने से दैत्यों का मुख मलीन पड़ गया और वह युद्ध भूमि में छोड़कर भाग गए। इस पर उनके शुम्भ-निशुम्भऔर कालनेमि आदि सेनापतियों ने अपने भागते हुए वीरों को रोककर शिवगणो पर बड़ा कठिन प्रहार करना आरंभ किया और ऐसा ही शिवजी के नन्दी आदि वीर गणों ने भी जिनमें गणेश और स्वामी कार्तिक भी थे अपने गणों को रोक-रोक कर देत्यों से भीषण युद्ध करना आरंभ किया।
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सत्रहवां अध्याय
नारद जी कहते हैं- उस समय शिवजी के गण प्रबल थे और उन्होंने जलन्धर के शुम्भ-निशुम्भ और महासुर कालनेमि आदि को पराजित कर दिया। यह देखकर सागर पुत्र जलन्धर एक रथ पर जिस पर की लम्बी पताका लगी हुई थी चढ़ कर युद्ध भूमि आकर घोर संग्राम करने लगा।
इधर जयशील शंकर के गण भी युद्ध में तत्पर होकर गरजने लगें इस प्रकार दोनों सेनाओं के हाथी घोड़े, रथ, शंख, भेरी तथा दोनों ओर के वीरों के सिंहनाद से पृथ्वी त्रस्त हो गई। तत्पश्चात जलन्धर ने कुहरे के समान बाणों को फेंककर पृथ्वी से लेकर आकाश तक व्याप्त कर दिया और नन्दी को पांच, गणेश को पांच तथा वीरभद्र को एक साथ बीस बाण मार कर उनके शरीर को छेद दिया और मेघ के समान गर्जन करने लगा यह देख कर रुद्र पुत्र कार्तिकेय ने भी दैत्य जलन्धर को अपनी शक्ति उठाकर मारी और घोर गर्जन किया जिसके आघात से वह पृथ्वी पर गिर पड़ा।
परन्तु वह इतना बली था कि शीघ्र उठकर खड़ा हो गया और क्रोधाविष्ट होकर कार्तिकेय पर अपनी गदा का प्रहार कर दिया। ब्रह्मा वरदान की सफलता के लिए शंकर पुत्र कार्तिकेय पृथ्वी पर सो गए। गणेश जी और नन्दी भी व्याकुल होकर गदा प्रहार से पृथ्वी पर गिर गए। वीरभद्र का सिर फट गया और बहुत सा रक्त बहने लगा। वीरभद्र को पृथ्वी पर गिरा देखकर शंकर के गण चिल्ला हुए संग्राम भूमि छोड़कर बड़े वेग से भाव निकले।
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अठारहवां अध्याय
देवर्षि नारद जी ने कहा- अब रुद्र महाप्रभु शकर अपने वीर गणों के साथ पर चढ़ हंसते हुए युद्ध भूमि में आए, उनको आया देखकर उनके पराजित गण फिर लौट आए और सिंहनाद करते हुए आयुधों से दैत्यों पर प्रहार करने लगे। भीषण रूपधारी रुद्र को देख दैत्य भागने लगे। तब युद्ध में अपने दैत्यों को पराहन्मुख होते देखकर जलन्धर हजारों बाण छोड़ता हुआ भगवान शंकर की ओर दौड़ा।
उसके शुम्भ-निशुम्भआदि वीर भी क्रोध से अपने होठों को काटते हुए भगवान शंकर की ओर दौड़े। इतने में भगवान शंकर ने जलन्धर के सब बाण जालों को काटकर अपने गणों को निर्भय करके पीड़ित कर दिया। अपने अन्य बाणों की आंधी से दैत्यों को खड़गोरमा नामक दैत्य को अपने फरसे से मार डाला। बलाहक का भी सिर काट दिया। धस्मर भी मारा गया और शिव गण नचिशिखा ने प्रचण्ड नामक दैत्य का सिर काट डाला। किसी को शिवजी के बैल ने मारा और कई उनके बाणों द्वारा मारे गए।
यह देखकर जलन्धर अपने शुंभ आदि दैत्यों को धिक्कारने लगा और भयभीतों को धैर्य देने लगा पर किसी प्रकार भी भयग्रस्त दैत्य दोबार युद्ध भूमि में आने को तैयार न हुए। दैत्य सेना ने पलायन किया। तब महाक्रुद्ध जलन्धर शिवजी को अपनी ओर ललकारने लगा। साथ ही उसने सत्तर बाण मारकर शिवजी को दग्ध कर दिया तथा और भी बहुत से बाणों का प्रहार किया। शिवजी उसके जलन्धर की ध्वजा, क्षत्र और धनुष को भी बाणों को काटते रहे। यहां तक कि उन्होंने काट दिया, फिर सात बाण मारकर उनके शरीर में आघात पहुंचाया। धनुष के कट जाने से जलन्धर ने एक प्रचण्ड बाण मार कर उसकी गदा के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। तब उसने समझा कि यह मुझसे अधिक बलवान है अतएव उसने गन्धर्वी माया उत्पन्न कर दी। अनेक गन्धर्व और अप्सराओं के गण उत्पन्न हो गए। वीणा और मृदंग आदि बाजों के साथ नृत्य और गान होने लगा। इससे अपने गणों सहित रुद्र भी मोहित हो गए।
उन्होंने युद्ध बन्द कर दिया फिर तो काम मोहित जलन्धर बड़ी शीघ्रता से त्रिनेत्र भगवान शंकर का रूप धारण करके वृषभ पर बैठकर पार्वती के पास जा पहुंचा। उधर जब पार्वती ने अपने पति को आते देखा तो उसने सखियों का साथ त्याग दिया और आगे आई। पार्वती को देख कर कामातुर जलन्धर का वीर्यपतन हो गया और उसके पतन से वह भी जड़ हों गया।
गौरी ने उसे दानव समझा। वह अन्तर्ध्यान होकर उत्तर की ओर मानस पर्वत पर चली गई। तब वहां पार्वती को न देख कर जलन्धर फिर शिवजी की ओर लौटा। उधर पार्वती जी ने भगवान् विष्णु को बुलाकर दैत्य धन का वह कृत्य कहा और यह प्रश्न किया कि आप इससे अवगत हैं।
भगवान विष्णु ने हाथ जोड़कर और सिर नवा कर उत्तर दिया- माता ! जो आज्ञा हो, पालन करूं। आपकी कृपा से मुझे सब कुछ ज्ञात है। है
जगत माता ने विष्णु जी से कहा-उस दैत्य ने जो मार्ग खोला है उसका अनुशरण उचित है। मैं तुम्हें आज्ञा देती हूं, कि तुम जाकर उसकी स्त्री का पति व्रत भ्रष्ट करो वह दैत्य तभी मरेगा।
पार्वती जी की यह आज्ञा पाते ही भगवान विष्णु उसको शिरोधार्य कर छल करने लिए जालन्धर के नगर की ओर गए।
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उन्नीसवां अध्याय
राजा पृथु ने कहा- हे देवर्षि ! अब यह कहिए कि भगवान् विष्णु ने वहां जाकर क्या किया? तथा जन्धर की पत्नी का पतिव्रता धर्म कैसे भ्रष्ट हुआ?
नारद जी बोले- जलन्धर के नगर में जाकर भगवान् विष्णु ने उसकी पतिव्रता स्त्री वृन्दा का पतिव्रत भंग करने का विचार किया। वह उसके नगर में एक उद्यान में जाकर ठहर गए और रात में उसको स्वप्न दिया। वह उनकी माया और अदभुत कार्य पद्धति थी। और फिर उनकी माया द्वारा जलन्धर की पत्नी पतिव्रता वृन्दा ने रात में यह स्वप्न देखा कि उसका पति नग्न होकर सिर पर तेल लगाये महिष पर चढ़ा है। वह काले रंग के फूलों की माला पहने हुए है तथा उसके चहुं ओर हिंसक जीव हैं। वह सिर मुडाए हुए, अन्धकार में, दक्षिण दिशा की ओर जा रहा है। उसने अपने नगर को समुद्र में डूबा हुआ देखा और इस प्रकार के बहुत से भयानक सपने देखे।
फिर तत्काल ही वह जाग पड़ी और स्वप्नों के सम्बन्ध में विचार करने लगी। इतने में उसने सूर्य को उदय होते हुए देख तो उसमें उसे एक छिद्र दिखाई दिया तथा वह कांतिहीन था। इसे उसने अनिष्ट जाना। वह भयभीत होकर रोने लगी। वह छज्जे पर गई, अटारी पर चढ़ी, भूमि पर भी उतरी मगर उसको शांति कहीं पर प्राप्त न हुई। फिर वह अपनी दो सखियों को साथ लेकर उपवन में गई। पन्तु वहां पर भी उसको कल न पड़ी। फिर वह जंगल में निकल गई, मगर वहां पर भी उसको चैन न आया। वन में उसने सिंह के समान दो भयंकर राक्षसों को देखा जिससे वह अत्यंत भयभीत होकर वहां से भागने लगी। उसी क्षण वहां पर अपने शिष्यों सहित एक मौनी तपस्वी आ गया। भयभीत वृन्दा उसके गले में हाथ डाल कर, उससे अपनी रक्षा लिए याचना करने लगी।
मुनि ने अपनी एक ही हुंकार से उन दोनों राक्षसों को वहां से भगा दिया। वृन्दा को आश्चर्य हुआ, वह भय, से मुक्त होकर मुनि नाथ को हाथ जोड़कर प्रणाम करने लगी और कृतज्ञता का ज्ञापन किया। फिर उसने मुनि से अपने युद्ध रत-पति के सम्बन्ध में उसकी कुशल क्षेम का प्रश्न किया। मुनि ने मौन होकर आगे पीछे देखकर कुछ कहना ही चाहा कि उसी समय दो वानर मुनि के समक्ष आकर हाथ जोड़कर खड़े हो गए और ज्यों ही मुनि ने भृकुटी संकेत किया, त्योंही वह उड़कर आकाश में चले गए।
फिर जलन्धर का सिर व धड़ लेकर मुनि के पास आ गए। तब वृन्दा अपने पति को मृत हुआ जानकर मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ी और अनेक प्रकार के वचन कह कर दारुण विलाप करने लगी।
तत-पश्चात उसने उस मुनि से कहा- हे कृपानिधे ! आप मेरे पति को जीवित कर दीजिए।
पतिव्रता परायण दैत्य पत्नी ऐसा कह कर दुख की स्वासों को छोड़ती हुई मुनीश्वर के चरणों में गिर पड़ी तब मुनीश्वर ने कहा-वह शिवजी द्वारा युद्ध में मारा गया है। अतएव जीवित नहीं हो सकता। क्योंकि जिसे हे पराई से गमन करने वाले विष्णु ! भगवान् शंकर मार देते हैं वह कदापि जीवित नहीं हो सकता। परन्तु शरणागत की रक्षा सनातन धर्म है अतः मैं कृपाकर इसे जिलाए देता हूं।
नारद जी कहते हैं कि वह मुनि साक्षात विष्णु ही थे जिन्होंने यह सब माया फैला रखी थी। वह वृन्दा के पति को जीवित करके अन्तर्ध्यान हो गए। जलन्धर ने उठकर वृन्दा का आलिंगन किया और उसका मुख चूमा। वृन्दा भी पति को जीवित हुआ देखकर अत्यन्त हर्षित हुई और अब तक हुई सब बातों को स्वप्न समझा। तत-पश्चात वृन्दा सकाम हो बहुत दिन तक उसी वन में अपने पति के साथ विहार करती रही फिर एक दिन उसने सूरत एवं सम्भोगकाल के अन्त में भगवान् विष्णु को पहिचान लिया।
अतः उन्हें ताड़ित करती हुई बोली- तुम्हारे शरीर को धिक्कार है। मैंने जान लिया है कि वह मायावी तपस्वी तुम ही थे। हे राजन् ! ऐसा कहकर परम क्रुद्ध हो पतिव्रता वृन्दा ने अपने तेज को प्रगट करते हुए शाप दिया।
जो तुमने अपनी माया से दो राक्षस मुझे दिखाए थे वही दोनों राक्षस किसी समय तुम्हारी भी स्त्री का हरण करेंगे और उसके विरह में दुखी होकर तुम वानरों की सहायता से वन में भ्रमण करोगे और यह सर्वेश्वर जो इस समय तुम्हारा शिष्य बना है यह यहां तुम्हारा साथी रहेगा।
ऐसा कहकर पतिव्रता वृन्दा भगवान विष्णु के लाख मना करने पर भी एक पादप में प्रवेश कर गई। ब्रह्मा आदि देवता आकाश से उसका प्रवेश देखते रहे। वृन्दा के शरीर का श्री तेज पार्वती जी के शरीर में चला गया और आकाश से जय-जय शब्द होने लगा। पतिव्रत धर्म के प्रभाव से वृन्दा ने मुक्ति प्राप्त की।
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बीसवां अध्याय
राजा पृथु ने कहा- हे देवर्षि ! इसके पश्चात युद्ध में क्या हुआ? तथा वह दैत्य कैसे मारा गया? कृपाकर अब उस अदभुत कथा को मुझे कहिए?
देवर्षि नारद जी बोले- जय गिरिजा वहां से अदृश्य हो गई और गन्धर्वी माया भी विलीन हो गई, तब भगवान् वृषध्वज चैतन्य हो गए। उन्होंने लौकिकता व्यक्त करते हुए बड़ा क्रोध किया। फिर भगवान् शिव जलन्धर से युद्ध करने लगे। जलंधर शिव के बाणों को काटने लगा। परन्तु जब काट न सका तो उसने माया की पार्वती बना कर अपने रथ पर बांध ली जो शुम्भ-निशुम्भ द्वारा विद्यमान थी और विलाप कर रही थी।
तब अपनी प्रिय पार्वती को इस प्रकार कष्ट में पड़ा देखकर लौकिक लीला दिखाते हुए भगवान शंकर प्रकृत जनों की तरह व्याकुल हो गए और उन्होंने अग्नि पुन्ज की तरह भयंकर रौद्ररूप धारण कर लिया। अब उनके रोद्ररुप को देखकर कोई भी दैत्य उनके सामने खड़ा होने में समर्थ न हो सका और तब भागने छिपने लगे। यहां तक कि शुम्भ-निशुम्भ भी युद्ध में स्थित होने को समर्थ हो सके।
जलन्धर की सारी माया क्षण मात्र में नष्ट हो गई। संग्राम में चारों ओर हाहाकार होने लगा। शिवजी ने उन भागते हुए शुम्भ और निशुम्भ को शाप देकर बड़ा धिक्कार दी, और उनसे कहा-
तुम दोनों बड़े दुष्ट हो तुमने मेरा बड़ा अपराध किया है। तुम पार्वती को मारते थे और अब युद्ध से भागते हो। भागते को मारना पाप है इसलिए अब मैं तो तुम्हें नहीं मारूंगा, परन्तु गौरी तुम्हें अवश्य मारेगी।
शिवजी के ऐसा कहने पर समुद्र-पुत्र जलन्धर क्रोध में अग्नि के समान प्रज्वलित हो उठा। उसने शिवजी पर घोर बाण वर्षा कर पृथ्वी पर अन्धकार कर दिया। तब उस दैत्य की ऐसी चेष्टा देखकर भगवान् शंकर बड़े ही क्रोधित हुए तथा उन्होंने अपने चरणगुपत से बनाए हुए शुदर्शन चक्र को चलाकर उसका सिर काट दिया। एक प्रचण्ड शब्द के साथ उसका सिर पृथ्वी पर गिर पड़ा और महान हाहाकार होने लगा। अन्जन पर्वत के समान उसके शरीर के दो खण्ड हो गए।
उसके रुधिर से संग्राम भूमि व्याप्त हो गई। सारी पृथ्वी विहवल हो गई। शिव आज्ञा से उसका रक्त और मांस महागौरव में जाकर रक्त का कुण्ड हो गया तथा उसके शरीर का तेज निकल कर शंकरजी के शरीर में वैसे ही प्रवेश कर गया जैसे कि वृन्दा का तेज गौरी जी के शरीर में प्रविष्ट हुआ था। जलन्धर को मरा हुआ देख कर देवता, गन्धर्व और सर्व प्रसन्न हो गए।
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इक्कीसवां अध्याय
श्री नारद जी ने कहा- अब ब्रह्मा आदि देवताओं ने नतमस्तक होकर भगवान शंकर की बड़ी स्तुति की और कहा- हे प्रभो ! आप प्रकृति से परे परब्रह्म और परमेश्वर हैं। आप निर्गुण, निर्विकार होकर, सब के ईश्वर होकर भी नित्य प्रकार के करमों को करते हैं।
शंकरजी ! हम सब ब्रह्मा आदि आपके दास हैं। हे देवेश ! हे शिव ! आप प्रसन्न हो हमारी रक्षा कीजिए। हे नाथ ! हम आपकी प्रजा है। तथा सदा आपकी शरण में रहते हैं।
नारदजी कहते हैं- जब इस प्रकार ब्रह्मा आदि सब देवताओं और मुनियों ने शिवजी की अनेक स्तुति करके उनके चरण कमलो का ध्यान करते हुए मौन ग्रहण कर लिया, तब उसे सुनकर देवताओं को वर देकर वे वहीं पर अन्तध्यांन हो गए। तत-पश्चात शिवजी का यश गाते हुए सब देवता भी प्रसन्नता पूर्वक अपने-अपने स्थान को चले गए।
महेशाख्यान से जलन्धर का यह युद्ध बड़ा ही पुण्यप्रद और सब पापों का नाश करने वाला है। यह सर्व सुखदायक और महेश को भी आनन्द दायक है। जो इन दोनों आख्यानों को सुनेगा या पढ़ेगा और पढ़ायेगा। वह यहाँ पर सुखों को भोगकर अन्त में गणेश पद को पावेगा।
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बाईसवां अध्याय
सब के ईश्वर होकर भी नित्य प्रकार के करमों को करते हैं। शंकरजी ! हम सब ब्रह्मा आदि आपके दास हैं।
हे देवेश ! हे शिव ! आप प्रसन्न हो हमारी रक्षा कीजिए। हे नाथ ! हम आपकी प्रजा है तथा सदा आपकी शरण में रहते हैं।
नारदजी कहते हैं- जब इस प्रकार ब्रहा आदि सब देवताओं और मुनियों ने शिवजी की अनेक स्तुति करके उनके चरण कमलले का ध्यान करते हुए मौन ग्रहण कर लिया तब उसे सुनकर देवताओं को वर देकर वह वहीं पर अन्तर्ध्यान हो गए। तत-पश्चात का यश गाते हुए सब देवता भी प्रसन्नता पूर्वक अपने अपने स्थान को चले गए।
ब्रह्मा आदि देवताओं के नेत्र हर्ष से खित गए और उन्होंने शिवजी को प्रणाम करब विष्णु जी का वह सब वृतान्त कह सुनाया जो उन्होंने बड़े प्रयत्न से वृन्दा को मोहित किया था तथा वह अग्नि में प्रवेश कर परमगति को प्राप्त हुई थी। देवताओं ने यह भी कह कि तभी से वृन्दा की सुन्दरता पर मोहि हुए विष्णु उनकी चिता की राख लपे इधर-उधर घूमते हैं। अतएव आप उन समझाइये। क्योंकि यह चराचर प्रकृति सब आपके अधीन है। देवताओं से यह वृतान सुन शंकरजी ने उन्हें अपनी दुस्तर माप समझाई और कहा कि यह सारा जगत उन के अधीन है। उसी से मोहित विष्णु भी का के वश हो गए हैं। परन्तु महादेवी त्रिदेवी की जननी सबसे परे हैं।
यह प्रकृति परम मनोहर और वही गिरजा कहलाती है। अतएव विष्णु का मोह दूर करने के लिए आप सब उनकी शरण मैं जाइये। यदि वह प्रसन्न हो जायेगी तो आपका सब कार्य हो जाएगा। भगवान शंकर की आज्ञा से सब देवता मूल प्रकृति को प्रसन्न करने चले। उनके स्थान पर पहुंचकर उन की बड़ी स्तुति की तब आकाश वाणी हुई-हे देवताओं! मैं तीन प्रकार से तीनों गणों से पृथक हाकर स्थित होती हूं। सत्य गण से गौरी, रजोगुण से ज्योतिरूप हूं। अतएव अब आप लोग मेरी रक्षा से यदि सादर उन देवियों के पास जाओ तो वह तुम्हारे सब मनोरथों को पूर्ण कर देंगी।
यह वाणी सुनकर देवताओं के नेत्र खुल उगए। वह भगवती का आदर करते हुए गौरी, लक्ष्मी और सरस्वती को प्रणाम करने लगे। सब देवताओं ने भक्तिपूर्वक उनका स्मरण किया। सब देविया प्रकट हो गई। सब देवताओं ने प्रसन्न होकर भक्तिपूर्वक अपना निवेदन किया।
देवियों ने कुछ बीज देकर कहा- इन्हें ले जाकर दे दो। तुम्हारे सब कार्य सिद्ध हो जायेंगे। ब्रह्मा आदि देवता उन बीजों को लेकर भगवान विष्णु के पास गए और उन्हें वृन्दा की चिता भूमि में डाल दिया। उससे धात्री, मालती और तुलसी प्रकट हुई। भगवान विष्णु ने ज्योंही उन स्त्री रूप वाली वनस्पतियों को देखा वह उठ बैठे। कामासक्त चित्त से मोहित हो उनसे गचना करने लगे। धात्री और तुलसी उनसे प्रीति की। विष्णु जी सारा दुःख भूलकर देवताओं से नमस्कृत होकर अपने लोक में चले गए। अब वह पूर्ववत् सुखी होकर भगवान शंकर का स्मरण करने लगे। यह आख्यान शिवजी की भक्ति देन वाला है।
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तेइसवां अध्याय
नारदजी ने राजा पृथु से कहा- 'हे राजन ! इसी कारण उद्यापन में तुलसी की जड़ में भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। तुलसी का मूल प्रदेश भगवान 'विष्णु को प्रसन्न करने वाला है। हे राजन! तुलसी का पौधा जिस घर में वर्तमान है वह घर तीर्थ स्वरूप है और उस घर में यम के दूत कभी नहीं आते। सब पापों का नाश करने वाला अभीष्ट फल को देने वाला है। जो मनुष्य तुलसी का ने पौधा लगाता है वह यमराज को नहीं देखता। भगवती नर्मदा का दर्शन, गंगा स्नान व तुलसी के पौधे का संसर्ग यह तीना पुण्यप्रद है। तुलसी का पौधा लगाने से, सीचने से, दर्शन से और तुलसी को छूने से कामिक, वाचिक, मानसिक आदि सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं।
जो प्राणी तुलसी के दल से भगवान शंकर का पूजन करते हैं वह पुनः गर्भ में नहीं जाते। निःसन्देह वे जीवन मुक्त हो जाते हैं। तुलसी के दल में पुष्कर आदि समस्त तीर्थ, गंगा आदि सम्पूर्ण नदियां और विष्णु प्रभृति सब देवता निवास करते हैं। तुलसी के साथ यानी तुलसी के पास अपना प्राण विसर्जन करता है, वह चाह कितना बड़ा पापी क्यों न हो, उसको यमराज नहीं देख सकते। हे राजन! जो लोग तुलसी के काष्ट का चन्दन लगाते हैं वह सहज है मोक्ष को प्राप्त हो जाते हैं। उनके द्वारा गए पाप भी उनके शरीर को स्पर्श नहीं कर पाते। हे राजन! जहां तुलसी के यन छाया हो, वहां पर पितरों के निमित्त दिया हुआ दान सर्वदा के लिए अक्षय होता है। राजन! आंवले के वृक्ष की छाया में जो प्राण पिण्डदान करते हैं उनके पितर यदि नरक की यातना भी भोग रहे हों तो भी मुक्त हो जाते हैं।
सिर, हाथ, मुंह और देह में जो आंवले को धारण करते हैं, उनको विष्णु रूप जानना चाहिए। आंवले के फल और तुलसी के दलों को पानी में मिलाकर जो प्राणी जोमान करते हैं, उनको गंगा स्नान का फल मिलता है। जो मनुष्य आंवले के पत्तों और फलों से देवताओं का पूजन करते हैं उनको स्वर्ण मणि और मोतियों द्वारा पूजन का फल प्राप्त होता है। कार्तिक मास में सब तीर्थ किए रूषि, देवता और सब यज्ञ, जब सूर्य तुला राशि में होता है, आंवले के वृक्ष में वास करते हैं। जो मनुष्य द्वादशी तिथि को तुलसी का दल और कार्तिक में आंवले का पत्ता तोड़ता है वह रौरव नरक में वास करता है। जो कार्तिक में आंवले की छाया में बैठकर नरजन करता है। उसके अन्त-संसर्ग में सब दोष नष्ट हो जाते हैं।
कार्तिक मास में जो आंवले की जड़ में भगवान विष्णु का पूजन करता है, उसको श्री विष्णु क्षेत्रों के पूजन का फल प्राप्त होता है। आंवले तथा तुलसी की महत्ता का वर्णन करने में श्री ब्रह्माजी भी असमर्थ हैं। इसलिए धात्री और तुलसी की जन्मकथा सुनने से मनुष्य अपने वंश सहित मुक्ति प्राप्त करता है।
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चौबीसवां अध्याय
राजा पृथु ने देवर्षि श्री नारद जी से पूछा- नारद जी ! आपने तुलसी के इतिहास, व्रत, महात्म्य के बारे में कहा है। अब यह बताने की कृपा करें की क्या इस कार्तिक मास में और भी देवताओं का पूजन होता है? यह भी मुझे समझा कर कहिए।
श्री नारद जी बोले- 'पहले समय पर्वत के निकट करतीपुर में एक धर्मात्मा धर्मदत्त नामक ब्राह्मण रहता था। वह भगवान विष्णु के सब व्रत करता था और आठों पहर उनकी भक्ति में तल्लीन रहता था। एक दिन कार्तिक मास में वह एक पहर रात शेष रहने पर, जागरण के लिए भगवान विष्णु के मन्दिर में गया। वह हर प्रकार की सामग्री लेकर पूजा करने के लिए जा रहा था कि उसने मार्ग में एक बड़ी भयंकर राक्षसी को देखा, जिसके कि बड़े-बड़े दांत थे। लपलपाती हुई जीभ थी। बड़े-बड़े लाल-लाल नेत्र थे। जिसका शरीर नगा था। मांस रहित था। उस भयंकर राक्षसी को देखकर धर्मदत्त बुरी तरह से कांपने लगा और कुछ उपाय न देखकर उसने पूजा पाली थाली और जल का लोटा उस राक्षसी पर फेंक दिया। क्योंकि उसने भगवद् नाम का जप करते हुए वह सामग्री और जल का लोटा जिसमें कि तुलसीदल पड़ा हुआ था, उसको मारा था, इससे उसके जन्म जन्मान्तर के पाप नष्ट हो गए और उसे अपना पूर्व जन्म स्मरण हो आया।
वह हाथ जोड़कर धर्मदत्त के चरणों में गिर पड़ी और उसने कहा- हे विप्र ! मैं पूर्व जन्म के कर्मों के फल से इस अवस्था को प्राप्त हुई हूं।
नारद जी ने कहा- हे राजन ! उसको इस प्रकार प्रणाम करते देखकर अति विस्मित होकर धर्मदत्त ने पूछा- तेरी यह अवस्था किस कर्म के फल से हुई है। तू पूर्व जन्म में कहां रहती थी और तेरा कैसा चरित्र था, यह सब कुछ तू मुझे बता।
उस राक्षसी ने जिसका नाम कलहा था उसने कहा- 'हे ब्राह्मण ! सौराष्ट्र में भिक्षुक नामक एक ब्राह्मण रहता था। मैं उसकी पत्नी थी। मेरा स्वभाव बड़ा ही निष्ठुर था। मैंने अपने पति का कभी भला न चाहा। न कभी उसे अच्छा भोजन और मिठाई ही खाने को दी। मैं प्रतिदिन उससे लड़ती झगड़ती रहती थी। मुझे इस प्रकार की लड़ाका देखकर तथा नित्य प्रति की कलह से तंग आकर मेरे पति ने दूसरा विवाह करने का निश्चय किया। यह सुनकर कि मेरा पति दूसरा विवाह कर रहा है, मैंने उसके दूसरा विवाह करने से पहले ही विष खाकर आत्म हत्या कर ली।
मेरी मृत्यु के पश्चात यम के दूत आए और मुझे पकड़कर गदा मारते हुए यम के पास ले गए। यमराज ने मुझे देखकर चित्रगुप्त से पूछा- हे चित्रगुप्त ! इसने क्या कर्म किया है। जो भी कर्म इसने किए हैं अब इसको उनका फल भोगना होगा।२
चित्रगुप्त ने यमराज से कहा- 'इसने अपने जीवन में कोई भी अच्छा काम नहीं किया है। यह सदा अपने पति को खराब भोजन देकर आप सदा अच्छा भोजन खाती रही है। इसलिए यह अब विष्ठा खाने वाली होगी। इसको अब सूकरी का जन्म दिया जावे। चूँकि यह अकेली ही पाक के बर्तन में भोजन करती थी। इसलिए यह अपने बच्चों को खाने वाली बिल्ली हो। इसने चूंकि अपने पति पर क्रोध करके आत्मघात किया है। इसलिए यह प्रेत योनि में जाएगी। अब आप इसे अपने दूतों द्वारा मरु स्थान में भेज दीजिए।
यहां पर वह बहुत दिनों तक प्रेत योनि में रहकर फिर यह पापिन अपनी तीनों योनियों को भोगे। हे विप्र ! मैं पांच सौ वर्षों से प्रेत योनि में हूं और भूख प्यास के कारण नित्य दुखी रहती थी कि एक दिन भूख से तंग आकर मैं एक वैश्यं के शरीर में प्रविष्ट हो गई और उसके शरीर द्वारा मैं कृष्णा और वेणि के संगम पर इस देश में आ पहुंची। मैं उस वैश्य के शरीर में रहती थी कि एक दिन भगवान शंकर व विष्णु भगवान ने मुझको बलात उसके शरीर से बाहर निकाल दिया। फिर मुझे आप दिखाई दिए आपके लोटे में से तुलसी जल का एक छींटा मेरे ऊपर पड़ा, जिससे कि मेरे सब पाप नष्ट हो गए। हे द्विजोत्म ! अब आप मुझे यह बतलाइए कि आगे होने वाली तीनों योनियों और इस प्रेत देह से मेरी मुक्ति किस तरह होगी?
धर्मदत्त कलहा की बात सुनकर और उसके पिछले कर्मों और उसकी वर्तमान अवस्था को देखकर बड़ा दुःखी हुआ और उसका दुःख देखकर उसका चित्त पिघल गया। फिर उसने दुखित भाव से कहा-
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पच्चीसवां अध्याय
'तीर्थ, व्रत और दान आदि के करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं' मगर प्रेत योनि में रहने वाले को इसका अधिकार नहीं है। परन्तु तुम्हारे दुःख को देखकर मैं अत्यन्त दुःखी हूं और तुम्हारा दुःख दूर किए बिना मुझे संतोष नहीं होता। तुम्हारे पाप बड़े भारी हैं। क्योंकि यह तीनों योनियां बहुत बड़े पाप करने वालों को ही प्राप्त होती हैं और प्रेत योनि तो थोड़े से पुण्य से नष्ट भी नहीं हो सकती। लेकिन मैं तुम्हें इस योनि से अवश्यमेव छुड़ाऊंगा। इसलिए मैंने जो कार्तिक का व्रत किया है, उसका आधा पुण्य तुम्हें देता हूं। क्योंकि यज्ञ, दान, तीर्थ यह सब निश्चय ही कार्तिक के व्रत के पुण्य' के समान नहीं है।
नारद जी ने कहा- 'हे राजन् ! इतना कहकर धर्मदत्त ने उसको 'ॐ नमो भगवते वासुदेवायः' यह द्वादषाक्षर मन्त्र सुनाया और तुलसी का जल उसके ऊपर छिड़का। बस फिर क्या था, क्षण भर में वह प्रेत योनि से छूटकर प्रज्वलित शिखा के समान दिव्य रूप धारण करके लक्ष्मी के समान सुन्दर हो गई।
तब वह धर्मदत्त को दण्डवत प्रणाम करके प्रसन्नता से गदगद होकर बोली- हे ब्राह्मण! आपके आशीर्वाद से मैं इस घोर नरक में छूट गई हूं। मुझे पाप सागर में डूबती हुई के लिए आप नौका के समान है।
नारद जी ने कहा- 'हे राजन् ! अभी कलहा इस प्रकार कह रही थी कि वहां पर विष्णु गष्ण एक देदीप्यमान विमान लेकर आये। विमान के द्वार पर अप्सराएं और गण बठे हुए थे। धर्मदत्त ने उन सबको देख कर दण्डवत प्रणाम किया। पुण्यशील और सुशील नामक भगवान विष्णु के गणों ने धर्मदत्त को अपने हाथों से ऊपर उठाकर उसका अभिनन्दन करके उन्होंने कहा- हे द्विजश्रेष्ठ ! आप धन्य हैं जो कि आप सदा भगवान विष्णु के व्रत, कथा और सेवा में लगे रहते हैं।
आप सर्वदा दीन दुखियों पर दया करते रहते हैं। आपने जो अपने बाल्यकाल में पवित्र और शुभ कार्तिक व्रत किया था। आपने उसके आधे फल से कलहा के पूर्व जन्म के एकत्रित पाप नष्ट कर दिये हैं। यही नहीं आपकी कृपा से उसके सैकड़ों जन्म के पाप नष्ट हो गए हैं।
आपके जागरण आदि के करने के पुण्य प्रभाव से आकाश मण्डल से यह विमान आया है। हे ब्राह्मण ! अब हम इसे भांति-भांति के भोगों से युक्त वैकुण्ठ में ले जा रहे हैं। आपके दान पुण्य के प्रभाव से कार्तिक व्रत या तुलसी पूजा के प्रभाव से यह अब भगवान विष्णु के निकट रहेगी। आप भी इस जन्म के पश्चात् अपनी दोनों स्त्रियों सहित बैकुण्ठ लोक में भगवान विष्णु के समीप रहोगे और मुक्ति प्राप्त करोगे। हे दयासागर! वह मनुष्य धन्य है और जन्म उन्हीं का फलीभूत है जिन्होंने कि तुम्हारी तरह भगवान विष्णु की भक्ति की है। क्योंकि भगवान विष्णु अपने भक्तों को भला क्या नहीं देते? वह सब कुछ देते हैं जिन्होंने प्राचीन काल में उत्तानपाद के पुत्र को ध्रुव स्थान में पहुंचाया। जिसके स्मरण मात्र से कोई भी नहीं है। हे दयासागर ! तुम धन्य हो क्योंकि तुमने जगदगुरु भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए कार्तिक का व्रत किया है। जिसके आधे पुण्य के फल की भागीदारी इस कलहा को इस समय हम अपने साथ विष्णु लोक ले जा रहे हैं।
नारद जी ने कहा- 'हे राजन्! अभी कलहा इस प्रकार कह रही थी कि वहां पर विष्णु गण एक देदीप्यमान विमान लेकर आये। विमान के द्वार पर अप्सराएं और गण बठे हुए थे। धर्मदत्त ने उन सबको देख कर दण्डवत प्रणाम किया। पुण्यशील और सुशील नामक भगवान विष्णु के गणों ने धर्मदत्त को अपने हाथों से ऊपर उठाकर उसका अभिनन्दन करके उन्होंने कहा-'हे द्विजश्रेष्ठ ! आप धन्य हैं जो कि आप सदा भगवान विष्णु के व्रत, कथा और सेवा में लगे रहते हैं। आप सर्वदा दीन दुखियों पर दया करते रहते हैं। आपने जो अपने बाल्यकाल में पवित्र और शुभ कार्तिक व्रत किया था। आपने उसके आधे फल से कलहा के पूर्व जन्म के एकत्रित पाप नष्ट कर दिये हैं। यही नहीं आपकी कृपा से उसके सैकड़ों कोई भी नहीं है। हे दयासागर! तुम धन्य हो - क्योंकि तुमने जगदगुरु भगवान विष्णु को - प्रसन्न करने के लिए कार्तिक का व्रत किया है। जिसके आधे पुण्य के फल की भागीदारी इस कलहा को इस समय हम अपने साथ विष्णु लोक ले जा रहे हैं।
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छब्बीसवां अध्याय
नारद जी ने कहा- देवगणों के ऐसे वचन - सुनकर धर्मदत्त ने कहा- 'सब मनष्य भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिए विधिवत आराधना, यज्ञ, दान, व्रत, तीर्थ तथा तपस्या आदि करते हैं। किन्तु कोई ऐसा सरल उपाय बताइये कि जिसे करने से इन सबका फल प्राप्त हो ।'
गणों ने कहा- हे दिजश्रेष्ठ ! आपका प्रश्न बड़ा श्रेष्ठ है। हम आपको भगवान विष्णु को शीघ्र प्रसन्न करने का उपाय बताते हैं। हम इतिहास सहित प्राचीन वृतांत सुनाते है। सावधानी से सुनो।
प्राचीन काल में कांचीपुरी में चोल नामक चक्रवती राजा राज्य करता था। उसी के नाम से उसके देश का नाम भी चोल ही प्रसिद्ध था। राजा चोल के राज्य में कोई प्राणी दरिद्र, दुःखी, पापी व रोगी न था। यह सब राजा के यज्ञ करने का प्रभाव था। ताम्रपणीं नदी के दोनों किनारों पर सोने के यज्ञ स्तम्भ सुशोभित थे। हे द्विजवर! एक दिन वह राजा भगवान विष्णु के पास गया. भगवान उस समय शेष शय्या पर योग निद्रा वश सो रहे थे। राजा ने उनकी मणियां मोतियों और स्वर्ण के दिव्य फलों फूलो द्वारा पूजा की। यह साष्टांग प्रणाम करके भगवान के चरणों के पास ही बैठ गया।
थोड़ी देर के बाद राजा ने अपनी नगरी कांचीपुरी के ब्राह्मण विष्णुदास को वहां आते हुए देखा। विष्णुदास भगवान की पूजा के लिए तुलसी दल और जल लिए हुए था। विष्णु दास ने व्हां आकर भगवान को विष्णु सूक्त मंत्रों द्वारा स्नान करवाकर मन्जरी तथा दलों से उनका विधि पूर्वक पूजन किया। विष्णुदास के चढ़ाये हुए दलों से राजा के चढ़ाए हुए नणि मोती व स्वर्ण के फूल ढक गए। राजा यह देख कर क्रोध में भरकर बोला- ढोंगी मूर्ख! तूने मेरी चढ़ाई हुई मणियों, तियों व सोने के फूलों को तुलसी दल य अपने सादे फूलों से ढक दिया है। तू बेचारा लाभक्ति करना क्या जाने? तूने मेरे किए विचित्र श्रृंगार को बिगाड़ दिया है। राजा बात सुनकर विष्णुदास को भी क्रोथ चढ़ आया और वह राजा के गौरव को तुच्छ समझकर कहने लगा- हे राजन्! तुम भक्ति करना नहीं जानते तुमको अपने धन का घमण्ड है। बताओ आज. से पहले तुमने भगवान के कितने व्रत किए हैं?
देवगण ने कहा- ब्राह्मण के ऐसे वचन सुनकर राजा न धमण्ड से हंसकर कहा- हे विप्र ! भगवान की भक्ति के अभिमान से यदि तू ऐसी बात कह रहा है तो मैं पूछता कि तेरे जैसे भिखमंगे ब्राह्मण में भगवान की भक्ति ही कितनी है? क्योंकि तुमने आज तक भगवान की प्रसन्नता के लिए कुछ भी नहीं किया। न तो कोई मन्दिर ही बनवाया है, तो तुम भला इस प्रकार की भक्ति का जैसी कि तुम कर रहे हो क्या गर्व कर सकते हो? यहां जितने भी ब्राह्मण बैठे हैं।
मेरी बात को ध्यानपूर्वक सुनें और देखें कि भगवान विष्णु के दर्शन मुझे होते हैं या कि उसे। इसके बाद दोनों की भक्ति के सम्बन्ध में आप लोग जान लेंगे। देवगण ने कहा-ऐसा कहकर राजा अपने महल में चला गया और वहां जाकर उसने अपने पुरोहित मुद्गल को आचार्य बनाकर विष्णु यज्ञ आरम्भकिया। उसने उस यज्ञ में अनेकों ऋषि-महर्षियों को बुलाया। उन को बहुत सा अनाज और नकदी आदि दक्षिणा दी। जो यज्ञ पहले ब्रह्माजी ने गया में किया था वही यज्ञ राजा चोल ने अपनी नगरी चोल में क्रियाः। विष्णु दास भी अपने मन्दिर में ही रहकर भगवान की प्रसन्नता के लिए व्रत करने लगा। उसने माघ तथा कार्तिक मास की के व्रत किए।
तुलसी के वन की और एकादशी को भगवान विष्ण के द्वादश-अक्षर मन्त्र का जाप किया। वह न करने के लिए गीत गाता रलव नृत्य करता रहा। नित्य प्रति व्रत करता। भूमि पर सोता। हर समय भगवान विष्णु का स्मरण करता और सब प्राणियों में समदृष्टि से भगवान को ही देखता था। उसने भगवान को प्रसन्न करने के लिए माघ तथा कार्तिक के व्रत भी किए और उन व्रतों के नियमों का पालन भी किया। और उद्यापन भी किया। और इस प्रकार राजा चोल और विष्णुदास द्वारा दोनों को आराधना करते हुए बहुत दिन बीत गए।
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सत्ताईसवां अध्याय
गणों ने कहा- विष्णुदास एक दिन भोजन तयार करके भक्ति में तल्लीन था कि कोई उनका भोजन चुरा कर ले गया। लेकिन सायंकाल की आराधना हो सक आऔर प्र भंग न हो। इसलिए उसने उस दिन दोबार भोजन तैयार नहीं किया।
श्री नारदजी ने कहा- हे राजन् ! इस तरह लगातार सात दिन तक कोई दूसरा भोजन चुराता रहा तब वह हैरान होकर सोचने लगा कि यह तो बड़ी विचित्र घटना है कि न जाने कौन हर रोज मेरे भोजन को चुरा कर ले जाता है। फिर भी इस देव स्थान को छोड़ना नहीं चाहिए। अगर मैं भोजन बनाकर खा लेता हूं तो देर हो जाएगी और पूजा छूट जाएगी। अतः मुझे भोजन बनाकर तुरन्त खाना नहीं चाहिए। बिना भगवान को भोग लगाने के वैष्णवों को भोजन नहीं कराना चाहिए। अमर सात दिन बिन भोजन के बीत तो आज का एक दिन और सही। आज मैं भली भांति भोजन की रक्षा करूंगा और देखूंगा कि हर रोज इ चुराकर ले जाता है।
ऐसा सोच विष्णुदास भोजन के पास ही छिपकर बैठ गया। उसने थोड़ी देर के बाद देखा कि वहां पर एक चाण्डाल आया जिस का शरीर अत्यन्त दुर्बल था। उसके शरीर पर केवल चमड़ी-ही-चमड़ी दिखाई देती थी। जब वह चाण्डाल भोजन चुराकर चल दिया तो विष्णुदास ने उसे पुकारा- हे भाई! यह रूखा भोजन ले जाकर क्या करोगे घी भी लेते जाओ।
ऐसे कहकर वह श्रेष्ठ ब्राह्मण आगे को बढ़ा, विष्णुदास को अपनी ओर आते देखकर वह चाण्डाल तेजी से दौड़ने लगा। वह ब्राह्मण से डर गया। लेकिन निर्बलता के कारण दौड़ भी तो न सकता था, अतः वह भूमि पर गिर पड़ा और मूर्छित हो गया।
चाण्डाल को मूर्छित देखकर विष्णुदास लपक कर उसके पास पहुंचा और अपने वस्त्र से उस पर हवा करने लगा। और इसके बाद उसने जो कुछ देखा उसे देखकर वह आश्चर्य चकित रह गया। उसने देखा कि उसके सम्मुख शंख, चक्र, गदा, पदम, पीताम्बर धारी चतुर्भुजी रूप, अलसी के फूल के समान वाले छाती में कौस्तुभ माला से सुशोभित साक्षात श्री भगवान विष्णु खड़े हैं। भगगन का दर्शन करके सात्विक भाव से मुक्त्त वह श्रेष्ठ ब्राह्मण उनकी स्तुति तथा प्रणाम कुछ भी न कर सका।
वहीं पर सब इन्द्र आदि देवता भी उपस्थित हो गए। और गन्धर्व तथा अप्सराएं आकर गीत गान करने लगी तथा नृत्य करने लगी। ब्राह्मण उन्हें प्रणाम करने के लिए ज्योही उतावला हुआ, त्योंहि वहां सम्पूर्ण देव, गन्धर्व और अप्सराएं आ गई। नृत्य संगीत होने लगे। विष्णु भगवान ने अपना स्वरूप ब्राह्मण को प्रगट कर उसका आलिंगन किया और दिव्य विमान में बैठाकर उसे बैकुण्ठ ले गए।
दिव्य विमान में ब्राह्मण को विष्णु के साथ जाते हुए चोल राजा ने भी देखा उसने अपने गुरु आचार्य मुगदल को कहा कि मैंने जो यज्ञादि किए हैं, वे सब व्यर्थ हुए। जितनी दान दक्षिणा मैंने ब्राह्मणों को दी वह असफल हुई। विष्णु भगवान के दर्शन नहीं हुए। विष्णुदास ब्राह्मण ने केवल श्रद्धा से भक्ति की, उसके प्रभाव से विष्णु भगवान ने आकर उसको दर्शन दिए। इसलिए भक्ति ही सर्वोपरि है। मुझे विष्णु भगवान के दर्शन के लिए राज-काज त्याग कर भक्ति करनी चाहिए।
राजा के कोई पुत्र न होने के कारण उसने भानजे को राजगद्दी का अधिकारी बना दिया और आप विष्णु भगवान की भक्ति करने लगा। बहुत काल तक भक्ति करने के बाद भी विष्णु ने दर्शन नहीं दिए तो वह अग्नि कुण्ड में कूद पड़ा। अग्नि में प्रगट होकर विष्णु भगवान ने राजा को गोदी में उठा लिया और कहा कि मैं तेरे त्याग और भक्ति से बहुत प्रसन्न हूं। उसका आलिंगन करके उसको दिव्य विमान में अपने साथ बिठाकर बैकुण्ठ लोक में ले गए। भगवान विष्णु ने अपने समान रूप वाले ब्राह्मण को पुण्यशील और राजा चोल को सुशील नाम देकर दोनों को अपना द्वारपाल बनाया।
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अट्ठाईसवां अध्याय
धर्मदत्त ने पूछा- हे देवगण! जय और विजय ने अपने पूर्व जन्म में ऐसा कौनसा पुण्य किया था जिससे भगवान विष्णु का रूप धारण करके वह उनके द्वारपाल हुए?
गणों ने कहा- प्राचीन काल में तृणबिन्दु की पुत्री देवहुतों से कर्दम ऋषि द्वारा केवल देखने मात्र से ही दो सुन्दर बालक उत्पन्न हुए। उनमें से बड़े का नाम जय और छोटे का नाम अजय हुआ। बाद में देवहुति के गर्भसे कपिल देव जी भी हुए। जय और अजय दोनों ही भगवान विष्णु के बड़े भक्त और धमर्मात्मा थे। दोनों ही नित्यप्रति अष्टाक्षर मंत्र का जाप करते थे ओ भगवान विष्णु कः वत करते थे। भगवान भी इन दोनों भाइयों पर अत्यन्त प्रसन्न थे। और नित्य पूजा के समय इनको दर्शन दिया करते थे।
एक समय राजा के निमंत्रण पर देवर्षि नारच गणों हिल राजा के यज्ञ में पधारे। उस यज्ञ में जय ने बह्या और अजय ने पुरोहित बनकर यज्ञ को सम्पूर्ण करवाया। यज्ञ की विधिपूर्वक समाप्ति हुई। मरुत राजा ने जय और अजय को बहुत सा धन दिया। वह दक्षिणा लेकर दोनों भाई अपने आश्रम में वापिस आये। धन का बंटवारा करते समय दोनों भाइयों का आपस में झगड़ा हो गया। जय ने अजय से कहा कि धन के दो बराबर-बराबर भाग होने चाहिए। अजय ने कहा-नहीं जितना धन जिसको मिला है। उतना धन उसका ही है। तब जय ने क्रोध में भरकर अजय को शाप दिया।
तुम धन लेकर नहीं देना चाहते हो इसलिए तुम ग्रह हो जाओ।
अजय ने जय का दिया हुआ श्राप स्वीकार कर लिया और जय को श्राप दिया। तू अभिमानी है इसलिए तू हाथी हो जा।
और जब नियमपूर्वक दोनों की पूजा के समय भगवान उनको दर्शन देने के लिए आए तो दोनों ने भगवान से श्राप मोचन का उपाय पूछा दोनों ने प्रभु से कहा- हे देव! हम दोनों आपके भक्त हैं। मगर हम हाथी की योनि में कैसे होंगे? हे कृपासागर श्राप से हमारा उद्धार कीजिए।
भगवान विष्णु ने कहा-मेरे भक्तों की वाणी भी कभी असत्य न होगी। यमराज भी इसको अन्यथा नहीं कर सकते। पूर्व काल में मुझे भक्तराज प्रहलाद के कहने पर स्तम्भसे प्रगट होना पड़ा था और राजा अम्बरीष के कहने पर दस अवतार लेने पड़े थे। अतएव तुम दोनों अपने श्रापों को भोगकर फिर मेरे लोक को प्राप्त होवोगे।
इतना कहकर भगवान विष्णु अर्ध्यान हो गए। गणों ने कहा तब वह दोनों गण्डकी नदी के किनारे मगर और हाथी हुए। जाति स्मरण रहने के कारण इस योनि में भी भगवान विष्णु का व्रत नियम पूर्वक किया करते थे।
एक दिन कार्तिक की पूर्णमासी को वह हाथी स्नान के लिए गण्डकी नदी में गया। तब पिछले जन्म का श्राप रस्मरण करके मगर ने हाथी पकड़ लिया। मगर के पकड़े हुए हाथी ने भी भगवान विष्णु का स्मरण किया। फिर क्या था, तुरन्त ही शंख, चक्र, गदा, पदमधारी भगवान ने अपने सुदर्शन वक्र द्वारा उन दोनों मगर और हाथी का उद्धार किया और उन दोनों को अपने जैसा रूप देकर भगवान उन्हें बैकुण्ठ में ले गए। उसी दिन से उस स्थान का नाम हरिक्षेत्र प्रसिद्ध है।
चक्र के आघात से वहां के पत्थरों में भी चिन्ह बने हुए हैं। वह दोनों भी जय और जय के नाम से आज तक संसार में प्रसिद्ध हैं।
हे ब्राह्मणो आपने विष्णु के द्वारपालों के सम्बन्ध में जो प्रश्न किया था उसका विस्तृत उत्तर मैंने दे दिया है। इसलिए है द्विज! तुम भी ईर्ष्या और द्वेष को त्याग कर नित्य भगवान विष्णु का व्रत करो। जगत के प्रत्येक जीव को सम दृष्टि से देखो तुला, मकर और मेष की संक्रांति में नित्य प्रातः स्नान किया करो। एकादशी व्रत किया करो। तुलसी वन की रक्षा किया करो। गौ, ब्राह्मण, वैष्णवों की सेवा के लिए हर समय तैयार रहा करो। व्रत करने वालों को मसूर, कांची बैगन के साग का कदापि प्रयोग नहीं करना चाहिए।
हे धर्मदत्त ! ऐसा करने पर तुम शरीर त्याग के पश्चात् हम लोगों के समान गति पाओगे। भगवान विष्णु को प्रसन्न करने वाले इस व्रत के समान फल देने वाला तीर्थ, दान और यज्ञ दूसरा और कोई नहीं है।
हे विप्र ! तुम धन्य हो। क्योंकि तुमने विष्णु भगवान को प्रसन्न करने वाला व्रत किया है और जिसका आधा फल तुमने इस 'कलहा को दिया है। उसके फलस्वरूप हम कलहा को बैकुण्ठ में लिए जा रहे हैं।
नारद जी ने राजा पृथु से कहा-राजन् ! इस प्रकार धर्मदत्त को विष्णु भक्ति का उपदेश देकर कलहा को साथ लेकर, विष्णु के पार्षद, बैकुण्ठ को चले गए। धर्मदत्त भी उनके आदेशानुसार भगवान विष्णु के व्रत में तल्लीन हो गया और फिर जब उसका देहान्त हुआ तो अपनी दोनों स्त्रियों के साथ विष्णु लोक को गया। हे राजन् ! जो कोई भी प्राचीन काल के इस इतिहास को सुनता है. और सुनाता है वह अन्त में विष्णु लोक को प्राप्त होता है।
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उन्नतीसवां अध्याय
राजा पृथु ने कहा- हे नारदजी ! आपने कृष्णा और वेणी नदी के तट पर, बनिए और कलहा ने जिस प्रकार मुक्ति पाई वह सारी कथा हमको सुनाई है मैंने भली प्रकार सुनी है। देवर्षि यह कार्य उन दोनों नदियों के प्रभाव से हुआ था या इस क्षेत्र के प्रभाव से हुआ था कृपा करके मुझे यह बताने की कृपा कीजिए। क्योंकि मुझे सन्देह है।
देवर्षि नारद बोले- कृष्णा नदी साक्षात भगवान श्री कृष्णचन्द्रजी महाराज का शरीर और बेणी नाम वाली नदी भगवान शंकर का शरीर है। इन दोनों नदियों के संगम का महात्म्य श्री ब्रह्माजी भी वर्णन करने में असमर्थ हैं। फिर भी चूंकि आपने पूछा है अतएव मैं आपको इनकी उत्पत्ति का वृतांत सुनाऊंगा। ध्यानपूर्वक सुनिए।
चाक्षुक मन्वन्तर के आरम्भ में श्री ब्रह्माजी ने सह्य पर्वत के शिखर पर यज्ञ करने का निश्चय किया। वह सब देवताओं, भगवान विष्णु, भगवान शंकर और यज्ञ की सारी सामग्री लेकर उस पर्वत के शिखर पर गए। तब महर्षि भृगु आदि ऋषियों ने ब्रह्म मुहुर्त में उन्हें दीक्षा देने का विचार किया। इसके उन्होंने श्री ब्रह्माजी की पत्नी स्वरा को बुलवा भेजा। वह बड़ी आहिस्ता आहिस्ता जा रही थी। इस बीच में श्री भृगु जी ने भगवान विष्णु से पूछा- हे प्रभो! आपने स्वरा को शीघ्रता से बुलाया था, वह क्यों नहीं आई? यदि ब्रह्म मुहुर्त टल गया तो फिर दीक्षा का कार्य कैसे होगा।
इस पर भगवान विष्णु ने कहा- यदि स्वरा यथा समय यहां पर न आई तो आप गायत्री को ही स्त्री मानकर दीक्षा विधान कर दीजिएगा। क्या गायत्री पुण्यमयी ब्रह्मा जी की स्त्री नहीं हो सकती?
नारद जी बोले- भगवान विष्णु ने भगवान शंकर की बात का समर्थन किया। यह बात सुनकर भृगुजी ने गायत्री को श्री ब्रह्मा जी के दाई ओर बिठाकर दीक्षा विधान आरम्भकर दिया। ऋषि मण्डल गायत्री को दीक्षा दे ही रहा था कि इतने में स्वरा भी यज्ञ-मण्डप में आ पहुंची। श्री ब्रह्मा जी के पहलू में गायत्री को देखकर ईर्ष्या से क्रोध करके कहने लगी।
स्वरा ने कहा- जहां अपूज्यों की पूजा होती है और पूज्यों की अप्रतिष्ठा होती है। वहां पर दुर्भिक्ष, मृत्यु तथा भय तीनों अवश्यमेव हुआ करते हैं। यह गायत्री जी श्री ब्रह्माजी की दाई ओर तथा मेरे स्थान पर बैठी है। यह अदृश्य बहने वाली नदी होगी। आप लोगों ने अविचार से,
इसे जा मेरे स्थान पर बैठाया है अतः आप भी सबके सब जड़ रूप नदियां होंगे।
नारदजी ने महाराजा पृथु से कहा-हे राजन्! इस प्रकार स्वरा के शाप को सुनकर, गायत्री मारे क्रोध के लाल भभूका होकर अपने होंठ काटने लगी। देवताओं के मना करने भी उसने उठकर स्वरा को श्राप दे डाला। गायत्री ने कहा-
'ब्रह्माजी जैसे तुम्हारे पति हैं वैसे ही मेरे भी पति हैं। तुमने व्यर्थ ही श्राप दिया है।
अतएव तुम भी नदी हो जाओ।'
नारदजी ने कहा- तब तो देवताओं में खलबली सी मच गई। वह स्वरा को दण्डवत प्रणाम करके कहने लगे- हे देवी! तुमने जो ब्रह्मा आदि सब देवताओं को शाप दिया है इससे यदि हम सब जड़ रूप नदियां हो जाएंगे, तो फिर निश्चय ही यह तीनों लोक नष्ट हो जाएंगे। क्योंकि यह शाप तुमने बिना विचारे दिया है। अतएव तुम इसको वापस ले लो।
स्वरा ने कहा-हे देवतागण ! चूंकि आपने यज्ञ के आरम्भ में गणेश पूजन नहीं किया है. इसलिए यह विघ्न उपस्थित हो गया है। मेरा यह शाप कभी खाली नहीं जा सकता। इसलिए आप सब अपने-अपने अंशों से जड़ीभूत होकर अवश्यमेव नदियां बनोगे। हम दोनों सौतें भी अपने-अपने अंशों से पश्चिम में बहने वाली नदियां बनेंगी।
देवर्षि नारद जी ने राजा पृथु से कहा-स्वरा के यह वचन सुनकर सभी देवता विष्णु शंकर आदि अपने-अपने अंशों से नदिय बन गए। भगवान विष्णु के अंश से कृष्णा भगवान शंकर के अंश से वेणी तथा ब्रह्माजी के अंश से ककुदमवती नाम वाली
नदियां उत्पन्न हो गई। सभी देवताओं ने अपने अंशों को जड़ बनाकर वहीं सह्य पर्वत पर फेंक दिया। फिर उन लोगों के अंश अलग-अलग नदियों के रूप में बहने लगे। देवताओं के अंशों से पूर्व वाहिनी तथा उनकी स्त्रियों के अंशों से सैंकड़ों व हजारों की संख्या में पश्चिम वाहिनी नदियां उत्पन्न हो गई।। गायत्री और स्वरा दोनों पश्चिम वाहिनी नदियां होकर एक साथ बहने लगीं। दोनों का नाम सावित्री पड़ा। श्री ब्रह्माजी ने उस यज्ञ स्थल पर भगवान विष्णु और भगवान शंकर की स्थापना की। दोनों देवता महाबल तथा अतिबल के नाम से विख्यात हुए।
हे राजन् ! कृष्णा और वेणी नदी की उत्पत्ति का वर्णन जो मनुष्य सुनेगा उसको दर्शन व स्नान का फल प्राप्त होगा।
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तीसवां अध्याय
भगवान् श्रीकृष्ण चन्द्र जी महाराज ने कहा- हे प्रिय ! नारद जी के वचन सुनकर महाराजा पृथु बड़े विस्मित हुए। अन्त में उन्होंने नारद जी का पूजन करके उनको विदा किया। इसी कारण माघ, कार्तिक और एकादशी यह तीन व्रत मुझे अत्याधिक प्रिय हैं। वनस्पतियों में तुलसी, महीनों में कार्तिक, तिथियों में एकादशी और क्षेत्रों में श्री द्वारका जी मुझे बहुत प्रिय हैं। जो प्राणी जितेन्द्रिय होकर इनका सेवन करता है, वह यज्ञ करने वाले प्राणियों से भी मुझे अधिक प्रिय होता है। जो प्राणी विधि-विधान से इनकी सेवा करते हैं। उनके अनुग्रह से सभी पाप दूर हो जाते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण चन्द्र जी महाराज के वचन सुनकर सत्यभामा ने कहा- हे नाथ! आपने यह बात बड़ी आश्चर्य जनक कही है कि दूसरे के लिए पुण्य फल से कलहा की मुक्ति हो गई। यह प्रभावशाली कार्तिक मास आपको अत्यधिक प्रिय है कि जिसे पति द्रोह का पाप केवल स्नान के पुण्य से ही नष्ट हो गया, दूसरे प्राणी द्वारा किया हुआ पुण्य उनके देने से कैसे मिल जाता है? यह आप मुझे बतलाइये।
इस पर भगवान् श्रीकृष्ण चन्द्रजी महाराज ने कहा- बिना दिया हुआ पुण्य और पाप जिस कर्म द्वारा मिलता है सो सुना- सतयुग में देश ग्राम तथा कुलों का दिया पुण्य या पाप मिलता था, किन्तु कलयुग में केवल कर्त्ता को ही पाप और पुण्य का फल भोगना पड़ता है।
संसर्ग न करने पर भी यह व्यवस्था कही गई और संसर्ग जैसे पाप पुण्य दूसरे को कैसे मिलते हैं उसकी व्यवस्था भी सुनो- पढ़ाना, यज्ञ कराना और एक साथ भोजन करने से पाप पुण्य का आधा फल मिलता है। एक आसन पर बैठने तथा एक सवारी चढ़ने से स्वांस के आने-जाने से पुण्य व पाप का चौथा भाग प्राणी मात्र को मिलता है। स्पर्श करने, भोजन करने और दूसरे की स्तुति करने से पुण्य और पाप का छटवा भाग मिलता है।
दर्शन करने, सुनने तथा ध्यान करने से मनुष्य को पुण्य और पाप का दसवां अंश मिलता है। दूसरे की निन्दा चुगली और धिक्कार करने से उसका सौवा भाग मिलता है। पुण्य करने वाले मनुष्यों की जो कोई सेवा करता है, वह सेवा का भाग लेता है और अपना पुण्य उसे देता है, स्त्री नौकर और शिष्य के अतिरिक्त जो मनुष्णा दूसरे से सेवा करवा कर उसको पैसा नहीं देता तो वह सेवक उसके पुण्य का भागी होता है। पंक्ति में बैठे हुए भोजन करने वालों की पत्तल जो व्यक्ति लांघता है, वह उसको, जिसकी कि पत्तल उसने लांघी है। अपने पुण्य का छटवां भाग देता है। स्नान तथा ध्यान आदि करते हुए मनुष्य से जो व्यक्ति बातचीत करता है या उसे स्पर्श करता है वह अपने पुण्य का छटवां भाग उसे दे डालता है। जो मनुष्य धर्म के कार्य के लिए दूसरों के लिए धन मांगता है वह पुण्य का भागी होता है। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार दान करने वाला पुण्य का भागी होता है। जो मनुष्य धर्म का उपदेश करता है पश्चात से श्रोता से याचना करता है वह अपने पुण्य का छटा भाग उसे देता है। जो मनुष्य दूसरों का धन चुराकर उससे धर्म करता है, वह चोरी के पाप का फल भोगता है और शीघ्र ही निर्धन हो जाता है और जितना धन चुराता है वह पुण्य का भागी होता है।
बिना ऋण के उतरे जो मनुष्य मर जाते है उनको ऋण देनेवाले सज्जन पुण्य के भागी होते हैं। शिक्षा देने वाला, सलाह देनेवाला, सामग्री को जुटानेवाला तथा प्रेरणा देनेवाला यह सब पाप और पुण्य के छटे भाग को प्राप्त, करते हैं। राजा प्रजा के पाप पुण्य के षष्ट अंश का भागी होता है। गुरु शिष्यों का, पति-पत्नी का, पिता-पुत्र का, स्त्री-पति के किए हुए पुण्य का छटा भाग पाती है। पति को प्रसन्न रखनेवाली आज्ञाकारिणी स्त्री पति के किए हुए पुण्य का आधा हिस्सा लेती है।
जो पुण्य आत्मा पराए लागों को दान करता है, वह उनके पुण्य का छटा भाग प्राप्त करता है। जीविका देनेवाला मनुष्य जीविका ग्रहण करनेवाले मनुष्य के पुण्य के छटवे भाग को प्राप्त करता है। इस प्रकार दूसरों के किए हुए पुण्य अथवा पाप बिना देने के भी दूसरे को मिल सकते है। किन्तु यह नियम जो कि मैंने बतलाए हैं कलयुग में लागू नहीं होते। कलयुग में तो एकमात्र कर्ता को ही अपने पाप व पुण्य भोगने पड़ते हैं। इस सम्बन्ध में एक बड़ा पुराना इतिहास जो कि पवित्र भी है और बुद्धि का देनेवाला भी, कहता हूं ध्यान पूर्वक सुनो।
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इक्तीसवां अध्याय
भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रजी महाराज ने कहा- पहले उज्जैन में एक महापापी और दुरात्मा धनेश्वर नामक ब्राह्मण रहता था। वह रस, चमड़ा और कम्बल आदि का व्यापार करता था। वैश्यागामी था और मद्यपान आदि बुरे कर्म किया करता था।
चूंकि वह दिन रात पाप में रत रहता था इसलिए उस व्यापार के लिए वह नगर-नगर घूमता था। वह एक दिन माहिस्यमती पुरी में जा पहुंचा। माहिस्यमती पुरी चूंकि राजा माहिष ने बसाई थी इसलिए बस राजा के नाम पर ही विख्यात थी। नगरी के पास ही पाप नाशिनी पुन्यकारिणी भगवती नर्मदा बहती थी। उस नदी के किनारे देश-देशान्तर से आए हुए यात्री कार्तिक व्रत करने के लिए कुछ दिनों के लिए ठहरा करते थे। उन कार्तिक व्रत करने वाले प्राणियों को वहां ठहरा देखकर वह दुष्ट धनेश्वर भी इधर-उधर व्यापार करता हुआ एक मास के लिए वहां ठहर गया। अपने माल को बेचता हुआ वह नर्मदा नदी के तट पर घूमता हुआ ब्राह्मणों को देव पूजा में अक्सर लगा हुआ वह देखता कि कोई तो पुराण पढ़ रहा है और कोई सुन रहा है, कोई भगवद् कीर्तन कर रहा है, कोई भजन सुन रहा है, कोई ध्यान में लीन है। और कोई तुलसी की माला धारण किए हुए है।
बस इसी तरह वह भगवद भक्तों के बीच में रहा और वैष्णवों के दर्शन करता रहा, उनको स्पर्श करता रहा, उनसे वार्तालाप करता रहा, और भगवान् विष्णु के नाम स्मरण के पुण्य को अर्जित करता रहा। वह कार्तिक के व्रत की उद्यापन विधि तथा जागरण को भी देखता रहा। उसने पूर्णिमा को देखा कि व्रती ब्राह्मणों तथा गऊओं को भोजन करवा रहे हैं और उनको दक्षिणा आदि भी दे रहे हैं। उसने नित्य प्रति भगवान् शंकर की प्रसन्नता के लिए होती दीपमाला भी देखी, त्रिपुर नामक राक्षस के तीनों पुरों को भगवान् शंकर ने इसी तिथि को जलाया था। इसी कारण:
भगवान् शिव के भक्त इस तिथि को दीप उत्सव मनाते हैं। जो मनुष्य मुझमें और भगवान् शंकर में अन्तर मानता है उसकी सम्पूर्ण क्रिया निष्फल हो जाती है। धनेश्वर वहां की पूजा विधि देखता हुआ, इधर-उधर घूम रहा था, कि उसे एक काले सर्प ने काट लिया और वह भूमि पर गिर पड़ा। उसकी यह दशा देखकर वहां के दयालु भक्तों ने उसको चहुं ओर से घेर लिया और उसके मुंह पर तुलसी दल मिश्रत जल के छींटे देने लगे। और जब उसके प्राण निकले तो यम के दूत उसे बांधकर कोड़ों से मारते हुए यमपुरी को ले गए।
उसे देखकर चित्रगुप्त ने यम से कहा- इसने बाल्यकाल से लेकर आज तक बुरे काम ही किए हैं। इसके जीवन में पुन्य तो लेशमात्र भी दिखाई नहीं देता। यदि मैं पूरा एक वर्ष आपको सुनाता रहूं तो भी इसके पापों की सूची समाप्त नहीं होगी। यह महापापी है। अतः इसको एक कल्प एक घोर नर्क में गलना चाहिए।
चित्रगुप्त की बात सुनकर यमराज ने बड़े क्रोध में भरकर उसको अपना कालनेम के समान भयंकर रूप दिखाते हुए अपने अनुचरों को आज्ञा दी, उसने कहा- हे प्रेत सनापतियों ! इस दुष्ट मूर्ति को मुगदरों से मारते हुए कुम्भीपाक नर्क में फेंक दो।
भगवान् श्रीकृष्ण चन्द्र जी महाराज ने कहा- यह सुनकर प्रेत सेनापति ने मुगदरों से उसका सिर तोड़ते हुए, कुम्भीपाक नर्क में ले जाकर खौलते हुए तेल की कढ़ाही में छोड़ दिया। प्रेत सेनापतियों ने ज्यों ही उसे तेल की कढ़ाही में फेंका त्यों ही लपलपाती हुई आग अपने आप ठण्डी हो गई। जैसे कि प्रहलाद को अग्नि में डालनें से वह अग्नि ठण्डी हो गई थी। यह विचित्र घटना देख कर प्रेत सेनापत्तियों ने यमराज के पास जाकर सारा वृतान्त कहा। यमराज भी सारा हाल सुनकर आश्चर्य चकित रह गए और धनेश्वर को अपने पास बुलाकर स्थिति पर विचार करने लगे।
उसी समय 'नारायण नारायण, का किर्तन करते हुए देवर्षि नारख भी वहां आ पहुंचे। और यमराज से कहने लगे- हे अरुण नन्दन यमराज ! यह ब्राह्मण नक में डाले जाने के योग्य नहीं है। क्योंकि इसन अन्त समय में कुछ शुभ कर्म किए हैं जो जि नर्क यातना को नष्ट करने वाले हैं। लोग भगवद-भक्तों का दर्शन करते हैं, उनत वार्तालाप करते हैं और उनका स्पर्श करते हैं। चाहे उन्होंने कोई पुन्य कर्म न किया हो, सहज स्वर्ग के अधिकारी हो जाते हैं। अतः धनेश्वर भी पुण्यात्माओं के संग व स्पर्श से स्वर्ग का अधिकारी हो गया है। अतएव यह पुण्यात्मा है। इसे यक्ष योनि दो और केवल इसे पाप-भोग करने वाले नरक दिखा दो।
तो धनेश्वर को पुण्य-आत्सा समझते हुए, यमराज ने दूतों को उसे नर्क दिखाने की भगवान् श्रीकृष्ण चन्द्रजी महाराज ने कहा-जब देवर्षि नारद ऐसा कह कर चले गए आज्ञा दी।
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बत्तीसवां अध्याय
भगवान् श्रीकृष्ण चन्द्रजी महाराज ने कहा-प्रेतपति यमराज की आज्ञा से धनेश्वर को नरकों के पास ले गया और उनको दिखाता हुआ कहने लगा- हे धनेश्वर ! इन भयंकर नरकों को देखो
जिनमें कि पापियों को यम के दूत सदा ही दुःख देते रहते हैं। यह देखो यह तप्तवाचुक नामक भयंकर नरक है। जिसमें देह जलने के कारण पापी विलाप कर रहे हैं। भोजन के समय जो प्राणी भूखों को भोजन नहीं देते, वह बार-बार नरक में डाले जाते हैं। वह मनुष्य जो गुरु, अग्नि, ब्राह्मण, गौ, वेद और राजा इनको लात मारते हैं, उनके पर भयंकर नरक में जलाए जाते हैं। यह छः प्रकार के नरक अतिशय पापों के करने पर मिलते हैं।
सब देखो यह दूसरा अन्धकमिश्र नामक तमोत नामक कीड़े इन पापियों को काट रहे नर्क है। हे ब्राह्मण सुई की भांति मुख वाले हैं। इस नरक में दूसरों का दिल दुखाने वाले पापी गिराये जाते हैं।
अब यह तीसरा क्रकय नामक भयंकर नरक देखो। इस नरक में पापी आरे से चीरे जाते हैं। यह नरक भी असिमंत्रवण आदि भेदों से छः प्रकार का है। इसतें स्त्री तथा पुत्रों में वियोग कराने वाले प्राणियों को कढ़ाई में पकाया जाता है। दो प्रियजनों का विछोह कराने वाले प्राणी भी यहां असिमन्त्र सभी तलवार की धार से काटे जाते हैं। और कुछ भेड़ियों के डर से भाग जाते हैं।
अब तुम यह चौथा नरक देखो। इसका नाम अर्गल है। इसमें पापी लोग जोर-जोर से चिल्लाते हुए इधर-उधर भाग रहे हैं। इधर नाना प्रकार के सांपों को यमदूत पापियों पर चढ़ा रहे हैं यह नर्क भी वध आदि भेदों से छः प्रकार का है।
पांचवां नरक है। जिसमें कि समेट कर लाए और यह देखो यह कूटशाल्यलि नामक अंगारों की भांति कष्ट देने वाले बड़े-बड़े कांटे लग रहे हैं। यह भी यातना आदि के भेदों से छः प्रकार का है। पर स्त्री गमन करने वाले प्राणी इस नरक में पकाये जाते है।
देखो यह उल्वण नामक छटा नरक है। जिसमें कि सिर नीचे करके पापियों को पकाया जाता है। जो लोग भक्ष्याभक्ष्य का विचार नहीं करते, दूसरों की निन्दा और चुगली करते हैं उनको इस नरक में डाला जाता है। देख लो कि यह लोग किस तरह से चिल्ला रहे हैं। दुर्गन्ध भेद से यह नरक भी छः प्रकार का है।
और यह देखो सातवां कुम्भीपाक नामक नरक है। यह बहुत ही भयंकर है। हे ब्राह्मण यह भी छः प्रकार का है। इसमें महा पातकी लोगों को पकाया जाता है। इस नरक में हजारो वर्ष तक यातना भोगनी पडती है। यही रोरव नरक है। इच्छा रहित जो पाप किए है वह सूखे और इच्छा पूर्वक जो पाप किए जाते हैं वह पाप आर्द्ध कहलाते हैं। इस कार शुष्क या आर्द्ध भेदों से यह पाप दो कार के होते हैं।
इनके अतिरिक्त और भी पृथक-पृथक चौरासी प्रकार के पाप हैं। 1۰ अपकीर्ण 2. पाडाकतेय 3. मलिनीकरण 4. जातिभ्रंशकरण 5. उपाय 6. अतिपाप 7. महापाप । यह सात प्रकार के पातक हैं। जो जीव जैसा कर्म करता है वह इन सादों नरकों से अपने पाप कर्मों के अनुसार पकाए जाते हैं तुम्हारा चूंकि कार्तिक व्रत करने गले प्रभु भक्त्तों के साथ पर्याप्त मेल जोल रहा है उसके पुण्य-प्रभाव से तुम्हारी नरक यातना दूर हो गई है।
भगवान् श्रीकृष्ण चन्द्रजी महाराज ने कहा- इस प्रकार प्रेतपति ने धनेश्वर को सब प्रकार नरक दिखलाने के पश्चात यक्ष लोक में ले जाकर उसे वहां का राजा बना दिया। वहां पर उसका नाम धनयक्ष हुआ और वह कुबेर जी का सेवक बन गया। बाद में महर्षि विश्वामित्र ने उसके नाम पर तीर्थ बनाया था।
हे राजन् ! कार्तिक मास का व्रत महाफल का दाता है। इसके बराबर कोई दूसरा पुण्य कर्म नहीं है। जो कोई यह व्रत करता है तथा व्रत करने वाले का दर्शन करता है उसे अवश्य मुक्ति मिलती है।
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तेतीसवां अध्याय
सूतजी ने कहा- इतनी कथा सत्यभामा को सुनाकर भगवान् श्री कृष्ण चन्द्रजी महाराज संध्या करने के लिए महल के भीतर चले गए। यह कार्तिक मास का व्रत भगवान् विष्णु को अत्यन्त प्रिय है तथा भक्त्ति का प्रदान करने वाला। रात्रि जागरण, प्रातःकाल का स्नान, तुलसीवट सिचन, उद्यापन और दीपदान यह पांच कर्म भगवान् विष्णु को प्रसन्न करने वाले हैं। इसलिए इनका पालन अवश्य करना चाहिए।
ऋषियों ने कहा-भगवान् विष्णु का प्रिय अधिक फल का देने वाला, शरीर के रोम-रोम को प्रसन्न रखने वाला इतिहास पूर्वक जो कार्तिक महात्म्य आपने कहा है, मोक्ष की चाहना करने वालों या भोग के इच्छुक मनुष्यों को यह व्रत अवश्य करना चाहिए। किन्तु हम एक बात आपसे पूछना चाहते हैं। वह यह कि यदि कार्तिक मास का व्रत करने वाला किसी संकट में फंस जाए या वह जगल में हो अथवा वह किसी रोग से ग्रस्त हो जाए तो फिर वह कार्तिक का व्रत किस प्रकार करे। क्योंकि यह विष्णु भगवान् का अतिशय प्रिय तथा मुक्ति-भक्ति प्रदान करने वाला व्रत किसी प्रकार भी नहीं छोड़ना चाहिए।
श्री सूतजी ने उत्तर दिया- यदि कार्तिक-व्रती किसी संकट में फंस जाए तो वीरता के साथ भगवान् शंकर तथा भगवान् विष्णु के मन्दिर में जाकर जागरण अवश्य करे। यदि भगवान् शंकर का मन्दिर या भगवान् विष्णु का मन्दिर पास न हो तो जिस किसी भी देवता का मन्दिर पास में हो उसमें जाकर रात्रि जागरण करे। अगर घना जंगल हो तो फिर पीपल के वृक्ष के नीचे अथवा तुलसी के वन में जाकर जागरण करें। भगवान् विष्णु की मूर्ति के सम्मुख बैटकर भगवान् विष्णु का कीर्तन करे।
ऐसा करने से हजार गऊओं के दान के बराबर कल मिलता है। जो व्यक्त्ति विष्णु के कीर्तन में बाजा बजाता है, उसको बाजपेय यज्ञ के बराबर फल मिलता है। और हरिः कीर्तन में नृत्य करने वाले प्राणी को समस्त तीर्थों में स्नान करने वाला फल मिलता है। किसी संकट के समय या रोगी हो जाने पर और यदि जल न मिल सके तो केवल भगवान् विष्णु के नाम मात्र से मार्जन ही कर ले। यदि उद्यापन न कर सके तो व्रत की पूर्ति के लिए केवल ब्राह्मणों को भोजन ही करवा देवे। क्योंकि ब्राह्मणों के प्रसन्न होने से भगवान् विष्णु भी प्रसन्न रहते हैं। यदि आप दीप दान न कर सके, तो दूसरे के दीप की वायु आदि से भली भांति रक्षा करे। और यदि तुलसी का पौधा पास न हो तो वैष्णव ब्राह्मण की ही पूजा कर लेवे। क्योंकि भगवान् विष्णु केवल शनिवार को ही पीपल को स्पर्श करना चाहिए और किसी दिन नहीं।
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चौतीसवां अध्याय
ऋषिगणों ने सूत जी से कहा- 'हे सूत जी! पीपल का वृक्ष शनिवार को छोड़कर सप्ताह के बाकी दिनों में क्यों नहीं पूजा जाता?
सूत जी ने कहा-समुद्र का मंथन करने से जो रान देवताओं को मिले थे उनमें से देवताओं ने लक्ष्मी और कौस्तुभमणि भगवान् विष्णु को दे दी थी।
विष्णु भगवान् जब लक्ष्मी से विवाह करने के लिए तैयार हुए तो लक्ष्मी ने कहा- प्रभो! जब तक मेरी बडी बहिन का विवाह नहीं हो जाता आप मुझ छोटी बहन से विवाह कैसे कर सकते हैं? इसलिए आप पहले मेरी बड़ी बहिन का विवाह कीजिए, बाद में फिर मुझसे विवाह कीजिए क्योंकि यह प्राचीन नियम है।
सूतजी बोले- लक्ष्मी के ऐसे वचन सुनकर भगवान् विष्णु ने लक्ष्मी की बड़ी बहिन का विवाह उद्दालक ऋषि के साथ कर दिया। वह अलक्ष्मी बड़ी कुरूप थी-बड़ा मुख, चमकते हुए दांत, वृद्धा के समान शरीर, बड़े-बड़े लाल-लाल नेत्र और रूखे बाल। महर्षि उद्दालक भगवान विष्णु के आग्रह पर उससे विवाह कर उसको वेद मन्त्रों की ध्वनि से गुंजाते हुए अपने आश्रम में ले आये। वेद ध्वनि से गूंजित हवन के पवित्र धुंए से सुगन्धित मनोहर ऋषि आश्रम को देखकर बहुत दुःखी हुई।
उसने महर्षि उद्दालक से कहा- 'इस आश्रम में वेद ध्वनि हो रही है। अतः यह स्थल मेरे रहने के योग्य नहीं है। अतएव तुम मुझे किसी दूसरो जगह ले चलो।'
उसकी बात सुनकर महर्षि उद्दालक ने कहा-तुम यहां पर क्यों नहीं रह सकतीं? और तुम्हारे रहने के योग्य दूसरी जगह कौन सी है। यह मुझे बतलाओ,
अलक्ष्मी जी ने कहा- जहां पर वेद-ध्वनि होती हो, अतिथियों का सत्कार होता हो, यज्ञ आदि होते हों, उस स्थान पर मैं नहीं रह सकती। जहां पर पति-पत्नी का आपस में प्यार हो, पितरों के निमित्त यज्ञ होते हों, देवताओं का पूजन होता हो, वहां पर मैं नहीं रह सकती। जहां दिन रात पति-पत्नी लड़ते रहते हों और जहां से अतिथि लोग सदा निराश लौटते हों। जहां पर पूज्य, वृद्धों, सत्य पुरुषों तथा मित्रों का अनादर होता हो और जहां पर अति कठोर वाणी बोली जाती है, जहां पर दुराचारी, चोर, परस्त्रीगामी प्राणी रहते हैं। जहां पर गौयों का वध, मद्यपान, ब्रह्महत्या आदि पाप होते रहते हैं वहां मैं प्रसन्नता पूर्वक निवास करती है।'
सूतजी ने कहा- इस प्रकार अलक्ष्मी के वचन सुनकर महर्षि उद्दालक का मुख मलिन हो गया। वह उस बात को सुनकर चुप रह गए। थोड़ी देर तक चुप रहने के पश्चात उन्होंने उससे कहा - अच्छा तुम्हारे लिए ऐसा ही स्थान खोजूंगा। अतः मैं जब तक तुम्हारे लिए ऐसा स्थान ढूंढकर न आऊं तब तक तुम इसी पीपल के नीचे चुपचाप बैठी रहो।
सूत जी ने कहा- महर्षि उद्दालक उसको पीपल के नीचे बिठा कर स्वयं उसके रहने योग्य स्थान ढूंढने के लिए निकले ! लेकिन जब वह बहुत काल तक प्रतीक्षा करने पर भी वापिस नहीं लौटे तो अलक्ष्मी रोने लगी। उसका बुरी तरह से रोना श्री लक्ष्मी जी ने बैकुण्ठ में भी सुना। अपनी बहिन का रोना सुन लक्ष्मी जी व्याकुल हो गई।
उन्होंने दुःखी होकर भगवान् विष्णु से कहा- 'प्रभो मेरी बड़ी बहिन अलक्ष्मी पति के त्याग देने से अत्यन्त दुखी हो गई। हे नाथ! यदि मैं आपकी प्रिय पत्नी हूं तो आप उसे आश्वासन देने के लिए उसके पास जाइए।
लक्ष्मी जी की प्रार्थना सुनकर कृपा सिन्धु भगवान् लक्ष्मी जी को साथ लेकर उस पीपल के पास गए जिसके नीचे अलक्ष्मी बैठी रो रही थी। उसको आश्वासन देते हुए भगवान् विष्णु ने कहा- हे अलक्ष्मी ! इसी पीपल की जड़ में तुम सदा सदैव के लिए निवास करो। क्योंकि मेरे ही अंश से इसकी उत्पत्ति हुई है और इसमें मेरा निवास रहता है। प्रतिवर्ष गृहस्थी लोग तुम्हारा पूजन करेंगे और उन्हीं के घर में तुम्हारी छोटी बहिन लक्ष्मी निवास करेगी।
स्त्रियों को विविध प्रकार के उपहारों से तुम्हारी पूजा करनी चाहिए। मनुष्यों को चाहिए कि वह पुष्प, धूप, गन्ध आदि से तुम्हारी पूजा करें। तभी लक्ष्मी उन पर प्रसन्न होगी।
सूत जी ने कहा- भगवान् श्री कृष्ण, सत्यभामा तथा पृथु और नारद का संवाद तुम लोगों को मैंने सुना दिया है। जिसके सुनने मात्र से ही मनुष्य के सब पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे बैकुण्ठ लोक की प्राप्ति होती है। तुम लोगों को जो कुछ पूछना हो पूछ सकते हो। उसे भी मैं विस्तार पूर्वक कहूंगा। सूत जी की बात सुनकर शौनक आदि ऋषि-महर्षि थोड़ी देर तक प्रसन्न चित्त वहां बैठे रहे। पश्चात श्री बद्री नारायणजी के दर्शन करने के लिए चले गए। जो प्राणी इस कथा को सुनता है और दूसरों को सुनाता है, वह इस संसार में सम्पूर्ण सुख प्राप्त करता है।
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।।ॐ नमः शिवाय।।
।। अथ ।।
तुलसी विवाह-विधि प्रारम्भ
इतनी कथा सुनकर ऋषीश्वर कहने लगे 'हे सूत जी! जब हम आपसे तुलसी जी के विवाह की विधि पूछना चाहते हैं कृपा कर वर्णन कीजिए।'
ऋषीश्वरों के वाक्य सुनकर आनन्द में मगन होते हुए सूत जी कहने लगे हे मुनिश्वरों! अब मैं आपके सामने तुलसी जी के विवाह की विधि का वर्णन करता हूं। इसलिए सावधान होकर सुनने का कष्ट करें। जब उत्तरायण रवि हो, गुरु शुक्र का उदय हो, विवाह के नक्षत्र हों और विशेष कर पूर्णिमा हो अथवा कार्तिक का महीना या भीष्म पंचक हो तब तुलसी वन में या अपने घर में सुन्दर मण्डप और उत्तम हवन कुण्ड के सहित मनोहर वेदी की रचना करता हुआ ऋत्विज ब्राह्मणों को जो विद्वान और राग द्वेषादि से रहित हों, निमन्त्रित करें, बुलावे और गृहयज्ञ आरम्भ करता हुआ मातृकाओं की पूजा करें।
हे मुनीश्वरों ऋत्वजी के उपस्थित हो जाने पर पहिले नन्दीमुख श्राद्ध करे और तत्पश्चात सुवर्ण के भगवान् सालिग्राम बनाकर उनका विधि विधान से पूजा सामग्री से पूजा करता हुआ चांदी की तुलसी को उनको समर्पण कर दे। इस प्रकार विवाह विधि से तूलसी जी का पाणिग्रहण कराने के पश्चात विधि पूर्वक होम करें और इसके बाद सपत्नीक यजमान भाई बन्धु और सेवकों के साथ चारों ऋत्वजों के सहित विष्णु भगवान की प्रेम प्रदक्षिणा करता हुआ शांति पाठ और मंगल गान करें। उस समय स्त्रियों के मंगल गान के सहित भेरि आदि बाजे भी बजवाने चाहिएं। हे मुनिश्वरों ऐसा हो जाने के पश्चात यजमान को गोदान और शैया दान करना चाहिए और ऋत्वजों को दक्षिणा देकर विप्रभोज और जाति भोज करना चाहिए।
इतनी कथा सुनाकर सूत जी कहने लगे हे मुनीश्वरों! इस प्रकार जो मनुष्य श्रद्धा भक्ति से युक्त्त होकर सत्व, शान्ति और सन्तोष को धारण करता है विष्णु भगवान् को तुलसी जी समर्पण करता है, वह समस्त पापों से रहित होकर समस्त संसारी सुखों को प्राप्त करता हुआ अन्त में विष्णु पद को प्राप्त हो जाता है।
इसमें संशय नहीं करना चाहिए। हे मुनीश्वरों जिस प्रकार से तुलसी जी के विवाह की विधि बताई गई है। उसी प्रकार आंवला, शमी और पीपल की विवाह विधि भी समझना चाहिए।
☆☆☆
पैतीसवां अध्याय
कार्तिक मास के महीने में विवाह के दिन अथवा उसके प्रथम दिन प्रातःकाल नन्दीमुख श्रद्धा और मातयाग करके गोधूलीय लग्न में यजमान स्नान करे और शुद्ध श्वेत वस्त्र पहन कर नित्य क्रिया के बाद मण्डप के नीचे कुशासन पर पूर्व की ओर मुख करके बैठे और तत्पश्चात् आचमन और प्राणायाम करे। निम्नलिखित संकल्प का उच्चारण करे।
ॐ अद्यतत्सद ब्राह्मोऽहि द्विताय प्रहराद्धे श्रीश्वेत बाराह कल्पे जम्बू द्वीपे भारत खन्डे
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कार्तिक महात्म्य
विक्रमादित्य राज्य, अमुक सम्वतत्सरे अमुक मासे अमुक पक्षे अमुक तिथि, अमुक वासरे अमुक गोत्रोत्पन्न अमुक शर्मा, वर्मा व गुप्तो अहम मामाखितविधि पातक शमन पूर्वक भीष्ट सिद्धयर्थ सकल विघ्न शमनार्थ माथुरा योग्य मेश्वर्याभि वृद्धयथ श्री विष्णु देवता प्रात्यर्घ तुलसी विवाह कर्म करिष्ये। इस जगह जहां अमुक शब्द आया है। वहां पर उस सम्मत महान तिथिवार आदि का उच्चारण करना चाहिए। तदंगत्वेन गणेश पूजनं स्वस्ति पुण्याह वाचनम गृह यज्ञ च करिष्ये।
इस प्रकार संकल्प पढ़ने के पश्चात् गजानन भूत गणादि सेवितम् ।
कपित्थजम्बुफल चारु भक्षणम् ।।
उमासुतं शोक विनाश कारकम। नमामि विघ्नेश्वर पादपंकजम ।।१।।
शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्ण चतुर्भुज।
कार्तिक महात्म्य
152
इस मन्त्र को पढ़ता हुआ पुष्पाक्षत हाथ में लेकर गणेशजी पर चढ़ावे और तत्पश्चात् स्वस्तिवाचन और पुण्याह वाचन पढ़ता हुआ अथवा बालागणों दारा उच्चारण करता हुआ भगवान् का ध्यान करें और तत्पश्चात् दूब व कुशा द्वारा कलश के जल के छींटे लगाता हुआ निम्न वाक्यों का उच्चारण करें।
ॐ शान्तिरस्तु, पुष्टिरस्तु, तुष्टिरस्तु, बुद्धिरस्तु, अविध्नमस्तु, आयुष्पमस्तु, आरोग्यमस्तु, शिवकर्मसस्तु, कर्मसमृद्धिरस्तु, वेदसमृद्धिरस्तु, शास्त्रसमृद्धिरस्तु, धनधान्य समृद्धिरस्तु, इष्टसम्पदस्तु, अरिष्टिनिरसनमस्तु, यत्यापापं रोग मशुभमकल्याणं तददूरे प्रतिहतमस्तु, तच्छेयम्तदस्तु, उत्तरे मर्मणिउिविघ्ने मस्तु उत्तरोत्तर महरहरभिवृद्धिरस्तु, उत्तरोत्तरा, क्रिया-शुभाः शोभनः सम्पद्यं तो तिथि-करण मुहूर्त नक्षत्र ग्रह लग्न सम्पदस्तु अर्थात शांति
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कार्तिक महात्म्य
पुष्टि और पुष्टि बुद्धि आदि मुझे सर्वदा प्राप्त हों।
इस प्रकार उच्चारण करता हुआ यजमान प्रार्थना करे कि तिथि, करण, मुहूर्त, नक्षत्र ग्रह और लग्नादि देवता मेरे ऊपर प्रसन्न हों। दुर्गा पांचाली प्रसन्न हो, अग्नि पुरोगा और विश्वदेवा प्रसन्न हों। इन्द्र पुरोगा मरुदगण देवता प्रसन्न हो, माहेश्वरी से लेकर सब ऋषिवर प्रसन्न हों, ऋग्वेद आदि प्रसन्न हों, ब्रह्मा और यज्ञ ब्राह्मण प्रसन्न हों। श्री सरस्वती श्रद्धा भगवती कल्याणी, ऋद्धि-सिद्धि तुष्ट पुष्टि और अभय करने वाली देवियों सहित गणनायक कुल देवता, ग्राम देवता और इष्टदेवता सब मुझ पर प्रसन्न हों तथा ब्रह्मद्वेषी, पापी, दुराचारी, निंदक, व्याभिचारी, विघ्वकर्ता, तस्कर और शत्रु नष्ट हों। घोर नर्को का शमन हो, और शुभ कर्मों का उदय
कार्तिक महात्म्य
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ओम पूवेंरक्षतु गोविदं अग्नेयां गरुड़ वजः। यान्या रक्षतु वाराहो नारहिस्तु ।।१।। वारुणुयां केशवा रक्षै बाववां मधुसूदनः । उत्तरे श्रधरो रक्षेदृशाने तू गदधरः ।।२।। उर्ध्व गोवद्धनो रक्षेदेम्तच्चत्रिविक्रमः ।
इस प्रकार उच्चारण करने के बाद श्रद्धा भक्ति से युक्त होकर यजमान ऋत्वज ब्राह्मणों का वरण करे अर्थात उनके तिलक और मौली बन्धन करे। ऐसा करने पर ब्राह्मण लोग स्वास्तिक बन व पुण्य वाचन पढ़ने के बाद यजमान की रक्षा के लिए-
हो। जल, ऋतु, औषधियां, नदी, पहाड़, अतिथि, अग्नि, आहुतियां, दिन-रात घड़ी और पल आदि मेरे लिए कल्याण करने वाले हों। रवि, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, केतु आदि ग्रह, विष्णु जी, मेहर और स्वामी कार्तिकेय मेरे ऊपर सदा प्रसन्न रहें।
कार्तिक महात्म्य
एवं दशदिशो रक्षेद वासुदेवो जनार्दन ।।३।। यक्षमान सपत्नी के कमलाक्षश्र रक्षतु । रक्षाहीन तू यत्रथान तत्सव रलतोहरिः ।।४।। अप सर्पन्तु ते भुता भूमि सस्थिताः।
येभूताः विघ्न कर्तारन्तेनश्यन्तु श्विाज्ञया ।।५।।
इत्यादि मन्त्रों का उच्चारण करते हुए यजमान के चारों ओर अक्षत छोड़े।
इस तरह करने के बाद आचार्य जल का स्पर्श करके
ओम येन राजा बजिबद्धों दानवेन्दो महावदः तेन्त्वां प्रति विघ्नानि रक्षो मांगल माचलः ।।१।।
इस मंत्र से यजमान के मौली बांधे और बाद में
आदित्य व सवो रुद्रा विश्वेदेवा महाबला। नीकांते प्रतच्छन्तु धर्मकामार्थ सिद्धये ।।१।।
उपर्युक्त मन्त्र से तिलक करे। इस प्रकार
कार्तिक महात्म्य
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यजमान के रक्षा बन्धन और तिलक हो जाने के बाद त्रमूत्त्रिज जो नवगह मन्त्रों से या निम्नलिखित
ब्रह्मा मुरारि संभ्रांतकारीः
गुरुश्च भानुशशी भूमिसुति दुथश्च ।। शुक्रश्शनिराहूं केतेवः।
सवें ग्रहः शांति कराभवन्तु ।।
इस मन्त्र को पढ़ता हुआ सूर्य आदि ग्रहों का आवाह्न और पूजन करे और तत्पश्चात -ओमवरुण स्वोतम्भनमसिवरुणास्यन्कम्भसाजातीस्यो वरुणास्पयऋतु सदन्यासि वरुण म्यअऋरसनमशि।
उपर्युक्त मन्त्र का उच्चारण पन्च पल्लव और सुपारी आदि पूजा सामग्री से कलश का स्थापन और पूजन करता हुआ निम्नलिखित मन्त्रों से कलश प्रार्थना कराये। कलशरय मुखे विष्णु कठे रुद्रः समश्चितः ।
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कार्तिक महात्म्य
मूलेतस्यस्थिता ब्रह्मा मध्य मातृगण ल्मृतां ।।१।। ऋग्वेदोअथ यजुर्वेदः सामवेदो प्यार्वणः। अंगेच सहितः सर्वे कलशंतु समाश्रिताः ।।२।। देव दानव सम्वाद मध्य माने महादधौ। उत्पनोअसियदा कुम्भ विधृतोंविष्णुगां स्वयं ।।३।। तवत्त सर्वाणि तीर्थाननिदेवा देबासवें त्वथरिणताः। त्वयि तिष्ठन्ति भूतानि त्वयि प्राण प्रतिष्ठताः ।।४।। शिवः स्वर्थ त्वमेवासि विष्णुरूपश्च प्रजापतिः। आदित्या वसवो रूप विश्वे देवा सपकृता ।।५।। सर्वेपि त्वपि तिष्ट यतः काम फल प्रदः। त्वप्रसादादिमन यज्ञन् कत्तु मीहे जद्रव ।।६।। सनि यन् कुरुदेव प्रसन्नो भव सबदा।
उपर्युक्त मन्त्रों से कलश प्रार्थना कराने के बाद आचार्य तुलसी जी के बियये पर मण्डप करके विवाहिता विधि अनुसार चेदी बनाने और ततपश्चात् सर्वतोभद्र मण्डले पर स्वर्ण के भगवान् सालिग्राम सूर्य और चांदी
कार्तिक महात्म्य
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कार्तिक महात्म्य
की तुलसी की अग्नि के उद्वर की ओर स्थापना करता हुआ। ओम् इद विष्णुर्विचक्रम्
त्रयानिजभ पदम। समूढ़ सस्यबां सूरे।।
ओम् भूर्भुव स्वविष्णों इहागच्छ।
तुलसी श्री साखे शुभे पाप हारिणी शिवे।। नमस्ते नारद नुते नारायण सदा प्रिंसे ।
ओम् भूर्भुवः स्वतुलसी इहागच्छा।।
उपर्युक्त मंत्रों से विष्णु भगवान् और भगवती तुलसी का ध्यान करे और देश का उच्चारण करता हुआ सब प्रकार के विघ्न पाप और दुखों की शांति के लिए तथा श्रीविष्णु भगवान् की प्रीति के लिए यजमान द्वारा पूजा सामग्री से विष्णु जी व तुलसी जी का पूजन करावे बाद में-
ओम् मंगें न यत्र मयजंत। देवास्तानि भर्माणि प्रथमान्यासन ।।
तेहनाकम्महिमान सचंत यत्र।
पूर्वे साद्धयाः सन्ति देवा ।।१।।
पापोहन् पापकाहम् पाहात्मा पाप सम्भवः।
त्राहि मां पुण्डरिकाक्षं सर्वपापा हरो भवः ।।२।।
त्वमेव माता च पिता त्वमेव ।
त्वमेव बन्धु च सखा त्वमेव ।।
त्वमेव विद्या द्रविण त्वमेव ।
धर्मकामार्थ सिद्धायथ विष्णो कष्ट नाशक। तुम्पं दास्यामि तुलसी सर्व काम प्रदो भव ।।३।।
उपर्युक्त मन्त्रों से पुष्पांजलि समर्पण करता हुआ आचारानुसार श्रीकृष्ण प्रतिमा के सन्मुख तुलसीजी की प्रतिमा करके मंगल गान करके वाद्य के सुगंधित तेल और अन्य सुगंधित पदार्थों को ग्रहण कर देना प्रतिमाओं पर उष्णोदक (गर्म) जल के छींटे लगाता हुआ वस्त्र यज्ञोपवीत केवल विष्णु के लिए चन्दन
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पुष्प हार और आभूषण और घंटावादन के सहित-
ओम् यदव नदाक्षा यणहिण्य।
सतानी काम सुनस्यमान तन्मआवनामि शतशारया पुष्पांजरददिष्टिधासम ।।१।।
उपर्युक्त मंत्र से विष्णु मय तुलसी जी के कंकण बंधन कराता हुआ हाथ जोड़कर प्रार्थना करावे।
तत्पश्चात एक हाथ से लम्बी चौड़ी तथा चौरस बनी हुई वेदी को कुशाओं से साफ करते हुए अर्थात उस पर पड़े हुए तृणादिकों को हटाके उन कुशाओं को ईशान दिशा से छोड़ दे। इसके बाद गोबर से उस बेदी को लीपकर स्रवें से घी होमने वाले पात्र से उस पर उत्तराक्षर तीन लकीर खींचते हुए उस से अनामिका अंगूठा द्वारा थोड़ी सी मिट्टी लेकर इसे फेंक दे और तत्पश्चात वेदी पर जल के
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छींटे लगाकर दूसरे कांसी के पात्र से काढ़े हुए कांसे के पात्र में अग्नि मंगावे और इसके बाद-
ओम अग्नि दूत पुरोदवे हव्यवाह मुष्मुत्वे ।
देवा आशादयादिह।।
उपर्युक्त मन्त्र से प्रार्थना करते समय उसकी अग्नि की रक्षा के निमित्त कुछ समिधा वेदी पर जल के छींटे लगा दें।
इस तरह अग्नि का पूजन स्थापन हो जाने के बाद आचार्य यजमान के हाथों से पाद्य-पात्र दिला कर ओम पाद्य-२ विष्णु ये नमः। इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ विष्णु भगवान् के पैरों को धुलवा दे और बाद दूध अक्षत पुण्य और चन्दन आदि से युक्त अर्धपात्रां द्वारा ओम् अर्धी विष्णु नमः इस पात्र से अघख ओम् आचमनीयमा चसनीयमा मचमनीय विष्णवे
इस मन्त्र से विष्णु भगवान् को आगमनीय रेलवा दे। बाद में कांसे के पात्र में दही, धु और घी मिलाकर कांसी के पात्र से कता हुआ उसे यजमान के हाथ में देवे और होम् मधुपरकों मधुपरकों मधुपरकः ऐसा च्चारण करके मधुपरक गृहाणात्वम् वासुदेव मोष्तुसे, इस मन्त्र से भगवान् के मधुहरक मर्पण करते हुए पुनः आचमन करा दे।
इस तरह भगवान् का पांद्यादि समर्पण कराने के बाद आचार्य यजमान का आचमन और प्राणायाम करके कहा और तत्पश्चात् -ओ३म तत्सदद्यमुक सम्वत्तरे अमुक शाके अमुक मासे अमुक पक्षे अमुक तिथि व अमुक पासरे अमुक गांत्रोत्पन्नो अहमसुक नाम शर्मा श्री परमेश्वर प्रत्यर्थ ममाखन्डित सुख सौभाग्य सन्तृभ्या युरारोग्ये श्वर्याभिवृद्धयर्थ श्री तुलसी देवता प्रीत्यर्थ तुलसी पूजनमः
करिष्ये।
उपर्युक्त संकल्प पढ़ता हुआ यजमान भगवान तुलसी का ब्याह करने को कहे स्वयं निम्नलिखित मन्त्रों का उच्चारण करे। ओ३म घ्यायेच्च तुलसीदेवी श्यामा कमला लोचनाम प्रसन्नां पद्यवन्दना वरदां च चतुर्भुजां किरीट हार मेयूर कुन्डलादि विभूषणां ।
धवलांशुक संयुक्तों पद्यासन निसेवितां ।।२।। प्रियां च सर्वदा विष्णोः सर्व देव नमकृस्तां । सुखदाज्ञां नदां नोमि पुत्रदां रागहारिणीम ।।३।।
उपर्युक्त मन्त्रों से भगवती तुलसी का ध्यान करता हुआ आचार्य पूजा सामग्री से यजमान द्वारा तुलसी जी का पूजन और-
सौभाग्यं सन्तित देहि धनधान्यं च में सदा। आरोग्यं शोकशमनं कुरु में माधवप्रिये ।।१।।
इस मन्त्र से प्रार्थना करावे।
इस प्रकार यथाशक्ति पूजन करने के
कार्तिक महात्म्य
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बाद तुलसी प्रतिमा के सम्मुख विष्णु भगवान् की प्रतिमा करे और तत्पश्चात् मध्य में अन्तर सेपट करते हुए निम्नलिखित मंगलाष्टक पढ़े। और श्रीमत्कार्तिक शुक्लगा तिथिवरा एकादशी, द्वादशी तस्यां गोरजलागृके बधुवरौ साक्षाग्गानाको श्रीकृष्ण तुलसी विवाह । मकरोत्तस्मिन विवाहोत्वे तौ देवो भवतां सदा शुभकरो लक्ष्मी मंगलम ।।१।।
यह मंगल श्लोक पढ़कर अन्तःपट को हटाता हुआ आचार्य अक्षत छोड़े और तत्पश्चात् यजमान को उत्तर मुख बैठाकर आचमन प्राणायाम करता हुआ शंख में दूब, अक्षत, फल, पुष्प, चन्दन और जल लेकर निम्नलिखित संकल्प का उच्चारण करता हुआ उसके द्वारा यजमान श्री तुलसी को विष्णु भगवान् के समर्पण करा दे। ।। संकल्प।। ओ३म तत्सदृमुक सम्वत्सरे अमुक मासे
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कार्तिक महात्म्य
अमुक पक्षे अमुक तिथि व अमुक वासरे अमुक गोत्रो त्पन्नो अहम अमुक शर्मा अह ममेह जम्मान जन्मान्तरेका कृत कायिक वाचिक मानसिक सांसार्गिक दोषापरिहाथ तथा च विष्णु प्रसन्नार्थ श्री दामोदरामा याहाविष्ण वेवराय, इमां कन्मावत्स वद्धितां तुलसी श्रीरूपिणी यथाशवत्यंलंकृता तुभ्यं श्री धराताह संप्रददे।
इस तरह संकल्प उच्चारण करता हुआ विष्णु देव के आगे जल सहित अक्षत छोड़े और पार्वती जोसम्भूतां वृन्दाभस्मनि सस्थितां अनादिम यनिधना बल्लभां ते ददाम्यह्म ।।१।। पयोघटेश्च सेवाभिः कन्यावद वाद्धतामया। त्वप्रियां तुलसी तुभ्यं दास्यामि त्वं गृहाणभोः ।।२।।
उपर्युक्त मन्त्र से विष्णु भगवान् की प्रार्थना करता हुआ निम्नलिखित मन्त्रों से तुलसी जी की प्रार्थना करे।
कार्तिक महात्म्य
त्वं देवि में ऽमृतो भूयास्तुलसी देविपार्श्वयोः देवित्व पृष्ठतो भूयास्त्वद्दानान्मोक्षमाप्नुयाम
इस प्रकार प्रार्थना सहित तुलसी जी का विष्णु भगवान को समर्पण कर देने के पश्चात यजमानं भगध न की यथाशक्ति दक्षिणां समर्पण करें और ऋत्विज लोग उस समय शांति पाठ और वेद मन्त्रों का उच्चारण करें।
☆☆☆
कुशकुणिड का हवन
शांति पाठ हो जाने के बाद यजमान एक ब्राह्मण बना कर उसका पूजन करता हुआ उसका तिलक करे और मौली बांध (अथवा आचार्य कुशाओं का कल्पित ब्रह्मा बनावे) तत्पश्चात् अग्नि से दक्षिण दिशा में शुद्ध
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कार्तिक महात्म्य
आसन बिछाकर पूर्व की ओर मुख कर कुशाओं को उस पर रखते हुए, ब्रह्मा की अग्नि की परिक्रमा कराकर आसन पर विराजमान होने के लिए उनकी प्रार्थना करें और तत्पश्चात आप मेरे यज्ञ कर्म कराने के लिए ब्रह्मा बनिये। ऐसा उच्चारण करता हुआ एक प्राणाता-पात्र वा सराई लेकर उसे कुशाओं से ढक दे और इसके बाद उसे ब्रह्मा को दिखाकर नीचे कुश बिछाता हुआ उसे अग्नि से उत्तर की ओर स्थापित कर दें।
तत्पश्चात सोलह कुशाओं के चार भाग करके उनमें एक की अग्नि कोण से निशान कोण तक, दूसरे का नैऋत्य से वांयब्य तक, तीसरे को ब्रह्मा से लेकर अग्नि तक और चौथे को अग्नि प्रणीता पात्र तक रख दे। इसके बाद पवित्र-छेदन के लिए अग्नि से नैऋत्य कोण एक तीन कुशाओं को रखे
कार्तिक महात्म्य
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और पवित्र करने के लिए अन्त गरभ बाली कुशा की झण्डी के मध्य की दो कुशाओं को उत्तर की ओर रख दे।
ऐसा हो जाने के पश्चात प्रोक्षणी पात्र (जल से भरी हई सुराही), घी का बरतन, तेहरांवटी हुई वेणी रूप तीन कुशा, प्रादेश पात्र (लगभग चार अंगुल लम्बी) तीन समिधा, (जांट की लकड़ी) सुवा (घी होमने का चमचा) और हवन सामग्री उत्तर में रखता हुआ पूर्ण पात्र चावलों से भरा हुआ पात्र स्थापित करें। परन्तु ये सब चीजें पवित्रच्छेदन कुशाओं से पूर्व दिशा की ओर क्रम से रखनी बाहिए।
ऐसा हो जाने के पश्चात पवित्र छेदन की कुशाओं से पवित्र छेदन करता हुआ पावत्री बनाने और तत्पश्चात पवित्री सहित हाथ से प्रणीता का जल तीन बार प्रोक्षणी पात्र में
कार्तिक महात्म्य
डालें इसके बाद अनामिका और अंगूठे पवित्री पहनकर प्रणीता के जल को तीः बार ऊपर उछालती हुई प्रणीता के जल र प्राक्षणी के और प्रोक्षणी जल से पवित्र द्वारा अन्य वस्तुओं के छींटे लगावे। पुन अग्नि और प्रणीता के बीच में प्रोक्षणी रखकर घी के बरतन को आंच पर रख दे और उसके बाद एक जलता हुआ तृण लेकर घी को चारों ओर से भली प्रकार देखता हुआ उस तिनके को अग्नि में छोड़ दे। इसके बाद प्रोक्षणी के जल से अग्नि के चारों ओर छींटे दे और नुवकों अग्नि में तपाता हुआ सम्मार्जन कुशाओं से उसके मुख भाग को बाहर-भीतर से साफ करे। तत्पश्चात प्रणीता के जल से खुवे के छींटे लगाता हुआ उसे अपनी ब्रह्मा की दाहिनी ओर रख ले।
इस प्रकार खुवे को रख देने के पश्चात
कार्तिक म्हात्म्य
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कार्तिक महाल्य
घी के पात्र को अग्नि पर से उतारे और उसके बाद रखे हुए घी को थोड़ा-थोड़ा तीन बार ऊपर उछालता हुआ उसमें गिरी हुई अशुद्ध चीजों को बाहर निकाल दे और पुनः तीन बार उसी प्रकार घी को थोड़ा ऊपर को उछालता हुआ उसे साफ करे।
तत्पश्चात आचार्य प्रतयमन कुशाओं को हाथ में लेकर खड़ा हो जावे और मन में प्रजापति का ध्यान करता हुआ घी में भिगोई हुई तीन समिधाओं के सहित चुपचाप अग्नि में छोड़ दे और इसके बाद बैठकर पोक्षणी के जल को पवित्री से चारों ओर घुमाता हुआ प्रणीता पात्र में पवित्रा रख दे।
उसके बाद दाहिना गोडा नीचा कर उसके और ब्रह्मा के बीच में कुशाओं को रखता हुआ निम्नलिखित मन्त्रों से खुवे से घी की आहुतियां देता जावे। आहुति से बचा हुआ
सुवे का घी प्रक्षणी पात्र में छोड़ता जावे।
ॐ प्रजापतये स्वाहा, इन्द्रम प्रजापतये ।।१।।
ॐ इन्द्राय स्वाहा, इदमिद्राय ।।२।।
ॐ अग्नेय स्वाहा, इदमग्नये ।।३।।
ॐ सोमाम वहा, इद सोमाय ।।४।।
ॐ भूः स्वाहा इदमग्नये ।।५।।
ॐ भुवः स्वाहा इदम्वयवे ।।६।।
ॐ स्वः स्वाहा, इद सूर्याय ।।७।।
ॐ त्वन्नोऽअग्ने वरुणास्त विद्वान देवस्ते होऽअवयामि सीष्ठाः।
मजिष्ठो वन्हितमः शौशुचानो विश्वादेवाऽसिप्र मसुग्ध्यस्त स्वाहा। इदमग्निवरुणाभ्याम ।।१।। ॐ सत्वनो अग्नेव्वमोयवो तिनेदिष्ठोऽअस्याऽ उषसाव्युष्ठाऽ अब यश्वेनोव्वरुणाभ्यम् ।
इस प्रकार उपर्युक्त आहुतियां देकर अग्नि का प्रोक्षण करता हुआ 'ओम नमो भगवते वासुदेवायः इस द्वादशयोक्षर' 'ओम अग्नये
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स्विष्टकृते स्वाहा, इ कमग्नये स्विष्टकृते स्वाहा, इस मन्त्र से स्विष्टकृत होम करता हुआ यजमान को सस्रव प्राशन खुवे के लगा हुआ घी का और आचमन कराकर संकल्प द्वारा उससे ब्रह्मा को दक्षिणा सहित पूरनपात्र दिलवा दे और स्वयं 'स्वप्तति प्रति' वचनम इस मन्त्र का उच्चारण करे।*
ऐसा हो जाने के पश्चात यजमान आचार्य को यथाशक्ति दक्षिणा देकर ब्रह्मा का ग्रन्थ विमोचन करा दे। उसके बाद आचार्य ओ३म सुमित्रायामऽआप औषधवः सन्तु। इस मन्त्र से पवित्री ग्रहण कर प्रणीता के जल से यजमान का अभिषेक करें। और ओंम दुर्मित्रयास्तसमे संतुयाऽस्मान द्वेष्टिय चवय द्विष्मः, इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ प्रणीता को ईशान दिशा में मोधी भर दे। इसके बाद हवन-वेदी चारों ओर बिखरी
कार्तिक महात्म्य
कुशाओं को घी में भिगोकर ओ३म् देवागातु विदोगातु वित्वागातुमितं इयं देव यज्ञ स्वाहा वातेधाः इस मन्त्र का उच्चारण कर उन्हें अग्नि में छोड़ता हुआ-
ओ३म् मूर्द्धन दिवो अरन्ति पृथिय्योश्वावर मृत आजात मगनिम। कवि सम्राजमतिथि जनाना मांमनपात्रं जनयन्त देवाः स्वाहा, इस मन्त्र से अग्नि में पूर्णाहुति देवे।
इस प्रकार पूर्णाहुति देने के बाद आचार्य आसन पर बैठ जाये और उसके बाद सुवे के भस्म लगा कर दाहिने हाथ की अनामिका के अग्रभाग निम्नलिखित मन्त्रों द्वारा यजमान का तिलक करे।
ओ म् त्रयायुष जमगयनेः, इससे ललाट में। ओ मयद्देबेपुत्रयायुषम् इससे दायें कंधे के मूल में, ओ म तन्नो अस्तु त्रयायुक्ष्म, इससे हृदय में।। ऐसा हो जाने के बाद
कार्तिक महात्म्य
जमान प्रदक्षिणा करे और शांति पाठ तथा जे गाजे के सहित पृथा विधि विष्णु तुलसी का पूजन करता हुआ गुरुजनों को नमस्कार करे और उसके बाद कुलगुरु को गऊ और थाशक्ति दक्षिणा देकर देवों का विसर्जन
भौर ब्रह्मभोज कराता हुआ-'ओंम यस्यस्मत्याच नामोकत्या तपो यज्ञ किया
देशु सम्पूर्णातां वाति मद्यावन्दे तमच्युतम ।।१।। पअहं पापकर्माहग पापात्मा पाप संभव। त्राति पं पुण्डरीकांक्ष सर्वपाप हरो भवः ।।२।।
त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च तखा त्वमेव, त्वमेव विद्या द्रविण त्वमेव, त्वमेव सर्व ममदेव देव। इस प्रकार सर्व दोषशमनार्थ विष्णुदेव की प्रार्थना करें।
नोट-इसी विधि से शान्यशवत्थ का 'जाटी'
वेवाह कराया जाता है।
दोहा-हरनारायण विप्र ने, भाषा मांहि बनाया।
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कार्तिक महात्म्य
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विवाह-विधि संक्षेप से, लिखिशिवाको ध्याय ।। इत तुलसी नारायण विवाह विधि समाप्त। शुभस्थमात। श्रीरस्तु। कल्याणमस्तु ।।
☆☆☆
अथ श्री तुलसी चालीसा
।। दोहा ।।
जय जय तुलसी भगवती सत्यवती सुखदानि। नमो नमो हरि प्रेयसी श्री वृन्दा गुण खानि ।।
जय नन्दिनि जग पूजिता विश्व पावनी देवि।
जयति पुष्प सारा सुरभि देहु अमर व अम्ब ।। श्री हरि शीश बिराजिनी देहु अमर वरअम्ब। जनहित हे वृन्दावानी अब जनि करहु विलम्ब।॥
।। चौपाई ।।
धन्य धन्य श्री तुलसी माता। महिमा आगम सदा श्रुति गाता।। सारसदा अलि से तुम
कार्तिक महास्य प्यारी। हरिहि हेतु कीन्ह्यो तप भारी ।। 176
जब प्रसन्न हैं दर्शन दीन्हो। तबकर जोरि विनय अस कीन्हो ।।
हे भगवन्न् कन्त मम होहू। दीन जानि जनि छांड़हु छोहू ।।
सुनि लक्ष्मी तुलसी की बानी। दीन्हो श्राप क्रोध पर आनी ।।
अस अयोग्य वर मांगन हारी।
होहु विटप तुम जड़ तनु धारी ।।
सुनि तुलसहिं श्राप्यो तेहिं ठामा। करहु बास तुहुं नीचन धामा ।। दियो बचन हरि तब तत्काला।
सुनहु सुमुखि जनिहोहु बिहाला ।।
पुजिहौ आस बचन सत मोरा ।। समय पाइ व्है रौ पति तोरा।
तब गोकुल नहं गोप सुदामा। तासु भई तुलसी तू बामा ।।
कृष्ण रास नीला के माहीं। राधे शक्यो प्रेम लुखि नाहीं।।
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कार्तिक महात्म्य
विवाह-विधि संक्षेप से, लिखिशिवाको ध्याय ।। इत तुलसी नारायण विवाह विधि समाप्त। शुभस्थमात। श्रीरस्तु। कल्याणमस्तु ।।
☆☆☆
अथ श्री तुलसी चालीसा
।। दोहा ।।
जय जय तुलसी भगवती सत्यवती सुखदानि। नमो नमो हरि प्रेयसी श्री वृन्दा गुण खानि ।।
जय नन्दिनि जग पूजिता विश्व पावनी देवि।
जयति पुष्प सारा सुरभि देहु अमर व अम्ब ।। श्री हरि शीश बिराजिनी देहु अमर वरअम्ब। जनहित हे वृन्दावानी अब जनि करहु विलम्ब।॥
।। चौपाई ।।
धन्य धन्य श्री तुलसी माता। महिमा आगम सदा श्रुति गाता।। सारसदा अलि से तुम
कार्तिक महास्य प्यारी। हरिहि हेतु कीन्ह्यो तप भारी ।। 176
जब प्रसन्न हैं दर्शन दीन्हो। तबकर जोरि विनय अस कीन्हो ।।
हे भगवन्न् कन्त मम होहू। दीन जानि जनि छांड़हु छोहू ।।
सुनि लक्ष्मी तुलसी की बानी। दीन्हो श्राप क्रोध पर आनी ।।
अस अयोग्य वर मांगन हारी।
होहु विटप तुम जड़ तनु धारी ।।
सुनि तुलसहिं श्राप्यो तेहिं ठामा। करहु बास तुहुं नीचन धामा ।। दियो बचन हरि तब तत्काला।
सुनहु सुमुखि जनिहोहु बिहाला ।।
पुजिहौ आस बचन सत मोरा ।। समय पाइ व्है रौ पति तोरा।
तब गोकुल नहं गोप सुदामा। तासु भई तुलसी तू बामा ।।
कृष्ण रास नीला के माहीं। राधे शक्यो प्रेम लुखि नाहीं।।
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कार्तिक महात्म्य
दियो श्राप तुलसिंह तत्काला। नर लोकहिं तुम जन्महु बाला ।।
भयो गोप वह दानव राजा। शंख चूड़ नामक शिर ताजा ।।
तुलसी भई तासु की नारी। परम सती गुण रूप अगारी ।।
अस द्वै कल्प गीत जब गयऊ। कल्प तृतीय जन्म तब भयऊ ।।
वृन्दा नाम भायो तुलसी को। असुर जलन्धर नाम पति को ।।
करि अति द्वन्द अतुल बलधामा। लीन्हा शंकर से संग्रामा ।।
जब नित सैन्य संहित शिव हारे। मरहि न तब हर हरहिं पुकारे ।।
पतिव्रता वृन्दा थी नारी।
कोउ न सके पतिहिं गंहारी।। तब जलन्धरहि भेष बनाई। वृन्दा ढिग हरि पहुंच्यो जाई।
कार्तिक महात्म्य
शिव हितलहि करिकपट प्रसंगा। कियो सतीत्व धर्म तेहि भंगा।।
भयो जलन्धर कर संहार।
सुनि वृन्दा उरशोक अपारा ।।
तिहिं क्षणादियो कपट हरि टारी।
लखि वृन्दा दुख गिरा उचारी।।
जलन्धरहिं जस हत्यो अभीता।
सोइ रावण व्हैं हरिही सीता।।
अस प्रस्तर सम हृदय तुम्हारा। धर्म खण्डि मम पतिहिं संहारा।।
यहि कारण लहि श्राप हमारा। होवे तनु पाषाण तुम्हारा।।
सुनि हरि तुरतहिं वचन उचारे। दियो श्राप तुम बिना बिचारे।। तख्यो न निज करतूति पती को।
छलन चह्यो जब पारवती को ।।
जड़मति तुहुं अस हो जड़रूपा। जगमहं तुलसी विटप अनूपा।।
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कार्तिक महात्म्य
धरव रूप हम शालिग रामा।
नदी गण्ड की बीच ललामा ।। जो तुलसी दल हमहिं चढ़इहैं।
सब सुख भोगि परम पद पइहैं।।
बिनु तुलसी हरि जलत शरीरा।
अतिशय उठत शीश उर पीरा।।
जो तुलसीदल हरि शिर धारत। जो सहस्र घट अमृत डारत।।
तुलसी हरि मन रंजनि हारी।
रोग दोष दुख भंजनि हारी।।
प्रेम सहित हरि भजन निरन्तर ।
तुलसी राधा में नहिं अन्तर ।।
व्यंजन हो छप्पनहु प्रकारा। बिनु तुलसी दल हरिहिं प्यारा।।
सकल तीर्थ तुलसी तरु छाहीं। लहत मुक्ति जन संशय नाहीं ।।
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कवि सुन्दर इक हरि गुण गावत। तुलसिहिं निकट सहसगुण पावत।।
बसत निकट दुर्वासा धामा।
जो प्रयाग ते पूर्व ललामा।।
पाठ करहिं जो नित नर नारी।
होहिं सुखी भाषहिं त्रिपुरारी ।।
।। दोहा।।
तुलसी चालीसा पढ़हिं तुलसी तरु गृह धारि। दीप दान करि पुत्र फल पापहिं बन्ध्यहुं नारि।।
सकल दुःख दरिद्र हरि हार व्है परम प्रसन्न ।
अतिशय धन जन लहहि गृह बसहिं पूरणा-अन्न
लहि अभिमत फल जगत महं लहहिं पूर्ण सब काम जइदल अर्पहिं तुलसी तहं सहस बसहिं हरि धाम तुलसी महिमा नाम लख तुलसी सुत सुखराम । मानस चालीसा रच्यो जग महं तुलसी दास ।।
☆☆☆
कार्तिक महात्म्य
कार्तिक महात्म्य
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आरती श्री तुलसी जी की
जय जय तुलसी माता।
सब जग की सुखदाता वरदाता ।। जय ।। सब योगों के ऊपर सब रोगों के ऊपर। रुज से रक्षा, करके भव त्राता ।। जय ।। बटु पुत्री हे श्यामा सुर बल्ली हे ग्राम्या। विष्णु प्रिये जो तुमको सेवे सो नर तर जाता ।। जय ।। हरि के शीश विराजत त्रिभुवन से हो वन्दित। पतित जनों की तारिणी विख्याता।। जय ।। लेकर जन्म विजन में आई दिव्य भवन में। मानव लोक तुम्हीं से सुख सम्पत्तिपाता ।। जय ।। हरिको तुम अति प्यारी श्याम वरण कुमारी। प्रेम अजब है उनका तुमसे कैसा नाता ।। जय ।।
☆☆☆
श्री सालिग्राम की आरती
सालिग्राम सुनो विनती मोरी यह वरदान दयाकर पाऊं ।। प्रातः समय उठि मन्जन करके प्रेमसहित स्नान कराऊं ।।।
चन्दन धूप दीप तुलसीदल वरण-वरण के पुष्प चढ़ाऊं ।।१।।
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तुम्हरे सामने नृत्य करूं नितप्रभु घंटा शंख मृदंग बजाऊं।
चरण धोय चरणामृत लेकर कुटुम्ब सहित बैकुण्ट सिधाऊं ।।२।।
जो कुछ रूखा-सूखा घर में भोग लगाकर भोजन पाऊं। मन वचन कर्म से पाप किये जो परिक्रमा के साथ बहाऊं ।।३।। ऐसी कृपा करो मुझ पर जम के द्वारे जाने न पाऊं। माघोदास की विनय यहीं है हरि दासन के दास कहाऊं ।।४।।
आरती श्री तुलसीजी की
तुलसी महारानी नमो नमो ।
हरि की पटरानी नमो नमो ।। बन तुलसी पूरन तप कीयो मैया,
शालगराम महा जाके मंजमंजरी कोमल मैया,
पटरानी।
श्रीपति चरण कमल लपटानी।
धूप, दीप, नैवेद्य आरती मैया, पुष्पन की बरषा छप्पन भोग छत्तीसों व्यंजन मैया, बरसानी।
बिन तुलसी हरि एक न मानी।
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कार्तिक महात्म्य
सामरो सखी माई तेरा यश गावै मैया, भक्तीवर दीजै
मह। रानी।
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आरती श्री यमुना जी की
ओ म् जय यमुना माता, हरि ओम जय यमुना माता। जो नहावे फल पावे, सुख की दाता।। ओ म्।। श्री यमुना जल शीतल अगम बहै धारा जो धन शरण से कर दिया निस्तारा ।। ओ म् ।। जो जन प्रातः ही उठकर नित्य स्नान करे। यम के त्रास ने पावे जो नित्य ध्यान करे ।। ओ म् ।। कलि काल में महिमा तुम्हरी अटल रही। तुम्हारा बड़ा महात्तम चारों वेद कहं ।। ओ म् ।। आन तुम्हारा माता प्रभु अवतार लियो । नित्य निर्मल जल पीकर कंस को मार दियो ।। ओ म्।। नमो मात भयहरणी शुभ मंगल करणी। मन 'बेचैन' भया है तुम बिन वैतरणी ।। ओ म् ।।
☆☆☆
सामरो सखी माई तेरा यश गावै मैया, भक्तीवर दीजै
☆☆☆
मह। रानी।
आरती श्री यमुना जी की
ओम् जय यमुना माता, हरि ओम जय यमुना माता। जो नहावे फल पावे, सुख की दाता।। ओ म्।। श्री यमुना जल शीतल अगम यहै धारा जो धन शरण से कर दिया निस्तारा ।। ओ म् ।। जो जन प्रातः ही उठकर नित्य स्नान करे। यम के त्रास ने पावे जो नित्य ध्यान करे ।। ओ म् ।। कलि काल में महिमा तुम्हरी अटल रही। तुम्हारा बड़ा महात्तम चारों वेद कहं ।। ओ म् ।। आन तुम्हारा माता प्रभु अवतार लियो । नित्य निर्मल जल पीकर कंस को मार दियो ।। ओ म् ।। नमो मात भयहरणी शुभ मंगल करणी। मन 'बेचैन' भया है तुम बिन वैतरणी ।। ओ म् ।।
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कार्तिक महात्म्य
184
श्री गंगाजी की आरती
जय भगवती गंगे मां जय-जय भगवती गंगे।
तरल तरंगे दुर्मति भंगे सुरमति संगे ।। जय ।।
विष्णु पदादनुसगणी खंडिनि ब्रह्मांडे।
शंकर जटा के विहरिन अतिरंगे ।।
जय जय भागीरथी मति लगने सगर जग उद्धरणे ।। जय ।।
जाहन्वी नाम तुम्हारा शोभित ।
अघनाशन भवनाशन दासन शियतनुजें
त्रासन मोह विकारन बह्य पदे।
सुरसरि धारा सहधारा कलिमल टारन।
जय शरणागत प्रतिपालक बालक शिवसुखदे ।। जय ।।
शिवशरणी जगतरणी हरणी भवसिन्धो ।
हरि पद पाता धाता वंदित जगमाता ।।
काम क्रोध विदारिणि दारुण दुर सुभगे।
पाथोधि परतिय सुरधुर्निं गुण जंगे ।। जय ।।
तब धारा जय पारा दर्शित भक्त जने।
सेवत काशी निवासी अखिल जन्य तरने ।।
शेष नरेश कवेश गुण गायें।
तेरी पूर्ण आश निराशा सुरसरि सुखदंगे ।। जय ।।
सुरवधु सारी नृपति सुनारी स्नया मृदमद देते। 185
कार्तिक महात्म्य
सुरलोक गच्छति सुरधर निर्मदले।;
तेरी महिमा का लगि बरनूं गंगे भवभंजे।
त्रिपथगामिनि सुर नर पन्नगधे ।। जय ।।
गंगा आरती सकल उधारिन हरजनने।
सुनत सुनावत फल पावत मन के।। गावत आरती राम कृष्णजन के।
☆☆☆
सकल कामना पूरन करत श्री गंगे ।। जय ।।
आरती श्री त्रिवेणीजी की
पद-ओ३म जय श्री त्रिवेणी ओ३म जय मां त्रिवेणी। तीरथराजप्रयाग प्रकाशनि सबको सुख देनी।। ओं।।
गंगा यमुना प्रगट बहत मिलि, धन्य दोउ बहैनी।
धारा गुप्त सरस्वती, सुगम स्वर्ग नसैनी ।।१।।
अन्तरवेद शास्त्र शूचि महिमा, सत्य काल धैनी।
पाप काटने भक्त भगवती, हो पैनी छेनी ।।२।।
छवि सुन्दर साक्षात ब्रह्ममय, रत्न राशि बैनी।
नीर आलौकिक पवन सुधामय, रुचिर मधुर फैनी।।३।।
यज्ञ दान तप सुमन अक्षयवट, सुख सम्पति श्रेणी।
कुम्भ विश्व सम्मेलन गोविन्द, अपार लाभ अपैनी ।।४।।
कार्तिक महात्म्य
186
ओं जय श्री त्रिवेणी ओं जय मां त्रिवेणी। तीरथराजप्रयाग प्रकाशनि सबको सुख देनी ।।५।।
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श्री हनुमान जी
लाल देह लाली लसे अरु धरी लाल लंगूर।
वज देह दानव दलन जय-जय कपि सूर।। टेक।।
आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।। आरती
जाके बल से गिरवर कांपे। रोग दोष जाके निकट नहीं झांके ।। आरती बलदाई।
महा अंजनी पुत्र सन्तन के प्रभु सदा सहाई ।। आरती
वीरा रघुनाथ पठाये। दे लंका जारि सिया सुधि लाये।। आरती
लंका सो कोट समुद सी खाई।
लका
जात पवन सुत बार न लाई ।। आरती जारि असुर संहारे।
सियारामजी के काज संवारें ।। आरती
लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे। आनि संजीवन प्राण उबारे।। आरती
187
कार्तिक महात्म्य
पेठि पाताल तोरि यम कारे।
अहिरावण की भुजा उखारे।। आरती बायें भुजा असुरदल मारे।
दाहिने भुजा संतजन तारे ।। आरती सुर नर मनि आरती उतारें।
जै जै जै हनुमान उचारें ।। आरती कंचन थार कपूर लौ छाई।
आरती करत अंजनी माई ।। आरती विध्वंस लंक किया रघुराई।
तुलसीदास कपि आरती गाई।। आरती जो हनुमान जी की आरती गावै।
बसि बैकुण्ठ परम पद पावै।। आरती
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श्री शंकर जी
जय-जय कैलाशपति जय देवों के देव। स्वीकारों प्रभु आरती हर-हर महादेव।। टेक।।
जय शिव ओंकारा, हर शिव ओंकारा, ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धगी धारा।। टेक।। एकानन चतुरानन, पंचानन राजे।
कार्तिक महात्म्य
188
हंसानन गरुड़ासन, वृषवाहन साजे ।। जय ।।
दोऊ भुज चारु चतुर्भुज, दश भुज ने सोहे। तीनों रूप निरखता, त्रिभुवन-जन मोहे।। जय ।।
अक्षमाला वनमाला, मुण्डमाला धारी।
वन्दन मृगमद सोहै भोले शशिधारी।। जय ।।
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे।
सनकादिक ब्रह्मादिक भूतादिक संगे।। जय ।।
कर में श्रेष्ठ कमण्डलु चक्र त्रिशूल धर्ता जगकरता जगहरता जगपालन करता।। जय ।।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर में शोभित ये तीनों एका।। जय ।।
त्रिगुण शिवजी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी मनवांछित फल पावे।। जय ।।
ओम जय जगदीश हरे
देव सच्चिदानन्द प्रभु हे इशों के ईश। करूं तुम्हारी आरती जय जय जगदीश।। टेक।। ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे। भक्त जनों के संकट छिन में दूर करे।।ॐ जो ध्यावे फल पावे दुःख बिनसे मन का। स्वामी 189
कार्तिक महाल्य
सुख-सम्पत्ति घर आवे कष्ट मिटे तनका ।। ॐ भात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी। स्वामी तुम बिन और न दूजा, आस करूं जिसकी ।। ॐ तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी। स्वामी पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी ।। ॐ तुम करुणा के सागर तुम पालन कर्त्ता। स्वामी मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता। ॐ तुम हो एक अगोचर जग में, सबके प्राणपति। स्वामी किस विधि मिलूं गोसाई, तुमको मैं कुमति।। ॐ दीनबन्धु दुःख हर्ता, ठाकुर तुम मेरे। स्वामी अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे । ॐ विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा। स्वामी श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, सन्तन की सेवा ।। ॐ
☆☆☆
श्री विष्णु स्तुति
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्यनाभं सुरेशं, विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभांगम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं गोगिभिर्ध्यानगम्यं, वन्दे विष्णुं भवभयहर सर्वलोकैकनाथम् ।।
कार्तिक महात्म्य
190
।। श्री कमलनेत्र स्तोत्र।।
श्री कमलनेत्र कटि पीताम्बर, अधर मुरली गिरधरम् ।
मुकुट कुण्डल कर लकुटिया, राधे वरम् ।।
सांवरे
कूल यमुना धेनु आगे सकल, गोपियों के मनहरम् ।
पीत वस्त्र गरुड़ वाहन चरण, नित सागरम् ।।
सुख
करत केलि कलोल निशदिन, कुब्जा भवन उजागरम् । अचल अमर अडोल निश्चल,
अपरापरम् ।। पुरुषोत्तम दीनानाथ दयालु गिरधर,
कंस हिरनाकुश हरम् । गले फूल माल विशाल लोचन, अधिक सुन्दर केशवम् ।।
वंशीधर वसुदेव छल्यो बलि,
कार्तिक महाल्य
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छल्यो हरि वामनम् ।
जल डूबते गज राख लीनो, लंका छेन्द्यो रावणम् ।।
सप्तदीप नवखण्ड चौदह,
भवन कीनो एक पलम् । दोपदी की लाज राखी,
कहां लौ उपमाकरम् ।।
करुणामय
दीनानाथ दयालु पूरण, करुणाकरम् ।
कविदत्त दास विलास निशदिन, नाम जपत नित नागरम् ।।
प्रथम गुरुजी के चरण वन्दो, यस्य ज्ञान प्रकाशितम् ।।
विष्णु जुगादि शिवशंकरम् ब्रह्म,
सेवते
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193
॥ गुरुदेव से विनती ॥
सतगुरू प्यारे से मिलन कैसे होए। खिड़की तो चारों बंद पड़ी।।
(1) रामा पहली खिड़की खोल के देखें, उसमें कॉट बबूल। मुझसे इतना ना होये भगवान, झाडूं तो यामें वे के चलूँ।
(2) रामा दूजी खिड़की खोल के देखें उसमें गंगा जमुना। मुझसे इतना न होये भगवान, गोता तो यामें मार चलूँ।
(3) रामा तीजी खिड़की खोल के देखें, उसमें भोले बाबा। मुझसे इतना ना होये भगवान, पूजा तो याकी करके चलूँ।
(4) गमा चौथी खिड़की खोल के देखें, उसमें श्री भगवान। मुझसे इतना ना होये भगवान, दर्शन तो या यो करके चलूँ।
(5) रामा पाँचवीं खिड़की खोल के देखूं उसमें गुरु भगवान। मुझसे इतना ना होये भगवान, जान तो इनसे ले के चलें।
(6) रामा छठी खिड़की खोल के देखें, उसमें घोर अंधेरा। मुझसे इतना ना होये भगवान, दिवला तो यहाँ चास चलें ॥
(7) समा सातवीं खिड़की खोल के देखूँ, उसमें कपिला गाय। मुझसे इतना ना होये भगवान, सेवा तो इसकी करके चलें।
चौबारा
धरती माता का चुनियो चौबारा
चाँद और सूरज का चुनियो चौबारा
नौ लाख तारो का चुनियो चौबारा
महादेव पार्वती का चुनियो चौबारा
विष्णु लक्ष्मी का चुनियो चौबारा
राधा क्मण का चुनियो चौबारा
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194
तुलसा पथवारी का चुनियो चौबारा
गंगा-यमुना का चुनियो चौबारा
अपनी काया का, अपने दीदे-गोढ़ो का चुनियो चौबारा
बेटे-पोतों का, भाई-भतीजों का चुनियो चौबारा
दीह-जंवाई का, अगड पड़ौसन का चुनियो चौबारा
गली-मोहल्ले का, राम श्याम का चुनियो चौबारा
तैतीस करोड़ देवी देवताओं का चुनियो चौबारा।
भजन पथवारी
पथवारी तुझे सीचे रीद्धी-सीद्धी, जो विन्दायक बाबा घर आए
पथवारी तुझे सीचे गंवतरी, जो नान्द्योई घर आए
पथवारी तुझे सींचे जंवतरी, जो चान्दयो घर आए
पथवारी तुझे सींचे पार्वती, जो महादेव घर आए
पथवारी तुझे सींचे लक्ष्मी माता, जो विष्णु घर आए
पथवारी तुझे सींचे सीता माता, जो रामचन्द्र घर आए
पथवारी तू पथ की है रानी भूल्या न वाट बताव रानी भूल्या न वाट बिछेड़या ने मेलो बिछड़या न ल्यान मिलाव, पथवारी तुझे सीचे धरती माता, जो इन्द्र घर आए पथवारी तुझे सीचें राणा वेद जो सूरज घर आए पथवारी तुझे सींचे राधा रुक्मण, जो कृष्ण घर आए पथवारी तुझे सीचें तुलसामाता, जो सालिग्राम घर आए पथवारी तुझे सीचे गौरा, जो ईश्वर घर आए पथवारी तुझे सींचे सबीरी, जो बीरा घर आए पथवारी तुझे सींचे सपूती, जो पत्र घर आए पथवारी तुझे सींचे सुहागन, जो साहेब घर आए
195
तेरो साहेब आवै, निधल्यावे, मन इच्छा फल पावे, पथवारी सींचू बाट सिलाऊ, मंगल गाऊँ दिवला जोऊँ
पालना
कांये का तेरा पालना री सजनी, कांय लग रही डोर, झुलाओ मोरी सजनी, श्री राम झूले पालना। झुल्लाओ मोरी सजनी। अंदनं-चंदन का पालना री सजनी, रेशम लग रही डोर। झुलाओ... ये कौन झूले, ये कौन झुलावे, ये कौन झोटा दे। झुलाओ... श्री राम झूले, कौशल्या झुलावे, दशरथ झोटा दे। झुलाओ... एक लुगाई हमारे अंगना में आई, लाला के नजर लगाई। झुलाओ... आँख न खोले लाला, मुख से न बोले, हुलर-हुलर दूधागेरे। झुलाओ... उस रे लुगाई न पकड़ बुलाओ, लाला की नजर उतारो। झुलाओ.. नून-राई उतारे यशोदा, लाला की नजर उतारी। झुलाओ... आँख भी खोले लाला, मुख से भी बोले, गुटर-गुटर दूधा पीवे। झुलाओ.. श्री राम झूले पलना जी। झुलाओ मेरी सजनी। आंगन में खेलत हैं चारों भाई, ब्रज में खेलत हैं चारों भाई, राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघन हैं आंगन में धूम मचाई, दूर खेलन मत जाओ, मेरे लाल दूर बड़े बड़े हाऊ, आंगन में... मारी गेंद गई जमुना, कूद पड़े रघुराई, ना कोई चाचा, ना कोई ताऊ, ना कोई माँ का जाया। भाई। आंगन...
हम ही चाचा, हम ही ताऊ, हम ही माँ का जाया भाई। आंगन... रावण मार राम घर आए, घर घर बंटे बधाई। आंगन... माता कौशल्या करे आरती, सखियों ने मंगल गाई, आंगन.... राम. लक्ष्मण, चरत, भरत हैं हनुमत चंवर डुलाई, आंगन मे...
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आरती
कसे ए कार्तिक की नहाने वाली श्री कृष्ण जी की आरती हे राम। काहे को तेरो दिवलो जी, काहे तेरी बात कोन सुहागण कौन समुती। जोहीयो जी भर कार्तिक की सत।
सोने को मेरो दिवलो जी रूपा मेरी बात मैं ही सुहागण मैं ही सपूती। जो हीयो जी भर कार्तिक की रात ।
श्री नारायण जी की आरती हे राम।
लीपा पोता ओबरा जी माय बिछाई सेज यो जोड़ी तो अलचल रहीयों एक पुरुष दूजी नार। श्री नारायण जी को आरती हे राम।
चंदन भरबो चौकड़ा जी मोतियन भर लो मांग करो कृष्ण जी की आरती हे राम।
छींके दही जमावती मिश्री का जामन दे हर न नोत जीसावती जी अलचल ढोलुगी जायं श्री नारायण को आरती हे राम।
हंस हंस दोपहरी मोचडी जी हंस हंस बांधी पांग श्री कृष्ण जी व्यावण चल दिया। बरणी है। राजकुमार। श्री नारायण जी की आरती हे राम।
गंगा बड़ी गोदावरी जी तीर्थ बड़े प्रयाग बर्तों में एकादशी जी यो म्हारो प्रेम आधार। श्री नारायण जी को आरती हे राम।
भैसों में भैंसे बड़ी गायों में कपिला गाय नारियों में सीता बड़ी जी पुरुष बड़े भगवान श्री नारायण जी को आरती हे राम।
तुलसी का बिडला भला जी गाय चन्दन को रूख। साधु की मण्डली भली जी।
माय सावरीया हर को रूप। श्री नारायण को आरती हे राम।
नारायण के आरते में कौन-कौन रखवाला सीता माता द्रोपदी जी और कोशल्या हर की माया
197
श्री नारायण जी को आरती हे राम। नारायण के आरते में कौन-कौन फल होवे अन्न धन लक्ष्मी बहुत धनी मौर मुकुट गत होवे। श्री नारायण जी को आरती हे राम।
रसोई
उठो रानी रूक्मण तपो ए रसोई, हमसे उठाए न जाए, हमारा अंग पसीजे, तुम्हारा अंग पसीजे, स्नान करो जी, स्नान करे ते हमारा कानुड़ो सा दुःख, तुम्हारा कानुंडो सा दीखे, झाड़ परदा दीवावो, झठदे उठी रानी राधिका, न्हाई धोई करने चली है रसोई। हर का चौका बुहारी दीनी, कुम्भ कलश भर लाई। हर का दाल रांधा भात रांधा, परवल की तरकारी, हर का जीमो देई-देवता मन चित्त लाई। हर का जीमों महादव पार्वती मन चित्त लाई। हर का जीमो विष्णु लक्ष्मी मन चित्त लाई। हर का जीमों तुलसा पथवारी मन चित्त लाई। हर का जीमो गंगा जमुना मन चित्त लाई। हर का जीमो राम और लक्षमण, तुलसा पथवारी मन चित्त लाई। हर का जीमो छतिस करोड़ देई-देवता मन चित्त लाई। राधा मांग न होय सो मांग हमारे मन भाई अन्न-धन लक्ष्मी हमारे बहुत, कहो जी कुछ मांगा। पीहर-सासरा हमारे बहुत, कहो जी कुछ मांगा। भाई-भतीजे हमारे बहुत, कहो जी कुछ मांगा। बेटे-पोते हमारे बहुत, कहो जी कुछ मांगा। साई-सेती हमारे राज, कहो जी कुछ मांगा।
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हम तो चढ़ावें राम तुलसी का बिड़ला तो शीश धरे-हर लागे राम। यों ही चढ़ाऊँ राम, यो ही धर पूँजू, यो ही धरूंगी हर के आगे राम।
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थाली
कार्तिक डारो मगन महीना, तो गाओ न किशन हर की थाली थाली हो राम। राम जी को नौतन राधिका चली है तो, ओढ़ कसुम बल साड़ी साड़ी हो राम। धोला चावल फटक कर संध्या तो मूंगा की दाल हरी-हरी। सुरभी गऊ का घिरत भंगाया। तो, भांय भिरचा की तली-तली राम। भूरही भैंस का दही जमाया तो मोंय माखन की डली डलो।
पापड-पूडी कैर करेला तो, और चूलां की फली फली। हो राम। गढ़-मथुरा से थाल मंगाया तो, जीमो कृष्ण हर की रली-रली हो राम।' सात कौशल्या ने थाल परोसा तो, भोग लगाओ कृष्ण हरी-हरी। चंद्रावल हर की चुटकी बजाये तो, आंगन भीतर खडी खडी। हो राम। बहन यशोधरा चुटकी बजाये तो, आंगन भीतर खड़ी खड़ीं हो राम। सोन चिडी हर का सगुन मनावे तो, बैठे अम्बे की डाली डाली राम। जो कोई राम जी की थाली गावे तो, लख चौरासी टली-टली हो राम। हम गावां हमारा राम जी न लडावा तो पूरन मन की रली-रली। हो रुम। बाली गावे घरवर पावे तो तरणी पुत्र खिलावे हरी-हरी हो राम। बूढी गावें गंगा जमुना न्हावें तो, स्वर्ण पालकी आवे हरी-हरी। हो राम।
तुलसा भजन
तुलसा महारानी नमो नमो, हर की पटरानी नमो नमोः कौन से महीने में बोई रानी तुलसा तो, कौन से महीने में हुई हरियाली। आसाढ़ के महीने में बोई रानी तुलसा तो, सावन मास हुई हरियाली। कौन से महीन में हुई तेरी पूजा तो, कौन से महीने में हुई पटरानी।
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कार्तिक के महीने में हुई मेरी पूजा तो, मंगशिर मास हुई पटरानी। धूप-दीप नैवेध आरती तो, पुष्पन की बरसा बरसानी नमो नमो। छपन भोग छत्तीसो व्यंजन तो, बिन तुलसा हर एक न मानी नमो नमो। जो कोई तुलसा का सवेरे गाए तो श्री कृष्ण के दर्शन पाए। जो कोई तुलसा को दोपहर को गाए तो खीर खांड के भोग लगाए। जो कोई तुलसा माई सांझ को गाय तो श्री कृष्ण जी को आरती उतारे। जा काई तुलसः उत्ते नो गाए तो श्री कृष्ण जी के चरण दबाए। महारानी नमो नमो हर की पटरानी नमो नमो।
माला भजन
माला री तेरा जपना कठिन है, माला री तेरा भजना कठिन है। सास, ससुर और पति अपने की, इन तीनों की सेवा कठिन है। माता-पिता और गुरु अपने की, इन तीनों की आज्ञा कठिन है। चाँद-सूरज और नौ लाख तारे, इन तीनों का मिलना कठिन है। गंगा-यमुना और त्रिवेणी, इन तीनों का बहना कठिन है। राम, लक्ष्मण और सीता मईया, इन तीनों का दर्शन कठिन है। माला री।
☆☆☆
तुलसा
राधे खडी हैं बदन पूछे हर से बात हर नारायण श्री भगवान। कपडे कहाँ धुलवाए मेरे राम, मेहंदी कहां लगवाई मेरे राम। राखी, कजरा, टीका कहां लगवाया मेरे राम, हर नारायण श्री भगवान। हम तो राधाप्यारी घाट गए थे तो धोबन ने कपडे धोए मेरे राम। मालिन ने मेहंदी लगाई मेरे राम, सावन महीने सलूनों आई तो, बहनों ने राखी बांधी मेरे राम, कातिक महीने भैया दूज जो आई तो, कजरा इस गुण डाला मेरे राम, कातिक महीने भैया दूज जो आई तो,
202
बहनो ने टीका लगाया मेरे राम, हर नारायण श्री भगवान। क्यों री धोबन हम तुम्हें मारे तो श्रीकृष्ण के मेहंदी, कपड़े क्यों धोए मेरे राम, क्यों जी राधा प्यारी हमें क्यों मारो तो, तुलसा सौतन ब्याही मेरे राम, हर नारायण श्री भगवान। क्यों जी कृष्ण जी झूठ क्यों बोले, तुलसा सौतन ब्याही मेरे राम। हम तो राधा प्यारी तुमसे डरे थे तो झूठ जो इस विध बोला मेरे राम।
भजन माला
उम्र सारी बीत गई माला ना फेरी।
भोर भई चिड़िया चहकायीं, मैं घर-घर हांड आर्या, माला ना फेरी।
मैं तेरी-मेरी कर आयी माला ना फेरी। उम्र सारी बीत गई...
न्हाय धोये आसन पर बैठी, ये निदिया बेरन आ गई माला ना फेरी, मैं गप्प गप्प खा आयी माला न फेरी। उम्र सारी बीत गई...
साँझ हुई जब निकले तारे, मैं घाल खटोला सोय गयी माला ना फेरी। उम्र सारी बीत गई माला ना फेरी।
यम के दूत जब लेने की आये, मैं खड़ी खड़ी कांप रही माला ना फेरी। उम्र सारी बीत गई माला ना फेरी।
धर्मराज जब लेखा माँगे, मैं सच-सच बोल आयी। उम्र सारी बीत गई माला ना फेरी।
गंगा भजन
मेरा कर दो बेड़ा पार गंगे महारानी, तुम कर दो बेड़ा पार गंगे महारानी।
1. पत्थर फोड़ गऊ मुख निकली। कोई शिव की जटा में समाय गंगे महारानी। मेरा कर दो बेड़ा पार गंगे महारानी...
2. एक धार आकाश को गयी है दूजी गयी पाताल गंगे महारानी।
3. इधर से गंगा उधर से यमुना संगम हुआ अपार गंगे महारानी।
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4. हाये धोये से पाप कटेगे कोई पीने से उद्धार गंगे महारानी।
5. पान चढ़े तो पे फूल चढ़े तो पे चढ़े दूध की धार गंगे महारानी।
6. ध्वजा नारियल पान सुपारी कोई तेरी भेंट चढ़ाये गंगे महारानी।
7. साधु संत तेरी करें आरती हो रही जय-जयकार गंगे महारानी।
8. दूर-दूर से आये यात्री कोई चरणों में शीश नवायें गंगे महारानी।
यमुना भजन
तेरी लहर मन भायी सुन यमुना मईया
1. गोरे-गोरे माथे पर चौड़ी-चौड़ी बिंदिया, लगावत में शरमायी सुन यमुना मड़या।
2. गोरी गोरी बईया में हरी-हरी चूड़ियाँ, पहन, मैं शरमायी सुन यमुना मड्या।
3. छोटी-छोटी उंगली में बड़े-बड़े बिछुवा पहन, मैं शरमायी सुन यमुना मड्या।
4. मोतीचूर मगध के लड्डू, खावत मैं शरमाई सुन यमुना मइया।
5. गोरे-गोरे तन पर लाल साड़ी, गुच्छा देख शरमायी सुन यमुना मड़या।
सगाई (1)
खेलत-खेलत राधा गई है ब्रज में, नन्द रानी कोर बुलाई हो-राम। हरा-हरा गोबर राधा, पीली पीली माटी, मुतियन चौक पुराया हो राम। अंदन चंदन के राधा पटरे बिछाये, ऊपर राधा बिठाई हो राम। छोटा सा लड़का री राधा गऊ चरावे, उम्र धोर बिठाया हो राम। अरी जरी की राधा चुंदड़ी उड़ाई, ऊपर जरत किनारी हो राम। आप भी खाइयो राधा सखियों ने दीजो, घर लेके मत जाइयो हो राम। आज तो आई राधा फिर मत आइयो, यहाँ तेरी हुई है सगाई हो राम। राधा की माता यूँ उठ बोली।
संग की सहेली सब घर आई तूने कहाँ देर लगाई हो राम।
खेलत माता गई थी ब्रज में, नन्दरानी कोर बुलाया हो राम।
204
हरा-हरा गोबर माता पीली पीली माटी, मुतियन चौक पुराया हो राम। अंदन-चंदन के माना पटरे बिछाये, ऊपर हमको बिठाया हो राम। छोटा सा लड़का री माता गऊऐ चरावे, उम्र घोर बिठाया हो राम। अरी-अरी की माता चुंदड़ी उड़ाई, मेवा से गोद भराई हो राम। आप भी खाइयो राधा सखियों ने दीजो, घर लेके मत जाइयो हो राम। आज तो आई राधा फिर मत आइयो, यहाँ तेरी हुई है सगाई हो राम। देखो री मेरी अगड़ पड़ोसन, दोरानी-जेठानी राधा ने कैसी लजाई हो राम।
सगाई 2
वृषभानु की कंवर लाड़ली नन्द जी के द्वारे प्रहुंची हो राम। उस नन्द रानी ने हेलो मारा, या ही से करूंगी सगाई हो राम। सारा तो गहना पहनाया, नौसर हार पहनाया राम। छमछम तो पायल पहनाई, सारा ही शहर सराहे। मेरी राधा गोरी कृष्ण हर सांवला हरे राम। खेल-माल राधा घर को आई, माता पूछन लागी राम। किसके द्वारे खेलन गई थी, कौन तेरा करा है सिंगार। नन्द जी के द्वारे खेल गई थी, नन्द रानी ने करा सिंगार। सारा तो गहना पहनाया, नौसर हार पहनाया मां। छम-छम तो पायल पहनाई, सारा ही शहर सराहे मां। मेरी राधा गोरी कृष्ण हर सांवला हरे राम। राधा तो मेरी भोली-भाली और कुछ ना जाने राम। उस नन्द रानी से यूं कह दीजो, ना करूं काले सें ना करूं गूजर से सगाई, मेरी राधा गोरी कृष्ण हर सांवला हरे राम। नन्द जी के हरे बाग में, राधा खेलन चली राम। राय चमेली का फूल तोड़ा, डस गया काला नाग। नन्द जी के वो हरे बाग में नौ नौ मेदा चाले राम।
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